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छत्तीसगढ़ के आदिवासी जनता पर बढ़ता राजकीय दमन

भारत अपने को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है और इसी वर्ष भारत ने अपना 67 वां गणतंत्र दिवस मनाया। लोकतंत्र-गणतंत्र पर नेता, मंत्री, अधिकारी बहुत बड़ी-बड़ी बातें करते हैं जो सुनने में बहुत अच्छी लगती है और हमें गर्व महसूस होता है कि हम लोकतांत्रिक देश में जी रहे हैं। यह गर्व और खुशफहमी तभी तक रहती है जब तक हम अपनी स्वतंत्रता और संविधान में दिये हुये अधिकार की बात न करें। 67 वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा कि ‘‘हमारी उत्कृष्ट विरासत लोकतंत्र की संस्थाएं सभी नागरिकों के लिये न्याय, समानता तथा लैंगिक और आर्थिक समता सुनिश्चित करती है।’’

राष्ट्रपति की यह बात क्या भारत जैसे ‘लोकतांत्रिक’, ‘गणतांत्रिक’ देश में लागू होती है? भारत का संविधान अधिकार यहां के प्रत्येक व्यक्ति को अधिकार देता है कि वह अपनी पसंद से विचारधारा, धर्म, भारत में रहने का जगह, व्यवसाय को चुन सकता है। क्या भारतीय संविधान लागू होने के 67 साल बाद भी यह अधिकार भारत की आम जनता को मिला है? यह हम सभी के लिए यक्ष प्रश्न बना हुआ है। आज भी दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं, आदिवासियों, पर हमले हो रहे हैं। दलितों के आज भी हाथ-पैर काटे जा रहे हैं, रोहित वेमुला जैसे होनहार छात्र को आत्महत्या करने की स्थिति में पहुंचा दिया जाता है। होनहार अल्पसंख्यक नौजवान को आतंकवाद के नाम पर पकड़ कर जेलों में डाल दिया जा रहा है। महिलाओं, यहां तक कि छोटी-छोटी बच्चियों को रोजाना बलात्कार का शिकार होना पड़ रहा है। आईएएस, पीसीएस महिलाओं को भी मंत्रियों और सीनियर के हाथों खुलेआम शर्मिन्दगी उठानी पड़ती है। उन्हें उनके ईशारों पर चलना होता है और ऐसा नहीं होने पर उनको ट्रांसफर से लेकर कई तरह की जिल्लत झेलने पड़ती हैं। इस तरह की खबरें शहरी क्षेत्र में होने के कारण थोड़ी-बहुत मीडिया या सोशल मीडिया में आ जाती है।

इस देश के मूलवासी आदिवासी को छत्तीसगढ़ सरकार और भारत सरकार लाखों की संख्या में अर्द्धसैनिक बल भेजकर प्रतिदिन मरवा रही है। उनकी बहु-बेटियों के साथ बलात्कार तो आम बात हो गई है। अर्द्धसैनिक बलों द्वारा उनके घरों के मुर्गे, बकरे, आनाज, खाना और पैसे-गहने लूट कर ले जाना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं है। यह सब करने के बाद उनको पुरस्कृत भी किया जाता है, जैसे सोनी सोढी के गुप्तांग में पत्थर डालने वाले अंकित गर्ग को 2013 में राष्ट्रपति द्वारा वीरता पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। छत्तीसगढ़ में आदिवासियों पर हो रहे जुल्म की खबरें शायद ही कभी समाचार पत्रों में छपती हैं। थोड़ी-बहुत खबर तब बनती है जब समाज के प्रहरी मानवाधिकार, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार उस इलाके में जाकर कुछ खोज-बीन कर पाते हैं। लेकिन यह खबर मीडिया के टीआरपी बढ़ाने के लिये नहीं होती है इसलिए उसे प्रमुखता नहीं दी जाती है। राष्ट्रीय मीडिया में यह खबर तब आती है जब 28 जून, 2012 की रात बीजापुर के सरकिनागुड़ा जैसी घटना होती है जिसमें 17 ग्रामीणों को (इसमें 6 बच्चे थे) मौत की नींद सुला दी जाती है। इस खबर पर रायपुर से लेकर दिल्ली तक यह कह कर खुशियां मनाई जाती है कि बहादुर जवानों को बड़ी सफलता मिली है। ऐसी ही कुछ घटनाएं हाल के दिनों में लगातार हो रही है जो कुछ समाचार पत्रों और मीडिया में आ पाई है। लेकिन इस तरह की खबरें भी आम जनता तक पहुंच नहीं पातीं।

30 अक्टूबर, 2015 को रष्ट्रीय स्तर की महिलाओं का एक दल जगदलपरु और बीजापुर गया था। इस दल को पता चला कि 19/20 से 24 अक्टूबर, 2015 के बीच बासागुडा थाना अन्तर्गत चिन्न गेल्लूर, पेदा गेल्लूर, गुंडुम और बुड़गी चेरू गांव में सुरक्षा बलों ने जाकर गांव की महिलाओं के साथ यौनिक हिंसा और मारपीट की। पेदा गेल्लूर और चिन्ना गेल्लूर गांव में ही कम से कम 15 औरतें मिलीं, जिनके साथ लैंगिक हिंसा की वारदातें हुई थीं। इनमें से 4 महिलायें जांच दल के साथ बीजापुर आईं और कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक व अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के समक्ष अपना बयान दर्ज कर्राइं। इन महिलाओं में एक 14 साल की बच्ची तथा एक गर्भवती महिला थीं, जिनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था। गर्भवती महिला के साथ नदी में ले जाकर कई बार सामूहिक बलात्कार किया गया। महिलाओं के स्तनों को निचोड़ा गया, उनके कपड़े फाड़ दिये गये। जांच दल की टीम ने कई महिलाओं पर चोट के निशान देखे, कई महिलाएं ठीक से चल नहीं पा रही थीं। मारपीट, बलात्कार के अलावा इनके घरों के रुपये-पैसों को लूटा गया, उनके चावल, दाल, सब्जी व जानवरों को खा लिए गये और जो बचा वह साथ में ले गये। घरों में तोड़-फोड़ किया गया और उनके टाॅर्च, चादर, कपड़े भी लूटे गये। यह टीम समय की कमी के कारण सभी गांवों में नहीं जा पाई थी। इन महिलाओं के बयान दर्ज कराने के बावजूद अभी तक किसी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

इस बीच में काफी फर्जी मुठभेड़ और बलात्कार की घटनाएं हुईं। 15 जनवरी, 2106 को सीडीआरओ (मानवाधिकार संगठनों का समूह) और डब्ल्यूएसएस (यौन हिंसा और राजकीय दमन के खिलाफ महिलाएं) की टीम छत्तीसगढ़ गई थी। इस टीम का अनुभव भी अक्टूबर में गई टीम जैसा ही था। 11 जनवरी, 2016 को सुकमा जिले के कुकानार थाना के अन्तर्गत ग्राम कुन्ना गांव के पहाड़ियों पर ज्वांइट फोर्स (सी.आर.पी.एफ., कोबरा, डीआरजी, एसपीओ) के हजारों जवानों (लोकल भाषा में बाजार भर) ने डेरा डाल रखा था। कुन्ना गांव में पेद्दापारा, कोर्मा गोंदी, खास पारा जैसे दर्जन भर पारा (मोहल्ला) हैं। यह गांव मुख्य सड़क से करीब 15-17 कि.मी. अन्दर है और गांव के लोगों को सड़क तक पहुंचने के लिए 3 घंटे लगते हैं। 12 जनवरी, 2016 को सुरक्षा बलों, एसपीओ और जिला रिजर्व फोर्स के जवानों ने गांव को घेर लिया। पेद्दापार के ऊंगा खेती करते हैं और आंध्रा जाकर ड्राइवर का काम भी करते हैं। फोर्स ने उनके घर का दरवाजा तोड़ दिया, घर में रखे 500 रुपये ले लिये और 10 किलो चावल, 5 किलो दाल और 5 मुर्गे खा लिये। उनकी पत्नी सुकुरी मुसकी के अन्डर गारमेंट जला दिये और उनके घर के दिवाल पर यह लिख दिये -‘‘फोन कर 9589117299 आप का बलाई सतडे कर।’’ ऊंगा का आधार कार्ड भी फोर्स वाले लेकर चले गये।

इसी तरह गांव के अन्य घरों में तोड़-फोड़ की। चावल, दाल, सब्जी, मुर्गे, बकरी खाये और मरक्का पोडियामी के घर में लगे केले के पेड़ से केले काट कर ले गये। मुचाकी कोसी, करताम हड़मे, करतामी गंगी, हड़मी पेडियामी, कारतामी कोसी, पोडियामी जोगी व हिड़मे भड़कामी सहित कई महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार व लैंगिक हिंसा किया। महिलाओं ने सोनी सोढी के नेतृत्व में बस्तर संभाग के कमिश्नर के पास शिकायत की। इन महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ और उनके स्तन को निचोड़ा गया। कुंआरी लड़कियां अपने बहनों के मंगलसूत पहन कर अपने को विवाहित बतायी, क्योंकि गांव में 17-18 साल की लड़की अगर शादी-शुदा नहीं है तो उसको माओवादी मान लिया जाता है। इस गांव के 29 लोगों (24 पुरुष, 5 महिला) को पकड़ कर पुलिस ले गई, जिनमें से तीन पर फर्जी केस लगा कर जेल भेज दिया गया। गांव वालों को ले जाते समय रास्ते में बुरी तरह मारा-पीटा गया, महिलाओं के कपड़े फाड़े गये।

कोर्मा गोंदी में 13 जनवरी, 2016 को यही सुरक्षा बल गये और अन्दावेटी का मोबाईल फोन और 500 रुपये छीन लिये। इसी तरह गांव के अन्य लोगों के साथ मारपीट किये और खाद्य सामग्री सहित मुर्गे खा गये। इसी गांव के लालू सोडी (21), पुत्र सोडी लक्कमा को पुलिस ने पकड़ा और बुरी तरह पीटा। इस पिटाई से उसकी 14 जनवरी को मृत्यु हो गई, जिसका एफआईआर दर्ज नहीं हुआ। इसी पारा के योगा सोरी, पुत्र सोरी लक्का को फोर्स के तीन लोगों ने सुबह 9 बजे घर से खींच लिया और उसे गांव से एक किलोमीटर दूर ले जाकर मारा। उसके पैरों में काफी चोट आई, जिससे वह दो दिन तक चल नहीं पाया। इसी पारा के इरम्मा, देवाश्रम और सोमा को 12 जनवरी को पकड़ कर कुकानार थाने ले गये और पांच-पांच पुलिस वालों ने उनके साथ रास्ते में मारपीट की। 15 तारीख को सादे कागज पर हस्ताक्षर लेकर उनको छोड़ दिया गया।

पेद्दापारा से कुछ दूर गोटेकदम गांव के योगिरापारा में फोर्स गई और उसने फायरिंग करना शुरू की। उस समय लोग बांध निर्माण का कार्य कर रहे थे, जो मनरेगा द्वारा 9 लाख रुपये में बन रहा है। फोर्स की फायरिंग की आवाज सुनकर लोग काम छोड़ कर भाग गये। फोर्स ने घरों में घुसकर तलाशी लेनी शुरू की और महिलाओं के साथ छेड़खानी की। घरों में तलाशी के दौरान अरूमा के घर पर एक जवान बोरे (जिसमें समान रखा था) पर लात मार रहा था तो वह फिसल कर गिर गया। उसकी अपनी बंदूक से गोली चल गई जो उसके पैर में लगी और वह घायल हो गया। भीमा की मोटर बाईक से घायल जवान को ईलाज के लिए दो जवान लेकर गये और उसको बाईक वापस नहीं किये। अखबार में सुबह छपा कि माओवादी-पुलिस मुठभेड़ में एक जवान घायल हो गया। पुलिस 14 तारीख तक गांव में रही और तब तक गांव के पुरुष जंगल में भूखे-प्यासे छिपे रहे।

बीजापुर के बासागुडा थाना अन्तर्गत बेलम नेन्द्रा व गोटुम पारा में 12 जनवरी, 2016 को सुरक्षा बल के ज्वांइट फोर्स गांव में तीन दिन तक रूकी रही। इन तीन दिनों में वे गांव के मुर्गे, बकरे को बनाये, खाये या और दारू भी पिये। कराआईती के घर में 7 जगहों पर खाना बनाये और दारू पिये। कराआईती के घर के 40 मुर्गे, 105 कि.ग्रा. चावल, 2 किलो मूंग दाल, बरबटी खाये और दो टीन तेल (एक टीन कोईना का और एक सरसों का) खत्म कर दिये। घर में रखे 10 हजार रू. भी ले गये। कराआईती के घर में खाने के साथ दारू भी पिये, जिसके बोतल आस-पास पड़े हुये थे।

मारवी योगा के घर के 14 मुर्गे, 10 किलो चावल, मूंग दाल, सब्जी और टमाटर खा गये, जिन्हंे वे शनिवार को बाजार से लाये थे। वे अपने साथ बड़े भाई की बेटी को रखते हैं जिसको फोर्स वाले ने गोंडी में कहा कि सभी औरतंे एक साथ रहो, रात में बतायेंगे। यहां तक कि एक घर से काॅपी और पेन भी ले गये। गांव में रूकने के दौरान दर्जनों महिलाओं के साथ बलात्कार और यौनिक शोषण किये। इससे पहले भी 6 जनवरी को सुरक्षा बलों के जवान गये थे। तब उन्होंने मरकमनन्दे को पीटा था, उसकी बकरी ले गये थे और लैंगिक इस हिंसा भी की थी। इस गांव को सलवा जुडूम के समय दो बार जला दिया गया था।

जब ये पीड़ित महिलाएं बीजापुर आयीं तो पुलिस अधीक्षक इनकी शिकायत लेने को तैयार नहीं थे। इनको थाने के अंदर डराया-धमकाया गया। दो-तीन दिन बाद देश भर से जब एसपी-डीएम को फोन गया तो इनकी शिकायत सुनी गई।

राष्ट्रपति की यह बात कि ‘हमारी उत्कृष्ट विरासत लोकतंत्र की संस्थाएं सभी नागरिकों के लिये न्याय, समानता तथा लैंगिक और आर्थिक समता सुनिश्चित करती है’, आम आदमी पर तो लागू नहीं होती है। हां, यह बात जज साहब जैसे लोगों के लिए जरूर है जिनके लिये बकरी पर भी केस दर्ज हो जाता है। राष्ट्रपति इसी सम्बोधन में आगे कहते हैं कि ‘हमारे बीच सन्देहवादी और आलोचक होंगे, हमें शिकायत, मांग, विरोध करते रहना चाहिए -यह भी लोकतंत्र की एक विशेषता है। हमारे लोकतंत्र ने जो हासिल किया है, हमें उसकी भी सरहाना करनी चाहिये।’ भारत सरकार और खासकर छत्तीसगढ़ सरकार पर यह बात लागू नहीं होती है। विनायक सेन को यही सरकार मानवाधिकार के फर्ज अदा करने के जुल्म में जेल में डाल दिया तथा हिमांशु कुमार को सलवा जुडुम में जले हुये गांव को बसाने की सजा उनके आश्रम को तोड़ कर दी। यह वही सरकार है जिसने असामाजिक तत्वों को लेकर ‘सामाजिक एकता मंच’ बनाया और मानवाधिकार कार्यकर्ता, पत्रकार मालनी सुब्रमण्यम के घर पर हमला करवाया। यह वही संगठन है जो बेला भाटिया और सोनी सोढी के खिलाफ प्रदर्शन करता है। इसी प्रदेश में 50 से अधिक पत्रकारों पर अपराधिक मामले दर्ज हैं और चार पत्रकार संतोष यादव व सोमारू नाग जेल में बंद हैं। इन पत्रकारों का गुनाह यह है कि वे अपने पत्रकारिता धर्म को निभाते हुये सही बात कहना चाह रहे थे, अन्य पत्रकारों जैसा पुलिस की कही बातों को सही मान कर रिर्पोटिंग करने वाले नहीं थे। वे उस तरह के पत्रकार नहीं थे जो गोटेकदम में अपनी पिस्तौल से घायल जवान को मुठभेड़ में घायल की खबर छाप देते और उसी जगह दर्जनों महिलाओं के साथ हुई यौनिक हिंसा पर चुप रहते। राष्ट्रपति महोदय ने कहा कि आलोचक और विरोध करने वालों की बात सुनी जा रही है। क्या यह सब घटनायें आप तक नहीं पहुंचतीं? अगर पहुंचती है तो आप चुप क्यों हैं और नहीं पहुंचती तो उसके कारण क्या हैं?

महोदय, आपने ही अपने पिछले सम्बोधन में कहा था कि ‘भ्रष्टाचार तथा राष्ट्रीय संसाधनों की बर्बादी से जनता गुस्से में है।’ बिल्कुल सही फरमाया था आपने। छत्तीसगढ में आदिवासियों को इसलिए मारा जा रहा है कि वे जिस जमीन पर रहते हैं और जिस जंगल को उन्होंने बचा कर रखा है, उसके अन्दर अकूत खनिज सम्पदा है। वह खनिज सम्पदा देशी-विदेशी लूटेरों (पूंजीपतियों) को चाहिए। इसके लिए यह सरकार इन आदिवासियों को हटाना चाहती है और वे हटना नहीं चाहते। वे अपनी जीविका के साधन, मातृभूमि और अपनी संस्कृति की रक्षा कर अपने तरीके से जीना चाहते हैं। आप जिस देश के महामहिम हैं उस देश की सरकार उनको इस तरह जीने देना नहीं चाहती है। वह उनके उपर हमले करवा रही है। सलवा जुडूम के नाम पर 650 गांवों को जला दिया गया, हजारों लोगों को मारा गया, महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। खुले में रहने वाले आदिवासी समाज को यह सरकार कैम्पों (इन कैम्पों का खर्च टाटा और एस्सार ने दिया) में डाल दिया। जो कैम्प में नहीं आये उसको माओवादी घोषित कर दिया। सरकार की नजर में आदिवासी गुलाम हैं, नहीं तो बागी (माओवादी)। इन बागियों के पास बैंक अकाउंट नहीं हैं, न ही इनके पास घर हैं। ये प्रकृति के सहारे जिन्दा रहते हैं। महामहिम जी, आपके ‘बहादुर सुरक्षा बल’ सेटेलाइट और यूएवी (मानवरहित एरियल व्हेकल) के सहारे आधुनिक हथियारों, मोर्टारों, हेलीकाप्टरों से लैस होकर छत्तीसगढ़ जनता पर हमले कर रहे हैं। निहत्थे महिलाओं, बच्चे-बूढ़े, नौजवानों पर हमले करना उनके साथ यौनिक हिंसा और फर्जी मुठभेड़ में मारना दिनचर्या बन गई है।

सुरक्षा बल सुकुमा जिले के गोमपाड़ गांव की महिला गोमपाड के साथ बलात्कार करता है और अपने कुकर्मों को छिपाने के लिये उसकी हत्या कर देता है। यह इस तरह का फर्जी इनकांउटर था कि कोई भी उस महिला के लाश को देख कर समझ सकता है। सोनी सोढी इस मामले की जानकारी लेने महिला के गांव तक जाना चाहती है तो उन्हें पुलिस और सलवा जुडूम के गुंडों द्वारा रोका जाता है। इस पर न तो देश का सुप्रीम कोर्ट, न राष्ट्रपति भवन और न ही गृह मंत्रालय वहां की वास्तविकता को जानना चाहता है। भारत मां के जयकारे लगा कर उन्माद फैलाने वालों के लिये गोमपाड की मौत कोई मौत नहीं है।

इस तरह के फर्जी गिरफ्तारी और इनकांउटर पर अफसरों को फटकार लगाने वाले सुकमा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रभाकर ग्वाल को एसपी के शिकायत पर सस्पेंड कर दिया जात है। इस तरह की खबरें बाहर नहीं आ पाये, इसके लिये फैक्ट फाइडिंग (तथ्यपरक खोज) टीम के उपर भी सरकारी दमन किया जा रहा है। अभी हाल ही में जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालयों से प्रोफेसरों की एक टीम गई थी, जिनको पुलिस ने फर्जी तरीके से फंसाने का प्रयास किया। इस तरह के फर्जीवाड़े का मास्टर माइंड बस्तर रेंज के आईजी एसआरपी कल्लूरी ने सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी है कि इस तरह के लोगों पर खुफिया विभाग द्वारा नजर रखनी चाहिये। कल्लूरी चाहते हैं कि रायपुर के एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, बस स्टैण्ड और ट्रेवल एजेंसियों के स्थल पर इस तरह के लोगों की आवाजाही पर नजर रखी जाये।

ये सारे हथकंडे इसलिये अपनाये जा रहे हैं कि छत्तीसगढ़ में जो अकूत खनिज सम्पदा है उसको लूटा जाये। छत्तीसगढ़ में कोयला 52,533 मिलियन टन, लौह अयस्क 2,731 मिलियन टन, चूना पत्थर 9,038 मिलियन टन, बाक्साईट 148 मिलियन टन, हीरा 13 लाख कैरेट की खनिज सम्पदा है। इसके अलावा और भी खनिज सम्पदा छत्तीसगढ़ में है। इस खनिज सम्पदा को देशी-विदेशी धन पिपाशु लूटना चाहते हैं, जिसके लिये सितम्बर 2009 तक 4 बड़ी कम्पनियों को बिलासपुर, रायपुर, राजानन्दगांव और रायगढ़ में 6,836 हेक्टेअर जमीन देने का निश्चय किया था। टाटा कोे बस्तर में 5.5 मिलियन टन का स्टील प्लांट लागने के लिए 2,044 हेक्टेअर भूमि चाहिए, जिसके लिए 6 जून 2005 में छत्तीसगढ़ सरकार के साथ इकरारनामा हुआ है। इसके अलावा और सैकड़ों इकरारनामें हुये हंै जिसमें छत्तीसगढ की लाखों हेक्टेअर जमीन जानी है। इस लूट को पूरा करने में अमेरिका और इस्राईल जैसे देशों की भी भागीदारी रही है। वे यहां के आदिवासियों को खत्म करने के लिये हथियारों से लेकर ट्रेनिंग तक दे रहे हैं। वे अपने एक्सपर्ट को छत्तीसगढ़ भेजते हैं ताकि आदिवासियों के संघर्ष को समाप्त कर पूंजीवादी-साम्राज्यवादी लूट को बढ़ाया जा सके।

रोज-रोज के फर्जी मुठभेड़ और गिरफ्तारियों से आदिवासियों के लिए अस्तित्व का खतरा पैदा हो गया है। आदिवासी अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संगठित होकर लड़ रहे हैं, चाहे आप इनके संघर्ष को जिस नाम से पुकारें। इस लूट को बनाये रखने के लिये भारत सरकार, छत्तीसगढ सरकार जितना भी फर्जी मुठभेड़ में लोगों को मारे, महिलाओं के साथ बलात्कार करे, शांतिप्रिय-न्यायपसंद लोगों को धमकाये और उन पर हमले कराये, लेकिन वह शांति स्थापित नहीं कर सकती है। राष्ट्रपति जी, आपने पूछा था कि‘शांति प्राप्त करना इतना दूर क्यों है? टकराव का समाप्त करने से अधिक शांति स्थापित करना इतना कठिन क्यों रहा है?’ जब तक मुट्ठी भर धन पिपाशुओं के लिए आम जनता की जीविका के साधन (जल-जंगल-जमीन) छिनते जायेंगे, तब तक यह टकराव रहेगा। जब तक विकास के नाम पर विनाश का खेल चलता रहेगा, तब तक शांति स्थापित नहीं हो सकती है। यही आपके प्रश्नों के उत्तर हैं।

कब तक देश की शोषित-पीड़ित जनता, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, महिला मुद्दों पर अलग-अलग लड़ती रहेगी? क्या हम सब की लड़ाई एक नहीं है? क्या हमारा साझा दुश्मन सामंतवाद, पूंजीवाद, साम्राज्यवाद नहीं है? क्या हमारी अलग-अलग लड़ाई इन ताकतों के लिए फायदेमंद नहीं है? दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, महिलाएं, मजदूर, किसान एक होकर लड़ें यही समय का तकाजा है।

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