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कला व साहित्य से जुड़े कलाकारों को मदद की ज़रुरत

पिछले कुछ दिनों में अपने रिश्तेदारों और परिचितों और मित्रों में से कुछ को खो देने के अलावा जो एक बड़ा दर्द रहा है वह है साहित्य, पत्रकारिता और कला के अपने गुरुजनों और साथियों को खोने का। कई का तो पता भी तभी चला जब वे चले गये।हमने अपने अपने लाकडाउन के एकांत में उन्हें याद किया और उन पर लिखा भी। लेकिन हमारे लिखने से ज़्यादा बड़ा यह था कि वे लिखने के लिये नहीं बचे। और इसकी कोई क्षतिपूर्ति नहीं है। हमने हीरे जैसी प्रतिभाएँ खो दी हैं।

मैंने जानना चाहा कि दुनिया भर में लेखक समुदाय को कोविड में क्या सहायता मिल रही है। मैंने देखा कि अमेरिकन सोसायटी ऑफ जर्नलिस्ट्स एंड ऑथर्स ने राइटर्स इमर्जेंसी असिस्टेंस फंड बनाया है। कारनेगी फंड फ़ॉर ऑथर्स ने एक ऑथर्स लीग फंड खड़ा किया है। PEN ने एक पेन राइटर्स इमर्जेंसी फंड बनाया है। एंड्रयू मेलन फ़ाउंडेशन, द गेट्टी ट्रस्ट, हेलेन फ्रैंकेनथलेर फ़ाउंडेशन, एंडी वारहोल फ़ाउंडेशन कलाकारों की मदद के लिये आगे आये। निजी क्षेत्र के उद्योगपति, विभिन्न ट्रस्ट्स, सार्वजनिक उपक्रम इकाइयों ने मिलकर एक coalition भी बनाया कि कोविड से गुजर रहे साहित्यकारों व कलाकारों को पांच हजार डॉलर की तत्काल सहायता दी जाये।संगीतकारों, नृत्यकारों, नाट्यकर्मियाें की पृथक् पृथक् गिल्ड ने भी अपनी अपनी पृथक योजनायें आरंभ कीं।Equal Sound ने Musicians’ Corona Relief Fund प्रवर्तित किया। संयुक्त राज्य अमेरिका में मुस्लिम कलाकारों की मदद के लिये Pillars Rapid Response Fund बना और non-white queer लेखकों के लिए भी पृथक फंड क़ायम हुआ।वहाँ एक संगठन Twenty Summers है जिसने कोरोना के कारण अचानक आर्थिक नुकसान में आ गये कलाकारों और कला संगठनों की मदद के लिये Art Interrupted Emergency Arts Fund शुरू किया। ब्रिटेन में सोसाइटी ऑफ ऑथर्स, ALCS, रॉयल लिट्रेरी फंड, टी एस इलियट फ़ाउंडेशन, इंग्लिश PEN और अमेजन UK ने मिलकर ऑथर्स इमर्जेंसी फंड बनाया है। अब जरूरी हो गया है कि साहित्यकारों, कलाकारों के contact numbers की ही एक डायरेक्टरी हो कि जिसके ज़रिए उनकी खोज खबर ली जाती रहे।और उनके लिए विकेंद्रित सुविधा केंद्र भी हों।

कोविड ने एक भयंकर कल्चर शॉक दिया है। अलग ही तरह का। लेकिन उसे लेकर दुनिया जो कर रही है, क्या हम कर रहे हैं? दुनिया भर में लेखकों व कलाकारों से वीडियो और ऑडियो प्रस्तुतियाँ ही नहीं ली जा रहीं, वर्चुअल पुस्तक मेले ही नहीं हो रहे , कोविड पीड़ित होने पर उनकी सुविधा सहायता के लिए, प्राब्लम साल्विंग के लिए फ़ेसबुक फोरम भी प्रचलन में हैं। कोरोना संकट से गहन संकट में आ गये सांस्कृतिक व्यवसायों की चिंता करते हुए लेखकों और कंपोज़र्स की सोसायटीज़ के अंतर्राष्ट्रीय परिसंघ ने सारे देशों की सरकारों को खुला ख़त जारी किया है। एक जानकारी के अनुसार चार से दस वर्ष के 61% संगठन भारत में बंद हो गये हैं।

उधर आर्ट्स कौंसिल ऑफ वेल्स ने 7 मिलियन पौंड का Resilience Fund बनाया है। यूरोपीय यूनियन के छ: लाख से ज़्यादा लाइव पर्फार्मेंस कलाकारों, १०००० संगठनों और European Arts and Entertainment Alliance ने विभिन्न सदस्य देशों की सरकारों से एक कोआर्डिनेटेड एक्शन प्लान और एक रिकवरी पैकेज के लिये माँग की है। उन्होंने कहा है कि जीवंत प्रदर्शन ( लाइव परफ़ॉर्मेंस) का यह क्षेत्रक अपने सबसे ख़राब दौर से गुज़र रहा है। बिना रिकवरी पैकेज के इनमें से कई सांस्कृतिक संगठन हमेशा के लिये बंद हो जायेंगे। कई कलाकार कला की दुनिया से हमेशा को हाथ जोड़ लेंगे।

उन्होंने कलाकारों के लिए रोज़गार योजना या बेरोज़गारी में समर्थन योजनाओं, आय में हुई कमी की क्षतिपूर्ति योजना, और यूरोपीय यूनियन की निम्न स्कीमों का लाभ भी कलाकारों को दिलाने की माँग की है- recovery and resilience facility, SURE, REACT-EU, ESF+, Neighbourhood Development and International Cooperation Instrument और European Globalisation Adjustment Fund. अल्जीरिया की संस्कृति मंत्री मलिका बेंडौडा ने ऐसे कलाकारों जिनका काम व्यवधानित हुआ, के लिये वित्तीय सहायता पैकेज घोषित किया। आस्ट्रेलिया में फ़ेडरल सरकार ने 27 मिलियन आस्ट्रेलियाई डालर का विशेष कला सहायता और 7 मिलियन का आदिवासी दृश्य कला समर्थन निधि जारी की। फिर 250 मिलियन का प्रोडक्शन और ईवेंट व्यापारों के लिये पैकेज दिया।फिर एक 75 मिलियन डॉलर का समर्थन पैकेज दिया। कई टैक्स हटा लिये। इटली ने “असाधारण समर्थन निधि” के रूप में 50 मिलियन यूरो दिये।फ़्रांस, जर्मनी, स्वीडन आदि कई देशों ने ऐसे पैकेज दिये।

हम सोचते हैं कलाकार डिजिटली परफ़ॉर्म कर लें। पर हर चीज़ का डिजिटल उत्तर नहीं हो सकता। स्ट्रीमिंग और रिकार्डिंग के अपने खर्चे हैं। वीडियो और साउंड क्रू को जुटाना पड़ता है। हमारे यहाँ तो Europeana जैसा डिजिटल संग्रहालय भी नहीं कि ये माँग की जाये कि संगीत, नृत्य, थियेटर आदि को intangible heritage मानकर उसी तरह का समर्थन कलाकारों को दिया जाये।

वैसे सिर्फ़ अपेक्षा ही नहीं, इस संकट ने रचनाकार दुनिया को योग देने के अवसर भी दिये हैं। वर्जीनिया विश्वविद्यालय ने ‘लिट्रेचर इन डार्क डेज़’ के नाम से एक श्रृंखला शुरू की है। कई पुस्तकालयों और संग्रहालयों ने ने पुस्तकों की डिजिटल कापी बनाकर अपने सदस्यों को देना और ऑनलाइन डिस्प्ले प्रोजेक्ट आरंभ किये हैं।

आज एक जिम्मेदार मंच पर इनमें से कुछ बातें मैंने कहीं हैं। यह समय सब रचनाकारों के साथ आने का है।

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