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इसाईयत की तलवार है एक हाथ में रोटी और एक हाथ में बाइबिल

भगवान, इस देश में बहुत से झूठे धर्म पैदा हो रहे है, जिनसे अधर्म फैल रहा है। इस संबंध में हमारा क्या कर्तव्य है? कृपया मार्गदर्शन दें।

जिनके पास भी सोचने की थोड़ी भी समझ है,जिनके पास भी देखने की जरा सी आंख है उनको मुझे बताना ही पड़ेगा कि उनका कर्तव्य क्या है। उनका कर्तव्य है इस देश में फैलते हुए झूठे धर्म को रोकना—एक—दो देश के वास्तविक धर्म को पुनः फूल की तरह खिला देना। यह सच है कि जिस तरह मेरे दुश्मनों की संख्या बढ़ी है उसी तरह मेरे दोस्तों की संख्या भी बढ़ी है। प्रकृति में एक संतुलन है। और दुश्मन नासमझी के कारण दुश्मन हैं, इसलिए उनसे डरने की कोई जरूरत नहीं है। दोस्त समझदारी के कारण दोस्त है। इसलिए दस दुश्मन के मुकाबले एक दोस्त कीमती है। उन दुश्मनों को हम जीत लेंगे क्योंकि उन दुश्मनों के पास कुछ भी नहीं है। उनके भीतर एकदम खालीपन है, अर्थहीनता है। न कोई शांति है न कोई आनंद है।

तुम्हारा कर्तव्य यही है कि इस देश ने जो हजारों वर्षों में अर्जित किया है उसे कहीं तुम्हें न भूल जाओ। अन्यथा तुम कैसे दुनिया को याद दिलाओगे? और तुम भूल रहे हो। तुम्हारे पंडितों, तुम्हारे पुजारियों, तुम्हारे स्वामियों को कोई चिंता नहीं है। उनको फिकर है सिर्फ उनके पेशे और उनके धंधे के चलने की। उन्हें इस विराट संसार और पृथ्वी पर जो आंदोलन हो रहे हैं उनका कोई बोध नहीं। वह इस देश में भी अपने धर्म को बचाने में समर्थ नहीं हैं।

ईसाइयत इस देश में आज तीसरा बड़ा धर्म हो गया है। आज नहीं कल ईसाइयत अलग मुल्क की मांग पैदा करेगा। और अगर मुसलमान अलग मांग कर सकते हैं तो ईसाइयत को भी कह है। वे नंबर तीन हैं। और उनकी संख्या रोज बढ़ रही है। और उनकी संख्या के बढ़ने के ढंग ऐसे हैं कि तुम समझ भी नहीं पा रहे हो। वे आकर लोगों को समझा रहे हैं कि बर्थ—कंट्रोल धर्म के खिलाई है। और तुम्हें पता नहीं कि बर्थ—कंट्रोल अगर धर्म के खिलाफ है तो तुम गरीब से गरीब होते जाओगे। और जितनी गरीबी बढ़ेगी उतनी ईसाइयत बढ़ेगी। जितने अनाथ होंगे उतनी ज्यादा मदर टेरेसा होंगी।

तुम्हें सोचने की जरूरत है कि धर्म की आड़ में ईसाइयत को फैलाने का जो बड़ा जाल चल रहा है, उसे रोकना तुम्हारे हाथ में है। तुम्हारे बच्चे ईसाई होंगे क्योंकि भूखे मरते बच्चों को सिवाय ईसाई होने के और कोई रास्ता न रह जाएगा। लेकिन अगर तुमसे कहा जाए कि संतति—नियमन करो तो तत्क्षण तुम्हारे पंडित और तुम्हारे शंकराचार्य भी इसका विरोध करते हैं बिना सोचे समझे कि वे जो कर रहे हैं वे ईसाइयों के हाथ में खेल खेल रहे हैं—अनजाने, अंधे आदमियों की तरह।

पश्चिम के मुल्कों में—फ्रांस या स्वीडन—उनकी संख्याएं स्थिर हो गई हैं। वहां नए बच्चे पैदा नहीं हो रहे। या उतने ही पैदा हो रहते हैं जितने पुराने लोग मर रहे हैं। तो उनकी आर्थिक स्थिति रोज ऊंची जोती चली जाती है और तुम्हारी आर्थिक स्थिति रोज नीची गिरती चली जाती है।

मुसलमान ने दुनिया को बंदूक और तलवार की नोक पर मुसलमान बनाया था। ईसाइयत ज्यादा होशियार है। वह तो तलवार लाती है और बंदूक लाती है। वह एक हाथ में रोटी लाती है और एक हाथ में बाइबिल लाती है। और भूखा यह नहीं देखता कि रोटी के साथ बाइबिल भी जुड़ी है।

अगर इस देश को अधर्म से बचाना है तो पहला काम है कि इस देश की संख्या की बढ़ती हुई स्थिति को रोकने की हर चेष्टा की जाए। न तो सुनो तुम्हारे पंडितों को न तुम्हारे शंकराचार्य को। न सुनो पोप को और न मदर टेरेसा को। लेकिन बड़ा आश्चर्य है उनको नोबल प्राइज दी जाएगी,डाक्टरेट दी जाएगी। पदमश्री की उपाधियां दी जाएंगी, भारत—रत्न बनाया जाएगा। और उनका सारा जहर एक ही बात पर निर्भर है कि वे तुम्हें समझाएं कि बच्चे पैदा करना…। उन्हें स्वीडन जाकर समझना चाहिए जहां बच्चे पैदा करना बंद हो गए; जहां की सरकार हर नए बच्चे के लिए सहूलियतें देने को तैयार है क्योंकि उन्हें डर है कि उनकी संख्या गिर रही है। कहीं ऐसा न हो कि उनकी संख्या बहुत ज्यादा बिरा जाए और वे कमजोर हो जाएं। आश्चर्य की बात है मदर टेरेसा कलकत्ता में बैठी हैं, इनको स्वीडन जाना चाहिए। नहीं, लेकिन स्वीडन जाने से क्या फायदा। वहां सब ईसाई हैं। कलकत्ता में रहने की जरूरत है क्योंकि वहां अनाथ बच्चे हैं जिनको कि ईसाई बनाना है, और और अनाथ पैदा हो सकें इसके लिए तुम्हें समझाना है।

तो पहला काम है कि इस देश की संख्या रोकी जाए। दूसरा काम है कि देश ने अपनी ऊंचाइयों के दिनों में जो महानउड़ानें भरी थीं—उनका कोई संबंध हिंदू से नहीं है, न जैन से है, न बौद्ध से है, उनका संबंध मनुष्य के स्वत्व से है, उसके सत्य से है—उन ऊंचाइयों को फिर से मौका दिया जाए। तुम्हारे स्कूलों में ध्यान की कोई व्यवस्था नहीं है तुम्हारे स्कूलों में धर्म की या योग की कोई व्यवस्था नहीं है। तुम अब भी उसी तरह की फैक्टरियां चला रहे हो युनिवर्सिटी के नाम से जो ब्रिटेन ने स्थापित की थीं—जिन फैक्टरियों से केवल क्लर्क पैदा होते हैं और कुछ भी नहीं। तुम्हें वे लोग पैदा करने पड़ेंगे जिनकी ज्योति से दुनिया को यह अनुभव हो सके कि अध्यात्म के अतिरिक्त जीवन की कोई उपलब्धि उपलब्धि नहीं है। और तुम्हें हिम्मत करके लड़ना भी सीखना पड़ेगा। लड़ने का मतलब कोई बंदूकें लेकर लड़ना नहीं है।

जब मैं अमरीका की जेल में था तो सारी दुनिया से विरोध के पत्र, तार, टेलीग्राम, टेलीफोन, टैलेक्स हजारों की संख्या में पहुंचे, सिर्फ भारत से नहीं। दुनिया के अनेक महत्वपूर्ण लोगों ने—उनमें संगीतज्ञ हैं, कवि हैं, नृत्यकार हैं,अभिनेता हैं, डायरेक्टर हैं—अमरीका की गवर्नमेंट पर दबाव डाला कि मेरे साथ जो किया जा रहा है वह अन्याय है। लेकिन भारत की सरकार बिलकुल चुप रही। भारत का अंबेसेडरअमरीका के प्रेसीडेंट से जाकर नहीं मिला कि एक भारतीय के ऊपर अन्याय नहीं होना चाहिए। और तुमने कोई फिकर न की कि तुम दिल्ली की सरकार पर जोर डालते। यह पार्लियामेंट है या नपुंसकों की जमात है। इन हिजड़ों को बाहर करो। उल्टा जिस दिन मैं जेल से छूट गया, उस दिन भारतीय अंबेसेडर का आदमी मेरे पास पहुंचा कि हम आपकी क्या सहायता कर सकते हैं। मैंने कहा: तुम और मेरी सहायता करोगे? अब मैं जब जेल से छूट गया हूं! बारह दिन तक तुम कहां थे? तुम्हाराअंबेसेडर कहां था? तुम्हारी गवर्नमेंट कहां थी? मुझे तुम्हारी किसी सहायता की कोई जरूरत नहीं है। तुम्हें और तुम्हारी सरकार को मेरी कोई सहायता की जरूरत हो तो मुझको खबर करो। और जब मैं भारत आया तो अमरीका अंबेसेडर ने भारत की सरकार पर जोर डाला कि मैं भारत में रह सकता हूं—दो शर्तों पर। एक कि मेरा पासपोर्ट दिन लिया जाए ताकि मैं भारत के बारह न जा सकूं। दूसरा कि किसी गैर—भारतीय को, विशेषकर पत्रकारों को मेरे पास न पहुंचने दिया जाए। और भारत की सरकार ने दोनों शर्त मंजूर कर लीं। इन शर्तों की मंजूरी के कारण मुझे तत्काल भारत वापस छोड़ देना पड़ा क्योंकि इन शर्तों के रहते अमरीका का जेल हुआ या भारत का जेल हुआ बराबर हो गया।

मैं बार—बार दुनिया के चक्कर पर जाऊंगा। और बार—बार हर मुल्क की जेल मुझे देखनी है। और तुम्हें दिखाना है कि सत्य को बोलना इस दुनिया में सबसे बड़ा पाप है। और धर्म की बात करना इस दुनिया में सबसे बड़ी खतरनाक स्थिति में प्रवेश करना है। तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम अपनी सरकार को हिजड़ों की सरकार न रहने दो। इस सरकार पर दबाव होना चाहिए। लेकिन इस सरकार पर उलटे दबाव हैं। उस पर दबाव अमरीका का है।मैं अभी भारत वापिस आया हूं। मेरे पास कोई लगेज नहीं। फिर भी मुझे तीन घंटे एयरपोर्ट पर बिना रखा गया। मैंने उस आफिसर को कहा कि तुम यहां लिखे हुए हो एयरपोर्ट पर वैल्कम टू इंडिया। मैं भारत का हूं। मुझे किसलिए तीन घंटे यहां बिठा रखा गया है? क्या कारण है? मेरे पास कोई लगेज नहीं है। जिनके पास लगेज है उनको मैं पीछे छोड़ रहा हूं।

लेकिन उन्होंने कहा: माफ करिए, हम क्या करें? ऊपर से जैसी आज्ञा है हम वैसा कर रहे हैं। इन ऊपर की आज्ञाओं को तोड़ना होगा। ये कौन हैं जो ऊपर हैं? ये तुम्हारे नौकर हैं। ये भिक्षमंगे हैं जिन्होंने तुमसे वोट मांगी और आज तुम्हारे ऊपर हैं। और अकारण उन आफिसरों ने तीन घंटे के बाद मुझसे क्षमा मांगी। मैंने कहा, तुम्हारी कक्षा का सवाल नहीं है। तुम्हारी सरकार को क्षमा मांगनी चाहिए। मेरे तीन घंटे तुम्हें खराब करने का क्या कह है? अगर कोई कारण होता तो ठीक था। लेकिन कोई भी कारण नहीं है और तुम मुझे तीन घंटे व्यर्थ यहां बिठाए रखे हो।

मैं भारत वापस आया हूं सिर्फ इसलिए ताकि मैं भारत की जनता को यह आगाह कर सकूं कि अब दुबारा जब मैं वापस दुनिया के दौर पर जाता हूं और जगह—जगह मेरे लिए मुश्किल होगी तो तुम कम सेम कम भारत की सरकार पर दबाव डालना कि अगर तुम एक भारतीय की भी, जो कि बिलकुल ही निर्दोष है…। अभी दो दिन पहले अमेरीका के अटर्नी जनरल ने सब से बड़े कानूनविद ने, पत्रकारों को जवाब देते हुए उत्तर में कहा कि हम भगवान को जेल में बंद नहीं कर सके क्योंकि उनके ऊपर कोई जुर्म नहीं है। लेकिन फिर भी उन्होंने साठ लाख रुपया मेरे ऊपर फाइन किया है। भारत की सरकार को पूछना चाहिए कि अगर मेरे ऊपर कोई जुर्म नहीं है तो साठ लाख रुपया किस तरह मुझ पर फाइन किया गया है,किस बात के लिए फाइन किया गया है? मुझे पांच लाख के लिए अमरीका में प्रवेश बंद किया है वह किस आधार पर किया है? और दस साल तक अगर अमरीका में मैं कोई छोटा—मोटा जुर्म भी करूं तो उसकी सजा दस साल कैद होगी और अदालत में मैं कोई मुकदमा नहीं लड़ सकूंगा। और अमरीका का सब से कड़ा कानूनविद, प्रेसिडेंट का अटर्नी जनरल, अपने उत्तर में कहता है कि वे मुझे जेल में नहीं रख सके क्योंकि उनके पास मेरे खिलाफ कोई भी सबूत नहीं है और मैंने कोई जुर्म नहीं किया है।

दूसरी बात उन्होंने कही कि हम भगवान ने जो कम्यून अमरीका में स्थापित किया था उसे नष्ट करना चाहते थे। और वह भगवान की मौजूदगी में रहते नष्ट नहीं हो सकता था,इसलिए भगवान को हटाना पड़ा। उस कम्यून का क्या जुर्म था। उस कम्यून का जुर्म यह था कि हमने एक डेजर्ट को, वर्षों से डेजर्ट है एक हरे भरे उद्यान में परिवर्तित कर दिया था। पांच हजार संन्यासियों ने अपने मकान खुद बनाए थे। अपने रास्ते खुद बनाए थे और यह सिद्ध कर दिया था कि डेजर्ट में भी स्वर्ग को निर्मित किया जा सकता है। यह बात अमरीका के राजनीतिज्ञों को बहुत अखर रही थी। क्योंकि लोग उनसे पूछ रहे थे कि ये बाहर से आए हुए लोग मरुस्थल को स्वर्ग बना सकते हैं, तो तुम अब तक क्या करते रहे हो? इसलिए कम्यून को नष्ट करना जरूरी था। और मेरे रहते वहां कम्यून को नष्ट करना मुश्किल था क्योंकि पांच हजार संन्यासी यह तय किए हुए बैठे थे कि उनको बिना मारे मुझे अरेस्ट नहीं किया जा सकता।

और तीसरी बात अटर्नी जनरल ने कहीं है कि हम भगवान को इसलिए जेल में नहीं रख सके कि हम नहीं चाहते कि दुनिया के वे एक पैगंबर बन जाएं, क्योंकि उन्हें जेल होगी तो उनका रुतबा एक शहीद का होगा। उनके संन्यासियों के मन में वही जोश और खरोश पैदा होगा जो कि जीसस के सूली पर चढ़ जाने के बाद पैदा हुआ था। लेकिन उनकी दिली इच्छा यहां थी कि वे मुझे मार डालते। मार नहीं सके क्योंकि सारी दुनिया में विरोध था, सिर्फ भारत को छोड़कर। भारत में छोटा—मोटा विरोध हुआ। उस छोटे—मोटे विरोध को कोई मूल्य नहीं है। और भारत के विरोध में भारत की सरकार का कोई हाथ नहीं था। क्योंकि भारत की सरकार को फिकर इस बात की ज्यादा है कि अमरीका से न्युक्लियर बम बनाने की तरकीबें और सामान कैसे पाया जाए; इस बात की फिकर नहीं है कि अमरीका आध्यात्मिक रूप से रूपांतरित कैसे किया जाए।

तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम उन लोगों को आने वाले चुनाव में चुनना जो दुनिया को आध्यात्मिक रूप से परिवर्तित करने की चेष्टा करें। तुम्हारी ताकत बड़ी है क्योंकि मैं अनुभव करता हूं अगर मैं अकेला आदमी सारी दुनिया की सरकारों के खिलाफ लड़ सकता हूं, तुम भी लड़ सकते हो। सरकारों की ताकत बड़े नीचे तल की ताकत है।

मैं तुम्हें एक उदाहरण देता हूं। उरुग्वे में, उरुग्वे के प्रेसिडेंट ने जो कि मेरी किताबों को पढ़ते रहे हैं और मुझसे में उत्सुक हैं, मुझे निमंत्रित किया, मैं उरुग्वे स्थिर रूप से निवास करने के लिए तैयार था। तत्क्षण अमरीका के प्रेसिडेंट नेऊरुग्वे के प्रेसिडेंट को धमकी दी कि अगर छत्तीस घंटे के भीतर उरुग्वे नहीं छोड़ते हैं तो जितना ऋण तुमने अतीत में हमसे लिया है वह सब वापस करना होगा। वह तो बिललियन्सआफ डालर्स वह उरुग्वे कैसे गरीब देश को लौटाना असंभव है। और अगर तुम नहीं लौटा सकते तो तुम पर तो रेट आफइंटरेस्ट है, ब्याज की जो दर है, वह दुगुनी हो जाएगी। दूसरा छत्तीस घंटे के भीतर अगर उन्हें बाहर नहीं किया जाता है तो भविष्य के लिए जो हमने तुम्हें बिलियन्स आई डालर्स देने का वचन दिया है वह रद हो जाएगा। प्रेसिडेंट के सेक्रेटरी ने मुझे आकर कहा कि मैंने पहली दफे उरुग्वे के प्रेसिडेंट की आंखों में आंसू देखे। और ये शब्द प्रेसिडेंट ने कहे कि भगवान के आने से कम से कम एक बात हुई कि हमारा यह भ्रम टूट गया कि हम स्वतंत्र हैं।

पुराने किस्म का साम्राज्य समाप्त हो गया है। एक नए किस्म का साम्राज्य व्याप्त हो गया है। हर देश को अमरीका धन दे रहा है जिसको कोई देश लौटा नहीं सकता। वायदे कर रहा है ज्यादा धन देने के जिनको कोई देश इंकार नहीं कर सकता। यह ज्यादा आसान गुलामी है। दिखती भी नहीं। झंडा भी तुम्हारा तिरंगा फहरता है और भीतर—भीतर तुम्हारी आत्मा पर अमरीकी झंडा गड़ा हुआ है। इस झंडे को उखाड़फेंकना है। यह बेहतर है कि हम गरीब हों। यह बेहतर है कि हम मर जाए और इस दुनिया से भारत का नामोनिशान मिट जाए। मगर यह बेहतर नहीं है कि पैसा हमें खरीद ले और हमारी आत्माओं को खरीद ले। इस देश को अपनी आत्मा को बेचने से बचाना तुम्हारा कर्तव्य है।

ज़ोरबा द बुध्दा में ओशो के प्रवचनों का अँश

प्रस्तुति ओशो प्रेमी आईपीएस यादव

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