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भारत भवन की तिलस्मी दुनिया

निदा फाजली का शेर है–
बाग में जाने के आदाब हुआ करते हैं
किसी तितली को फूलों से न उड़ाया जाए।

इसी तरह सरकारी नौकरी के भी कुछ नियम-कायदे हुआ करते हैं। सभी के साथ न्याय किया जाए। न केवल किया जाए बल्कि न्याय होता हुआ दिखाई भी दे।
भारत भवन के प्रशासनिक अधिकारी महोदय एक सरकारी अधिकारी हैं । वो खुद को सरकारी न मान कर ट्रस्ट का कर्मचारी मानते हों तब भी, भारत भवन एक शासकीय ट्रस्ट है। मध्यप्रदेश शासन के बजट से उसे लगभग चार करोड़ सालाना मिलता है। शासन के संस्कृति सचिव ही भारत भवन के न्यासी सचिव हैं। प्रकांरातर से भी भारत भवन के प्रशासकीय अधिकारी शासकीय अधिकारी हुए। प्रत्येक शासकीय अधिकारी के लिखित एवं अलिखित आचरण नियम होते हैं। इनमें –

1. अपने प्रशासनिक कार्य को निष्ठा एवं निष्पक्षता से करना ।
2. नागरिकों एवं आगंतुकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना ।
3. सोशल मीडिया पर/सार्वजनिक तौर पर शासकीय मामले से संबंधित विषयों पर विवाद में हिस्सा नहीं बनना।
4. शासन की नीतियों की सार्वजनिक आलोचना नहीं करना ।
5. अपने हित में अपने पद का दुरुपयोग नहीं करना| …आदि हैं।

आइए हम नज़र डालते हैं कि भारत भवन के मामले में क्या हुआ–

1. भारत भवन का लाभ देने में कोई नीति नहीं बनाई गई।
2. भारत भवन का लाभ व्यक्ति विशेष को बार-बार दिया गया।
3. भारत भवन की पत्रिका ‘पूर्वग्रह’ में रचनाएं छापने की कोई नीति नहीं बनाई गई। इसी तरह नाट्य और गायन विधा में हुआ |
4. आगंतुकों एवं साहित्यकारों/ कलाकारों से खराब व्यवहार के आरोप भी लगते रहे हैं।
5. भारत भवन की नीति को प्रश्नगत करते ही फेसबुक पर खुद मुख्य प्रशासनिक अधिकारी ने प्रश्न करने वालों के खिलाफ़ मोर्चा खोलकर स्तर से नीचे के शब्दों का प्रयोग आरंभ कर दिया, जैसे–कुकुरमुंह,उन्मादी,बकते रहते हैं फूहड़ आदि।
6. समर्थन में वो लोग मुखर हो गए जिन्हें बार-बार लाभ दिया गया है।इन लोगों ने भी अपशब्दों में कंजूसी नहीं की।जैसे–झंडू, सतही कवि, शर्मनाक रुदन करने वाले, कीट-पतंग, अनपढ़ आदि।
7. मुझे तो याद नहीं पड़ता कि कभी किसी आईएएस अधिकारी ने भी किसी नीति की आलोचना होने पर इस तरह आम लोगों के खिलाफ़ अपशब्दों का मोर्चा खोला हो।
8. भारत भवन की नीति की आलोचना मुख्य प्रशासनिक अधिकारी की व्यक्तिगत आलोचना नहीं है ? भारत भवन में जो राशि व्यय की जाती है वो किसी की व्यक्तिगत नहीं शासकीय है।
9. भारत भवन के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी खुद किसान आंदोलन के पक्ष एवं शासन की नीतियों के खिलाफ़ कविता लिखकर अखबार में छपवा चुके हैं।
10. मुख्य प्रशासनिक अधिकारी खुद एक अच्छे कवि हैं। क्या यह संयोग मात्र है कि इन्हें बड़े कवि के रूप में स्थापित करने की पैरवी वही लोग मुखर होकर कर रहे हैं जो यहां लाभार्थी हैं। अगर ये संयोग नहीं है तब पद का दुरुपयोग है।
9. भारत भवन को जितना बजट मिलता है उसमें इससे बहुत अधिक कलाकारों को समायोजित किया जा सकता है, जितनों को अभी किया जा रहा है अगर फिजूलखर्ची एवं विलासिता पर व्यय पर अंकुश लगाया जाए। जैसे–
अ. आगंतुकों को फाइव स्टार होटल की जगह थ्री स्टार होटल, शासकीय होटल, शासकीय रेस्ट हाउस, प्रशासन अकादमी आदि में रुकवाना।
ब. वायुयान की जगह AC-2 मार्ग व्यय देना।
स. भारत भवन में खुद के दो वाहन होते हुए भी प्राइवेट टैक्सी के हो रहे उपयोग को कम करना।
द. महंगे महंगे निमंत्रण पत्र की छपाई सीमित कर निमंत्रण पत्र ऑनलाइन भेजने को बढ़ावा देना। ….आदि।

निजी स्वार्थों के चलते किसी भी सुधार का विरोध करने वालों को भी इस मौके पर अपने लेखकीय सरोकारों पर विचार करने की ज़रूरत है। केवल लेखन में न्याय एवम समता की बातें करना काफी नहीं होता।कसौटी जीवन होता है।

साभार –https://m.facebook.com/kumar.suresh.710 से