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मादाम कामाः ‘18 अगस्त भारत का सम्मान दिवस – मराठे

महू (इंदौर) । ‘18 अगस्त भारत का सम्मान दिवस है। आज ही के दिन वीरांगना मदाम कामा ने भारत का पहला ध्वज फहराया था । इस ध्वज का निर्माण वीर सांवरकर ने किया था।’ यह बात सुपरिचित लेखक श्री अभय वसंत मराठे ने मुख्य वक्ता के रूप में ‘अचिंहित संस्करण : वीरांगना मैडम भीखाजी कामा’ विषय पर वेबीनार में व्यक्त किया। यह वेबीनार डॉ. बी. आर. अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, महू एवं हेरिटेज सोयायटी, पटना के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। श्री मराठे ने आगे बताया कि आज से 114 वर्ष पूर्व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार ध्वज मदाम कामा ने फहराया।

जर्मनी में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में मदाम कामा ने कहा कि-‘मैं भारत का ध्वज फहरा कर ही कुछ बोलना चाहती हूं। आप सभी खड़े होकर ध्वज का सम्मान करें.’ मदाम कामा के ओजस्वी वाणी से प्रभावित सभी प्रतिनिधि ध्वज के सम्मान में खड़े हो गए। इसके बाद उन्होंने कहा कि ब्रिटिश शासन भारत के संसाधनों से ऐशो-आराम की जिंदगी गुजार रहा है और भारतवासी दाने दाने के लिए मोहताज है। मेरा प्रस्ताव है कि भारत सहित समस्त संसार में समता व समाजवाद के लिए हम प्रयास करें। मदाम कामा के प्रस्ताव का ब्रिटिश प्रतिनिधियों ने विरोध किया किन्तु एक प्रतिनिधि ने अपना समर्थन व्यक्त किया।

विश्व मंच पर फहराये गए ध्वज निर्माण के बारे में श्री मराठे ने बताया कि इसका निर्माण वीर सावरकर ने किया था। ध्वज का विवरण देते हुए उन्होंने कहा कि यह तिरंगा भारतीय ध्वज ही था जिसकी पहली पट्टी हरे रंग की थी जो भारत की हरितिमा का प्रतीक था। दूसरी पट्टी कमल के 8 पुष्प अंकित थे जो भारत के आठ प्रांतों का प्रतिनिधित्व करते थे। इसमें वीरता और त्याग के लिए प्रेरित करने वाला संदेश वंदेमातरम लिखा गया था। ध्वज के अंतिम पट्टी लाल रंग की थी जो भारत के अनुराग का प्रतीक था। इसमें एक तरफ सूर्य और दूसरी तरफ चंद्रमा बनाया गया था जो हिन्दू-मुस्लिम सद्भाव का प्रतीक था। आज 114 वर्ष पश्चात हम इसका उल्लेख करते हुए गर्व से भर जाते हैं ।

श्री मराठे ने मदाम कामा के जीवन परिचय देते हुए उल्लेख किया कि मुंबई में जन्मी मदाम कामा प्रतिभावान विद्यार्थी थीं। वे हमेशा से प्रथम स्थान प्राप्त किया। उन्हें बचपन से ऐतिहासिक व्यक्तित्व के बारे में जानने की इच्छा थी और इन्हें सुनकर उनके भीतर देशप्रेम की भावना जागी। वे सामाजिक और राजनीतिक कार्यों में हमेशा आगे रहीं। श्री मराठे ने बताया कि उनकी शादी प्रख्यात एडव्होकेट जेआर कामा के साथ हुई थी लेकिन दोनों के मध्य नहीं बनी। मिस्टर कामा अंग्रेजों के पक्ष में थे और मदाम कामा अपने देश के साथ। मुंबई में प्लेग फैलने पर वे लोगों की सेवा में जुट गईं और लोगों की सेवा करते करते स्वयं प्लेग की शिकार हो गईं। उनका जीवन बचाने के लिए उन्हें 1901 को यूरोप भेज दिया गया। 1905 में वे स्वस्थ्य हो जाने के बाद लंदन आ गईं। यहां वे क्रांतिकारियों से मिलीं और अपने लेखन के माध्यम से लोगों को जागृत करने और जोडऩे के काम में लग गईं।

मदाम कामा से अंग्रेज सरकार नाराज हो गई देश छोडऩा पड़ा लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उनका सम्पर्क वीर सावरकर, लाला हरदयाल और अन्य लोगों से था । श्री मराठे ने मदाम कामा और स्वाधीनता संग्राम से जुड़े अनेक अनछुये प्रसंग से अवगत कराया। उन्होंने आज के इस महत्वपूर्ण दिन के लिए आयोजन पर ब्राउस कुलपति प्रो. आशा शुक्ला को अपनी शुभकामना दी।

कार्यक्रम की अध्यक्ष एवं कुलपति प्रो. आशा शुक्ला ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की प्रेरणा एवं राज्यपाल श्री पटेल के मार्गदर्शन में आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर वेबीनार का आयोजन करने में सफल हो रहे हैं। विशेष वक्ता श्री मराठे का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि इस श्रृंखला में अमृत महोत्सव के अवसर पर स्वाधीनता संग्राम के इतिहास का स्मरण किया जा रहा है। वेबीनार का संचालन योगिक साइंस विभाग के डॉ. अजय दुबे ने किया। कार्यक्रम के सह-संयोजक हेरीटेज सोसाईटी के महानिदेशक डॉ. अनंताशुतोष द्विवेदी ने इस विशेष वक्तव्य के लिए श्री मराठे का दोनों संस्थानों की ओर आभार व्यक्त किया। वेबीनार के सफल संचालन के लिए डीन डॉ. डी. के. वर्मा एवं रजिस्ट्रार डॉ. अजय वर्मा के साथ विश्वविद्यालय परिवार का सहयोग रहा।

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