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विरोध इसलिए कि संस्थान में संस्कारवान लोग नहीं चाहिए

मुंबई फिल्म उद्योग के ज्यादातर दिग्गज जहां जहां बाहुबली पर मुंह सिले हुए हैं वहीं वे एफटीआईआई में अध्यक्ष पद पर फिल्म एवं टीवी अभिनेता गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति के मामले में खूब मुखर दिखते हैं। ऋषि कपूर और उनके बेटे रणबीर कपूर ने क्या बयान दिए, ये सब जानते हैं। अब कोई इनसे पूछे कि इस संस्था के पद पर कोई भी बैठे, इन्हें क्या फर्क पड़ता है। इन्होंने क्या इस संस्थान से कोई डिग्री ली है? डिग्री तो गजेन्द्र चौहान ने भी नहीं ली, लेकिन जब उन्हें ये जिम्मेदारी सौंपी गयी तो उन्होंने तमाम व्यस्तताओं के बावजूद इसे स्वीकार किया। कोई इन पिता-पुत्र से पूछे कि क्या अपनी महीने की करोड़ों की कमाई और अन्य मोह त्याग कर वे यह पदभार संभालेंगे? बेशक, उनका जवाब होगा, नहीं। तो फिर इतना हल्ला क्यों? गजेन्द्र का नाम लेकर कहा जा रहा है कि वह हिन्दुत्वनिष्ठ विचार के हैं, वगैरह वगैरह। दरअसल, ये सब उस तरह से है कि किसी इंसान के जन्म लेने से पहले ही ये घोषणा कर दी जाए कि वह तो नेत्रहीन पैदा होगा। हल्ला मचाने वालों से कोई पूछे कि ऐसी भविष्यवाणियों का आधार क्या है। प्रबुद्ध लोगों को यह सोचना चाहिये कि एक इंसान ने अभी अपना पदभार भी नहीं संभाला है और उसकी इतनी आलोचना। इन आलोचकों से ज्यादातर ने न तो इस संस्थान की कभी शक्ल देखी है और न ही वे इसकी हकीकत से परिचित हैं।  

 

 

कुछ लोग अजय देवगन और राजपाल जैसे भी हैं। पिछले दिनों टीवी पर एक इंटरव्यू के दौरान अजय देवगन ने एक बात कही। उनसे जब गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति के बारे में कुछ पूछा गया तो उन्होंने साफ कहा कि देखिये, मैं वहां से पढ़ा नहीं हूं। वहां की कार्य प्रणाली से बहुत ज्यादा परिचित भी नहीं हूं। लेकिन एक इंसान को अगर किसी काम के लिए चुना गया है तो कम से कम उसे वह काम करने तो दिया जाए। मेरा मतलब कि उसे एक मौका तो दिया जाए। इंटरव्यू लेने वाले की ओर से जब इस निर्णय पर सही या गलत सरीखी राय रखे जाने जैसा दवाब बढ़ा को उन्होंने कहा कि सरकार को एक बार फिर से इस विषय पर सोच लेना चाहिये। हो सकता है कि अजय देवगन की ही तरह बहुत से लोगों की यही राय हो। क्योंकि मौजूदा दौर में बहुत कम ऐसे लोग हैं जो इस संस्थान से शिक्षा लेकर नाम कमा रहे हैं। यहां तो ज्यादातर लोग या तो किसी के बेटे या फिर चाचे, मामे या ताये हैं। सारा काम रिश्तेदारी में चल रहा है। तभी हमारी फिल्मों की यह हालत हो रही है। उधर, किसी भी मुद्दे पर कम बोलने वाले राजपाल यादव ने घाटमपुर, कानपुर में एक कार्यक्रम में कहा कि गजेन्द्र की नियुक्ति का विरोध पूर्वाग्रह से ग्रस्त है। उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिलना चाहिये। हो सकता है कि गजेन्द्र का समर्थन करने वालों की संख्या उनके विरोध में खड़े होने वालों से ज्यादा हो। लेकिन फिलहाल उनका समर्थन करने वाले लोग दिख नहीं रहे हैं।

 

 

कुछ समय पहले सीबीएफसी में पहलाज निहलानी की नियुक्ति पर भी कुछ ऐसा ही हंगामा हुआ था। बाद में पता चला कि वहां किस-किस तरह के गोरखधंधे चल रहे थे। पैसे लेकर फिल्मों को मनमाने प्रमाणपत्र दिये जा रहे थे। कहीं एफटीआईआई में भी ऐसे ही गोरखधंधों को छिपाने की साजिश तो नहीं हो रही है?

 

 

 

इस मामले में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से तलब एक रपट में कहा गया है कि एफटीआईआई में भ्रष्टाचार का बोलबाला है और यहां चारों ओर राष्ट्रविरोधी वामपंथी विचारधारा फैली हुई है। संक्षेप में कहें तो इस रपट में कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर भी इशारा किया गया है। रपट के अनुसार संस्थान पर प्रबंधन मंडल के लोगों ने अपना कब्जा जमा रखा है और कई पुराने छात्र यहां राज कर रहे हैं। पुराने छात्रों के राज का यहां यह आलम है कि सन् 2008 में दाखिला लेने वाले छात्र यहां अभी तक कब्जा जमाए हैं और वह भ्रष्टाचार और राजनीति में शामिल हैं, जिसकी वजह से संस्थान का विकास नहीं हो पा रहा है। नए छात्रों को दाखिला नहीं मिल पा रहा है, जिसकी वजह से इस संस्थान की प्रसिद्धि में भी कमी आयी है और लोग निजी संस्थानों की ओर रुख कर रहे हैं। यहां पढ़ने वाले एक छात्र की पढ़ाई पर करीब दस लाख रुपये का खर्चा आता है, जिसे सरकार उठाती है। यहां कई वर्षों से जमे हुुए छात्रों ने अपने हास्टल की फीस तक जमा नहीं कराई है। छात्रों से ली गयी फीस और हास्टल फीस से संस्थान को करीब 25 फीसदी आय होती है, लेकिन 2010-11 में संस्थान को इस मद से केवल 11 फीसदी ही आय हुई। पंचवर्षीय योजना के तहत इस संस्थान का पूरा ढांचागत खर्च करीब 80 करोड़ रुपये है, जबकि हर साल गैर योजनाबद्ध खर्च 20 करोड़ रुपये रहता है। संस्थान के 55 साल के इतिहास में 39 बार हड़ताल हो चुकी है। कई प्रकार की वित्तीय अनियमितताएं सामने आयी हैं। बीते तीन सालों से यहां छात्रों के नए दाखिले तक नहीं हुए हैं। लेकिन इन सब बातों पर हमारी ज्यादातर फिल्मी हस्तियां मुंह सिले बैठी हैं जिसका फायदा महेश भट्ट जैसे सेकुलर उठाते हैं। 

 

साभार- साप्ताहिक पाञ्चजन्य से 

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