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मानव अधिकारों की रक्षा भारतीय दर्शन और लोकाचार की स्थायी धरोहर – डॉ.जैन

राजनांदगांव। मानव अधिकार दिवस पर प्रख्यात वक्ता और दिग्विजय कालेज के राष्ट्रपति सम्मानित प्रोफ़ेसर डॉ.चन्द्रकुमार जैन ने कहा कि भारत सदैव मानव अधिकारों का पक्षधर रहा है। संयुक राष्ट्र के सार्वभौमिक घोषणा पार्ट से लेकर आज तक दुनिया चैन के लिए हमारे देश ने हमेशा मानव अधिकारों के संरक्षण पर बल दिया है।

मानवाधिकार पर दुर्ग-भिलाई ट्विन सिटी मैत्री क्लब के आयोजन में भारतीय संविधान और मानव अधिकार विषय पर बोलते हुए डॉ.जैन ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के सार्वभौम घोषणा का प्रारूप तैयार करने में भारत ने सक्रिय भागीदारी की। संयुक्त राष्ट्र के लिए घोषणा पत्र का मसौदा तैयार करने में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने विशेष रूप से लैंगिक समानता को दर्शाने की जरूरत को उजागर करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। परन्तु, डॉ.जैन ने स्पष्ट किया कि मानव अधिकारों के लिए सम्मान भारतीय लोकाचार में सामाजिक दर्शन के एक भाग के रूप में लंबे समय से एक अस्तित्व में है। क़ानून के एक अहम पहलू जुड़कर इसने अलग स्वरूप प्राप्त कर लिया है।
मानवाधिकार की राष्ट्रीय वाद विवाद प्रतियोगिता के विजेता रहे डॉ.जैन ने बताया कि भारतीय संविधान के लागू होने के बाद सार्वभौम घोषणा के अधिकांश अधिकारों को इसके दो भागों, मौलिक अधिकार और राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में शामिल किया गया है जो मानव अधिकारों के सार्वभौम घोषणा के लगभग क्षेत्रों को अपने में समेटे हुए है। इसमें समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरूद्ध अधिकार, धार्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक स्वतंत्रता का अधिकार और सांविधानिक उपचारों का अधिकार आदि शामिल है। साथ ही इसमें सामाजिक सुरक्षा का अधिकार, कार्य का अधिकार, रोजगार चुनने का स्वतंत्र अधिकार, बेरोजगारी के खिलाफ काम की सुरक्षा और कार्य के लिए सुविधाजनक परिस्थितियां, समान कार्य के लिए समान वेतन, मानवीय गरिमा का सम्मान, आराम और छुट्टी का अधिकार, समुदाय के सांस्कृतिक जीवन में निर्बाध हिस्सेदारी का अधिकार, मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार, लोगों के कल्याण को बढ़ावा देना, समान न्याय और मुफ्त कानूनी सहायता और राज्य द्वारा पालन किए जाने वाले नीति के सिद्धांतों को शामिल किया गया है।
डॉ.जैन ने बताया कि भारत ने मानव अधिकार रक्षा अधिनियम, 1993 बनाकर संघ तथा राज्य स्तर पर मानवाधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए आयोगों की स्थापना आवश्यक कर दिया है। इस अधिनियम की वजह से संघ स्तर पर राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग तथा राज्यों के स्तर पर राज्य मानव अधिकार आयोगों की स्थापना करना कानूनी रूप से आवश्यक हो गया है। यह आयोग मानव अधिकारों तथा उससे संबंधित विषयों को सुलझाने के लिए जिम्मेदार हैं। इतना ही नहीं, भारत विश्व में मानवाधिकारों की रक्षा का पक्षधर है तथा इसके लिए कार्यरत संघों का समर्थक भी है। अंत में आयोजन समिति ने डॉ.जैन का आत्मीय सम्मान किया।
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