Sunday, March 3, 2024
spot_img
Homeचर्चा संगोष्ठीआँखें नहीं ये खजाना है, इन्हें सम्हाल कर रखिये – डॉ. आरती

आँखें नहीं ये खजाना है, इन्हें सम्हाल कर रखिये – डॉ. आरती

आँखें क्या नहीं हैं, इसका एहसास उनको होता है जो देख नहीं पाते हैं, और हमें भी आँखें होने का एहसास तब होता है जब आँखों में किरकिरी हो जाए और हम उसे निकालने के लिए बैचैन हो जाएँ। लेकिन आँखें मात्र दो टिमटिमाते सितारे जैसे ही नहीं है, इनके अंदर तकनीक और शरीर विज्ञान का एक ऐसा जटिल तंत्र बिछा हुआ है, जिसका पता आँख के डॉक्टर को ही होता है। शायरों और कवियों ने आँखों की गहराई को उसकी खूबसूरती और उसमें प्रकट होने वाले भावों से समझा है तो चिकित्सा विज्ञान ने उसकी जटिल संरचना और उसकी उपयोगिता से।

गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब ऐसे तो खेल और सामाजिक गतिविधियों के लिए जाना जाता है लेकिन क्लब की प्रबंध कमेटी इसे एक नई पहचान दे रही है, यहाँ संगीत, साहित्य से लेकर रीति-रिवाजों से जुड़े आयोजनों के माध्यम से सदस्यों को भारतीय संस्कारों और जीवन शैली से जोड़ा जाता है।

इस बार सदस्यों के लिए आँखों पर चर्चा का आयोजन किया गया। जाने माने नैत्र विशेषज्ञ और बंजर जमीन के टुकड़े पर मुंबई का सर्वसुविधायुक्त गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब खड़ा करने वाले डॉ. श्याम अग्रवाल और उनके सहयोगियों, जिनमें उनकी बेटी और दामाद भी शामिल थे, आँखों को लेकर इतनी गंभीर और महत्वपूर्ण जानकारियाँ दी कि उपस्थित श्रोता हैरान रह गए। इस मंच पर आँखों को लेकर जो बात हो रही थी वो कवियों शायरों और चित्रकारों की सोच वाली आँखों पर नहीं बल्कि जीती जागती उन आँखों के बारे में थी जिसे परमात्मा ने किसी वरदान की तरह मनुष्य को सौंपी है।

चर्चा की शुरुआत डॉ. आरती अग्रवाल ने की। आरती उन प्रसिध्द नैत्र विशेषज्ञों में शामिल है जिन्होंने अमरीका में दुनिया भर से आए नैत्र विशेषज्ञों के बीच अपने शोधपत्र को पढ़ा था और इसे श्रेष्ठतम शोधपत्र के रूप में स्वीकार किया गया था। डॉ. आरती की प्रतिभा की प्रशंसा देश के जाने माने नैत्र विशेषज्ञ डॉ. रोहित शेट्टी भी कर चुके हैं।

अपनी प्रभावी प्रस्तुति और सहज सरल भाषा में डॉ. आरती ने बताया कि आँख की पूरी संरचना किसी कैमरे की तरह होती है, आँखों के बीच में जो काली टीकी होती है वह पारदर्शी लैंस की तरह होती है। आँखे का रैटिना कैसे कैमरे की तरह इमेज कैप्चर करके मस्तिष्क तक पहुँचाता है। डॉ. आरती ने बताया कि आँखों में मोतियाबिंद होता है लेकिन ये आज तक पता नहीं चला है कि ये कैसे होता है। जरुरी नहीं कि मोतियाबिंद बढ़ती उम्र के लोगों को ही हो, ये नवजात बच्चे को भी हो सकता है। कई बार क्रिकेकट, बेडमिंटन, टेबलटेनिस खेलते समय भी आंखों को चोट लग जाती है और आँखों को नुक्सान हो जाता है। कई बार एक आँख में ही मोतियाबिंद हो जाता है। इसलिए जरुरी है कि हर व्यक्ति को अपनी आँखों की जाँच करवाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि कई बच्चों में चश्में की समस्या वंशानुगत होती है। सात पीढ़ी पहले भी किसी को चश्मा लगा हो तो बच्चे को चश्मा लग सकता है। कई बार दूर की चीजें नहीं दिखाई देती है। लेज़र ऑप्रेशन बहुत अच्छा समाधान है और 19 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवाओं का लेज़र ऑप्रेशन किया जा सकता है।

डॉ आरती ने आँखों से जुड़ी समस्याओं को एबीसीडी के माध्यम से प्रस्तुत कर इस बोझिल विषय को रोचक बना दिया।

डॉ. अनुज बहुआ ने कहा कि बच्चों को बचपन में ही चश्मा लगा दिया जाएतो बाद में उनके चश्में का नंबर कम होता जाता है। उन्होंने कहा कि बच्चों को पढ़ाई के नाम पर मोबाईल देने की बजाय मोबाईल को टीवी से जोड़कर पढ़ने दीजिये। बच्चों को मैदान में जाकर बच्चों के साथ खेलने के लिए प्रोत्साहित कीजिए।

उन्होंने कहा कि इन दिनों आँखों का ऑप्रेशन बहुत सरलता से मिनटों में किया जा सकता है। आँखों की सर्जरी हर तरह से आसानी से की जा सकती है। साथ लाए छोटे छोटे मॉडलों की सहायता से डॉ. श्याम अग्रवाल, अनुज बहुवा और आरती ने आँखों की तमाम जटिलताओं, बीमारियों और उपचार प्रक्रिया के बारे में समझाया। उन्होंने बताया कि लैंस लगाने से लेकर लेज़र से ऑप्रेशन मात्र कुछ मिनटों में हो जाता है और मरीज को कुछ पता ही नहीं चल पाता है। वह ऑप्रेशन होने के कुछ देर बाद ही सामान्य जिंदगी जी सकता है।

डॉ. श्याम अग्रवाल ने मुंबई के जाने माने नैत्र चिकित्सक शंकर नैत्रालय के डॉ. बद्रीनाथ की सेवाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने हजारों नैत्र विशेषज्ञों को प्रशिक्षित कर समाज में एक उदाहरण स्थापित किया है। ऐसे व्यक्ति को पद्मश्री या पद्म भूषण जैसे अलंकरण से सम्मानित किया जाना चाहिए।

डॉ अग्रवाल ने अपने चिकित्सकीय जीवन से जुड़े रोचक प्रसंगों के साथ इस चर्चा सत्र को मजेदार बना दिया।

डॉ. विशाल राठौर ने डायबिटीज़ का उल्लेख करते हुए कहा कि ये किस तरह आँख और किडनी को नुक्सान पहुंचा सकती है, लेकिन यदि समय पर ईलाज करवा लिया जाए तो इस खतरे से बचा जा सकता है।

चर्चा सत्र के बाद जाने माने रेटिनोल़ॉजिस्ट डॉ. विशाल राठौर, डॉ. मयूर अग्रवाल, डॉ, सौरभ रामुका ने श्रोताओं के विभिन्न प्रश्नों के उत्तर दिए। डॉ. आरती ने बताया कि आँखों में कोई भी दवाई डालने की बजाय आँखों की प्रामाणिक ड्रॉप ही डालना चाहिए। इससे आँखों को कोई नुक्सान नहीं होता है, लेकिन आँखों में पानी और नमक का संतुलन बना रहता है। आँखों को बार बार धोने की बजाय दिन में दो चार बार ही धोना चाहिए।

यह भी उल्लेखनीय है कि डॉ. श्याम अग्रवाल हर तीन महीने में वृंदावन में दीदी माँ ऋतंभरा के आश्रम में जाकर 30-400 मरीजों के ऑप्रेशन निःशुल्क करते हैं। डॉ. आरती खुद 40 से लेकर 50 ऑप्रेशन करती है।

क्लब के अध्यक्ष श्री विनय जैन ने कहा कि डॉ. श्याम अग्रवाल आँखों की रोशनी रही ठीक नहीं करते बल्कि हमें विज़न भी देते हैं, क्लब का ये विशाल परिसर इनके विज़न का ही परिणाम है।

चर्चा सत्र के बाद श्रोताओँ की जिज्ञासा से इस बात का पता चल रहा था कि श्रोताओं ने पूरी गंभीरता और रुचि से इस सत्र को सुना और समझा था।

शेरो शायरी में शायरों ने आँखों को अपने अलग ही अंदाज में जाना और समझा है, प्रस्तुत है आँखों पर जाने माने शायरों के चुनिंदा शेर..

तमाम अल्फाज़ नाकाफी लगे मुझको,
एक तेरी आँखों को बयां करने में।

अगर कुछ सीखना ही है,तो आँखों को पढ़ना सीख लो,
वरना लफ़्ज़ों के मतलब तो,हजारों निकाल लेते है।

“मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ.

एक जंगल है तेरी आँखों में मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ.- “दुष्यंत”

मुझे मालूम है तुमने बहुत बरसातें देखी है,
मगर मेरी इन्हीं आँखों से सावन हार जाता है।

बहुत अंदर तक तबाही मचाता है,
वो आँसू जो आँखों से बह नहीं पता है।

बात आँखो की सुनों दिल में उतर जाती है ,
जुबाँ का क्या है ये तो अक्सर मुकर जाती है।

आँखों को पढ़ना सिख लो अगर कुछ सीखना ही है तो
वरना लफ्जो में मतलब तो हजारो निकाल लेते हे।

एक आँसू भी हुकूमत के लिए ख़तरा है
तुम ने देखा नहीं आँखों का समुंदर होना

उस की आँखों को ग़ौर से देखो
मंदिरों में चराग़ जलते हैं

लोग नज़रों को भी पढ़ लेते हैं
अपनी आँखों को झुकाए रखना

उन रस भरी आँखों में हया खेल रही है
दो ज़हर के प्यालों में क़ज़ा खेल रही है

उन झील सी गहरी आँखों में
इक लहर सी हर दम रहती है

उदास आँखों से आँसू नहीं निकलते हैं
ये मोतियों की तरह सीपियों में पलते हैं

निकलने ही नहीं देती हैं अश्कों को मिरी आँखें
कि ये बच्चे हमेशा माँ की निगरानी में रहते हैं

वो बोलते रहे… हम सुनते रहे…
जवाब आँखों में था वो जुबान में ढूंढते रहे।

निगाहे बोलती हैं जब जुबा खामोश रहती है,
दिलों की धड़कने ही तब दिलों की बात कहती हैं।

कुछ कहो तो शरमा जाती है आँखे
बिन बोले, बहुत कुछ कह जाती हैं आँखें

image_print

एक निवेदन

ये साईट भारतीय जीवन मूल्यों और संस्कृति को समर्पित है। हिंदी के विद्वान लेखक अपने शोधपूर्ण लेखों से इसे समृध्द करते हैं। जिन विषयों पर देश का मैन लाईन मीडिया मौन रहता है, हम उन मुद्दों को देश के सामने लाते हैं। इस साईट के संचालन में हमारा कोई आर्थिक व कारोबारी आधार नहीं है। ये साईट भारतीयता की सोच रखने वाले स्नेही जनों के सहयोग से चल रही है। यदि आप अपनी ओर से कोई सहयोग देना चाहें तो आपका स्वागत है। आपका छोटा सा सहयोग भी हमें इस साईट को और समृध्द करने और भारतीय जीवन मूल्यों को प्रचारित-प्रसारित करने के लिए प्रेरित करेगा।

RELATED ARTICLES
- Advertisment -spot_img

लोकप्रिय

उपभोक्ता मंच

- Advertisment -spot_img

वार त्यौहार