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देश, समाज और संस्कृति के बहाने लिखने का सिलसिला

देश की आज़ादी के रजत जयंती वर्ष (1972) में हमारी पीढ़ी के अनेक युवाओं को सम सामयिक घटनाक्रम में रूचि, वाक पटुता और भाषा पर पकड़ के गुण लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में खींच लाये थे. पत्र-पत्रिकाओं में नाम छपने से मिलने वाली शोहरत और प्रतिष्ठा तब भी इस विधा का ग्लैमर थी. आगे चलकर छोटे शहरों- कस्बों से उभरी यही प्रतिभाएं अख़बारों, रेडियो, टेलीविजन, जनसंपर्क, मीडिया संस्थानों में मिली आजीविका को अपनी खुशनसीबी मानकर पूरे ठसके और जूनून से नौकरी बजाती नज़र आईं.
राजा भोज की नगरी धार में जन्मे, पले-बढे, और खूब छपे मित्रवर डॉ. चंदर सोनाने इसी कड़ी का हिस्सा रहे हैं. हिन्दी साहित्य में प्रथम श्रेणी के स्नातकोत्तर चंदर सोनाने ने सुप्रसिद्ध साहित्यकार हिमांशु जोशी के रचना कर्म पर विक्रम विवि से पी-एचडी उस वक़्त की जब वे जनसंपर्क विभाग में पीआरओ के रूप में अपनी नौकरी का आधा सेवाकाल पूरा कर चुके थे. ‘कुत्ता’ शीर्षक से उनकी लघुकथा ‘कथादेश’ की अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता में पुरस्कृत भी हुई.
जनसंपर्क के क्षेत्र में विशिष्ट उपलब्धियों के लिये वर्ष 2004 के डॉ. राजेन्द्र कुमार सम्मान से नवाजे जा चुके श्री सोनाने चार साल तक राजधानी भोपाल में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि के कुलसचिव भी रहे हैं. संयुक्त संचालक जनसंपर्क के पद से सेवा निवृत्ति के उपरांत महाकाल की नगरी में जा बसे श्री सोनाने ने रिटायरमेंट के बाद लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सक्रियता कायम रखी है. विगत दो वर्षों से वे उज्जैन में ‘दस्तक न्यूज़ डॉट कॉम’ न्यूज़ पोर्टल के कार्यकारी संपादक हैं.
हिमांशु जोशी की रचना यात्रा पर केन्द्रित ‘पर्वतों का अन्तःसंगीत’ के दो दशक बाद उनकी दूसरी किताब ‘देश, समाज और संस्कृति’ (मूल्य पांच सौ रूपये) हाल में विद्या विहार नई दिल्ली से छपकर आई है. कुल जमा 270 पृष्ठों की किताब में चंदर सोनाने के 95 से अधिक सारगर्भित आलेख समाहित हैं जो 2015 से 2017 के बीच दैनिक प्रजादूत के साप्ताहिक कॉलम ‘देश, समाज और संस्कृति’ में प्रकाशित हुए हैं.
पुस्तक का आधे से ज्यादा ज्यादा हिस्सा उज्जैन में 2016 में संपन्न सिंहस्थ महापर्व की गतिविधियों पर केन्द्रित है. सिंहस्थ से जुड़े निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, पर्व स्नान की व्यवस्था, यातायात एवं भीड़ प्रबंधन, साफ़ सफाई व सौन्दर्यीकरण से लेकर क्षिप्रा के घाटों की मरम्मत व स्थानीय नागरिकों को होने वाली समस्याओं के समाधान तक श्रद्धालुओं व प्रशासन के हर विचारणीय बिंदु का लेखक ने बेबाक विश्लेषण व्यापक जनहित में किया है. सिंहस्थ में तूफ़ान की त्रासदी.. समूचा मेला क्षेत्र हुआ पास फ्री.. सिंहस्थ में लाल पत्थर की भरमार.. अमृत की बूंदें गिरी क्षिप्रा में सिंहस्थ स्नान नर्मदा में.. श्रद्धालुओं की आस्था से खिलवाड़.. महाकाल में आधे घंटे में हो सकते हैं दर्शन.. अलग अलग हों मेला अधिकारी और निगम आयुक्त.. पिछले सिंहस्थ से सीख लेना जरुरी.. पुराने अधिकारियों के अनुभव का लाभ लेने में क्या हर्ज़.. मोक्षदायिनी क्षिप्रा को मोक्ष की दरकार.. जैसे शीर्षकों से इन आलेखों के तेवर की बानगी मिलती है.
पुस्तक में शुरूआती लेख में परीक्षा परिणाम से हताश निराश विद्यार्थियों द्वारा आत्महत्या की बढती घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है. एक अन्य आलेख में  उज्जवला योजना के अंतर्गत देश में करीब दो करोड़ गैस कनेक्शन दिए जाने के बावजूद अभी भी 15 करोड़ महिलाओं की लकड़ी, कोयला अथवा कंडे जलाकर खाना बनाने की विवशता को रेखांकित किया गया है. बैंकों द्वारा किसानो की कर्जमाफी, हथियार बनाने में भारत की आत्म निर्भरता, जातिवाद का जहर, खेती का लागत मूल्य, राजनीतिक चंदाखोरी, अमानक बीज- खाद- कीटनाशक, डॉक्टरों की कमी, मंडियों में ऑनलाइन भुगतान, शिक्षा के अधिकार का मजाक जैसे अनेक ज्वलंत विषयों पर भी लेखक ने धारदार विचार अभिव्यक्त किये हैं. हालाँकि आलेखों के साथ तस्वीरें देने के मोह से बचा जाना चाहिए था. इससे पुस्तक का गंभीर कलेवर अपेक्षानुरूप बना रहता.
‘प्रार्थना में पहाड़’ के चर्चित उपन्यासकार भालचंद्र जोशी (जिन्होंने श्री सोनाने को साप्ताहिक कॉलम का शीर्षक सुझाया था) खरगोन से चली आ रही पुरानी लेखकीय मित्रता को निभाते हुए पुस्तक की भूमिका में लिखा है- “सत्ता के गलियारों में मीडिया के लिये विचरण की सुविधा, नजदीकी का विश्वास और अनेक लोभ बिखरे होते है. मीडिया और समाज का रिश्ता भले ही विश्वास की नाजुक डोर से बंधा हो, लेकिन मीडिया और सत्ता का रिश्ता द्वंदात्मक है. *भारतीय मीडिया में पिछले एक लम्बे अरसे में विचार और सरोकार का स्थान सनसनी, चर्चा में बने रहने का सुख और लाभ के अवसर ले चुके हैं.* सामाजिक प्रतिबद्धता छोटे पत्रकारों को उत्सवों, कार्यक्रमों में सीख देने की औपचारिकता में तब्दील होती जा रही है.”

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