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मेरी लंदन डायरीः लंदन वालों ने आज भी संजोकर रखी है अपनी ऐतिहासिक विरासतें

मैं पैदा तो स्वतंत्र भारत में ही हुआ था फिर भी मैं बचपन से देखता था कि हमारे यहाँ के अधिकाँश लोगों के मन में ब्रिटेन और ख़ास तौर से लन्दन को लेकर बेहद ईर्ष्या और सम्मान की भावना थी, यही नहीं लन्दन रिटर्न व्यक्ति की बड़ी इज्जत की जाती थी. इसके पीछे शायद यह उत्सुकता भी रही हो कि आखिर ब्रिटिश लोगों में ऐसी क्या खूबी है जो हम पर 300 वर्षों तक शासन कर गए. यही नहीं दुनिया ने एक दौर ऐसा भी देखा था कि ब्रिटिश राज्य इतना फैला हुआ था कि उसमें सूरज कभी डूबता ही नहीं था।

जब मैंने अंग्रेजी साहित्य में पोस्ट ग्रेजुएशन किया तो काफी सारा ऐसा साहित्य पढ़ने का मौक़ा मिला. जिनकी पृष्ठभूमि लन्दन की ही थी, वहां की सड़कों, बाज़ारों, गलियों का वर्णन खूब पढ़ा था , आज से 40 वर्ष पूर्व पढ़े चार्ल्स डिकेंस के ‘ओलिवर ट्विस्ट’, आर्थर कानन डायल के ‘द साइन आफ द फोर’ , थॉमस हार्डी के ‘द फिडलर आफ द रील्स’ , ऑस्कर वाइल्ड के ‘द पिक्चर ऑफ़ डोरियन ग्रे’ के विवरण दिमाग के किसी कोने में छुपे हुए थे, इस बार जब लन्दन जाना हुआ तो एक एक कर के वे किताबी विवरण आँखों के सामने आ कर तैर गये.

अमूमन सैलानी किसी शहर के बड़े शो रूम , शॉपिंग काम्प्लेक्स , मनोरंजन स्थलों में ज्यादा रूचि लेते हैं, लेकिन मेरी इच्छा लन्दन के उन सारे स्थानों को देखने की थी जिनको मैंने कहानियों, उपन्यासों आदि के माध्यम से पढ़ा था. मुझे देख कर हैरानी हुई कि लन्दन वासियों ने आज भी अपनी उस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को वैसा का वैसा संजों कर रखा है, इस शहर में आधुनिकता और विकास की जहाँ एक ओर चरम सीमा है वहीँ अपनी उस पुरानी पहचान को कायम रखने की जिद भी है. कहते हैं दुनिया भर में सबसे फैशनेबल शहर पेरिस है, लेकिन लन्दन के लोग भी अपने व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाने के मामले में पीछे नहीं हैं, युवा, मध्यम आयु वर्ग , वरिष्ठ आयु कहीं भी उम्र स्मार्ट, खूबसूरत बनने के रास्ते में आड़े नहीं आती है शायद यही इस शहर के प्रासंगिक होने के पीछे रहस्य है.

इस ट्रिप में हम लोग अमरीका से चल कर लन्दन पहुंचे थे , संयोग यह कि अपने रुकने का ठिकाना सेंट्रल लन्दन से केवल पच्चीस मिनट की दूरी पर था इस लिए पंद्रह दिन में लन्दन की मुख्य मुख्य सभी स्ट्रीट और पुरानी जगह छान मारीं।

दुनिया के अन्य महानगरों की तुलना में लन्दन घूमना बेहद आसान है। पूरे लन्दन में भूमिगत रेल का जाल फैला हुआ है. इन्हें वहां अंडरग्राउंड कहा जाता है, शहर के किसी भी कोने में खड़े हो जाइए वहां से कहीं भी जाने के लिए अंडरग्राउंड स्टेशन पांच दस मिनट पैदल चल कर मिल जाएगा .अंडरग्राउंड के स्टेशन, ट्रेन सभी कुछ वातानुकूलित हैं , और परिचालन की दृष्टि से बेहद व्यवस्थित हैं बाहर जाने और प्रवेश के साइनबोर्ड इतने सुविधाजनक हैं कि मुझे 15 दिन लगातार भिन्न भिन्न स्थानों पर घूमते हुए किसी भी व्यक्ति से कुछ पूछने की जरुरत नहीं पड़ी। लन्दन में भी स्थानीय लोग ठीक बम्बई की ही तरह से हर समय दौड़ते हुए दिखेंगे, लेकिन इस भाग दौड़ के बीच भी वे सहयात्रियों की सुविधा का भरपूर ख्याल रखते हैं, क्या मजाल कि किसी के ज़रा सा टच भी हो जाए , यदि भटक गए हों तो आप की मदद करने में नहीं चूकेंगे.

सेन्ट्रल लन्दन शहर का केंद्रीय भाग है, हालांकि इसकी कोई आधिकारिक परिभाषा नहीं है फिर भी परम्परागत रूप से लन्दन में किसी भी स्थान की दूरी वेस्टमिनिस्टर इलाके के चेरिंग क्रास से संदर्भित की जाती है. चेरिंग क्रास स्ट्रेंड, व्हाइटहॉल और कैस्पर स्ट्रीट का जंक्शन समझ लीजिये।यह पॉइंट ट्रेफलगार स्क्वायर के दक्षिण में है.

अंडरग्राउंड में बैठ कर लन्दन के एक सिरे से दूसरे सिरे तक शीघ्रता से पहुंचा जा सकता है लेकिन यह जमीन की सतह से सैकड़ों फिट नीचे हैं इसलिए इनमें यात्रा करके शहर की खूबसूरती को महसूस नहीं किया जा सकता है , इसके लिए या तो टैक्सी ले लीजिये, डबल-डेकर बस के ऊपरी तल की फ्रंट सीट पर बैठ कर घूमिये, यदि बजट सीमित है तो हमारी तरह सड़कों को पैदल ही नाप लीजिए, इसमें अलग मजा है आप शहर को बहुत करीब से महसूस सकते हैं.

हमने शहर को पैदल नापने की शुरुआत वेस्टमिनिस्टर अंडरग्राउंड स्टेशन से की. इस स्टेशन के दो एलिवेटर चढ़ कर जब बाहर निकले तो सामने ही बिग बेन के दर्शन हो गए , हम जब बाहर आये तो घने बादल छंट कर चुके थे और चटख धूप निकल आयी थी, दो घंटे की बारिश से हुई ठंड के बाद खिली धूप में खड़ा होना अच्छा लग रहा था. समय हो चला था बारह बजे, बिगबेन घड़ी ने तभी एक एक करके बारह बार अपना संगीत बजाया। इसी के साथ हमने टेम्स नदी के साथ बने प्रामिनेड पर चलना शुरू किया वहां से वेस्टमिनिस्टर ब्रिज पर जा कर फोटोग्राफी सेशन किया वहां से नयनाभिराम दृश्यों को कैद किया और फिर इसके बाद लन्दन आई की ओर प्रस्थान किया, यह विशालकाय झूला है , जिसमें वैठ कर धीरे धीरे लन्दन शहर का 360 डिग्री व्यू आपके सामने एक्सपोज़ होना शुरू हो जाता है. लन्दन आई के करीब में ही लन्दन डनगियान है जहाँ आधुनिक तकनीक से शताब्दियों से चली आ रही भुतहा कहानियां जीवंत हो जाती हैं. प्रमिनेड पर चलते चलते जुबली गार्डन पार करके जुबली ब्रिज आ गया. इस के नीचे से निकल कर पैदल वाटरलू ब्रिज तक कैसे पहुँच गए पता ही नहीं चला क्योंकि खुले मौसम में ओपन कैफेटेरिया और पबों की चहलपहल के बीच समय जैसे खो गया था.

वाटरलू ब्रिज हमें सीधे स्ट्रेंड तक ले गया .

स्ट्रेंड कोई एक किमी की लम्बाई में फैला हुआ है,यह इलाका 1000 से भी अधिक वर्षों से नगर का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है , 18 वीं शताब्दी में यहाँ के चेरिंग क्रास रेलवे स्टेशन से यूरोप के अन्य शहरों के लिए ट्रेन -बोट कनेक्शन हुआ करता था . एक लम्बे समय तक स्ट्रेंड इलाके में शाही घराने के काफी सदस्य भी रहा करते थे, पता नहीं क्या हुआ जो 16 वीं शताब्दी में एक एक कर के वे सब वेस्ट एंड जा कर बस गए। पुराने जमाने में यहाँ एक से बढ़ कर एक थियेटर हुआ करते थे जिनमें से अब डेल्फी, सेवाय और वाडिविले ही बचे हैं आज भी इस छोटे से इलाके में ,होटल, शॉपिंग, नाइट लाइफ, चर्च, आवास सभी कुछ मौजूद है, यहीं के एक टेवर्न डॉग एंड डक में १६वीं शताब्दी में किंग चार्ल्स के शासन को उखाड़ फेंकने की साजिश रची गयी थी इसका नाम ‘गन पावडर प्लाट’ रखा गया था लेकिन यह सफल नहीं हो पाई. 18 वीं शताब्दी में यहाँ के काफी- हाउस बुद्धिजीवियों के अड्डे बन चुके थे चार्ल्स डिकेंस, जान स्टुअर्ट मिल, हर्बर्ट स्पेंसर, विलियम मेकपीस ठाकरे जैसे साहित्यकार भी आ कर नए प्लाट और नए प्रेरणा स्रोत तलाशते थे .

स्ट्रेंड से हमारा अगला पड़ाव ट्रेफलगार स्क्वायर था।1820 में ब्रिटेन और फ़्रांस के बीच ट्रेफलगार युद्ध हुआ था जिसमें नेल्सन की फ़ौज़ पर ब्रिटिश फ़ौज़ ने विजय हासिल की थी, उसी की याद में चेरिंग क्रास पर यह स्मारक बनाया गया था. आज यह लन्दन का प्रमुख पर्यटन आकर्षण बन चुका है। यहाँ बीचों बीच में 200 फिट ऊँचा नेल्सन कालम है जिसकी हिफाज़त के लिए चार विशालकाय शेरों की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं. यह स्क्वायर कालांतर में पर्यटक-आकर्षण के साथ ही राजनैतिक प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र बन गया. यहाँ ज्यादा भीड़ जमा न हो इसके लिए कालम के सामने भव्य फव्वारे बना दिए गए है। स्क्वायर के ठीक पीछे नेशनल गैलरी है , यहाँ प्रवेश निशुल्क है. प्रदर्शित पेटिंग में काफी सारी ईसा मसीह के जीवन से सम्बंधित हैं. प्रदर्शित 2300 से भी अधिक पेंटिंग सं 1300 से 1910 के बीच की हैं, इनमें वान गोह, रेम्ब्रां ,विलियम होगार्ट , जेम्स टर्नर ,रेनर, मोनेट, एल्डर, बेलेनी जैसे ख्यातिनाम ब्रिटिश, फ्रेंच, जर्मन , इटेलियन , आस्ट्रियन पैंटरों की कलाकृतियां सम्मिलित हैं.क़ुल मिला कर इस स्क्वायर में जैसे समय कुछ क्षणों के लिय रूक जाता है.

लन्दन में ग्रीनिच इलाका है जिसे केंद्र मान कर दुनिया भर में समय का निर्धारण किया जाता है. ग्रीनिच पहुँच कर तो ऐसा लगा जैसे दो शताब्दी पीछे पहुँच गए हों और समय थम गया हो. यहाँ सब कुछ दो शताब्दी पहले जैसा ही है. सेन्ट्रल लन्दन के केंद्र बिंदु चेरिंग क्रास से यह इलाका 9 किमी की दूरी पर है, कभी ग्रीनिच में रॉयल पैलेस हुआ करता था, जहाँ ट्यूडर राजवंश के हेनरी चतुर्थ और एलिजाबेथ प्रथम जैसे कुल चिरागों का जन्म हुआ था, लेकिन सिविल वार के दौरान इसे काफी नुक्सान पहुंचा और बाद में पैलेस की जगह यहां रॉयल नेवल हॉस्पिटल बना दिया गया. यहाँ टेम्स के किनारे से सटा रॉयल नेवल कालेज हुआ करता था जिसने ब्रिटेन की विश्व की एक बड़ी नौसैनिक शक्ति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. आज यह परिसर संग्रहालय और और विश्वविद्यालय के कई विभागों में बदल गया है. लेकिन भवनों की मूल संरचना जस की तस है.
ग्रीनिच के नौसैनिक अतीत को यादगार बनाने के लिए 1869 में बने टी क्लिपर जहाज कटी शार्क को यहाँ स्थायी रूप से खड़ा करके संग्रहालय में बदल दिया गया है अपने ज़माने में यह सबसे तेज गति से चलने वाला बेहतरीन और आकर्षक जहाज था. ग्रीनिच की खूबी यह है कि आज भी यहाँ काफी कुछ कई शताब्दी पुराना है यहाँ के भवन कई शताब्दी पूर्व के वास्तुशिल्प की याद दिलाते है. ग्नीनिच से टेम्स नदी के नीचे से नार्थ ग्रीनिच तक का काफी पुराना भूगर्भीय मार्ग भी है। ग्रीनिच विलेज अपनी पब संस्कृति के लिए भी मशहूर है , यहाँ कई पब तो 150 से भी अधिक साल पुराने हैं और ये सब अपनी ब्रेवेरी में बनी बेहतरीन बीयर परोसते हैं. इनमें द ओल्ड ब्रेवेरी, बेलुशी, ग्रीनिच यूनियन, स्पेनिश गेलौं , जिप्सी मोथ, ट्रेफलगार टेवर्न, डेवी वाइन वाल्ट, ओल्डी एंड क्राउन, द गिलफोर्डस आर्म्स इनमें विशेष उल्लेखनीय हैं. हमने इनमें से द गिलफोर्डस आर्म्स को बैठने के लिए चुना, यह पब सन 1804 से चल रहा है, यह आकार में छोटा लेकिन भीड़ भाड़ से अलग बेहद अलग है , यहाँ का कम रौशनी और पुराने डेकोर का परिवेश भद्र ब्रिटिश तहजीब का अंदाज बयां करता है. यहाँ पर बीयर के अंतरराष्ट्रीय ब्रांड तो मिलते ही हैं लेकिन टेप बीयर इनकी अपनी ब्रेवेरी से आती है.सच तो यह है कि तेजी से आधुनिकीकरण की ओर बढ़ रहे लन्दन शहर के बीच द गिलफोर्डस आर्म्स जैसे पब वहां की पुरानी संस्कृति के शेष बचे टापू हैं.
एक दिन ब्रिटिश राजशाही की सीट बकिंघम पैलेस और उसके इर्द गिर्द के माहौल को देखने और समझने में लग गया . बकिंघम पैलेस और उसके आस पास का पूरा इलाका मुझे कुछ कुछ लुटियन दिल्ली की याद दिलाता रहा, आखिर क्यों न हो, दिल्ली का वाइसराय हाउस जो अब राष्ट्रपति भवन कहलाता है उसे और उसके आस पास के इलाके को बनाने के पीछे कहीं न कहीं लन्दन का यह शानदार इलाका जेहन में रहा होगा। बकिंघम पैलेस के चारों और हरियाली की भरमार है एक ओर सेंट जेम्स पार्क है तो दूसरी ओर हाइड पार्क और हाइड पार्क से जुड़े कई शाही पार्क हैं जो इस इलाके को और भी भव्य बनाते हैं. अच्छी बात यह है कि ब्रिटिश राजशाही के बारे में पर्यटकों को अवगत कराने के लिए रॉयल डे टूर, स्टेट रूम्स बकिंघम पैलेस, रॉयल गार्डन, रक्षक गार्डों की बदली की रस्म सब कुछ आपके लिए उपलब्ध है बस आपको 75 से 10 पौंड इन अलग अलग गतिविधियों के लिए अदा करने पड़ते हैं. मैंने इसी दौरान डेली टेलीग्राफ में एक रिपोर्ट पढ़ी थी कि ब्रिटेन की सकल राष्ट्रीय आय का 2 प्रतिशत महलों के प्रवेश शुल्क से आता है !

आक्सफोर्ड स्ट्रीट, रीजेंट स्ट्रीट लन्दन में बड़े बजट की खरीदारी के अच्छे विकल्प प्रदान करती हैं, दुनिया भर के बड़े बड़े ब्रांड के यहाँ शो रूम हैं. यहाँ सब कुछ इतना मंहगा है कि एक माध्यम वर्गीय पर्यटक के लिए विंडो शापिंग के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है. लेकिन हाथ में यहाँ की दुकानों के बैग आपके स्टेटस में कुछ वैल्यू एडीशन जरूर करते हैं. मुझे यहाँ घूमते घूमते बेसाख्ता दिल्ली का कनॉट प्लेस याद आता रहा क्योंकि कनॉट प्लेस ठीक इन्ही स्ट्रीट की तर्ज पर कालांतर में अंग्रेज शासकों ने बनाया था . रीजेंट स्ट्रीट से जुड़े पिकडली इलाके में कुछ कुछ बजट शॉपिंग की गुंजाईश लगी.पिकडली सर्कस पर कई थिएटर, रिप्ले का बिलीव इट आर नाट भी मौजूद है., यदि दुनिया भर के जाने माने लोगों के मोम के बने सजीव पुतलों को देखने का शौक है तो यहीं से बेकरलू लाइन पकड़ कर केवल 9 मिनट की अंडरग्राउंड यात्रा के बाद बेकर स्ट्रीट स्टेशन पहुँच जाइए बस वहां से दो मिनट की पैदल यात्रा के बाद मैडम टुस्साद म्यूजियम है. कई लोग तो लन्दन इस म्यूजियम को देखने के लिए ही जाते हैं ! भारतीय दर्शकों को आकर्षित करने के लिए अमिताभ बच्छन, ऐश्वर्य राय, सलमान खान जैसी फ़िल्मी शख्सियतों के सजीव बुत यहाँ मौजूद हैं.
नार्थ ग्रीनिच का इलाका मनोरंजन हब के रूप में विकसित हो रहा है, यहाँ ओ2 में ट्रेंडी पब, रेस्त्रां, ब्रांड स्टोर के साथ ही स्टेडियम भी है, जहाँ खेल कूद के साथ ही बड़े संगीत शो भी चलते रहते हैं, एमिरेट ने यहाँ से टेम्स के पार रॉयल डॉक्स तक नियमित गंडोला सेवा भी शुरू कर दी है जो न केवल पर्यटकों के द्वारा फन के लिये वरन उस इलाके के रहवासियों के काम पर आने जाने के लिए भी इस्तेमाल में आ रही है. इस सेवा के दूसरे छोर पर रॉयल डॉक्स में वाटर फ्रंट पर काफी सारी वाटर स्पोर्ट्स गतिविधियाँ भी उपलब्ध हैं. नार्थ ग्रीनिच में एमिरेट ने फन और यात्रियों के अनुभव के लिये फ्लाइट सिमुलेटर लगाए हुए हैं , जिस में वैठ कर आप हवाई जहाज लैंड करने, टेक आफ करने और उड़ाने का आभासी अनुभव प्रदान करता है.

पुराने ज़माने में भारत से समय समय पर मेहनत मजदूरी करने के लिए विभिन्न भागों से लोग लन्दन जाते रहे हैं, 1968 तक भारत के लोगों को वहां जाने के लिए वीसा भी नहीं लेना पड़ता था.और ब्रिटिश नागरिकता भी मिल ही जाती थी. आप हीथ्रो एयरपोर्ट पर देख लीजिये अधिकाँश सफाई कर्मचारी भारतीय मूल के विशेषकर पंजाब के हैं. आज लन्दन में ज्यादातर ऐसे भारतीय मूल के इन ब्रिटिश नागरिकों की दूसरी और तीसरी पीढ़ी अब तैयार हो चुकी . ये लोग लन्दन के बाहरी इलाके में रहते हैं और धीरे धीरे अपने क्षेत्र को मिनी इंडिया बना लिया है। ये इलाके साउथाल , वेम्ब्ले और लैंकेस्टर हैं. साउथाल एक तरह से मिनी पंजाब है,यहाँ तक कि साउथॉल रेल स्टेशन के नामपट्ट पर गुरुमुखी का भी इस्तेमाल किया गया है. स्टेशन से निकलते ही बाएं हाथ को उतारते ही एक विशाल गुरुद्वारा भी है, जिस पर पंजाब में आतंकवाद के दौरान काफी नकारात्मक भूमिका अपनाने के आरोप भी लगे थे।
साउथॉल में एक बड़ी संख्या पाकिस्तान के पंजाब और कश्मीर इलाके के लोगों की भी है, इसी लिए यहाँ पर स्टेट बैंक आफ इंडिया, पंजाब नेशनल बैंक, आई सी आई सी आई की शाखाओं के साथ ही हबीब बैंक की शाखा भी हैंदुकानों पर भारतीय दाल छावल, आटा , मसाले, पूजा का सामान, फल, सब्जियां, भारतीय पोशाकें , ब्राइडल ड्रेस मिल जाती हैं. यही नहीं भारतीय रेस्त्रां , फ़ूड स्टाल हैं जो जलेबी, समोसे, इडली, ढोकला, फाफड़ा सभी कुछ बेचते हैं. शादी के मैच मेकर भी मौजूद हैं. मुझे सबसे ज्यादा जलेबी जंक्शन दूकान ने प्रभावित किया जहाँ हर समय गरमागरम जलेबी मिलती हैं। हमारे मुरादाबाद के सहपाठी और बैंक सहयोगी नरेश सारस्वत इन दिनों करीब के सबर्ब स्लो के मंदिर में मुख्य पुजारी हैं, उन्होंने प्रवासी भारतीय समुदाय में अपने ज्ञान और विद्यता के कारण काफी नाम कमा लिया है। उन्होंने हमें दोपहर भोज के लिए यहाँ की किंग स्ट्रीट के दिल्लीवाला रेस्टोरेंट में आमंत्रित किया था। वही भारतीय मसालों की गंध, वही दिल्ली वाला स्वाद, पनीर, सरसों का साग और मक्के की रोटी, लस्सी और बढ़िया मिठाई आत्मा तृप्त हो गयी, कोई पांच महीने बाद अपने देश जैसा ऑथेंटिक स्वाद मिला. इसी तरह से वेमब्ले में गुजराती प्रवासी की बहुतायत है, वहां अहमदाबाद या बड़ौदा जैसा माहौल मिलेगा, फिर लैंकेस्टर में दक्षिण भारतीय मूल के प्रवासी रहते हैं वहां जा कर दक्षिण के किसी छोटे से शहर जैसा माहौल मिलेगा।

लन्दन पंद्रह दिन लगातार घूमने के वावजूद दिल नहीं भरा, यही लन्दन का चुम्बकीय आकर्षण है.

साभार- http://desireflections.blogspot.in/ से

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