ताजा सामाचार

आप यहाँ है :

हाड़ोती पुरातत्व दर्शन द्वारकाधीश मंदिर, झालरापाटन…..

पर्यटक अक्सर दुरस्त पर्यटन स्थलों को देखने -घूमने का कार्यक्रम बनाते हैं पर कभी स्थानीय क्षेत्रीय पर्यटन स्थलों पर घर की मुर्गी दाल बराबर समझ कर शायद ही कभी जाने का कार्यक्रम बनाते हो। यूं तो हाड़ोती के दर्शनीय स्थलों पर जाने और देखने का मौका मुझे कई बार मिला। विचार बनाया कि लंबा अंतराल होने से एक बार फिर से जा कर इन्हें देखा जाए। इस विचार की एक वजह हाड़ोती के पुरातत्व स्थलों पर किताब लिखना भी रहा।

रविवार 11 सितम्बर 2022 को कार से निकल पड़ा झालावाड़ और झालरापाटन के पर्यटक स्थलों को देखने। बरसात के मौसम में दरा घाटी हरे भरे पेड़ों की हरितमा से श्रृंगारित हो आंखों को सुकून दे रही थी। इससे गुजरते हुए महसूस हो रहा था जैसे प्राकृतिक सुंदरता लिए हिल स्टेशन हो। इस यात्रा में मैने दरा के गुप्तकालीन मंदिर और महल के अवशेष, झलरापाटन में द्वारकाधीश मंदिर, मदन विलास पैलेस, गोमती सागर झील, सूर्य मंदिर, शांतिनाथ जैन मंदिर, चंद्रभागा नदी के किनारे प्राचीन देवालय समूहऔर झालावाड़ के महल संग्रहालय का अवलोकन किया। इन्हीं पुरातत्व पर्यटन स्थलों के बारे में अपने मित्रों को भी लेखन और चित्रों के माध्यम से परिचय देने का प्रयास कर रहा हूं।

सबसे पहले ले चलता हूं द्वारकाधीश मंदिर के दर्शन पर। झालरापाटन में बस स्टैंड के पीछे गोमती सागर झील के सहारे वाली सड़क पर करीब एक किमी.पर प्राचीन काल में निर्मित एक विशाल द्वार से प्रवेश कर बड़ा सा परिसर दिखाई देता है जो तीन और से ऊंचे परकोटे से घिरा है और दाईं तरफ विशाल महल — हवेली में स्थित है वैष्णव मत का प्राचीन द्वारकाधीश मंदिर। मंदिर के चरण पखारती गोमती सागर झील और परिसर में बड़े – बड़े विशाल वृक्षों की छटा मंदिर को प्राकृतिक परिवेश प्रदान कर अत्यंत मनोरम बनती है।
** लाल पाषाण से निर्मित विशाल हवेली के अग्र भाग का स्थापत्य और मंदिर परिसर का कलात्मक तिमंजिला प्रवेश मंडप और इसके दोनों और बनी तिबारियों से मंदिर भव्यता का अहसास होता है। तिबारियों में प्रवेश द्वार के दोनों और एक – एक कलात्मक पेंटिंग बनी हैं और एक काफी बड़ा नगाड़ा आकर्षित करता है।
** मंदिर के सामने देवस्थान विभाग के सूचना पट्ट पर मंदिर दर्शन और पूरे दिन में होने वाली आरतियों का समय सूचित किया गया है। मंदिर परिसर में प्रवेश के लिए सड़क से ही 15 सीढियां चढ कर प्रवेश द्वार है। प्रवेश मंडप प्राचीन कारीगरी का सुंदर नमूना है।
** प्रवेश द्वार से जब मुख्य मंदिर परिसर में पहुंचते हैं। सामने ही द्वारकाधीश जी का मंदिर है और तीन ओर कलात्मक स्तंभों वाली तिबारियां हैं। मंदिर के बाईं तरफ एक प्राचीन कलात्मक द्वार शाखा विशेष रूप से प्राचीनता का बोध कराती हैं। इसके स्तंभ और ऊपरी
सरदल अत्यंत कलात्मक है।
** मुख्य मंदिर की जगती ऊंचाई लिए है और मुख्य प्रवेश द्वार से लगी तीन तरफ पांच – पांच सीढ़ियों की चौकी बनी है। मंदिर में अन्य वैष्णव मंदिर की भांति द्वारकाधीश जी के दर्शन होते हैं। यहां आरती,दर्शन और भोग आदि की समस्त व्यवस्थाएं नाथद्वारा मंदिर के समान हैं। मंदिर को विशाल हवेली शैली में कांकरोली के द्वारकाधीश मंदिर की अनुकृति पर बनवाया गया है।
** मंदिर के बाहर बाईं ओर गोमती सागर घाट बने हैं जहां महिला – पुरुष स्नान करते नजर आते हैं। घाट से मंदिर के पीछे का भाग झील के साथ चित्ताकर्षक प्रतीत होता है।
** ऐतिहासिक साक्ष्य के मुताबिक वैष्णव मत के बल्लभ संप्रदाय के भव्य द्वारकाधीश मंदिर का निर्माण 1796 ई. में झालावाड़ शहर के संस्थापक झाला जालिम सिंह ने करवाया था। मंदिर में देव प्रतिमा की स्थापना 1806 ई. में की गई। उन्होंने मंदिर की व्यवस्था के लिए उस समय जागीरें प्रदान की थी। माना जाता है की यहां एक मकान की खुदाई में प्राप्त द्वारकाधीश,गोपीनाथ, संतनाथ और रमणीकनाथ की मूर्तियों को इस भव्य मंदिर में प्रतिस्थापित किया गया था। झाला राजकुल का यह मंदिर वर्तमान में राजकीय संरक्षण में पुरातत्व निधि है।

——-
लेखक एवम पत्रकार
कोटा
मो.9928076040

image_pdfimage_print


Leave a Reply
 

Your email address will not be published. Required fields are marked (*)

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

Get in Touch

Back to Top