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शिक्षा मन में बैठे डर को भगाती है-प्रो. शुक्ला

महू (इंदौर). ‘महात्मा ज्योति बा फुले शिक्षा के माध्यम से समाज में चेतना जगाना चाहते थे। शिक्षा असहमत होना सिखाती है और मन में बैठे डर को दूर भगाती है।यह बात हवाबाग महाविद्यालय की प्राध्यापक प्रो. भारतीय शुक्ला ने मुख्य वक्ता की आसंदी से व्यक्त की। प्रो. शुक्ला डॉ. बी.आर. अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय में स्थापित महात्मा ज्योति बा फुले पीठ द्वारा आयोजित स्मृति वेब व्याख्यान को संबोधित कर रही थीं।

प्रो. शुक्ला का कहना था कि महात्मा फुले जैसे लोगों के जीवन में निजता या व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए कोई स्थान नहीं था। वे सबके लिए थे और सब उनके लिए। उनका कहना था कि यह सोच पाना भी हमारे लिये मुश्किल सा है कि ऐसा कौन सा मनोविज्ञान काम कर रहा था, ऐसी कौन सी चेतना थी जो अपमान के बाद भी वे मानवता के पक्ष में खड़े थे। समाज सुधार की यह अवधारणा न तो साधरण थी और न ही सुरक्षित। उनके भयानक संघर्ष को भी मैं अभिव्यक्त नहीं कर पा रही हूं।

प्रो. शुक्ला ने कहा कि आज के संदर्भों में जब हम महात्मा फुले को लेकर जाते हैं तो हम आज यह सोच भी नहीं सकते हैं क्योंकि एक वाक्य बोल देने के बाद हमें क्या-क्या सहन करना पड़ेगा। वर्तमान शिक्षा पद्वति से हम भीरू और डरे हुए पौध पैदा कर रहे हैं। जबकि शिक्षा विषमता को समाप्त करने वाली होनी चाहिए। यह सोच कर मैं हैरान रह जाती हूं कि कोई कैसे ऊंच जाति का हो सकता है और कोई कैसे नीच जाति का। उन्होंने कहा कि आज जरूरत केवल महात्मा फुले पर बात करने की नहीं बल्कि जरूरत उनके बताये मार्ग पर चलने की है।

बीज वक्तव्य देते हुए डॉ. कुसुम त्रिपाठी ने कहा कि महात्मा फुले ने समाज को दिशा दी और शिक्षा की ज्योति से प्रज्जवलित किया। उन्होंने कहा कि पुणे महाराष्ट्र की काशी सरीखा है, जिस पुणे में महाराज शिवाजीराव ने महिलाओं को सम्मान दिया, उसी पुणे में पेशवा शासन में उनके साथ अत्याचार किया गया। लैंगिक, जातिगत एवं वर्णभेद के खिलाफ महात्मा फुले शिक्षा के माध्यम से सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना की पहल की। स्त्री शिक्षा की दिशा में उन्होंने सबसे पहले अपनी पत्नी सावित्री बाई को शिक्षित किया। महात्मा फुले मूर्तिपूजा और ब्राम्हणवाद के खिलाफ थे।दोनों वक्ताओं ने अपने सारगर्भित व्याख्यान में महात्मा फुले के कार्यों का विस्तार से उल्लेख करते हुए आज के समय की आवश्यकता बतायी।

स्मृति वेब व्याख्यान की अध्यक्ष एवं कुलपति प्रो. आशा शुक्ला ने कहा कि समाज में परिवर्तन स्वयं से करना होगा। विपरीत परिस्थितियों में जो कार्य महात्मा फुले और सावित्रीबाई फुले ने किया, वह हमारे लिए प्रेरक हैं। आज हम थोड़े से पैसा और पॉवर से आम आदमी को भूल जाते हैं। इसके पूर्व कुलपति प्रो. आशा शुक्ला ने अतिथि वक्ताओं का स्वागत किया एवं प्रस्तावना वक्तव्य दिया। कार्यक्रम का संचालन डॉ.चेतना बोरीवाल ने किया एवं आभार प्रदर्शन कुलसचिव डॉ. अजय वर्मा ने माना। कार्यक्रम संयोजन डॉ. दीपक कारभारी का था।

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