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सैकड़ों बच्चों को अनाथ कर गए फिरोज अशरफ़

मुंबई के जोगेश्वरी क्षेत्र में बरसों से गरीब, साधनहीन हिंदू मुस्लिम से लेकर हर समाज के बच्चों को अपने खर्च व सीमित साधनों के साथ पढ़ा-लिखाकर उनके पैरों पर खड़ा करने वाले फिरोज अशरफ इऩ सब बच्चों को अनाथ कर चले गए।

हिन्दी- उर्दू के मशहूर लेखक, पत्रकार व अनुवादक जनाब फिरोज अशरफ की सड़क हादसे के शिकार हो गए। पिछली रात वे करीब ८.५० को जोगेश्वरी स्टेशन से अपने घर जा रहे थे। सड़क के किनारे उन्हें किसी आटो रिक्शे वाले ने धक्का दिया । धक्का लगने के बाद वे सड़क पर गिर गए। कुछ लोगों ने उन्हें नजदीक के अस्पताल में भर्ती कराया, पर दुर्घटना का केस होने से अस्पताल वालों ने उन्हें अपने यहां भर्ती नहीं किया, अस्तु उन्हें विलेपार्ले के कूपर अस्पताल में भर्ती कराया गया। सिर में चोट लगने के कारण , उन्हें बचाया नहीं जा सका।

लेखिका, प्रेरक वक्ता, थिएटरकर्मी विभा रानी फिरोज भाई को याद करते हुए लिखती हैं, 1990 का समय था । मुंबई 1989 में आ गई थी । मुंबई के नवभारत टाइम्स में साप्ताहिक कॉलम ‘पाकिस्ताननामा’ छपता था। मैं उसे बड़े चाव से पढ़ती थी। लिखनेवाले का नाम याद हो गया था- फिरोज अशरफ । मैं सोच रही थी कि उनसे कैसे बात करूं और मिलूं। इसके लिए नवभारत टाइम्स के दफ्तर ही जाना पड़ेगा। अचानक पता चला कि यह तो हमारे ऑफिस में ही काम करते हैं किसी दूसरे यूनिट में। कोशिश करके मैंने वहां का फोन नंबर हासिल किया और उनसे बात करनी चाही। सुनते ही कि मैं उनके यहां की अफसर हूं, तड़क से बोले – “मैं किसी ऑफिसर बफसर से बात नहीं करता।” मैंने उनसे कहा, – “मैं किसी अफसर की हैसियत से आपसे बात नहीं कर रही, आपकी प्रशंसक की हैसियत से बात कर रही हूं ।

फिर हम लोगों की बातों का सिलसिला शुरू हुआ । जब हमारे ऑफिस में आए, तब उन्होंने मुझसे मुलाकात की। उनकी बातें और रहन-सहन की सादगी कहीं छू गई। मैं तो धन्य थी उस लेखक को देखकर, जिसका ‘पाकिस्ताननामा’ मेरे रोएं- रोएं में छाया हुआ था ।

1990 के आखिर में अजय भी चीन से लौट कर आ गए। वह सचमुच में हमारे संघर्ष के दिन थे । मेरी अकेली नौकरी और अजय की फ्रीलांसिंग का संघर्ष और साथ में हमारी बड़ी बेटी जो उस समय महज 6 साल की थी। लेकिन फिरोज भाई जब भी मिलते या बात होती, बड़ी सहजता से मिलते। जब उन्हें पता चला कि मैं भी कुछ लिखती हूं, तब उन्होंने अपने यहां कवि सम्मेलन ना कराकर महिला कवि सम्मेलन करवाया और शहर की तमाम महिला कवियों को आमंत्रित किया, जिनमें जयंती, अनामिका, मेहर अंसारी साहिबा आदि शामिल हुईं। संचालन का काम सुदर्शना द्विवेदी जी को दिया गया था । मेरे ख्याल से शहर का वह पहला महिला कवि सम्मेलन रहा होगा।

उसके बाद मेरी उनसे बात और आगे बढी, जब वे मंजुल भारद्वाज को लेकर हमारे घर आए और कहा कि यह थिएटर करता है। हमने मंजुल जी के साथ मिलकर नाटक तैयार किया दूसरा आदमी दूसरी औरत। उसका मंचन भी हुआ। फिरोज अशरफ साहब से हमारी बात मुलाकात बीच-बीच में होती रही। 1992 के दंगों में हुए हिंदू-मुस्लिम के दो फाड़ ने उन्हें बहुत व्यथित किया और वे हिंदू बहुल इलाके से निकलकर मुस्लिम इलाके में आ गए । मैं उनके घर गई थी। जब उनकी बेटी की शादी हुई तब उसे दुल्हन के रूप में देखकर पहली बार मुंबई में लगा कि किसी शादी में आए हैं, दुल्हन को देखा है ।

 

 

फिरोज भाई ने अफसर का पद नहीं लिया। वह यूनियन में हमेशा बने रहे और कामगारों के भले के लिए काम करते रहे। उन्होंने मुझसे कहा था मैं ज्यादा दिन नौकरी में नहीं रहूंगा और उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। उन्होंने अपने ही घर पर निर्धन बच्चियों को तालीम देने की जिम्मेदारी ली और उन्हें पढ़ाने लगे। धीरे-धीरे उनका यह कारवां आगे बढ़ा और जाने कितनी बच्चियां तालीम हासिल कर अपनी अपनी जिंदगी के नए सूरज को देख सकीं। किसी लेखक का समाजसेवी बनना- यह मेरे लिए शायद पहला अनुभव था। मेरे सोशल एक्टिविटीज के भी बीज शायद यही कहीं से पड़े होंगे । अवितोको के बनने के समय भी मैंने उनसे सलाह मशविरा लिया था। उन्होंने कहा था, चाहे कितनी भी बड़ी अफसर क्यों ना बन जाओ, अपनी जमीन मत छोड़ना और मदद करने की बात ना भूलना। तुम बहुत सेंसिबल

हो और मुझे तुम पर नाज़ है।

हर साल ईद के मौके पर मैं उन्हें फोन करती थी और ईद की बधाइयां देती थी। पता नहीं कैसे इस बार 5 तारीख को मैंने किसी को फोन नहीं किया। किसी को बधाई नहीं दी।

आज फिरोज भाई का जाना ऐसा लग रहा है, जैसे मेरे कलेजे के हिस्से का कुछ निकल गया है और एक पिता को मैंने फिर से खो दिया है।

लेखिका पूनम पांडे ने श्रध्दांजलि व्यक्त करते हुए कहा, ‘पाकिस्ताननामा’ पढ़ने का एक जुनून हुआ करता था उन दिनों। वहीं से पहली बार जाना था फ़िरोज अशरफ जी को। फिर 1998-99 में मुंबई के किसी कार्यक्रम में उनसे मिलने का सुअवसर भी मिला। उनकी सहजता मन को अच्छी लगी।

परिदृश्य प्रकाशन के श्री रमण जी ने अपनी श्रध्दांजलि व्यक्त करते हुए कहा, पिछले चालीस साल से वे हिंदी और उर्दू की पत्रकारिता से जुड़े रहे। धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, हमारा महानगर , के साथ- साथ वे देश के प्रमुख उर्दू अखबारों के लिए अंतरराष्ट्रीय विषयों विशेष कर मुस्लिम देशों के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक हालातों का जायजा लेते हुए तप्सरा करते और हिंदी पाठकों को ज्ञान संपन्न कराते। वे इस तरह से सांस्कृतिक पुल बनाने का काम करते रहे। फिरोज अशरफ जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। इतिहास लेखन, पत्रकारिता, थिएटर , ट्रेड यूनियन , अध्यापन आदि क्षेत्रों में उन्होंने उल्लेखनीय कार्य किए। इंडियन आयल कार्पोरेशन में एक अधिकारी के रूप में की वर्षों तक अपनी सेवाएं दीं ।

सन् दो हजार के आसपास उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली। रिटायर्ड होने के बाद वे जोगेश्वरी में निर्धन लड़कियों को पढ़ाने का महत्वपूर्ण कार्य करने लगे। लगभग बीस वर्षों से वे लड़कियों को शिक्षित करने के साथ साथ उन्हें राजनीतिक व सांस्कृतिक रूप से जागरूक भी करते रहे। आज उनके पढ़ाए न जाने कितनी छात्राएं अच्छी नौकरियों में हैं। फिरोज अशरफ जी ने मुंबई के मशहूर हिन्दी दैनिक नवभारत टाइम्स में की दशकों तक एक कालम पाकिस्ताननामा लिखा। उनका यह कालम काफी लोकप्रिय था। इस कालम के माध्यम से वे पाकिस्तान की राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पहलुओं पर विचार-विमर्श विमर्श किया करते थे। इसके अतिरिक्त उन्होंने हमारा महानगर में भारत के विभिन्न राज्यों में बसे मुस्लिम समुदाय के लोगों का इतिहास भी लिखा। वह पुस्तक के रूप में चार खंडों में प्रकाशित होने को तैयार है।

फिरोज अशरफ जी का जन्म तत्तकालीन बिहार और अब झारखंड राज्य के हजारीबाग जिले में सन् १९४२ ईस्वी में हुआ था। अपनी पढ़ाई कर के वे मुंबई आ गए और इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन में नौकरी की। वहां पर उन्होंने कर्मचारियों के लिए यूनीयन बनाया और मजदूरों व कर्मचारियों के लिए लड़ते रहे। इसी दौरान उन्होंने नए कलाकारों के साथ नाटक करना शुरू किया। वे बताते थे कि उनका नाटक तो कला की दृष्टि से बहुत उच्च कोटि का नहीं होता था , पर उसे देखने हमेशा उच्च कोटि के कलाकार, लेखक , पत्रकार , व बुद्धिजीवी जरूर आते थे। । हिन्दू- मुस्लिम एकता के लिए वे सदैव आगे रहते थे। सन् १९९३ के साम्प्रदायिक दंगों के दौरान उन्होंने बहुत काम किया। वे देश में कौमी एकता के लिए विकल रहते थे। उन्होंने अपने राजनीतिक दृष्टिकोण को गति देने के लिए भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी को चुना । वे वंचितों के लिए शिक्षा व चिकित्सा के क्षेत्र में आखिरी वक़्त तक उल्लेखनीय कार्य करते रहे।

स्व. फिरोज अशरफ साहब का एक वीडियो, उनकी शख्सियत का परिचय देता है
https://www.youtube.com/watch?v=uSlK97JhP1c

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