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‘सीआईयू क्रिमिनल्स यूनिफॉर्म’: इसका हर पन्ना किसी फिल्म की तरह आँखों से गुजरता है

अपराध जगत को लेकर हिंदी और अंग्रेजी में ऐसे तो कई पुस्तकें आई है, लेकिन मुंबई में जाने माने उद्योगपति मुकेश अंबानी के घर के सामने एक अज्ञात वाहन में जिलेटिन रखने और इसके बाद के रोमांचक, खौफनाक, रहस्यमयी और हर पल एक नई साजिश को उजागर करने वाले घटनाक्रम को लेकर जाने माने पत्रकार संजय सिंह और राकेश त्रिवेदी की पुस्तक ‘सीआईयू क्रिमिनल्स यूनिफॉर्म’ एक ऐसी पुस्तक है जो पाठकों को अलपराध जगत से लेकर पुलिस की अंदरूनी व्यवस्था, राजनीतिक षड़यंत्र, घात-प्रतिघात की एक रहस्यमयी दुनिया की सैर कराती है।

ऐसे तो ये पुस्तक उपन्यास शैली में लिखी गई है मगर 269 पृष्ठों की ये पुस्तक हर पल, हर पंक्ति के साथ पाठकों को रोमांच और खौफ की एक ऐसी दुनिया में ले जाकर छोड़ती है कि पाठक कभी सिहर उठता है तो कभी अपने आपको रोमांच के बियाबान में पाता है।

ये एक अपराधिक घटना पर लिखी गई पुस्तक है मगर जिस गति के साथ पुस्तक आगे बढ़ती है, उससे ऐसा लगता है पाठक पुस्तक नहीं पढ़ रहा है बल्कि कोई फिल्म देख रहा है। फिल्मी पटकथा की शैली में लिखी गई इस पुस्तक में एक एक दृश्य और हर एक घटना को इतनी खूबसूरती से पिरोया गया है कि पाठक इसके रोमांच में खो सा जाता है।

दोनों लेखकों ने अपने पत्रकारिता के लंबे अनुभव और पुलिस से लेकर अपराधियों, और न्यायालयों में वकीलों की पैंतरेबाजी को इतनी कुशलता से बुना है कि पाठक को पुस्तक में दिए गए घटनाक्रमों के बहाने कई जाने-अनजाने तथ्यों का पता चलता है।

पुस्तक पंद्रह चैप्टरों में है और इसका हर चैप्टर इस कांड को परत-दर-परत खोलता जाता है। जो बातें और घटनाएँ पुलिस चालाकी से छुपा लेती है और पूरे मामले को एक अलग मोड़ दे देती है उन तमाम घटनाओं को इतनी बारीकी से शामिल किया गया है कि कई बार तो लगता है पूरे कांड के जाँच अधिकारियों से ज्यादा जानकारी इन लेखकों के पास रही होगी।

पूरी पुस्तक फिल्मी पटकथा शैली में लिखी गई है, हर घटना को इस तरह समझाया गया है जैसे कोई फिल्म निर्देशक अपनी पूरी यूनिट को समझाने के लिए एक-एक घटना एक-एक दृश्य को बारीकी से लिखता है।

यह पुस्तक अपराधिक जगत से लेकर पुलिस की कार्यप्रणाली के उस तिलस्म से परिचित कराती है जिसे हम जानते और समझते तो हैं मगर समझ नहीं पाते। अपने सुदीर्घ पत्रकारिता के अनुभवों के माध्यम से लेखक द्वय ने बहुत ही कुशलता से इस पुस्तक को समृध्द किया है।

हत्या कैसे आत्महत्या में बदलने की कोशिश की जाती है लेकिन परिस्थितिजन्य सबूत कैसे इसे हत्या में बदल देते हैं। कैसे पुलिस कमिश्नर और उनका राजदार इंस्पेक्टर अपने आपको सत्ता और समाज की निगाह में लाने के लिए एक गहरा अपराधिक षड़यंत्र रचकर एक बेगुनाह को इसमें फँसाकर उसकी हत्या करके वाहवाही लूटने के चक्कर में होते हैं और अचानक किस तरह नियति का पहिया उल्टा घूमने लग जाता है और एक एक षड़यंत्र सामने आने लगता है। किस तरह पुलिस केंद्रीय जाँच एजेंसियों को गुमराह करती है और केंद्रीय एजेंसियाँ भी शह और मात का खेल खेलकर पुलिस की हर चाल को नाकाम कर देती है।

इस पुस्तक को पढ़कर ये अंदाज लगाया जा सकता है कि किसी भी अपराध के होने में और अपराधी के छूट जाने में पुलिस कितनी अहम भूमिका निभाती है। यदि किसी छोटे से छोटे अपराध की भी गहराई से जाँच की जाए तो अपराधी पर तो शिकंजा कसा ही जा सकता है बल्कि उस अपराध से जुड़े हर व्यक्ति का चेहरा उजागर किया जा सकता है।

केंद्रीय एजेंसी ने किस तरह अपने तीखे सवालों से असली गुनाहगारों को शिकंजे में लिया ये पढ़ना भी किसी रोमांच से कम नहीं। किसी का मोबाईल किस तरह एक अहम सबूत बन सकता है, इसके कई रोचक किस्से पुस्तक में मिलते हैं। अपराधी कितना भी शातिर हो वह अपने ही बुने जाल में कैसे फँस जाता है इसके कई उदाहरण इस पुस्तक से सामने आते हैं कि किस तरह एक अपराध को दबाने के लिए दूसरी घटना को अंजाम दिया गया और इसके बाद तो मानो एक के बाद एक सिलसिला चलता ही रहा। जाँच एजेंसियाँ भी कहाँ हार मानने वाली थी उन्होंने अपनी सख्ती, चालबाजी और रंगबाजी से असली गुनाहगारों को शिकंजे में ले ही लिया।

पत्रकारिता से लेकर लेखन में रुचि रखने वाले हर व्यक्ति को ये पुस्तक जरुर पढ़ना चाहिए, जिससे वे ये जान सकें कि किसी भी घटना की खोजबीन कैसे की जानी चाहिए और किसी घटना पर एक शानदार पुस्तक कैसे लिखी जानी चाहिए।

पुस्तक का नाम ‘सीआईयू क्रिमिनल्स यूनिफॉर्म’

लेखकः संजय सिंह व राकेश त्रिवेदी

कीमत ः 395 रुपये

प्रकाशकः आरके पब्लिकेशन

मुंबई

यह पुस्तक फ्लिपकार्ट पर https://www.flipkart.com/criminals-in-uniform/p/itmccfeb870ba2a8 इस लिंक पर उपलब्ध है

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