आप यहाँ है :

भाषाओं को मरने से कैसे बचाएँ

सुन कर चौंकिएगा नहीं , दुनिया भर में कहीं न कहीं हर पखवाड़े में एक भाषा की मौत हो जाती है . इस हिसाब से अगली शताब्दी तक विश्व भर बोली जाने वाली सात हज़ार भाषाओं में से आधी दृश्य पटल से ग़ायब हो जाएँगी . यह बहुत सारे अंचलों और समुदायों द्वारा अपनी आंचलिक या समुदाय की भाषा को छोड़ कर अंग्रेज़ी , मैंडरिन , स्पैनिश जैसी ताकतवर भाषाओं को अपनाए जाने के कारण हो रहा है . भारत में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है 1961 की जनगणना बाद से यही कोई 200 भाषाओं का अस्तित्व ख़त्म हो चुका है और 197 भाषाएँ विलुप्ति की ओर अग्रसर हैं.

प्यूपिल लैंग्विज सर्वे आफ इंडिया के सर्वेक्षण के अनुसार सिक्किम की माझी भाषा को बोलने वाले बस केवल एक ही परिवार के चार सदस्य बचे हैं. इसी प्रकार अरुणांचल में कोरों , गुजरात में सीदी , असम में दिमासा की स्थिति भी कोई अच्छी नहीं है , UNESCO ने हमारे देश की असुर , बिरहोर और कोरवा को भी विलुप्त होने वाली श्रेणी में रखा हुआ है , जिसमें बिरहोर बोलने वाले अब केवल 2000 लोग ही बचे हैं।

युनेस्को (UNESCO) की विलुप्त होने के कगार पर खड़ी भाषा की परिभाषा के अनुसार वो है जिसे बोलने वालों की संख्या 10000 से कम रह गई है, वहीं हमारे यहाँ 1971 की जनगणना के अनुसार 10,000 से कम लोगों द्वारा बोली भाषा आधिकारिक सूची में शामिल नहीं होगी।

दुनिया भर की बात करें तो कमोबेश स्थिति यही है . पेरू में रासीगारो बोलने वाले केवल दो ही लोग बचे हैं. जापान में आइनू भाषा और परम्परा पर उन्नीसवीं शताब्दी में प्रतिबंध लगा दिया गया था , 1980 के बाद दोबारा इसको पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया गया पर अब मुश्किल से गिने चुने लोग इस भाषा को बोलते हैं और उनकी आयु भी 65 वर्ष से ऊपर है .वोतिक लोग जो वोत भाषा बोलते थे उन्हें रूस से निष्कर्षित करके 1943 में फ़िनलैंड भेज दिया गया था , अब इसके बोलने वालों की संख्या दस से अधिक नहीं बची है. यही हाल अमरीका के उत्तरी ओकलहामा इलाक़े के बसे नेटिव पवनी लोगों की अपनी भाषा का है .

आप सवाल कर सकते हैं कि अगर कोई ऐसी भाषा जिसके बोलने और समझने वाले लोगों की संख्या कम हो रही है और वह विलुप्त हो जाती है तो उससे क्या फ़रक पड़ेगा , आसमान थोड़ी गिर जाएगा ? कोई भी आंचलिक भाषा अपने आप में उस अंचल की वन्य सम्पदा, औषधियों, जन जीवन, लोक कथाओं का ख़ज़ाना होती है , ये जानकारियाँ भाषा के ज़रिए पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती हैं . जब कोई भाषा कमजोर पड़ने लगती है तो वह ज्ञान का स्रोत भी सूखने लगता है. भाषा के मरने से संस्कृति के ह्रास के साथ ही सामुदायिक एकजुटता का भी क्षरण हो जाता है , इसे यों भी कह सकते हैं कि भाषा का खोना मानव के खो जाने जैसा है.

दुनिया भर की भाषाओं की विविधता तो अनूठी है . ऐसी भाषाएँ भी हैं जो केवल 11 ध्वनियों से काम चला लेती हैं तो कई भाषाओं में 118 से भी अधिक ध्वनियाँ हैं , हर भाषा की विशाल शब्द सम्पदा , शब्दों की अनूठी संरचना और अभिव्यंजना हैं जो भाषा की अभिव्यक्ति के काम आती हैं . भाषाविद भाषाओं की पदस्थापनाओं , समानताओं और विविधताओं के बारे में बहस करते रहते हैं लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाते हैं . संकेतों की भाषा ने यह भी सिद्ध किया है कि सम्प्रेषण के लिए भाषा को बोलने की भी ज़रूरत नहीं है . इन सब से एक ही बात सिद्ध होती है कि मानव मस्तिष्क और उसकी सम्प्रेषण क्षमता में काफ़ी लचीलापन है . जब हम विविध भाषाओं का अध्ययन करते हैं तो हमें मानवीय अनुभूति के मर्म का अंदाज़ा होता है.

किसी भी भाषा के मरने का सम्बंध किसी एक कारक से नहीं है , ये कारक बहुत सारे हो सकते हैं जिनमें राजनैतिक , आर्थिक , सांस्कृतिक प्रमुख हैं . लेकिन ज़्यादातर मामलों में देखा गया है कि अपनी भाषा की जगह लोग अपने बच्चों को अच्छे भविष्य के लिए दूसरी भाषा सिखाने में जी जान लगा देते हैं और उनकी अपनी भाषा दूसरी या तीसरी पंक्ति में बैठने लगती है . अमेरिका में पिछले डेढ़ सौ वर्षों में कुछ कुछ ऐसा ही हुआ है , यहाँ यूरोप, जापान, कोरिया , चीन, भारत आदि देशों से आए हुए दूसरी जेनेरेशन के प्रवासी अपने माता पिता की भाषा धारा प्रवाह से नहीं बोल पाते थे क्योंकि उन्हें अच्छी नौकरी या अच्छे व्यवसाय के अवसर अंग्रेज़ी सीखने में दिखाई दिए , तीसरी जेनेरेशन आते आते उनकी पहली भाषा अंग्रेज़ी हो गई.

किसी समुदाय या समूह का एक स्थान से दूसरे पर विस्थापन भी किसी भाषा या बोली के लुप्त होने का कारण बन गया है . महानगर मुंबई में जो आबादी है उसका बहुत बड़ा हिस्सा देश के कोने कोने से आए प्रवासियों का है लेकिन उनकी दूसरी और तीसरी जेनरेशन अंग्रेज़ी , मराठी या हिंदी में ही बोलती नज़र आती है . अब से छै से आठ हज़ार वर्ष पूर्व प्रोटो-इंडो-यूरोपीय लोग यूरोप और एशिया के बड़े भाग में आ कर बस गए तो बहुत सारी बोलियों और भाषाओं ने दम तोड़ दिया.

आने वाले वर्षों में जल-वायु में ज़बरदस्त बदलाव से लोगों का विस्थापन सम्भावित है जिसके कारण और कई भाषाओं का लुप्त होना सम्भावित है .

अगर भाषाओं को लुप्त होने से बचाना है तो उसके लिए सभी को प्रयास करना पड़ेगा. अपनी भाषा के माध्यम से धंधा-पानी सम्भव नहीं है तो कम से कम अपने लोक-गीतों, साहित्य, सांस्कृतिक का माध्यम तो बना रहने दें. कई भाषा भाषियों में मैंने यह ज़बरदस्त मोहब्बत देखी है , ख़ास तौर से मराठी भाषी लोग ख़रीद कर अपनी भाषा की किताबें ज़रूर ख़रीद कर पढ़ते हैं इस बहाने हर महीने मराठी की नई नई पुस्तकें छप रही हैं. यह प्रवृति मुझे कम से कम हिंदी भाषियों में नहीं दिखती है. अगर आप की को अलग बोली है तो उसे घर , परिवार में ज़रूर बोलें और उसके बनाए रखने की हर सम्भव कोशिश करें .

मेरे एक मित्र ने अवकाश प्राप्ति के बाद हाल ही में कुमायूँनी भाषा के व्याकरण और लोकोक्तियों पर पुस्तक लिखी वे इसे अपने खर्चे पर स्थानीय लोगों में बाँट रहे हैं ताकि वहाँ के लोग अपनी भाषा से जुड़े रहें. दरअसल भाषा को जीवित रखने की ज़िम्मेवारी सरकार से कहीं ज़्यादा उस भाषा को बोलने वाले लोगों की है .

(लेखक इन दिनों लंदन में हैं और विविध विषयों पर शोधपूर्ण लेख लिखते हैं)

image_pdfimage_print


Get in Touch

Back to Top