Monday, July 22, 2024
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हाड़ोती में पुरा संपदा कोलवी की प्राचीन बौद्ध गुफाएं

बौद्ध धर्म के प्राचीन अवशेषों की दृष्टि से राजस्थान के झालावाड़ जिले में स्थित बौद्ध गुफाएं महत्वपूर्ण अवशेष हैं। झालावाड़ जिला मुख्यालय से 90 किलोमीटर दूर कोलवी नामक गांव में लेटराइट पहाड़ी चट्टानों को काटकर बनाई गई बौद्ध गुफाएं राजस्थान में बौद्धकालीन संस्कृति के अवशेष के रूप में अपना विशेष महत्व रखती हैं। क्यासरा नदी के तट पर करीब 200 फीट ऊंची अश्वनाल आकृति की पहाड़ी पर विशाल चट्टानों की काटकर बनाई गई इन गुफाओं की खोज 1835 में डॉ. इम्पे द्वारा की गई। गुफाओं पर हिन्दु शैली के मंदिरों का तथा स्तूप शिखर पर दक्षिण भारतीय कला का प्रभाव नजर आता है। यहां बनी दो मंजिली गुफाएं विशेष रूप से दर्शनीय हैं। कुछ गुफाओं में भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं एवं दीवारों पर रेखांकन नजर आता है।

स्वतंत्र स्तूप वर्गाकार या अष्टकोणीय आधार के साथ दिखाई देते हैं। बोधिसत्व आकृतियों की अनुपस्थिति यहाँ हीनयान के प्रभाव का संकेत देती है। कुछ गुफाओं में या तो एक खुला या खंभों वाला बरामदा है, जो एक या दो कक्षों के प्रवेश द्वार प्रदान करता है। परिसर में एक विलक्षण चैत्य-गृह है जिसके अंदर स्तूप में बैठे बुद्ध की एक विशाल आकृति ढले हुए आसन पर ध्यान-मुद्रा में है । एक धनुषाकार जगह के अंदर ध्यान-मुद्रा में एक और बुद्ध और सभा हॉल के पास निचले खंड बुद्ध की एक खड़ी आकृति है। कुल मिलाकर कोलवी गांव के दक्षिण-पश्चिम में पहाड़ी के उत्तर, दक्षिण और पूर्व में चट्टानों को काटकर बनाई गई लगभग पचास गुफाएं हैं।उत्तर और पूर्व की अधिकांश गुफाएं ढह चुकी हैं। हालांकि, ये अवशेष उनके डिजाइन और व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं।

कोलवी से 12 किमी.पर बिनाएगा गाँव के पूर्व में खुदाई की गई गुफाओं के इस परिसर में लगभग बीस गुफाएँ हैं, जो एक लेटराइट पहाड़ी के दक्षिण की ओर कटी हुई हैं और पूर्व से पश्चिम की ओर चलती हैं। अधिकतर कोलवी की गुफाओं से छोटे आकार की हैं। यहां की सबसे दिलचस्प खुदाई स्तूप के आकार का अभयारण्य है। इसकी छत पारंपरिक चैत्य-गृह के समान है जिसमें चैत्य खिड़कियां हैं। एक और गुफा, जो ध्यान देने योग्य है, में एक खुले आंगन के दो पंख हैं। इसके पीछे एक बंद लॉबी है जिसमें गुंबददार छत है और एक केंद्रीय दरवाजा है जिसके दोनों ओर एक कोठरी है।

बिनायगा से पचपहाड़ के रास्ते में पगरिया गाँव से लगभग 3 किमी दक्षिण में ‘हथियागोर-की-पहाड़ी’ नाम की एक पहाड़ी है। इस पहाड़ी में केवल पांच खुदाई की गई गुफाएं हैं, जिनमें से एक गुंबददार छत के साथ 5 एमएक्स 5 एमएक्स 7 मीटर है। कुछ दूरी पर एक वर्गाकार आसन पर एक स्तूप निर्मित है।

नारंजनी शिव मठ के पास शहर के दक्षिण में स्थित नारंजनी की गुफा। यह लैटेरिटिक पहाड़ी के उत्तरी ढलान पर तराशी गई 3.50 x 3.80 मीटर की एक छोटी गुफा है। गुफा में उत्तर से एक संकरे प्रवेश द्वार से प्रवेश किया जाता है। मठ के सादे आंतरिक भाग में दो वर्गाकार खंभों पर टिकी सपाट छत है। यह नौवीं-दसवीं शताब्दी ई. का है। इसी प्रकार गुनाई ग्राम के समीप बौद्ध श्रमणों की 4 गुफाएं हैं। कोलवी के आसपास गांवों में स्थित बौद्ध गुफाओं से ज्ञात होता है कि राजस्थान का यह स्थल कभी बौद्ध धर्म का एक प्रभावी केन्द्र रहा होगा। करीब 2000 साल पुरानी 6ठी और 8वीं सदी के बीच निर्मित ये गुफाएं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित हैं।आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑॅफ इंडिया द्वारा इसका विकास कराया जा कर नीचे गेस्ट हाउस तथा सीढियां व रेलिंग बनायी गयी हैं।

(लेखक राजस्थान के जनसंपर्क विभाग के सेवा निवृत्त अधिकारी हैं और ऐतिहासिक व पुरातात्विक विषयों पर लिखते हैं)

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