Thursday, June 13, 2024
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जब डाकू का घर गिराने माधो राव सिंधिया ने भेज दी तोप, मगर डाकू का कुछ नहीं बिगाड़ पाए

माधो राव सिंधिया (Madho Rao Scindia) को आधुनिक ग्वालियर का निर्माता कहा जाता है. वह साल 1886 से लेकर 1925 तक सिंहासन पर रहे. करीब 39 साल के कार्यकाल में उनका सबसे ज्यादा जोर अपनी सेना को मॉडर्न बनाने पर था. सैनिकों की संख्या बढ़ाई और आधुनिक हथियारों से लैस किया. हालांकि माधो राव का यह कदम अंग्रेजों को खास पसंद नहीं आया और टकराव की वजह बना. वरिष्ठ पत्रकार और लेखक रशीद किदवई अपनी किताब ‘द हाउस ऑफ सिंधियाज’ में लिखते हैं कि अपने चाहने वालों के बीच माधो महाराज के नाम से माधो राव की अंग्रेजों से अच्छी बनती थी. इसके बावजूद जब वह अपनी सेना के लिए हथियार खरीदने या उनकी संख्या बढ़ाने की कोशिश करते तो अंग्रेज अड़ंगा लगा देते.

1857 के विद्रोह के बाद तो अंग्रेज और सतर्क हो गए. माधो महाराज (Madho Rao Scindia) की हर कोशिश में अड़ंगा लगाने लगे. हालांकि माधो महाराज ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने सैनिकों की संख्या बढ़ाना जारी रखा. एक वक्त ऐसा आया जब सिंधिया रियासत की सेना में 7000 से ज्यादा सैनिक हो गए. इन पर सालाना 40 लाख रुपये खर्च होता था. हालांकि अच्छे हथियारों और गोला-बारूद की कमी बड़ा मुद्दा थी. इस वजह से एक दफा माधो राव को शर्मिंदा भी होना पड़ा.

ग्वालियर के महाराजा जयाजीराव सिंधिया (MAHARAJA JAYAJIRAO SCINDIA) की एक उम्र तक कोई संतान नहीं थी. महाराजा की उम्र जैसे-जैसे बढ़ने लगी, उन्हें चिंता सताने लगी कि उनके बाद सिंधिया रियासत की गद्दी कौन संभालेगा. जयाजीराव ने 40 साल की उम्र में 13 साल की एक लड़की से दूसरी शादी रचाई. आगे चलकर उस शादी से उन्हें एक बेटा हुआ. साल 1886 में जब जयाजीराव का निधन हुआ, तो वही लड़का गद्दी पर बैठा. उस वक्त उसकी उम्र सिर्फ 10 साल थी और नाम था माधो राव सिंधिया.

माधो राव सिंधिया (Maharaja Madho Rao Scindia) सही मायने में सिंधिया खानदान के ऐसे पहले महाराजा थे, जिन्होंने अपनी रियासत को नई ऊंचाइयां दी. उन्होंने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से एलएलडी की डिग्री हासिल की. सिंधिया परिवार से विदेश जाने वाले पहले व्यक्ति थे. माधो राव की मिलिट्री से लेकर इंजीनियरिंग में खासी दिलचस्पी थी. एक तरफ उन्होंने अपनी सेना को मॉडर्न बनाने में ताकत झोंकी. तो दूसरी तरफ रियासत में डाक से लेकर नहर जैसी सुविधाएं ले आए.

किदवई लिखते हैं कि माधो राव सिंधिया जब लंदन में पढ़ रहे थे, उसे वक्त उनकी बड़ौदा की राजकुमारी से करीबी की खबरें सुर्खियां बनी. बाद में जब महाराजा की शादी की बात आई तो बड़ौदा राज परिवार पहली पसंद था. रिश्ता तय भी हो गया, पर शादी से ऐन पहले बड़ौदा की राजकुमारी ने मना कर दिया और रिश्ता टूट गया. हालांकि राजकुमारी ने रिश्ता तोड़ने के पीछे कोई खास वजह नहीं बताई.

बड़ौदा की राजकुमारी से रिश्ता टूटने के बाद माधो राव सिंधिया (Maharaja Madho Rao Scindia) को बहुत गहरा धक्का लगा. उनकी सेहत पर बुरा असर पड़ा. डायबिटीज की बीमारी ने घेर लिया. महाराजा ने पहले की तरह किसी भी खेल में भाग लेना बंद कर दिया और ग्वालियर जिमखाना क्लब भी कभी-कभार जाने लगे.

महाराजा की हालत देखकर उनके करीबी चिंतित हो गए. इस बीच उनके दरबार के कुछ मराठा सरदार एक नया रिश्ता लेकर आए. जो गोवा के राणे परिवार का था. राणे परिवार की राजकुमारी गजरा राजे अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर थीं. उनकी माधो राव सिंधिया से शादी हो गई. किदवई लिखते हैं कि गजरा राजे अकेले नहीं आईं, बल्कि अपने साथ अपनी पांच बहनों को भी लेकर ग्वालियर आईं.

माधो राव सिंधिया (Maharaja Madho Rao Scindia) साल 1886 में जब ग्वालियर रियासत की गद्दी पर बैठे तो उनकी उम्र सिर्फ 10 साल थी. बाद में के सालों में उन्हें ऐसे कारनामे किये, जिसके अंग्रेज भी मुरीद हो गए. माधो राव ने सिंधिया रियासत की सेना को आधुनिक बनाने पर बेतहाशा पैसा खर्च किया. जब पहला विश्व युद्ध शुरू हुआ तो ग्वालियर की इंपीरियल आर्मी ब्रिटिश फौज की तरफ से फ्रांस, ईस्ट अफ्रीका, मिस्र, फिलिस्तीन जैसे देशों में लड़ी.

लेखक रशीद किदवई लिखते हैं कि एक अनुमान के मुताबिक फर्स्ट वर्ल्ड वॉरमें सिंधिया परिवार को उस जमाने में 25 मिलियन (करीब 2.5 करोड़) रुपये खर्च करने पड़े थे.

माधो राव सिंधिया ने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से LLD की डिग्री हासिल की. जब वह ग्वालियर लौटे तो उन्होंने अपनी रियासत में अलग से सिविल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट बनाया. जो खासतौर से बड़े-बड़े स्टोरेज टैंक और नहर जैसी चीजें बनाया करता था. किदवई लिखते हैं कि माधो राव थोड़ा अंधविश्वासी किस्म के व्यक्ति थे. एक बार एक-एककर तीन ऐसी घटनाएं हुईं, जिससे वह दहल गए. उनका पसंदीदा हाथी किले से तोप ले जाते हुए मर गया. इसके ठीक बात उनकी पसंदीदा कोट ”माही मारताब” पता नहीं कैसे खराब हो गई. यहां तक तो ठीक था, लेकिन तीसरी घटना के बाद महाराजा बुरी तरह डर गए.

उन दिनों ग्वालियर के इमामबाड़े से मोहर्रम का ताजिया निकलता था, जिसकी अगुवाई सिंधिया परिवार करता था. एक दफा मोहर्रम के दौरान जब ताजिया निकला तो शॉर्ट सर्किट की वजह से उसमें आग लग गई. हालांकि थोड़ी देर में ही आग बुझा ली गई, लेकिन माधो राव को इससे तगड़ा सदमा लगा. उन्हें लगने लगा कि कोई अनहोनी होने वाली है.

उस वक्त माधो महाराज की कोर्ट में रहे कौड़ीकर बाबूजी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि ‘महाराजा ने कहा की सिर्फ ताजिया नहीं जला है, बल्कि मैं जल गया हूं…’ उस दिन जब वह ग्वालियर की सड़कों पर निकले तो उनकी आंखों से टप-टप आंसू गिर रहे थे. इन घटनाओं के बाद माधो सिंधिया बेतहाशा सिगरेट पीने लगे. उनके हाथ में हर वक्त सिगरेट दिखती थी. हालांकि उनके हकीम उन्हें बार-बार सिगरेट से दूर रहने की सलाह दिया करते थे, क्योंकि उनकी तबीयत बिगड़ती जा रही थी.

माधो राव सिंधिया का जानवरों से खास लगाव था. खासकर अपने पालतू कुत्ते हुस्सू से बहुत प्यार करते थे. साल 1925 में जब महाराजा पेरिस में बीमार पड़े तो उन्हें सबसे ज्यादा चिंता अपने कुत्ते की थी. उन्होंने सबसे सीनियर महारानी चिनकू राजे को बुलाया और कहा कि मेरी मौत के बाद हुस्सू की देखभाल में कोई कमी नहीं आनी चाहिए. माधो राव ने अपनी वसीयत लिखी तो इसमें हुस्सू की देखरेख के लिए खास तौर से एक रकम छोड़ी.

उल्लेखनीय है कि सिंधिया घराने के पहले शासक राणोजी राव सिंधिया पेशवा बाजीराव के अर्दली थे. पेशवा उनका नाम भी नहीं जानते थे. मगर एक दिन पेशवा ने देखा कि उनका अर्दली उनके जूते सीने से लगाये सो रहा है. नाराज होकर उन्होंने उसे जगाया तो रानोजी राव ने बताया कि हुजूर आपके जूते में कोइ जहर ना डाल दे इसलिये मैं इनको अपने साथ सीने से लगाकर सो गया. पेशवा इससे खुश हुये और फिर रानो जी राव को सामंत बना दिया. रानोजी ने पहले उज्जैन फिर ग्वालियर को अपनी राजधानी बनाया और शिंदे से सिंधिया बन गये. इस बात को किसी सिंधिया शासक ने छिपाया नहीं और वो मानते रहे कि कैसे उनके पूर्वज यहां तक पहुंचे.

सिंधिया परिवार से राजमाता विजया राजे सिंधिया ने अपना पहला चुनाव 1957 में कांग्रेस के टिकट पर इस सीट से लड़ा और जीत हासिल की। उन्होंने 1967 में स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और फिर 1989 में भाजपा से चुनाव लड़ा। स्व माधवराव सिंधिया ने अपना पहला चुनाव 1971 में भारतीय जनसंघ (बीजेएस) के टिकट पर गुना से लड़ा था और 2001 में नयी दिल्ली के पास एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु से पहले उन्होंने अपना आखिरी चुनाव 1999 में कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में लड़ा था।

माधवराव सिंधिया ग्वालियर से पांच बार चुने गए। राजमाता सिंधिया की बेटी यशोधरा राजे ने भी भाजपा के लिए दो बार लोकसभा में ग्वालियर सीट का प्रतिनिधित्व किया। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने2002 से 2014 के बीच चार बार गुना सीट का प्रतिनिधित्व किया है, जिसमें उपचुनाव में जीत भी शामिल है। वह अपनी हार के एक साल बाद मार्च 2020 में 22 कांग्रेस विधायकों के साथ भाजपा में शामिल हो गए, जिससे मध्य प्रदेश में कमल नाथ के नेतृत्व वाली सरकार गिर गई थी।

वर्ष 2019 में लोकसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार सिंधिया परिवार के लिए दूसरा झटका थी। इससे पहले 1984 में केंद्रीय मंत्री की बुआ और राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को भिंड लोकसभा सीट से भाजपा उम्मीदवार के तौर पर हार का सामना करना पड़ा था। वह कांग्रेस उम्मीदवार कृष्णा सिंह जूदेव से हार गईं, जो दतिया के पूर्व शाही परिवार से हैं।

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