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झमाझम बारिश के साथ कुछ यूं शुरू होती है ‘ज़िंदगी’ के जन्म की कहानी

शाम का वक्त हो और ज़ोर से बारिश हो रही हो, तो आप क्या कर सकते हैं? अपनी बोरियत मिटाने के लिए टीवी देखेंगे और क्या, है न? मैं भी यही कर रही थी। लगातार कई फ़िल्में देखीं, ग्रेएनॉटमी का नवां सीज़न देखा, 15 बार 400 से ऊपर चैनल भी पलटकर देख डाले लेकिन बारिश थीकि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। हारकर मैंने टीवी बंदकिया और इंटरनेट पर कुछ नया खोजने की कवायद शुरूकी। इत्तफ़ाक ऐसा हुआ कि मैं पाकिस्तान के एक शो‘ज़िदगी गुलज़ार है’ के इंटरनेट पेज तक पहुंच गई। उस पेज ने मुझे ऐसा बांधा कि उसके बाद मेरे आइपैड पर पाकिस्तानी सीरियल्स की बारिश हो गई। पूरे एक हफ्ते मैं घर से बाहर नहीं निकली। यह किस्सा है 2012 के मॉनसून का और यही वह समय था जब मेरे दिमाग में एक नयी योजना आकार ले रही थी। मेरे मन में एक सवाल था- क्या सीमा पार की ये कहानियां बाकी लोगों को भी उतनी ही अच्छी लगेंगी जितनी मुझे लग रही हैं?

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2012 की पूरी सर्दियां मैंने पूरा देश घूमने में लगाईं। मैं दोस्तों से मिली, दोस्तों के दोस्तों से मिली और फिर उनकेभी दोस्तों से। मेरा काम था उन्हें पाकिस्तानी शो, गाने, फिल्में, कोक स्टूडियो दिखाना…मुझे इस काम में बहुत खुशी भी मिली।

उसके बाद मैंने पाकिस्तान के लेखकों और निर्देशकों से संपर्क किया। उनसे मिलकर मुझे ऐसा लगा कि मैं रचनात्कमता के एक नए स्वर्ग में हूं। उस समय तक मेरा एक मिशन बन चुका था, वह यह कि मुझे पाकिस्तान कीरचनात्मक प्रतिभा की चमक भारत के लोगों तक पहुंचानी थी। तब तक मैं सांस्कृतिक साझेदारी और उसकीसंभावनाओं की ताकत महसूस कर चुकी थी।

लेकिन मैं यहां किसी और देश नहीं, पाकिस्तान के बारे में बात कर रही थी। मेरे करीबी दोस्तों ने इसे मेरा पागलपन बताया। मैंने उन पर विश्वास भी कर लिया होता अगर मैं भाग्यवश पुनीत गोयनका से नहीं मिलती। ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइज़ेज़ लिमिटेड के सीईओ और एमडी पुनीत ऐसे पहले और अकेले व्यक्ति थे, जिन्होंने मेरे पागलपन को समझा और उस पर विश्वास किया। मेरे सपने या पागलपन को हकीकत में बदलने के लिए पुनीत ने सिर्फ 10 मिनट लिए। मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ, जब उन्होंने कहाकि हम यह काम करेंगे।

मैंने सोचा कि यह सब इतनी आसानी से नहीं हो सकता। पुनीत को जल्दी ही अपनी गलती का एहसास हो जाएगा लेकिन पुनीत अपने शब्दों पर कायम रहे। हमने इस योजना पर काम करना शुरू कर दिया। जैसे-जैसे और सदस्य टीम से जुड़ते गए, एक छोटा सा आइडिया एक प्रोजेक्ट बन गया। उसके बाद नेशनल मार्केटिंग हेड आकाश चावला ने भी इसे अपनी स्वीकृति दी। हर दिन हमारी टीम से नये सदस्य जुड़ते गए। पूरी टीम में साफ तौर से उत्साह दिखता था। जिस तरीके का कंटेंट हम चाहते थे, उसके लिए दुबई से मुकुंद हमारी मदद कर रहा था। थोड़ी हिचकिचाहट थी, लेकिन उसका पूरा सपोर्ट हमें मिला। प्रोमो टीम ने प्रोमोज़ बनाने शुरू कर दिए। प्रोमो हेड सरिता ने कुछ बेहतरीन प्रोमोज़ तैयार किए।

इस प्रोजेक्ट ने एक चैनल का आकार लेना शुरू कर दिया था। एडिटर्स बिना थके काम कर रहे थे। हमारी प्रोग्रैमिंग हेड वनिता ज़ीटीवी से हमारे साथ काम करने आ गईं। सुमोना और प्रियंका के रूप में हमें हमारे मार्केटिंग और बिज़नेस हेड भी मिल गए। ज़ी लिमिटेड की पीआर हेड ऊषा थॉमस ने हमारे इस उत्साह को बहुत संयम से सहन किया।

अब यहां पंचशक्ति थी- पाँच स्त्रियों की शक्ति जो हमारे चैनल को हकीकत बनाने के लिए बिना थके, बिना रुके काम कर रही थीं। इन सबके बाद हमें एक नाम की ज़रूरत थी, जो बहुत ही महत्वपूर्ण था। और ऐसे मौके पर ज़ी लिमिटेडके चीफ कंटेंट और क्रिएटिव हेड भारत रंगा सामने आए। उन्होंने इस प्रोजेक्ट को इसकी अपनी पहचान दी, नाम दिया और ऐसे जन्म हुआ ‘ज़िदगी’चैनल का।

पूरी टीम जी-जान से लगी हुई थी डी-डे के लिए। हमारी लॉचिंग तारीख थी 23 जून।

बारिश में भीगी एक शाम ‘जिंदगी’ भी दे सकती है…है न मज़ेदार

लेखिका ज़ी नेटवर्क से जुड़ी है

साभार- samachar4media.com/

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