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मोदी ट्रैन के बेटिकट यात्रीः जेठमलानी, बाबा रामदेव, अरुण शौरी…और कौन…?

राम जेठमलानी ने बात ऐसे कही मानो नरेंद्र मोदी ने उनसे रिश्ता बनाया था। वे रिश्ता बनाने के लिए उनके घर गए थे। मतलब सवाल है कि रिश्ता कहा था जिसे तोड़ने की उन्होंने घोषणा की हैं! भला नरेंद्र मोदी का इस देश में क्या किसी से रिश्ता है जो कोई दांवा करें कि वह रिश्ता तोड़ रहा है! लोग उनकी कृपा पा सकते है। उनसे बन सकते है पर रिश्तेदार बन कर उनसे रिश्तेदारी निभाने की उम्मीद करें और निराश हो कर रिश्ता तोड़ने की घोषणा करें तो यह गलतफहमी में जीना है।

सचमुच राम जेठमलानी ने नरेंद्र मोदी से रिश्ता तोड़ने की जो बात कही है वह उनकी खामोख्याली का रिश्ता था। इसलिए आश्चर्य नहीं हुआ जो राम जेठमलानी के टिवट के जवाब में नरेंद्र मोदी ने टिवट करने या भाजपा के किसी ने प्रतिक्रिया नहीं दी। यह बात कई कारणों से पते की हैं। इसलिए कि आने वाले महीनों, सालों में नरेंद्र मोदी से ऐसे रिश्ते तोड़ने वाले कई होंगे। मन ही मन मोहभंग पक रहा हैं। पकता रहे। इस सब पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दृष्टि दो टूक है। इस दृष्टि की जानकारी पिछले दिनों पंजाब केसरी से त्रिदिव रमण के जरिए मालूम हुई। त्रिदिव ने अपने कॉलम में एक साल की वर्षगांठ पर पत्रकारों से अनौपचारिक मुलाकात की एक चर्चा बताई। मुलाकात के दौरान दैनिक पत्र के एक संपादक ने नरेंद्र मोदी से पूछा कि ऐसी क्या बात हो गई कि सुब्रहमण्यम स्वामी, बाबा रामदेव, मधु किश्वर, राम जेठमलानी जैसे लोग, जो आपके चुनावी अभियान के दिनों से या उससे पहले से आपके साथ जुड़े हुए थे आपके सरकार में आने के बाद आपकी आलोचना कर रहे हैं!

नरेंद्र मोदी ने हंस कर जवाब दिया- ये लोग मेरा नाम लेकर ही प्रासंगिक हुए। मेरे पक्ष में जब ये बोल रहे थे तो खुद को रीलिवेंट रखने के लिए, उस वक्त की हवा के अनुसार ये थे। मतलब इन लोगों ने मोदी के नाम का उपयोग किया। नरेंद्र मोदी का झंडा उठा कर बहती गंगा में हाथ धोया।नरेंद्र मोदी की इस सोच के आधार पर अपनी थीसिस है कि राम जेठमलानी खामोख्याली में नरेंद्र मोदी से अपना रिश्ता मानते रहे। उसका मुगालते पालते-पालते जब महत्व नहीं मिला तो यह टिवट कर डाला कि नरेंद्र मोदी से उनका ब्रेक अप हो गया है। पर इस टिवट के साथ राम जेठमलानी यह भी बता देते कि रिश्ता बना कब था जो तोड़ रहे हैं? नरेंद्र मोदी मानते हैं और एक हद तक सही भी है कि वे जननायक है। जननायक के नाते उनके ब्रांड की ट्रेन मई 2014 से पहले प्लेटफार्म पर लगी हुई थी। उस पर कई लोग खुद मौकापरस्ती में ट्रेन पर चढ़ गए। राम जेठमलानी, अरूण शौरी, डा स्वामी, मधुकिश्वर जैसे अनगिनत पैसेंजर बिना टिकट लिए चढ़ बैठे थे। ये कोई मोदी के बुलाए शाही मेहमान नहीं थे।

ये हमसफर नहीं बल्कि जबरदस्ती में हमराही बने। जैसा मोदी ने संपादक को समझाया। उसका भावार्थ है कि ये मोदी नामी पहन प्रासंगिक हुए। इन्होंने अपनी दुकान लगाई। ये उस वक्त मोदी के पक्ष में बोल रहे थे तो अपने को प्रासंगिक बनाने के लिए ऐसा कर रहे थे। अपना एकतरफा रिश्ता बनाए हुए थे। अब ये तोड़ रहे हैं तो यह इनकी कुंठा है। जब उन्होंने रिश्ता बनाया नहीं था तो निभाने की बात कैसे उठती हैं? दरअसल भारत में जमीन से उठा हर जननायक ऐसे ही सोचता हैं। जनता ने पालकी उठा कर जब नरेंद्र मोदी की सवारी निकाली तो मोदी क्योंकर यह सोचे कि फंला ने जुलूस में तुताडी बजाई थी या फंला ने रास्ता साफ करवाया था। पालकी में विराजमान राजा जनता के जयकारे में मगन होता है। जयकारा नरेंद्र मोदी का था, हैं और उन्हीं का रहेगा। जेठमलानी या किसी भी एक्स,वाई, जेड का इसमें जीरो मतलब हैं। हां, जमीन से उठे और खास कर वे जो नियति की आकस्मिक कृपा से जननायक बने नेता होते है वे रिश्ता नहीं बनाते। इस थीसिस का एक गौरतलब चेहरा लालू प्रसाद यादव का याद आता है। अपने वक्त के जयकारे में उन्होंने एक वक्त भारत के प्रधानमंत्री बने आईके गुजराल को खड़ा रख कर जो हैसियत याद कराई थी वह भी तब इस सोच की बदौलत थी कि मेरे से तुम हो, मैं तुमसे नहीं!

जब जनता लालू की थी तो गुजराल रिश्ता रखे या तोड़े इसका मतलब नहीं था। गुजराल ने लालू से रिश्ता बना उनकी ट्रेन पर लटक कर जब सब पाया तो लालू ने कथित बडे नेता को जब औकात दिखलाई तो वह एक जनप्रिय नेता का सहज व्यवहार था। लालू, देवीलाल ये सब जयकारे में सनातनी सत्ता बन जाने के गुमान में थे और ये अपना झंडा उठाने वाले बुद्दीजीवियों को काला कौआ व मौकापरस्त बूझते थे। इसलिए राम जेठमलानी के रिश्ता तोड़ने की बात बेमतलब है। नरेंद्र मोदी किसी की बदौलत नहीं है उनकी बदौलत बाकि सब है। यही मोदी राज की आज बुनावट है, प्रकृति है। चाहे कोई भले इसे अंहकार कहे। उनकी पालकी को ढ़ोहने वाले आते-जाते रहेगें। अच्छे-अच्छे सूरमा धकिया बाहर होगें। कौन आ रहा है, कौन जा रहा हैं, न इसका उन्हें हिसाब रखना है और न उन पर कोई फर्क पड़ना है। दिलजले चाहे जो सोचे, चाहे जो अर्थ निकाले, नरेंद्र मोदी अपने से दुनिया निकली हुई, बनती हुई देख रहे हैं तो राम जेठमलानी एंड पार्टी का मोल भला कैसे बनेगा?

साभार- http://www.nayaindia.com/ से 

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