जरूरत बन गया फोटोग्राफी का शौक

कहावत है आवश्यकता आविष्कार की जननी है। मेरे फोटोग्राफी के संदर्भ में यह उक्ति सही साबित हुई। बात 1980 की है जब नौकरी की वजह से वीआईपी के कार्यक्रमों और विकास की स्टोरी लिखने के लिए गांवों में जाना पड़ता था और फोटोग्राफ की जरूर पड़ती थी। साथ में फोटोग्राफर ले जाना पड़ता था। कई बार बहुत दूर तक जाना होता था और फोटोग्राफर की दिहाड़ी नहीं बन पाती थी। एक दिन दिमाग में आया कि क्यों न इस कला को भी सीख लिया जाए। कैमरे का तो नाम याद नहीं कोई जापनी था खरीद लिया। बस यही से शुरू हो गया फोटोग्राफी का सफर।

कभी शटर बंद रह जाता था, तो कभी एंगल सही नहीं आता था, कभी हाथ हिल जाता था, कभी रील पूरी नहीं होती थी तो बीच से कटवा कर फोटो बनवाने पड़ते थे,जिसमें दो – तीन स्नैप बेकार हो जाते थे, कई बार कैमरा भूल जाता था और पोटोग्राफ भी साथ नहीं होता था जैसे समस्याओं का सामना करते – करते धीरे – धीरे फोटो खींचना सीख गया।

विभागीय फोटोग्राफ सुधींद्र गौड़ से सूर्य की रोशनी में, बरसात में, बादलों में, एंटी लाइट में, प्रकृति के, मंदिरों के, मूर्तियों के, कार्यक्रम के एंगल आदि की बारीकियों का ज्ञान प्राप्त किया। परिणाम यह हुआ कि वह भी कहने लगा आपने तो मुझे भी पीछे छोड़ दिया। अब आप अच्छा सा कैमरा ले लें। मैंने पूछा कितने रुपए में आ जायेगा ? वह बोला यहीं कोई 15 हज़ार में। अरे इतने तो मेरी सामर्थ्य नहीं है। बात आई गई हो गई, पर मेरे मन में अच्छा सा कैमरा खरीदने की बात जम गई थी। मैंने रुपए जमा करने शुरू कर दिए।

करीब 6 माह पश्चात एक प्रोबेशनर आई ए एस को मेरा कैमरा पसंद आ गया और उसने खरीद लिया। मैंने भी इस बीच में 6 हज़ार रुपए जमा कर लिए थे। कुछ मेरे जीजा जी से उधार लेकर सुधींद्र के साथ दिल्ली चला गया। उसने मोलभाव कर 13 हज़ार में एक निकोन कैमरा दिलवा दिया। कोटा लौट कर इसके सारे फंक्शन सीखा दिए।

फोटोग्राफी में परिपक्वता आती चली गई। वह दिन सब से खुशी का रहा जब मेरे खींचे हुए चार फोटो पहली बार सरिता पत्रिका में प्रकाशित हुए। अब क्या था फोटोग्राफी का के शोक में ज्वार सा आ गया। मेरा लेख मेरे फोटो। लेखक के साथ फोटो में मेरा नाम छपने लगा। सरिता, मुक्ता, गृहशोभा, कादम्बिनी, हिंदुस्तान साप्ताहिक, धर्मयुग, नवनीत, दिनमान, नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान, जनसत्ता, राजस्थान पत्रिका, दैनिक नवज्योति, सरकारी पत्रिकाएं समाज कल्याण, परिवार कल्याण, डाकतार, कुरुक्षेत्र, योजना,भारतीय रेल, स्वागत, सुजस आदि में प्रमुखता से मेरे लेख के साथ मेरे फोटो खूब प्रकाशित हुए। आज भी मेरे लेख के साथ समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और न्यूज पोर्टल पर मेरे फोटो छप रहे हैं। आज जब भी मोबाइल खरीदता हूं उसके कैमरे पर विशेष फोकस रहता है। तकनीक बदल गई, कैमरा सुरक्षित रखा है और मोबाइल ही कैमरा बन गया।