टुकड़े टुकड़े पाकिस्तान / १३

पाकिस्तान द्वारा कब्जाया हुआ कश्मीर

(जाने माने इतिहास लेखक व राजनीतिक चिंतक प्रशांत पोळ ने भारत विभाजन के दौर की घटनाओँ पर जबर्दस्त शोध किया है और पाकिस्तान बनने और उसके बाद के घटनाक्रमों पर कई ऐतिहासिक साक्ष्य जुटाएं हैं , उनके इस अभिनव कार्य की तेरहवीं कड़ी में प्रस्तुत है पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में स्थित हिंदुओं के पवित्र तीर्थ शारदापीठ तक भारत से कोरिडोर बनाने की भारत सरकार की सफल रणनीति और इसका स्वागत पाकिस्तानी कश्मीर के कब्जे वाली असेंबली द्वारा करना , पाकिस्तान की भारी रणनीतिक हार और गिलगिट बाल्टिस्तान के लोगों द्वारा पाकिस्तान के कब्जे पर सवाल उठाना कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिसने पाकिस्तानी हुक्मरानों की सब रणनीतियाँ और कुटिलताएँ धूल में मिलती जा रही है।)

आर पार जोड दो
कारगिल रोड खोल दो
कुछ माह पहले, पाक द्वारा कब्जाये हुए कश्मीर और गिलगिट – बाल्टिस्तान में, इन नारों से घाटी गुंजायमान हुई थी. हजारो – लाखों की संख्या मे लोग पाकिस्तान के विरोध में अपना गुस्सा, अपना क्रोध बाहर निकाल रहे थे. घाटी मे गेंहू की कमी हो गयी थी, बिजली नही थी, महंगाई ने कमर तोड दी थी… और पाकिस्तान ने कब्जाये हुए कश्मीर के लोग भारत के जम्मू और कश्मीर के समाचार पढ़ते थे. वहां के विडिओ देखते थे. धारा ३७० हटने के बाद कश्मीर में कैसा खुशहाल वातावरण बना हैं, ये सब उनको दिख रहा था. पर्यटकों की झुंड भी दिखती थी.

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टुकड़े टुकड़े पाकिस्तान / १२

इसीलिए ये सारे आंदोलनकर्ता, पाकिस्तानी सरकार के साथ ही अपने पुरखोंको भी कोस रहे थे, कि हम भारत के साथ क्यूं नहीं गये?

इन लोगों की स्थिति बडी दयनीय है. ये सब ना तो घर के है ना घाटके! इन पर पाकिस्तान का पूरा नियंत्रण है, लेकिन ये लोग पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में अपना प्रतिनिधि नहीं चुन सकते. वोटिंग नही कर सकते. १९९४ तक तो गिलगिट – बाल्टिस्तान और पाक ने कब्जाये कश्मीर में, किसी को वोटिंग क्या होती हैं, यह मालूम ही नही था. विधानसभा जैसी रचना तो छोड़ दीजिये, सादी नगर पंचायत भी जनता द्वारा चुनी हुई नही थी. आखिरकार, यहां के लोगों के आंदोलन के कारण पाकिस्तान की फेडरल सरकार ने अक्तूबर १९९४ में, पाकिस्तान के राजनैतिक दलों को, पाक ने कब्जाये हुए कश्मीर में गतिविधियों की अनुमति दी. यहां ‘नॉर्दन एरियाज एक्झिक्यूटिव्ह कौन्सिल’ का गठन किया. किंतु शर्त यह कि यहां के स्थानिक राजनैतिक दल नहीं रहेंगे. सारी राजनैतिक गतिविधियां पाकिस्तान के राजनैतिक दलों द्वारा की जायेगी. अर्थात इस कौन्सिल (या अपनी भाषा मे विधानसभा) को कोई भी कार्यकारी अधिकार नही है. इनका काम केवल सलाह देने तक सीमित है.

इसीलिए कुछ महीने पहले, जब भारतीय संसद में गृहमंत्री अमित शाह ने घोषणा की कि ‘पाक ने कब्जाये हुए कश्मीर मे स्थित शारदा मंदिर तक एक कॉरिडोर बनाया जायेगा’, तब पाक ने कब्जाए हुए कश्मीर के असेंब्ली ने इसका स्वागत किया. शेख रशीद के नेतृत्व में ‘अवामी मुस्लिम लीग’ ने असेंब्ली में अमित शाह के वक्तव्य का संदर्भ देते हुए, ‘माता शारदा के मंदिर तक एक कॉरिडोर बनाने’ का प्रस्ताव रखा. इस प्रस्ताव को असेंब्ली ने पारित किया एवं पाकिस्तान सरकार को यह सलाह दी की ‘कश्मीरी पंडित और भारत के सभी हिंदू, माता शारदा के मंदिर के दर्शन करने आ सके’ ऐसी व्यवस्था हो. अर्थात पाकिस्तानी शासक, कौन्सिल (असेंबली) की इस मांग से खासे नाराज हुए. किंतु स्थानीय लोक भी चाहते है की शारदा पीठ का रास्ता, कर्तारपूर कॉरिडोर की तर्ज पर बनाया जाए. स्थानीय लोगोंमे शारदा पीठ को ‘शारदा माई’ नाम से जाना जाता है. इसमे यदि भारतीय दर्शनार्थी आने लगे, तो स्वाभाविकतः यहां का पर्यटन भी जबरदस्त बढेगा.

शारदा पीठ यह देश की १८ शक्तिपीठोंं मे से एक है. कुछ हजार वर्ष का इसका इतिहास है. यहां प्राचीन विश्वविद्यालय भी था. नीलम नदी (जो भारत मे आकर ‘किशनगंगा’ कहलाती है) के किनारे बसा यह गांव, किसी समय इस देश मे विद्या का, शिक्षा का प्रमुख केंद्र था. इसी के नाम से ‘शारदा लिपी’ प्रचलित हुई. आदी शंकराचार्य जी ने यहां तप किया था.

पाकिस्तान ने कब्जाये हुए कश्मीर की राजधानी मुजफ्फराबाद से यह स्थान १५० किलोमीटर, तो नियंत्रण रेखासे मात्र पच्चीस किलोमीटर की दूरी पर है.

पाकिस्तानने गिलगिट – बाल्टिस्तान और कब्जाये हुए कश्मीर पर नियंत्रण तो रखा है, किंतु संयुक्त राष्ट्र संघ के दबाव में वह इन्हे अपना राज्य नहीं मान सकता. इसलिये पाकिस्तान की प्रशासनिक दृष्टि से, गिलगिट – बाल्टिस्तान और कब्जाया हुआ कश्मीर, यह स्वतंत्र युनिट्स है. १९६२ मे भारत से हुए युद्ध में चीन ने अक्साई चीन पर कब्जा कर लिया था. इससे लगे हुए कुछ हिस्से पर पाकिस्तान का कब्जा था. इसलिये चीनी नेताओं ने, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को चीन बुलवाया. शनिवार दिनांक २ मार्च १९६३ को चीनी नेताओ ने पाकिस्तान के साथ पॅकिंग (वर्तमान मे ‘बीजिंग’) में एक समझौता किया, जो सायनो- पाकिस्तान समझौता’ के नाम से जाना जाता हैं. इस समझौते के तहत, कश्मीर का गिलगिट – बाल्टिस्तान से लगा हुआ हिस्सा, जिस पर पाकिस्तान ने अनाधिकृत कब्जा किया था, चीन को हमेशा के लिए दे दिया.

चूँकि इस पूरे क्षेत्र से कोई भी प्रतिनिधी चुनकर पाकिस्तान की नेशनल असेंब्ली मे नही जाता हैं, पाकिस्तानी सरकारने इस क्षेत्र के विकास पर कोई ध्यान नही दिया. पर्यटन की अपार संभावनाए होते हुए भी यहां पर्यटकों के लिए सुविधाओंका अभाव है. पिछले वर्ष, २०२२ में जहां भारत के जम्मू काश्मीर में रिकॉर्ड १.८८ करोड पर्यटक आये, वहां नीलम व्हॅली, मुजफ्फराबाद , गिलगिट….. यह सभी स्थान पर्यटकों के लिए तरस गए. मात्र पर्यटन ही नहीं, तो सभी क्षेत्र में, पाकिस्तान की सरकार ने कब्जाये हुए कश्मीर और गिलगिट – बाल्टिस्तान को पिछडा ही रखा. पाकिस्तान को, कश्मीर प्रश्न को विश्व की राजनीति मे जीवित रखना हैं, इसलिये पाकिस्तानी सेना ने, इस पुरे क्षेत्र मे अनेक आतंकवादी प्रशिक्षण केंद्र खोल रखे है.

यदि हम भारत के हिस्से वाले कश्मीर से इस क्षेत्र की तुलना करेंगे तो दिखता है की यह क्षेत्र अत्यंत पिछडा है. पाकिस्तान इस क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्थापर प्रतिवर्ष मात्र १३५ करोड रुपये खर्च करता हैं, वही भारत अपने हिस्से के कश्मीर में, शिक्षा पर ११०० करोड रुपये खर्च करता है. भारत के पास जो जम्मू कश्मीर है, उसमे तीन केंद्रीय विश्वविद्यालय, नौ राज्यस्तरीय विश्वविद्यालय और १७० से ज्यादा महाविद्यालय है. दो एम्स, आयआयटी, आयआयएम, एनआयटी, ११ मेडिकल कॉलेज, पंधरा से ज्यादा इंजीनियरिंग कॉलेजेस… इन सबके अलावा अनेक महत्त्वपूर्ण शिक्षा संस्थान और शोध संस्थान जम्मू कश्मीर में है.

इसके विपरीत, पाकिस्तानी कब्जेवाले कश्मीर की क्या स्थिति है?

यहा मात्र आठ शिक्षा संस्थान है, जिनमे से तीन मेडिकल कॉलेज है. भारतीय कश्मीर की तुलना मे पाकिस्तान ने कब्जाये हुए कश्मीर में बेरोजगारी और गरिबी का प्रतिशत बहुत ज्यादा है. इन्फ्रास्ट्रक्चर नही के बराबर है.

अभी ११ अगस्त को गिलगिट – बाल्टिस्तान क्षेत्र की, ‘गिलगिट – बाल्टिस्तान अवामी ॲक्शन कमिटी’ ने इस्लामाबाद मे बैठे पाकिस्तानी सरकार के विरोध में उग्र प्रदर्शन किये. अवामी ॲक्शन कमिटी के सचिव शब्बीर मायार के अनुसार यह प्रदर्शन, बेहद घटिया इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए किये गये. इस पूरे क्षेत्र में न तो अच्छी सडके हैं, और न ही बिजली. ‘ हर घर तक शुद्ध पेयजल’ यह तो उनकी कल्पना से भी बाहर है.

ये सारे लोग अपने पडोस के जम्मू कश्मीर के समाचार पढते, सुनते, देखते रहते है. भारत की, विशेषतः कश्मीर की, यह तरक्की देखकर आजकल पाक ने कब्जाये हुए कश्मीर और गिलगिट – बाल्टिस्तान में भारत के साथ जाने की मांग जोरों से उठ रही है. लेकिन स्वतंत्रता या भारत के साथ जाना, इन दोनो विकल्पों के सामने चीन है. बिलकुल वैसा ही, जैसे बलुचिस्तान और खैबर पख्तुनख्वा में है. चीन ने अपना बहुत बडा निवेश, पाकिस्तान ने कब्जाये कश्मीर में और गिलगिट – बाल्टिस्तान में कर रखा है. उसकी महत्त्वाकांक्षी परियोजना, ‘ग्वादर बंदरगाह को चीन के शिंजियांग प्रांत से जोडने वाला रास्ता’, पाकिस्तान ने कब्जाये हुए कश्मीर से जाता है. चीनने विद्युत निर्माण की अनेक परियोजनाए इस क्षेत्र में प्रारंभ की है.

इसलिये न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, अपने इस निवेश की सुरक्षा के लिये, चीन ने, पाक ने कब्जाये हुए कश्मीर और गिलगिट – बाल्टिस्तान में ग्यारह हजार से भी ज्यादा सेना के जवान तैनात किए है. एक प्रकारसे यह पुरा क्षेत्र, चीन का एक लघु उपनिवेश है. पाकिस्तान ने कब्जाये हुए कश्मीर और गिलगिट – बाल्टिस्तान के लोगों को कितना भी लगता होगा की पाकिस्तान से टूटकर स्वतंत्र राष्ट्र बनाएं या भारत मे विलीन हो जाए, तो भी चीन इसका मजबूती से विरोध करेगा.

आने वाले दिनों में यह देखना रोचक रहेगा की पाक ने कब्जा किये हुए कश्मीर के और गिलगिट – बाल्टिस्तान के लोग ज्यादा मुखर होते है, या चीन पूरी ताकत के साथ इन को दबा देता है.

मजेदार बात यह है, कि इस सारे संघर्ष में इस्लामाबाद में बैठे पाकिस्तानी नेताओं की कोई भूमिका नही है…!
(क्रमशः)
– प्रशांत पोळ