Saturday, February 24, 2024
spot_img
Home Blog

किशन प्रणय के राजस्थानी मालवी उपन्यास ‘गाम परगाम ने मौसर’ का लोकार्पण

कोटा, ‘आखर’ राजस्थान के तत्वावधान में विश्व मातृभाषा दिवस पर आईटीसी राजपूताना जयपुर में आयोजित समारोह में युवा कवि, उपन्यासकार किशन प्रणय के राजस्थानी मालवी उपन्यास ‘गाम परगाम ने मौसर’ का लोकार्पण हुआ । समारोह के मुख्य अतिथि अमर उजाला के समूह संपादक सलाहकार एवं प्रख्यात व्यंग्यकार यशवंत व्यास और राजस्थान लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. ललित के. पँवार थे।

इस अवसर पर यशवंत व्यास ने मालवी बोली और उससे जुड़े लोक गीत पर उद्बोधन देते हुए मातृभाषाओं की बारीक बातों और अंतर-संबंधों पर प्रकाश डाला । अतिथि डॉ. ललित के. पँवार ने इस उपन्यास को मालवी भाषा की समृद्धि बताया। लेखक किशन प्रणय ने बताया कि इस उपन्यास से मालवा के परिवेश और वहाँ की सांस्कृतिक शब्दावलियों को समझने में मदद मिलेगी। यह उनकी ग्यारहवीं पुस्तक है।

इस अवसर पर आयोजित काव्य-सत्र में मुरलीधर गौड़, देवीलाल महिया, विमला महरिया और मोहनपुरी ने सरस काव्य-पाठ किया। हाड़ौती के मधुर गीतकार मुरलीधर गौड़ के गुरु ब्रहम्मा और मांड बेटी मांड गीतों की स्वर लहरियों से श्रोता झूम उठे। समारोह में सागर कुमावत मऊँ की धाराळी कलम तथा बाबूलाल शर्मा की भटकै ‘विज्ञ’ चकोर का लोकार्पण भी हुआ। समारोह का संचालन प्रदक्षिणा ने किया तथा आखर के प्रमोद शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

ज्ञातव्य है कि साहित्य के क्षेत्र में विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किशन प्रणय की इससे पूर्व हाल ही में काव्य-प्रतिवेदन पुस्तक ‘भ से भगत’ का प्रख्यात साहित्यकार डॉ. नन्दकिशोर आचार्य, प्रसिद्ध कवियत्री एवं नाट्यशास्त्रज्ञ डॉ. संगीता गुंदेचा और केंद्रीय संस्कृत अकादमी के कुलपति डॉ श्रीनिवास वरखेडी के आतिथ्य में प्रगति मैदान दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेला 2024 में लोकार्पण हुआ था।

कथाकार-समीक्षक विजय जोशी ने लिखा है – ‘कीं उपन्यास में बोली ईं लैर बात हो तो समझ में आवै कै युवा रचनाकार को मन आपणी बोली अर संस्कृति कै बेई एक हूँस राखै है। या हूँस ईं बगत जरूरी है जो बोली अर भाषा की पैठ बनाया राखेगी। ईं उपन्यास में लोक जीवन में रम्या परम्परा का वै अध्याय है, जां में बदलता परिवेश की सुगबुगाहट है, तो मन में भीतर तक जाजम बिछाया बैठी परम्परा की सरसराहट बी है। याई कोईनीं समाज कै घणी भीतर तक दब्या पाँव चालती आरी रीत की भींत है तो ईं भींत में बन्या नई सोच का आल्या बी है। येई वै आल्या है जां में जग की बाताँ जग में घूम-फिर कै आर बिराज जावै है, अर फेर दिन उग्याँ पाछी जग आड़ी जातरा करबा चली जावै है।’

image_print

अरुण शौरी की नजर में तलाक और हलाला की क्रूर सच्चाई

प्रसिद्ध पत्रकार एवँ लेखक अरुण शौरी ने एक पुस्तक लिखी है जिसका नाम है The World of Fatwas or The shariah in Action। इसका हिंदी अनुवाद वाणी प्रकाशन, दिल्ली से “फ़तवे, उलेमा और उनकी दुनिया” के नाम से प्रकाशित हुआ था। इस पुस्तक में पिछले 100 वर्षों में विभिन्न मुस्लिम संस्थानों से मौलवियों द्वारा दिए गए विभिन्न फतवों को विषयानुसार समीक्षात्मक दृष्टि से परखा गया हैं। मैंने इस पुस्तक विशेष का नाम एक विशेष कारण के चलते लिया हैं।

आपको कोई भी सड़क चलता मुसलमान यह कहता सुनाई देगा कि “इस्लाम ने औरतों को जितना ऊँचा स्थान दिया है, उससे ऊँचा स्थान उन्हें किसी और धर्म ने नहीं दिया हैं।” इस लेख में हम इस कथन की अरुण शौरी के लेखन के माध्यम से समीक्षा करेंगे।हम तीन तलाक से आरम्भ करते है। शौरी के अनुसार पैगम्बर साहिब को तलाक से बेहद घृणा थी। वे लिखते है “सभी विधिसम्मत कार्यों में से, तलाक अल्लाह को सबसे ज्यादा घृणास्पद लगता था। सन्दर्भ-पृष्ठ 267”

सिद्धांत रूप में तलाक के घृणास्पद होने के बाद भी इस्लाम में पति केवल एक शब्द तलाक कहकर औरत को घर से निकाल सकता हैं। पत्नी की तीन माहवारी के बीच की अवधियों के दौरान एक-एक बार अथवा एक साथ तीन बार भी कह सकता हैं। पति द्वारा जाने-अनजाने, क्रोध, नशे, किसी के गुमराह करने पर, मजबूर किये जाने पर, मजाक में, गर्भावस्था अथवा बीमारी में, कहना न मानने पर, नमाज़ न पढ़ने पर आदि स्थिति में भी अगर तलाक उसके मुख से निकल गया है तब भी कोई हाकिम बीच बचाव कर पत्नी को तलाक से नहीं बचा सकता।

शरिया ऐसी सख्ती से मौलवियों द्वारा लागु किया गया हैं। एक बार घर से बाहर निकाल दिए जाने पर वह किसी रख रखाव खर्च की हकदार नहीं होती। सिवाय तीन माहवारियों तक की अवधि तक खर्च उसे पति से मिल सकता हैं। उसके बाद वह किसी खर्चे की हकदार नहीं रह जाती। तलाक देने वाले पति के लिए किसी प्रकार की कोई जवाबदेही नहीं हैं।

इस्लाम के समर्थक हमेशा यह साबित करना के लिए बैचैन रहते हैं कि उनका धर्म किस प्रकार हमेशा से ही प्रगतिशील, अग्रसर और आधुनिक रहा हैं।इसके विपरीत जब हम क़ुरान या हदीस का अध्ययन करते हैं, तो पता चलता है कि औरत एक ऐसी विपत्ति है जिसे आदमी को झेलना है और वह एक खेत है, जिसे आदमी अपनी मर्जी के मुताबिक चाहे सींचे या न सींचे। (सन्दर्भ-पृष्ठ 304 एवं क़ुरान 2/223) । ज्यादा से ज्यादा यह उन चीजों में से एक है, जिन्हें अल्लाह ने आदमी के आनंद के लिए पैदा किया है। (सन्दर्भ-पृष्ठ 304)

निकाह के समय जो मेहर दी जाती है उसका रामस्वरूप जी की पुस्तक वीमेन इन इस्लाम के अनुसार अर्थ है ‘उजरत’ अर्थात औरत को इस्तेमाल करने का भाड़ा। मर्द को तो बस औरत से आनंद लेना है और जब वह उससे ऊब जाए तो मामूली सा रखरखाव खर्च और इकरारनामे में तय हुआ मेहर देकर उसे फैंक सकता है। अर्थात यह इस्लाम में औरत के लिए केवल एकतरफा पुरुष का मनमाना एकाधिकार है। औरत को तीन तलाक का भी दिखाकर सदा दबाकर रखने का मंसूबा भर हैं। एक इस्लाम में निष्ठा रखने वाली औरत तलाक से क्यों इतनी भय खाती हैं। इसका केवल आर्थिक और सामाजिक कारण भर नहीं हैं। अपितु एक अन्य कारण भी हैं।

इसे हम तलाक वापिस करने की प्रक्रिया के रूप में जानते हैं। पति अगर पत्नी को तलाक देकर पछताए और उसे दोबारा अपनी बीवी बनाना चाहे तो वह तब तक उसकी बीवी नहीं बन सकती, जब तक कि वह इद्दत की अवधि समाप्त होने के बाद किसी दूसरे आदमी से शादी न करे और वह दूसरी शादी सहवास द्वारा पक्की न हो जाये और वह दूसरा पति उसे तलाक न दे दे और उसके बाद उसकी इद्दत की अवधि पूरी न हो जाए। इस प्रक्रिया को “हलाला” कहते है। उलमा के अनुसार दूसरे पति का सहवास के द्वारा शादी को पक्का नहीं कर देता तब तक हलाला पूरा नहीं होता। अगर कोई पत्नी को तलाक दे दे। उस महिला का दूसरा विवाह भी हो जाये पर जब तक उसका दूसरा पति उसके साथ अगर हमबिस्तरी न करे, तो वे सब कुफ्र के दलाल होते हैं और वह आदमी (मूल पति) और औरत व्यभिचारी और व्यभिचारिणी होते हैं। ऐसे सब लोगों को हद दर्जे की यातना झेलनी पड़ेगी और उन्हें दोज़ख की आग नसीब होगी। (सन्दर्भ-पृष्ठ 324)

शरिया के अनुसार बिना शारीरिक सम्बन्ध बनाये एक महिला का अपने दूसरे पति से तलाक नाजायज़ ही कहलायेगा। पाठक स्वयं सोचे कि क्या “हलाला” कैसी प्रथा के डर से इस्लाम को मानने वाली औरत तलाक से कितना भयभीत रहेगी। सदा पति की जायज-नाजायज मांगों का समर्थन करेगी। यह अत्याचार नहीं तो क्या हैं?

रसूल को तलाक से घृणा थी फिर इस्लाम में यह तलाक कैसे आया? यह जानने के लिए आपको असगर अली इंजीनियर की ‘दि राइट्स ऑफ वीमेन इन इस्लाम’ नामक पुस्तक पढ़नी पड़ेगी। वे लिखते है, “सवाल यह पैदा होता है कि दूसरे ख़लीफ़ा हज़रत उमर ने तलाक-ए-बत्ताह (तीन बार तलाक) क्यों लगी किया?” इसकी शुरुआत तब हुई जब जंगों में जीती गई बहुत सी औरतें श्याम, मिश्र और दूसरे स्थानों से मदीना पहुंचने लगी। वे गोरे रंग की खूबसूरत औरतें थीं और अरबी लोगों के मन में उनसे विवाह करने की लालसा जाग उठी। लेकिन ये औरतें सौतों के साथ रहने की आदि नहीं थी। इसलिए वे आदमियों के सामने यह शर्त रखती थीं कि वे अपनी पहली बीवियों को तीन बार तलाक दें ताकि उन्हें वापिस न लिया जा सके। वे उन औरतों की तसल्ली के लिए तीन तलाक कह देते और बाद में अपनी बीवियों को वापिस बुला लेते थे। जिसके कारण अनेक विवाद खड़े होने लगे। इसलिए हज़रत उमर ने एक ही बार में दिए गए तीन तलाकों को वापिस न लिया जा सकने वाला तलाक करार दे दिया। तबी से यह शरीयत का अभिन्न अंग बन गया।- (सन्दर्भ पृष्ठ 337-338)

विडंबना यह देखिए कि अरब के लोगों का शौक इस्लाम का एक मजबूत स्तम्भ बन गया। जिस पर सन्देश करना अथवा शंका करना भी कुफ्र अर्थात हराम गिना गया। आज भी शरिया को देश विशेष के कानून से ऊपर मानने वाला मुस्लिम समाज पुरानी प्रथाओं को केवल इस्लाम के नाम पर डोह रहा है। मज़हब के मामले में अक्ल का दख़ल नहीं ऐसा विचार रखने से उसने न केवल अपने आपको रूढ़िवादी बना लिया हैं। अपितु अपने समाज को एक अव्यवहारिक, अतार्किक, बंद समाज में परिवर्तित भी कर लिया हैं।

अरुण शौरी की पुस्तक के आधार पर तैयार किये गए इस लेख को पढ़कर क्या कोई मोमिम यह कहना पसंद करेगा कि “इस्लाम ने औरतों को जितना ऊँचा स्थान दिया है, उससे ऊँचा स्थान उन्हें किसी और धर्म ने नहीं दिया हैं।”

image_print

सनातन धर्म में कर्म और कर्म के आधार पर जन्म के नियम

सनातन धर्म के तीन मूल आधार स्तंभ हैं। कर्म नियम, पुनर्जन्‍म एवं मोक्ष। कर्म के तीन प्रकार होते हैं -आगामी, संचित और प्रारब्ध। ज्ञान की उत्पत्ति के पश्चात् ज्ञानी के शरीर के द्वारा जो पाप-पुण्य रूप कर्म होते हैं, वे आगामी कर्म के नाम से जाने जाते हैं।इनमें सर्वप्रथम है कर्म नियम होता है। सनातन धर्म मानता है कि जो व्यक्ति जैसा कर्म करता है उसको वैसा ही फल मिलता है। कर्म नियम सनातन धर्म में ऋग्वेद के समय से चला आ रहा सिद्धांत है। ऋग्वेद में मंत्र दृष्टा ऋषियों ने विचार करके पाया कि किसी भी व्यक्ति के जीवन में अकृताभ्‍य उपगम और कृत हानि नहीं हो सकती।

अकृताभ्य उपगम का अर्थ है कि जो कर्म हमने नहीं किए हैं उसके परिणाम हमें मिलेंगे। कृत हानि का अर्थ है कि जो कर्म हमने किए हैं उसके परिणाम हमें न मिलें। ऐसा नहीं हो सकता। ऋग्वेद कहता है कि जो कर्म आपने किए हैं उसके परिणाम आपको मिलेंगे।

हिंदू सनातन धर्म में पूर्व जन्म और कर्मों की बहुत ही अहमियत होती है। सनातन धर्म मानता है कि जो व्यक्ति जैसा कर्म करता है उसको वैसा ही फल मिलता है। हम जीवन में तीन तरह के कर्म देखते हैं। तीसरे प्रकार का कर्म है अनासक्‍त भाव से किया गया कर्म होता है। इसके अलावा दो तरह के सर्वाधिक प्रचलित कर्म मुख्य रूप से होते हैं। प्रत्‍येक व्यक्ति मोटे तौर पर दो प्रकार के कर्म करता है जिन्‍हें हम अच्छे कर्म और बुरे कर्म में विभाजित कर सकते हैं।

जिस कर्म से भलाई हो , परोपकार हो ,सुख प्राप्ति हो और उद्देश्‍य की सिद्धि हो। वे अच्‍छे कर्म हैं और जिससे किसी की बुराई हो , दुख मिले, संताप मिले, काम रूकें तो ऐसे कर्म को हम बुरा कर्म कह सकते हैं। हम जिस विचार या भावना से प्रेरित होकर कर्म करते हैं, वे विचार एवं भावनाएं ही अच्छा या बुरा कर्म बनाती हैं। जो अच्छा कर्म है वह हमें अच्छे परिणाम देता है। बुरा कर्म , बुरे एवं अशुभ परिणाम देता है।

हम इस संसार में देखते हैं कि बहुत से लोग दुखी हैं, कई तरह के कष्ट पा रहे हैं। जीवन अभावों से ग्रस्त है। जबकि दूसरी ओर ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो सर्व सुविधा संपन्न हैं।

यहां पर दो बातें विचारणीय है। पहली बात कि धनी होने एवं सुखी होने में अंतर है। आवश्यक नहीं है कि जो धनी है वह सुखी ही है और जो निर्धन है वह दुखी ही हो। दूसरी बात यह कि हमारे जो कर्म हैं और जो परिणाम हमें मिल रहे हैं वे केवल इस जन्‍म के ही नहीं होते। हमारे पिछले जन्‍मों के कई कर्म होते हैं जिनका परिणाम हमें इस जन्म में मिल रहा होता है। किसी व्यक्ति को देख कर यह समझना कि वह अच्‍छे कर्म करके भी दुखी है या इसने कोई गलत कार्य नहीं किया है या यह दुष्‍कर्मी होकर भी धनवान दिख रहा है। इसने कोई श्रेष्‍ठ कर्म नहीं किया होगा। ऐसा विचार करना अनुचित है।

सनातन धर्म के शास्त्रों के अनुसार हम जो कोई कर्म करते हैं। हम किसी कामना की पूर्ति के लिए, किसी इच्छा से जो भी कार्य करते हैं। वे हमारे मन में एक संस्कार को उत्पन्‍न करते हैं वह संस्‍कार हमारी आत्‍मा से चिपक जाता है।

किसी व्यक्ति के मन में जब किसी दूसरे के प्रति हिंसा का विचार आता है तो वह संस्‍कार विचार के रूप में व्‍यक्ति के अंतर्मन में, अवचेतन में, आत्मा में चिपक गया और आगे चल कर वही संस्‍कार उसके दुख का कारण बनता है और उसको दुख देता है।

इसी तरह जो व्‍यक्ति करूणाभाव से प्रेरित होकर किसी व्‍यक्ति की भलाई करता है अच्‍छे कार्य करता है तो वे सदविचार के रूप में आत्मा की पवित्रता के रूप में अच्‍छे संस्‍कार के रूप में उसकी आत्मा में चिपक जाते हैं। वही आगे चल कर उसे सुख देता है।

तीसरे प्रकार का कर्म है अनासक्‍त भाव से किया गया कर्म। इसका उपदेश भगवान कृष्‍ण में गीता में दिया है। भगवान कहते हैं ऐसे कर्म जो अनासक्‍त भाव से किए गए हों, जो कर्म फल को ध्‍यान में रख कर नहीं किए गए हों। जिसके पीछे कोई कामना न हो जिसके पीछे कोई इच्‍छा न हो। जिसे हम उत्‍तरदायित्‍व समझ कर करते हों। उन्‍हें इस तीसरी श्रेणी में रखा जाता है। ये निष्‍काम कर्म हैं।अनासक्‍त भाव से किए कर्मों का कोई उद्देश्‍य नहीं होता। उनका कोई लक्ष्‍य नहीं होता। वह केवल कर्म होता है। ऐसा ही कर्म निष्काम कर्म है । यही कर्म वांछनीय है और यही कर्म इच्छित है।

हिन्दू दर्शन के अनुसार मृत्यु के बाद मात्र यह भौतिक शरीर या देह ही नष्ट होती है, जबकि सूक्ष्म शरीर जन्म-जन्मांतरों तक आत्मा के साथ संयुक्त रहता है। यह सूक्ष्म शरीर ही जन्म-जन्मांतरों के शुभ-अशुभ संस्कारों का वाहक होता है। कर्म नियम ऋग्वेद के समय से चला आ रहा सिद्धांत है। एसा माना जाता है कि पूर्व जन्म के कर्मों से ही व्यक्ति को उसके दूसरे जन्‍म में माता-पिता, भाई बहन, पति पत्नी, दोस्त-दुश्मन , नौकर चाकर आदि रिश्ते नाते मिलते है। इन सबसे या तो कुछ लेना होता है या फिर कुछ देना होता है। इसी प्रकार इस जन्म के व्यक्ति के संतान के रूप में उसके पूर्व जन्म का कोई संबंध ही आता है। शास्त्रों के अनुसार हमारे जितने भी सगे-संबंधी हैं, वे सभी किसी न किसी कारण ही हमारे सगे-संबंधी बने हैं। कुछ भी अकारण या संयोग से नहीं होता है। संयोग भी किसी कारणवश ही होता है। पिछले जन्म का हमारा कुछ हिसाब-किताब अगर बाकी रह जाता है, तो वह उसे हमें इस जन्म में पूरा करना होता है। धर्मशास्त्र और नीतिशास्त्रों में कहा गया है कि कर्म के बगैर गति नहीं मिलती है। हमारे द्वारा किया गया कर्म ही हमारे भविष्य को निर्धारित करता है।

ये संस्कार मनुष्य के पूर्व जन्मों से ही नहीं आते, अपितु माता-पिता के संस्कार भी रज और वीर्य के माध्यम से उसमें (सूक्ष्म शरीर में) प्रविष्ट होते हैं जिससे मनुष्य का व्यक्तित्व इन दोनों से ही प्रभावित होता है। बालक के गर्भधारण की परिस्थितियां भी इन पर प्रभाव डालती हैं। ये कर्म ‘संस्कार’ ही प्रत्येक जन्म में संगृहीत (एकत्र) होते चले जाते हैं जिससे कर्मों (अच्छे-बुरे दोनों) का एक विशाल भंडार बनता जाता है। इसे ‘संचित कर्म’ कहते हैं। शास्‍त्रों में इसे 4 प्रकार का बताया गया है।

1.ऋणानुबन्ध पुत्र : –
यदि आपने पिछले जन्म में किसी से कोई कर्ज लिया हो और उसे चुका नहीं पाएं तो आपके इस जन्म में वो व्यक्ति आपकी संतान बनकर आपके जीवन में आएगा और तब तक आपका धन व्यर्थ होगा, जब तक उसका पूरा हिसाब न हो जाएं।
2.शत्रु पुत्रः-
अगर आपके पिछले जन्म में कोई आपका दुश्मन था और वो आपसे अपना बदला नहीं ले पाया था तो आपके इस जन्म में वो आपकी संतान के रूप में आपका एक अहम हिस्सा बनता है। जिसके बाद उसके कारण आपको जिंदगी भर परेशान ही रहना पड़ता है।
3 .उदासीन पुत्र : –
इस प्रकार कि सन्तान माता पिता को न तो कष्ट देती है ओर ना ही सुख। विवाह होने पर यह माता- पिता से अलग हो जाते हैं ।
4.सेवक पुत्र: –
यदि पिछले जन्म में आपने बिना किसी स्वार्थ के किसी की बहुत सेवा की है, तो वह व्यक्ति आपका कर्ज उतारने आपके वर्तमान जन्म में पुत्र बनकर आता है।

हमें अपने प्रारब्ध के कर्मो को सकारात्मक रूप में अंगीकार करते हुए , काटते हुए और भोगते हुए आने वाले समय के लिए सात्विक कर्म को निष्पादित करना चाहिए। सांसारिक लोगों के सुख दुख की ना ही तुलना करना चाहिए और ना ही उस के बारे में किसी प्रकार का चिन्तन करना चाहिए। सदैव निष्काम कर्म में ही संयुक्त होना चाहिए।

लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, आगरा मंडल ,आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए समसामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।)

image_print

वैदिक गणित को लोकप्रिय बनाने में जुटे रघुवीर सिंह

वैदिक गणित प्रदर्शनी में जब वैदिक गणिताचार्य रघुवीर सिंह सोलंकी ने बड़े से बड़े सवाल का गणितीय सूत्रों से मिनटों में हल कर उत्तर निकाल दिया तो बुद्धिमान दर्शक भी आवक रह गए और आश्चर्य से इस विधा के कायल हो गए। मैं भी उनके गणित इस जादू से आश्चर्चकित रह गया। कई प्रश्नों को तत्काल हल कर उन्होंने वैदिक गणित का जादुई सम्मोहन उत्पन्न कर दिया। हर एक की जुबान पर गणित का जादू सर चढ़ कर बोल रहा था। एक ने कहा क्या ही अच्छा हो कोटा में कोचिंग के स्टूडेंट्स भी इसे सीखें और जटिल गणित के पेपर को मिनटों में हल कर सही उत्तर प्राप्त कर सकें। उनका समय भी बचेगा और प्रश्नपत्र भी पूरा कर सकेंगे। सोलंकी ने बताया की वे वैदिक गणित को एनसीआरटी पाठ्यक्रम में शामिल कराने का प्रयास कर रहे हैं। इस क्रम में दो बार वे ह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को भी पत्र लिख चुके हैं। पहले पत्र का जवाब आया था कि उनका पत्र मानव संसाधन मंत्रालय को भेज दिया हैं। प्रधानमंत्री जी ने मन की बात कार्यक्रम में बच्चों को वैदिक गणित सीखने की बात पर जोर भी दिया है।

अवसर था हाल ही में राजकीय सार्वजनिक मंडल पुस्तकालय, कोटा द्वारा पुस्तकालय परिसर में आयोजित पांच दिवसीय संभाग स्तरीय लिट्रेचर फेस्टिवल का जब उन्होंने वैदिक गणित की प्रदर्शनी लगाई और दर्शकों को इसके प्रति आकर्षित किया। उन्होंने पुस्तकालयाध्यक्ष डॉ. दीपक श्रीवास्तव का आभार व्यक्त किया जिन्होंने उनको यह अवसर प्रदान किया।

प्रदर्शनी अवलोकन की रस्म पूरी होने पर मैंने उनसे इस विषय पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि वैदिक गणित बार-बार दुहरायी जाने वाली मूलभूत संक्रियाओं तथा अंकों के स्वभावको भली-भांति समझकर उन्हें अधिक कुशलता से कम से कम समय में पूरा कर लेने की कला है। वैदिक गणित सोलह सूत्रों एवं तेरह उपसूत्रों पर आधारित विधा है जो पूर्णतया भारतीय विधा है।

वैदिक गणित की विशेषताओं के बारे में उन्होंने बताया कि वैदिक गणित के सूत्र संस्कृत में जरूर हैं परन्तु उनके अर्थ व अनुप्रयोग बहुत ही आसान है। यह सहज, सरल और रूचिकर हैं। अल्प समय में ही बड़ी-बड़ी गणनाओं के मौखिक हल निकल आते है। किसी प्रकार का रफ वर्क करने की भी आवश्यकता नहीं होती। अर्थात् समय व कागज दोनों की बचत होती है। इसे बिना संस्कृत के ज्ञान के भी आसानी से सीखा जा सकता है।

मानसिक गणना करने से बौद्धिक विकास भी तेजी से होता है। इसलिए इसे “मानस गणित” भी कहा जाता है। “बिना आँसू की गणित” के नाम से भी इसे जाना जाता है। त्वरित गणना में वैदिक गणित सर्वश्रेष्ठ टेक्निक है। बच्चा जब किशोर अवस्था से ही वैदिक गणित से तेजी से मौखिक हिसाब-किताब व गणना करने लग जाता है तो अभिभावक कहते हैं कि हमारा बच्चा तो गणित में स्मार्ट हो गया है। फटाफट उत्तर निकलते देख बच्चों को लगता है कि यह गणित है या जादू।

वह बताते हैं आज के कम्प्यूटर युग में जहां हमारे कार्य आसान एवं त्वरित हुए हैं वही गणित में गणना करने के तरीके वही हैं जैसे कच्चे रास्ते पर बैलगाड़ी से सफर करना। वर्तमान में समय का महत्व काफी बढ़ गया है। प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल और असफल होने में अंतर है तो बस तकनीक के साथ फुर्ती का। अधिकांश तौर पर देखा गया है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्न समय के अभाव में छूट जाते है। खासतौर से गणित सेक्शन में जहां जटिल सवालों को कुछ ही पलों में हल करने का टारगेट दिया जाता है।

प्रचालित तरीकों से ही सवालों की गणना करने में काफ़ी समय बर्बाद होता है जिसके कारण पूरे सवाल हल नही कर पाते। अतः प्रतियोगी परीक्षाओं एवं विज्ञान के आंकिक प्रश्नों की गणना में समय की बचत करने व तनावमुक्त रहने के लिए वैदिक गणित सर्वश्रेष्ठ टेक्निक है। बचे समय का उपयोग अन्य विषयों के प्रश्न हल करने में किया जा सकता है। तब प्रतियोगी अच्छी सफलता प्राप्त कर सकता है।

उन्होंने बताया कि वैदिक गणित की परम्परा को सदियों के बाद अन्धकार से निकालकर पुनर्जीवित करने का सम्पूर्ण श्रेय गोवर्धन पीठ पुरी के शंकराचार्य स्वामी भारतीकृष्ण तीर्थ जी को है। उन्होंने वेदशास्त्रों का गहन अध्ययन किया और उनमें छिपे गूढ़ रहस्यों को ढूंढ निकालने के लिए आठ वर्ष (1911 से 1919 तक) गणित पर शोध कार्य किया था। जिसके परिणामस्वरूप गणना की ऐसी विधियाॅ निकल कर आई जिनसे आसानी से चन्द सेकन्ड़ों में मौखिक गणना हो जाती है। उन्होने गणना की इन विधियों को 16 सूत्रों एवं 13 उपसूत्रों में पिरोया है । स्वामी जी के इन सूत्रों की व्याख्या उनके मरणोपरांत 1965 में वैदिक मैथेमेंस्टिक के नाम से एक पुस्तक प्रकाशित हुई। गणना की इन्ही संक्षिप्त विधियों (शार्टकट ट्रिक्स) को ही आज हम “वैदिक गणित” के नाम से जानते हैं।

सोलंकी ने 16 अक्तूबर 2006 से वैदिक गणित के प्रचार-प्रसार का अभियान शुरू किया। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग की और से राजस्थान एवं मध्यप्रदेश के स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविध्यालयों एवं बीएड कॉलजों में अब तक 85 से ज्यादा कार्यशालाएं आयोजित कर चुके हैं। बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी झांसी की ओर से आयोजित तीन दिवसीय वैदिक गणित कार्यशाला, जयपुर में 2011 से पांच दिवसीय प्रदर्शनी बाल विज्ञान राष्ट्रीय कांग्रेस में भाग ले कर वैदिक गणित का महत्व प्रतिपादित किया है। आपको कई बार सम्मानित भी किया जा चुका है। आपका जन्म 12 जनवरी 1960 को हुआ और गणित विषय में बीएससी की डिग्री प्राप्त की है। शिक्षण कार्य में आपको 42 वर्ष गणित पढ़ने में से 17 साल वैदिक गणित पढ़ने का अनुभव है। वैदिक गणित के प्रचार-प्रसार के लिए आपने नयापुरा कोटा ने वैदिक गणित प्रचार-प्रसार संस्थान, स्थापना की है।

image_print

कुलपति सोढानी ने डॉ. सिंघल की पुस्तकों की सराहना की

कोटा। वर्धमान महावीर खुला विश्व विद्यालय कोटा के कुलपति डॉ. कैलाश सोढानी ने पूर्व संयुक्त निदेशक सूचना एवं जनसंपर्क विभाग डॉ. प्रभात कुमार सिंघल के पर्यटन पर आधारित लेखन पर कहा की आप तो हमारे लिए पर्यटन संबधी कोर्स और स्टूडेंट के लिए रिसोर्स पर्सन के रूप में उपयोगी हो सकते हैं। हाल ही में डॉ. सिंघल ने अपनी नवीनतम पुस्तकें “अलबेले मेले और उत्सव” एवं “नई बात निकल कर आती है” (संस्मरण) उन्हें भेंट की थी।

डॉ.सिंघल ने उन्हें अवगत कराया कि पुस्तक में भारत के 22 राज्यों के 80 परंपरागत मेलों और पर्यटन उत्सवों को शामिल किया गया है। भारत और राजस्थान के संदर्भ में पर्यटन, कला, संस्कृति के विविध आयामों पर 25 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने कहा यह कार्य तो अद्भुत है, आपके अनुभव का लाभ हमारे विद्यार्थियों को दिलाएंगे। उल्लेखनीय है कि इनकी पुस्तकों की एक प्रदर्शनी विगत दिनों राजकीय सार्वजनिक मंडल पुस्तकालय में आयोजित की गई थी।

image_print

भुवनेश्वर में खुला 120बेडवाला अत्याधुनिक अंकुर अस्पताल

भुवनेश्वर। 21फरवरी को सुबह में स्थानीय बापूजीनगर शिशु चौक के समीप के तारा शुभम् कॉम्प्लेक्स में 120 बेडवाले अत्याधुनिक अंकुर अस्पताल की नई शाखा खुली जिसका लोकार्पण ओडिशा सरकार के माननीय विज्ञान एवं प्राद्योगिकी मंत्री अशोक चन्द् पण्डा ने बतौर समारोह के मुख्य अतिथि के रुप में किया। अवसर पर सम्मानित अतिथिगण के रुप में भुवनेश्वर की मेयर सुलोचना दास, विधायक अनंत नारायण जेना, राज्यसभा सांसद अमर पटनायक, स्थानीय विधायक सुशांत कुमार राउत, ग्रामीण विकास विभाग के निदेशक आईएएस निखिल पवन कल्याण, सांसद कृष्ण देवरायालु और डॉ. अंकुर अस्पताल के संस्थापक और प्रबंध निदेशक कृष्ण प्रसाद भुनाम,शुभम कंस्ट्रक्शन के निदेशक तथा समाजसेवी चन्द्रशेखर सिंह आदि उपस्थित थे।

मंत्री अशोक चन्द्र पंडा ने अपने संबोधन में यह कहा कि यह अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त अंकुर अस्पताल राजधानी भुवनेश्वर में महिलाओं और बच्चों के लिए अंकुर अस्पताल-समूह,हैदराबाद की एक अनुपम भेंट है। अंकुर के प्रबंधनिदेशक ने कहा अब ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में भी महिलाओं एवं बच्चों को अत्याधुनिक स्वास्थ्य सेवाएं बेहकतर रुप में इस अस्पताल के द्वारा मिलेंगी।

गौरतलब है कि अंकुर अत्पताल-समूह, हैदराबाद लगभग एक दशक से भारत के तीन राज्यों में अपने लगभग 14 केंद्रों पर अत्याधुनिक मेडिकल सेवाओं के साथ-साथ मरीजों की विश्वसनीयता पर कार्यरत है।भुवनेश्वर का अंकुर अस्पताल बहु आयामी मेडिकल देखभाल के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के साथ कार्य करेगा जो 120 बिस्तरों वाला अस्पताल है जहां पर उच्च जोखिम वाले बाल रोग, बाल चिकित्सा गैस्ट्रोएंटरोलॉजी, एंटरोलॉजी, बाल चिकित्सा न्यूरोलॉजी, आर्थोपेडिक्स, कैंसर देखभाल और आपातकालीन देखभाल आदि की समस्त अत्याधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं।अंकुर,भुवनेश्वर के पास अत्याधुनिक एम्बुलेंस, रोगी परिवहन सेवाएं, फार्मेसी, प्रयोगशाला और रेडियोलॉजी सेवाएं एक ही छत के नीचे उपलब्ध हैं। अस्पताल में उच्च प्रशिक्षित डॉक्टर,नर्स और सुपर विशेषज्ञ 24 घण्टे उपलब्ध हैं।तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के बाद यह अंकुर, भुवनेश्वर अत्याधिनक अस्पताल ओडिशा के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में बदलाव लाने के लिए आज लोकार्पित किया गया।

अंकुर के संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक डॉ. कृष्ण प्रसाद भुनाम ने कहा कि अंकुर अस्पताल ने हमेशा मरीजों की बेहतर देखभाल पर ध्यान केंद्रित रखता है। यह महिलाओं और बच्चों की विभिन्न स्वास्थ्य आदि की सेवाओं के लिए सतत कार्य करेगा।उन्होंने यह भी कहा कि ओडिशा एक प्रगतिशील राज्य है जिसकी राजधानी भुवनेश्वर में खुली यह शाखा निश्चित रुप में भुवनेश्वर के मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने में सफल होगा।

image_print

वाराणसी परिक्षेत्र में एक हज़ार गाँव बने ‘संपूर्ण सुकन्या समृद्धि ग्राम’ – पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव

डाकघरों में एक ही छत के नीचे तमाम जनोपयोगी सेवाएँ उपलब्ध

वाराणसी। डाकघरों में एक ही छत के नीचे तमाम सेवाएं उपलब्ध कराकर उन्हें बहुद्देशीय बनाया गया है। बदले दौर में डाक विभाग अब पत्र-पार्सल के साथ-साथ सरकार की तमाम जनकल्याणकारी योजनाओं और इनके लाभों को भी लोगों तक पहुँचा रहा है। ऐसे में डाकघरों की सर्वसुलभता बेहद जरुरी है। वाराणसी परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव ने वाराणसी में महमूरगंज उपडाकघर में आयोजित कार्यक्रम में उक्त विचार व्यक्त किए।

इस अवसर पर दीप प्रज्वलन पश्चात महिलाओं को महिला सम्मान बचत पत्र एवं बालिकाओं को सुकन्या समृद्धि खाते की पासबुक देते हुए उनके सुखद भविष्य की कामना की। उन्होंने बताया कि वाराणसी परिक्षेत्र में 3.40 लाख बालिकाओं के सुकन्या समृद्धि खाते खोले जा चुके हैं, वहीं लगभग 1,000 गाँवों में 10 साल तक की सभी योग्य बालिकाओं के खाते खोलते हुए उन्हें ‘सम्पूर्ण सुकन्या समृद्धि ग्राम’ के रूप में आच्छादित किया जा चुका है। डाकघरों में लोगों की सुविधा हेतु एक ही छत के नीचे डाक, पार्सल मदों की बुकिंग के साथ बचत, बीमा, आईपीपीबी, आधार, कॉमन सर्विस सेंटर, पासपोर्ट, गंगाजल, क्यूआर कोड आधारित डिजिटल भुगतान जैसी तमाम जनोन्मुखी सुविधाएं उपलब्ध हैं।

वाराणसी पश्चिमी मंडल के अधीक्षक डाकघर विनय कुमार ने बताया कि महमूरगंज डाकघर 2016 से भवन की अनुपलब्धता के कारण वाराणसी कैंट प्रधान डाकघर के प्रांगण में संचालित हो रहा था। यहाँ के ग्राहकों को निरंतर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। पुनः महमूरगंज में डाकघर के विस्थापित होने से ग्राहकों को सभी सुविधाएं सुलभ हो सकेंगी। साथ ही डाक वितरण, खाता खुलवाने, आईपीपीबी, आधार के नवीनीकरण/अपडेशन इत्यादि कार्यों के लिए ग्राहकों को दूर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। एक लम्बे समय बाद महमूरगंज क्षेत्र में डाकघर पुन: शिफ्ट होने से आम जन में भी काफी हर्ष दिखा।

इस अवसर पर अधीक्षक डाकघर विनय कुमार, सहायक निदेशक आरके चौहान, सहायक अधीक्षक इंद्रजीत पाल, डाक निरीक्षक दिलीप पांडेय, मंजीत कुमार, पोस्टमास्टर महमूरगंज सतीश कुमार, एसपी गुप्ता सहित तमाम अधिकारी, कर्मचारी और स्थानीय लोग उपस्थित रहे।

image_print

पश्चिम रेलवे द्वारा 360 से अधिक स्कूलों में विभिन्न प्रतियोगिताएं आयोजित

‘2047 के विकसित भारत की विकसित रेल’ की थीम पर 360 से अधिक स्कूलों में ड्राइंग, निबंध और भाषण प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं

मुंबई। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी “अमृत भारत स्टेशन योजना” के अंतर्गत 26 फरवरी, 2024 को भारतीय रेल के 554 रेलवे स्टेशनों के पुनर्विकास का शिलान्‍यास करेंगे और साथ ही लगभग 41000 करोड़ रुपये की लागत से 1500 रोड ओवर ब्रिज/अंडरपास का शिलान्‍यास तथा राष्ट्र को समर्पित करेंगे।

इस अवसर पर पश्चिम रेलवे के कई स्थानों पर स्कूलों में ड्राइंग, निबंध और भाषण प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया। इन प्रतियोगिताओं में लगभग 360 स्कूलों के विद्यार्थियों ने बड़ी संख्या में सक्रिय रूप से भाग लिया। इन प्रतियोगिताओं के विजेताओं को 26 फरवरी, 2024 को पश्चिम रेलवे के स्थानों/स्टेशनों पर आयोजित होने वाले स्थानीय समारोहों में उपस्थित मुख्य अतिथियों द्वारा सम्मानित किया जाएगा।

पश्चिम रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी श्री सुमित ठाकुर द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार पश्चिम रेलवे द्वारा आयोजित इन प्रतियोगिताओं में 360 से अधिक स्कूलों के 1 लाख से अधिक छात्रों ने भाग लिया। प्रतियोगिताओं का विषय “2047 के विकसित भारत की विकसित रेल” था। पश्चिम रेलवे के मुंबई सेंट्रल मंडल में 100 स्कूलों में प्रतियोगिता आयोजित की गई, जिसमें लगभग 16200 छात्रों ने भाग लिया।

इसी तरह, वडोदरा मंडल में 107 स्कूलों के लगभग 62500 छात्रों ने भाग लिया। अहमदाबाद मंडल में 36 स्कूलों से लगभग 7000 छात्रों ने भाग लिया। भावनगर मंडल में 36 स्कूलों से 2900 से अधिक छात्रों ने भाग लिया। राजकोट मंडल में 60 स्कूलों से 4100 से अधिक छात्रों ने भाग लिया। रतलाम मंडल में 22 स्कूलों से 7275 विद्यार्थियों ने भाग लिया।

image_print

राजेश रेड्डी को ‘निराला सृजन सम्मान’ व पूनम विश्वकर्मा को ‘दुष्यंत स्मृति सम्मान’

मुंबई, आदित्य बिरला उद्योग समूह की कला एवं कलाकारों को प्रोत्साहित करने वाले संस्थान आईएनटी आदित्य बिरला सेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स की ओर से आयोजित हिंदी मुशायरा कार्यक्रम में महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और कालजयी ग़ज़लो दुश्यंत कुमार के नाम पर शुरू किए गए ‘निराला सृजन सम्मान’ और ‘दुष्यंत स्मृति सम्मान’ क्रमशः इस साल मशहूर ग़ज़लगो राजेश रेड्डी और शायरा पूनम विश्वकर्मा को दिए गए।

बुधवार की शाम दक्षिण मुंबई के चौपाटी स्थित भारतीय विद्या भवन के सभागृह में आईएनटी आदित्य बिरला सेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स की प्रमुख श्रीमती राजश्री बिरला के दोनों हाथों पुरस्कार प्रदान किए गए। दिग्गज राजेश रेड्डी साहित्य में योगदान के लिए 51 हजार रुपए, प्रशस्ति पत्र और ट्रॉफी देकर सम्मानित किए गए, वहीं उभरती कलाकार के तौर पर शायरा पूनम विश्वकर्मा को 21 हजार रुपए, प्रशस्ति पत्र और ट्रॉफी देकर प्रदान की गई। इस अवसर पर पूनम ने अपने ग़ज़ल संग्रह ‘सुब्ह शब भर…’ की एक प्रति राजश्री बिरला को भेंट की।

इस हिंदी मुशायरे में सम्मानमूर्तियों के अलावा मशहूर गीतकार शकील आज़मी, देवमणि पांडेय, माधव बर्वे (नूर) और भूमिका जैन ने शिरकत की। इस मुशायरे में ग़ज़लें सुनने के लिए श्रोताओं में नवीन जोशी नवा, सिद्धार्थ शांडिल्य, शेखर अस्तित्व, उदयन ठक्कर, हेमेन शाह, हितेंद्र आनंदपरा और डॉ प्रकाश कोठारी, हुतोची वाड़िया, अवनि मुले, कथाकार अलका अग्रवाल, गायिका शैलेश श्रीवास्तव और कवयित्री अनिता भार्गव जैसे गणमान्य लोगों समेत बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी सभागृह में मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन देवमणि पांडेय ने किया।

image_print

हिंदू समाज के क्रांतिकारी संत स्वामी श्रद्धानंद

(जन्म दिवस 22 फरवरी के अवसर पर विशेष रूप से प्रकाशित)

22 फरवरी 2024 को स्वामी श्रद्धानंद जी का जन्म दिवस दिवस है। आप पराधीन भारत के सबसे बड़े समाज सुधारकों में से एक थे। आपका जन्म पंजाब के जालंधर के तलवान नामक स्थान पर हुआ था। आपका सन्यास पूर्व नाम मुंशीराम था। आप सामाजिक परिस्थितियों को देखकर नास्तिक बन गए थे। बरेली में स्वामी दयानन्द जी के वचनामृत का पान कर आपके अँधेरे जीवन में उजाला हुआ एवं आप नास्तिक से घोर आस्तिक बन गए। आप आर्यसमाज के सदस्य बन गए एवं सक्रिय रूप से भाग लेने लगे।

आपके समक्ष बाल विधवाओं की समस्या एक चुनौती के रूप में आई। एक सज्जन की पुत्री छोटी आयु में बाल विधवा हो गई थी। वो उसका पुनर्विवाह करना चाहते थे। उस दौर में प्राचीन रूढ़िवादिता एवं अन्धविश्वास के चलते बाल विवाह किये जाते थे एवं बीमारी आदि के कारण पति की असमय मृत्यु हो जाने कारण देश में लाखों विधवाएं आजीवन नारकीय जीवन जीने को विवश थी। उस बच्चीं के पिता ने मुंशीराम जी से कहा कि मैं अपनी सुपुत्री को ऐसे हालातों में नहीं देख सकता।

आधुनिक भारत के महान समाज सुधारक स्वामी दयानन्द द्वारा अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में बाल विवाह एवं पुरुषों के लिए बहुविवाह का निषेध किया गया था वहीं विधवाओं के पुनर्विवाह का विधान बताया गया था। यह उस काल में सामाजिक क्रांति करने जैसा था। स्वामी जी के आदेश को सर्वोपरि मानते हुए मुंशीराम जी ने उस बाल विधवा के पुनर्विवाह का निर्णय लिया। जब उक्त सज्जन की बिरादरी वालों को उनके इस निर्णय का ज्ञात हुआ तो उन्होंने उनका विरोध करना आरम्भ कर दिया। मुंशीराम जी ने डरे , न डिगे अपितु उन्हें शास्त्रार्थ की चुनौती दे दी और पर्वत के समान अपने निर्णय पर अडिग रहें। परिणाम स्वरुप 1890 के दशक में उत्तर भारत के पंजाब में विधवा पुनर्विवाह आरम्भ हुए एवं देखते ही देखते हज़ारों बच्चियों का जीवन सदा के लिए सुखमय हो गया। इस जागरण का श्रेय मुंशीराम जी और आर्यसमाज को जाता हैं।

स्त्रियों के शिक्षा दूसरी सबसे बड़ी चुनौती थी। स्वामी दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं कि नारियों के लिए आजीवन चूल्हा-चौका करना ही जीवन का उद्देश्य नहीं हैं। नारियों को पढ़ लिखकर प्राचीन काल की विदुषी गार्गी, मैत्रयी के समान बनना चाहिए और समाज हित करना चाहिये। स्वामी जी ने नारी के लिए गुरुकुल खुलवाकर शिक्षा का प्रबंध करने का विधान लिखा और यह भी कहा कि जो परिवार अपने बच्चों को शिक्षा से वंचित रखें उसे राजा दंड देने का विधान करें। यह वह दौर था जब समाज में रूढ़िवादिता के कारण नारी को अनपढ़ रखा जाता था और छोटी आयु में उनका विवाह कर दिया जाता था। मुंशीराम जी ने जब नारी जाति की इस शोचनीय अवस्था को देखा तो उन्हें बड़ा कष्ट हुआ।

आपने अपने सम्बन्धी लाला देवराज जी के साथ मिलकर उत्तर भारत की सबसे पहली कन्याओं की शिक्षा के लिए समर्पित संस्था जांलधर कन्या महाविद्यालय की स्थापना की थीं। आरम्भ में यह संस्था 3 बार खुलकर बंद हुई। अनेक विरोधों एवं कष्टों का सामना करते हुए यह संस्था चल पड़ी। यहाँ पढ़ने वाली लड़कियां मंच से वेद मन्त्रों का पाठ करती और अस्त्र-शस्त्र चलाती तो दर्शक प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। इस संस्था का प्रभाव यह हुआ कि सम्पूर्ण उत्तर भारत में स्थान स्थान पर अनेकों कन्या पाठशाला, गुरुकुल आदि आर्य समाज ही नहीं अपितु अनेक संस्थाओं द्वारा खोले गए जिससे पुरे देश में नारी शिक्षा क्रांति का उद्घोष हुआ।

बेटी बचाओं, बेटी पढ़ाओ का नारा आज से 130 वर्ष पूर्व इस प्रकार से आर्यसमाज द्वारा जमीनी स्तर पर कार्य करके प्रारम्भ हुआ था। इसी कड़ी में मुंशीराम जी द्वारा लड़कों की शिक्षा के लिए गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना 1902 में वैदिक शिक्षा दीक्षा के लिए की गई थीं। गुरुकुल कांगड़ी में धनी हो या निर्धन, सवर्ण हो या अछूत, उत्तर भारतीय हो या दक्षिण भारतीय सभी को एक जैसी सुविधा, एक जैसी शिक्षा, एक जैसे संस्कार दिए जाते थे। जो विधान स्वामी दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश में लिखा था। उसी का अनुपालन किया गया था। इसी संस्था की एक अन्य शाखा कन्या गुरुकुल देहरादून नारी शिक्षा के लिए स्थापित किया गया था।

मुंशीराम जी सन्यास ग्रहण कर स्वामी श्रद्धानन्द बन गए। आप अब राष्ट्रीय स्तर के नेता बन गए थे। आपका ध्यान में देश के 6 करोड़ अछूत समझे जाने वाले दलित भाइयों की ओर गया। रूढ़िवादी समाज उनके साथ छुआछूत का व्यवहार करता था। उन्हें सार्वजानिक कुँए से पानी भरने की मनाही थीं। उनके बच्चों को उस विद्यालय में शिक्षा का अधिकार प्राप्त नहीं था, जहाँ पर सवर्ण समझे जाने वाले लोगों के बच्चें पढ़ते हो। उन्हें सवर्ण समाज के सदस्यों के साथ एक स्थान पर बैठकर भोजन करने का प्रावधान नहीं था। उन्हें समान धार्मिक अधिकार प्राप्त नहीं थे। स्वामी जी उस समय कांग्रेस के सदस्य बन चुके थे।

आपने कांग्रेस के मंच से दलितों के उद्धार का निश्चय किया एवं महात्मा गाँधी जी को इस कार्य के लिए कांग्रेस द्वारा विशेष कोष बनाने का सुझाव दिया। आपने यह भी कहा कि यह नियम बनाया जाये कि हर कांग्रेस के कार्यकर्ता के घर पर अछूत को सेवक के रूप में रखा जाएँ और उसके साथ बिना किसी भेदभाव के व्यवहार किया जाएँ। ऐसे विद्यालय खोले जाएँ जहाँ पर सभी वर्गों के बच्चों को एक साथ बिना भेदभाव के शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार हो। स्वामी जी के इस प्रयास को कांग्रेस से विशेष सहयोग नहीं मिला। इससे स्वामी जी ने कांग्रेस से त्याग पत्र दे दिया। आपने जात्तिगत भेदभाव को मिटाने के लिए अपनी सुपुत्री का विवाह जातिगत बंधन तोड़कर किया था। इसके लिए आपको अपनी बिरादरी का विरोध भी सहन करना पड़ा। पर आप अपने निर्णय पर अडिग रहें।

उन्हीं दिनों सिखों के गुरु का बाग़ मोर्चा के आंदोलन में स्वामी जी आर्यसमाज के शीर्घ नेता के रूप में भाग लेते हैं। उन्हें छ: महीने का कारावास होता हैं। जेल के अनुभव आपने ‘बंदी घर के विचित्र अनुभव’ के नाम से अपनी पुस्तक के रूप में लिखे हैं। जेल से छूटकर स्वामी जी ने ‘दलितोद्धार’ एवं ‘ब्रह्मचर्य प्रचार’ को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। दिल्ली के दलित भाई जातिगत अत्याचारों से पीड़ित थे। आपने घोषणा कर दी कि आप दलित भाइयों के साथ दिल्ली के सार्वजानिक कुओं से पानी भरेंगे।

आपका रूढ़िवादियों और मतान्ध लोगों ने विरोध किया। आप जुलूस लेकर सार्वजानिक कुओं से पानी भरते हैं। जुलूस पर पथरबाजी होती हैं। पुलिस के हस्तक्षेप के पश्चात शांति कायम होती हैं। स्वामी जी ने यह प्रयास देश की राजधानी दिल्ली में 1926 में किया था जबकि डॉ अम्बेडकर जी द्वारा महाड का जल सत्याग्रह इस घटना के एक वर्ष पश्चात 20 मार्च 1927 में किया गया था। स्वामी जी के प्रयासों से मंदिरों के द्वार अछूतों के लिए खुल गए। आर्यसमाज द्वारा स्वामी जी के नेतृत्व में दलितों को यज्ञोपवीत संस्कार, वेदादि धार्मिक ग्रंथ पढ़ने का अधिकार, यज्ञ करने का अधिकार दिया गया। सार्वजानिक कुओं से भेदभाव समाप्त हो गया। दलितों के बच्चों को विद्यालयों में दाखिला मिलने लगा। आर्यसमाज ने अनेकों सहभोज आयोजित किये। जहाँ पर अछूत के हाथ से सवर्णों को भोजन परोस कर छुआछूत का नाश किया जाता था। पराधीन भारत में यह जान जागरण एक विशेष क्रांति थी, जिसका श्रेय स्वामी श्रद्धानन्द और आर्यसमाज को जाता हैं। इसीलिए डॉ अम्बेडकर ने स्वामी जी को दलितों का सच्चा हितैषी लिखा हैं।

स्वामी जी हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रतीक थे। आप भारत के एकमात्र वैदिक सन्यासी थे। जिन्होंने जामा मस्जिद के मिम्बर से वेद मन्त्रों का पाठ कर हिन्दू मुस्लिम एकता पर बल दिया था। समाज सुधार के आपके आदर्शों को कुछ मतान्ध लोग समझ नहीं पाएं एवं एक षड़यत्र के अंतर्गत 23 दिसम्बर 1926 को आपकी हत्या हो गई। आप अपने बलिदान से सदा के लिए अमर हो गए। देश और समाज हित में आपके द्वारा किये गए कार्य को इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जायेगा। एक आदर्श नेता, संगठनकर्ता, समाज सुधारक, गुरुकुल शिक्षा क्रांति के प्रणेता, स्वदेशी और स्वतंत्रता के पक्षधर, सर्वस्व अर्पण करने वाले, मानव मात्र के सच्चे समाज सुधारक, महान व्यक्तित्व को आने वाली पीढ़ियां आपसे सदा प्रेरणा लेती रहेगी।

(साभार- पंजाब केसरी दैनिक, दिल्ली संस्करण, दिनांक 22 फरवरी, 2024)

image_print
image_print