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डॉ.सिंघल की पुस्तक ‘पर्यटन और संग्रहालय’ हाड़ौती की मूर्ति कला का अप्रतिम संग्रह

कोटा। राजकीय संग्रहालय की अनेक विशेषताओं में हाड़ौती की करीब 125 कलात्मक मूर्तियों का अप्रतिम संग्रह सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। संग्रहालय के अधीक्षक उमराव सिंह में बताया कि अब संग्रहालय की एप्रोच बड तिराहे से स्टेशन जाने वाली मुख्य सड़क से सीधी हो जाएगी और संग्रहालय सड़क से ही नजर आयेगा। यह जानकारी उन्होंने उस समय दी जब डॉ.प्रभात कुमार सिंघल ने अपनी पुस्तक ” पर्यटन और संग्रहालय ” की एक प्रति संग्रहालय के लिए भेंट की। संग्रहालय की सामग्री को आधुनिक रूप से प्रदर्शित करने के लिए पिछले सालों में करीब 2.75 करोड़ रूपये व्यय किए गए थे।

उमराव सिंह ने बताया कि संग्रहालय अंचल की मूर्ति कला के लिए विशेष रूप से पहचाना बनाता है। यहां दरा की झल्लरी वादक तथा बाडौली की शेषायी विष्णु की प्रतिमाएं तो फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी आदि कई देशों में प्रदर्शित हो चुकी हैं। अन्ता के समीप बड़वा ग्राम से प्राप्त 195 विकम्र (238 ई.) के चार वैदिक कालीन यूप स्तम्भ एवं एक चावल पर उत्कीर्ण गायत्री मंत्र इस संग्रहालय की महत्वपूर्ण निधी है जिस पर 268 अक्षर हैं। यह उत्कीर्ण चावल 11 सितम्बर 1939 को महाराव उम्मेदसिंह की सालगिरह पर दिल्ली के फतह संग्रहालय द्वारा तैयार कर भेंट किया गया था। गीता पंचरत्न नामक ग्रंथ में 236 पृष्ठ एवं 23 चित्र हैं तथा कई जगह अक्षर स्वर्ण में लिखे गये हैं उल्लेखनीय है।

उन्होंने बताया कि कोटा अंचल की सांस्कृातिक एवं पुरातत्व संपदा को सहेज ने के लिए संग्रहालय में प्रागेतिहासिक, पुरातत्व, शैव, वैष्णव, अस्त्र-शस्त्र, परिधान, चित्रकला, लोकजीवन एवं जैन प्रतिमा दीर्धाएं बनाए गई हैं। लोक जीवन के प्रतीक सृष्टि के सृजन कर्ता ब्रह्मा से शुरू कर मात्रिकाएं, लक्ष्मी, कुबेर, कामक्रीडा, नव गृह आदि प्रतिमाओं को क्रमवार दर्शाते हुए मृत्यु के देवता यम की प्रतिमा तक ले जाया गया है। जहॉ यमराज को हाथ कपाल लिऐ हुए दिखाया गया है। यहां वैष्णव, शैव और जैन तीन सम्प्रदायों की150 से भी अधिक चुनिन्दा मूर्तियों का संग्रह हैं। यहां मूर्तियाँ में मुख्य रूप से विष्णु, शिव, त्रिविक्रम, नारायाण, हयग्रीव, वराह, कुबेर, वायु, शिव-पार्वती, कार्तिकेय, ब्रह्या, हरिहर महेश, अग्नि, क्षेत्रपाल, वरूण, यम, एन्द्री, वराही, अम्बिका, ब्रह्याणी चन्द्र, पार्श्वनाथ, गजलक्ष्मी, रति-कामदेव आदि देवी देवताओं की प्रतिमायें शांमिले हैं।

उन्होंने बताया कि यहां गुप्त काल से लेकर 13 वीं सदी तक के अनेक शिलालेख,खरीतों पर लगाये जाने वाली चपड़ी की सील के कुछ लेख, स्टेम्प की मोहर के लेख , कोटा राज्य एवं मुगल काल के सिक्के, कोटा – बूंदी शैली के लघु चित्र, स्वर्ण अक्षरी, चित्र काव्य, भोजपत्री एवं नक्काशी द्वारा अलंकृत चित्रित ग्रंथ प्रदर्शित किए गए हैं। ग्रंथों में 1190 पृष्ठों एवं 4760 चित्र युक्त भागवत, दूसरी सुनहरी रेखांकन का काम की सूक्ष्म अक्षरी भागवत में बने दशावतार के चित्र हैं और एक गीता भी सूक्ष्म अक्षरी है जिसमें इतने बारीक अक्षर है कि इसे सूक्ष्मदर्शी यंत्र से भी पढ़ने में कठिनाई आती है विशेष उल्लेखनीय हैं। संग्रहालय राष्ट्रीय पर्वों को छोड़ कर प्रतिदिन प्रातः 9.30 बजे से सायं 6.00 बजे तक दर्शकों के लिए खुला रहता है।

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