ऐतिहासिक गुलाबी शहर जयपुर (भारत) से शुरू हुआ जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल अब दुनिया भर के कहानीकारों और कहानी प्रेमियों के लिए एक मंच बन चुका है, यह अब लंदन , न्यूयॉर्क , जैसे प्रमुख साहित्यिक नगरों की भी पहचान बन चुका है । इसका तीसरा संस्करण कल रात सिएटल में शुरू हुआ।
डाउनटाउन की विशाल पब्लिक लाइब्रेरी में हुए उद्घाटन समारोह में अमेरिका की चर्चित कांग्रेसवुमन और लेखिका प्रमिला रामपाल, संयुक्त राष्ट्र की पूर्व सहायक महानिदेशक सुश्री लक्ष्मी पुरी, फेस्टिवल के प्रबंध निदेशक संजॉय के. रॉय , सिएटल में भारत के काउंसलेट जनरल प्रकाश गुप्ता और दुनिया भर के कई जाने-माने लेखक उपस्थित थे।
'लाइफ ऑफ पाई' उपन्यास के लेखक के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले यान मार्केल ने कल सितंबर, 2026 को जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के तीसरे सिएटल एडिशन में ‘अनिश्चित समय में कहानियां और कल्पना क्यों अधिक महत्वपूर्ण हैं’ विषय पर अपने उद्घाटन भाषण में बात रखी।उनका कहना था कि हम केवल तथ्यों के सहारे नहीं जीते। हम उन कहानियों के सहारे भी जीते हैं जिनका उपयोग हम उन तथ्यों को समझने के लिए करते हैं। जब भविष्य अनिश्चित होता है, तो कल्पना हमें उन संभावनाओं को देखने की क्षमता देती है जो अभी दिखाई नहीं दे रही हैं। कहानियां हमें अपने से अलग लोगों के प्रति सहानुभूति रखने, पीड़ा से अर्थ निकालने और वर्तमान से एक अलग भविष्य की कल्पना करने की अनुमति देती हैं।उनके अनुसार अनिश्चित समय में, तथ्य हमें बताते हैं कि क्या हो रहा है, लेकिन कहानियां और कल्पनाएं इंसानों को यह समझने में मदद करती हैं कि इसका क्या अर्थ है — और इसलिए यह इस बात का हिस्सा बन जाती हैं कि समाज कैसे टिके रहते हैं, याद रखते हैं और अपने भविष्य की कल्पना करते हैं।
जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल में केवल साहित्यकार ही महत्वपूर्ण चर्चा का हिस्सा नहीं बनते , पाठकों की भी सक्रिय भागीदारी रहती है वे अपने प्रिय लेखकों से सिर्फ़ मिलते ही नहीं उनको सुनते ही नहीं वरन् उनकी पुस्तकें भी ख़रीद कर ले जाते हैं।
इस साहित्यिक और सांस्कृतिक समारोह का हिस्सा बन कर , मुझे महसूस हुआ है कि हिंदी लेखकों की पाठक वर्ग तक पहुंच काफी कमी है. कुछ ही सम्मानित अपवादों को छोड़कर आज के हिंदी लेखक बहुत छोटे दायरे तक सीमित हैं, जिसका कारण सीधा है कि उनकी रचनाएं बड़े वैश्विक प्लेटफार्म को तो छोड़िये हिंदी भाषा भाषियों तक भी नहीं पहुंच पाती हैं।
हाल के समय में इसका एकमात्र अपवाद गीतांजलि श्री हैं; उन्हें पुरस्कार और प्रशंसाएं भी इसलिए मिलीं क्योंकि उनकी कृति का विश्व ऑडियंस के लिए अंग्रेज़ी में अनुवाद हुआ और जब उन्हें बुकर मिलने की ख़बर मिली तो हिंदी पाठकों ने भी खोज कर उन्हें पढ़ना शुरू किया . यह विषय अलग से चर्चा का विषय भी है।
(लेखक स्टेट बैंक से सेवा निवृत्त अधिकारी हैं और इन दिनों अमरीका की यात्रा पर हैं)





