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5 हजार रुपये में विवाह देखकर दंग रह गए मुंबई वाले

क्या आज के जमाने में आप कल्पना कर सकते हैं कि किसी का विवाह मात्र 5 हजार रुपये में हो जाए और एक साथ 150 जोड़ों का विवाह आधे दिन में ही पूरा हो जाए। आधुनिकता की चकाचौंध में रहने वाले हम जैसे लोगों के लिए ये एक रुमानी कल्पना हो सकती है, मगर मुंबई से मात्र 100 किलोमीटर दूर ये चमत्कार हर बार होता है। बस होता ये है कि इस विवाह समारोह के साक्षी हर बार अलग-अलग लोग होते हैं, और जो भी इस विवाह समारोह में शामिल होता है वो अपने आपको धन्यभागी समझता है। उसकी संवेदना का सागर हिलोरें मारने लगता है और अगर इस आयोजन पर उसकी प्रतिक्रिया ली जाए तो वो निःशब्द हो जाता है। इस आयोजन के जनक हैं जव्हार, पालघर और विक्रमगढ़ के वनवासी क्षेत्र में विगत 27 वर्षों से सामाजिक सेवा में लगे निष्काम कर्मयोगी श्री संजय पटेल। एक संपन्न परिवार से संबंध रखने वाले संजय पटेल इस क्षेत्र के वनवासियों के लिए किसी देवदूत से कम नहीं। भरा पूरा कारोबार छोड़कर संजय पटेल इस क्षेत्र के वनवासियों की सेवा में ऐसे रमे हैं कि वनवासी उन्हें अपना बापू मानते हैं।

श्री संजय पटेल हर वर्ष में दो या तीन बार इन वनवासियों के लिए मुंबई से दानदाताओं को ले जाकर उनकी सहायता से सामूहिक विवाह समारोह का आयोजन करते हैं। इस विवाह का आयोजन इसलिए भी किया जाता है कि कोई भी वनवासी अगर विवाह कर भी ले तो गाँव में उसके विवाह को तब तक मान्यता नहीं मिलती जब तक वो पूरे गाँव को खाना ना खिला दे। खाना कोई शाही खाना नहीं बल्कि दाल चावल। लेकिन इन वनवासियों की हालत तो ये होती है कि सुबह खाना खा लें तो शाम के खाने की कोई गारंटी नहीं। इस क्षेत्र में सक्रिय इसाई मिशनरियां इन वनवासियों की इस मजबूरी का फायदा उठाती है और गले में क्रॉस डालकर इनको प्रभु यीशु के नाम से इसाई बना देती है। संजय पटेल विगत कई वर्षों से मिशनरियों के इस खेल के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं।

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इस सामूहिक विवाह का आयोजन रोटरी क्लब से सहयोग से किया गया था। इस आयोजन में शामिल हुए रोटरी क्लब के श्री अशोक चौधरी ने बताया कि श्री विकास जी गोयल भारत विकास परिषद् से जुड़े हैं उन्होंने मुझे इस आयोजन में शामिल होने व इसके लिए सहयोग देने का निवेदन किया और मैं इस आयोजन से जुड़ गया। इस विवाह समारोह में शामिल होने के बाद तो मेरा सोच ही बदल गया, मैं ये प्रत्यक्ष देखकर हैरान रह गया कि इतनी सादगी से भी इतने सारे जोडों का विवाह हो सकता है। ये मेरे जीवन का एक अद्भुत, अलौकिक और अध्यात्मिक अनुभव बन गया। हम बड़ी-बड़ी शादियों में जाते हैं जहाँ करेड़ों रुपये खर्च होते हैं, लेकिन हम वहाँ से कोई यादगार लेकर नहीं लौटते। इस विवाह समारोह में शामिल होने के बाद तो ऐसा लगा जैसे ये आयोजन हमेशा के लिए हमारी स्मृतियों में रच-बस गया है। इस आयोजन में जाकर हमें इस बात का एहसास हुआ कि ये मात्र विवाह समारोह नहीं बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और रीति-रिवाजों को बचाने का यज्ञ है। इस विवाह समारोह के माध्यम से एक वनवासी का परिवार ही नहीं बच रहा है बल्कि आने वाली पीढ़ी को हम अपनी धरोहर सौंप रहे हैं।

उन्होंने कहा कि वहाँ पहुँचते ही जिस अहोभाव से वनवासी भाईयों और बहनों ने हमारा स्वागत किया तो ऐसा लगा मानों हम किसी दूसरे युग में पहुँच गए हैं। खुले आसमान में भरी दोपहरी में 150 वनवासी जोड़ों के विवाह समारोह में हम शामिल थे, ये एक ऐसा रोमांचक अनुभव था जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। इन लोगों के पास न रहने की कोई व्यवस्था है न खाने की, न घर है न साधन मगर इनके चेहरे पर जो खुशी और संतोष देखा वो हम शहर के साधन संपन्न लोगों में भी नहीं देख सकते।

इस समारोह में शामिल हुए रोटरी क्लब के संजीव सर्राफ का कहना था कि ये मेरे जीवन का एक ऐसा अनुभव था जिसे बस महसूस किया जा सकता है, कहा नहीं जा सकता। उन्होंने बताया कि रोटरी क्लब के हमारे सहयोगी विकास गोयल ने इस आयोजन के बारे में बताया था और हम इस आयोजन में शामिल हुए। इस आयोजन से जुड़े संजय पटेल एक विलक्षण व्यक्ति हैं, वो जिस निष्ठा और समर्पण से इस कार्यक्रम को संपन्न करवाते हैं वो अपने आप में मैनेजमेंट का अनुपम उदाहरण है। रोटरी क्लब ने भी इस आयोजन में भागीदारी कर अपने आपको गौरवान्वित किया। इस समारोह में शामिल होने के लिए मुंबई से हमारे जो मित्र गए थे वे भी ये सब देखकर हैरान थे।

मुंबई के मातृभूमि सेवा फाउंडेशन की श्रीमती रमा सान्याल का तो कहना था कि इस आयोजन में शामिल होना किसी तीर्थ यात्रा का पुण्य प्राप्त कर लेने जैसा है। मैने जीवन में कई धार्मिक आयोजनों में भाग लिया, कितनी ही बार कई तरह के संतों और साधुओँ से मिलना हुआ है, लेकिन संजय पटेल जिस प्रतिबध्दता, कुशलता और संपूर्णता से इस आयोजन के माध्यम से गरीब वनवासी परिवारों का घर बसाते हैं उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। एक बार तो एक संन्यासी ने मुझे गुरू मंत्र भी दे दिया, लेकिन मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि मैं किसी को गुरू मान लूँ। लेकिन संजय जी को देखते ही ऐसा लगता है मानों किसी सिध्द योगी का सान्निध्य मिल गया हो। मैने जीवन में ऐसा व्यक्ति नहीं देखा जो आठ साल की उम्र से सेवा कार्यों से जुड़ा हो और अपना भरापूरा कारोबार छोड़कर एक निष्काम योगी की तरह जंगलों में जाकर वनवासी परिवारों की सुध लेता हो। उनके किसी काम से जुड़ना ऐसा है जैसे गौदान कर दिया हो। गाँव के वनवासियों की छोटी से छोटी समस्या से लेकर उनके हर रीति-रिवाजों के बारे में संजय जी की जानकारी गज़ब की है। इस सामूहिक विवाह के आयोजन में उनके प्रबंध कौशल और वनवासियों के साथ उनके सहज-सरल रिश्ते को देखकर हम तो दंग रह गए। सबसे बड़ी बात गाँव गाँव में फैले उनके समर्पित कार्यकर्ता जो बगैर किसी लालच के इतनी निष्ठा और संकल्प से काम करते हैं कि हम पैसे देकर भी ऐसा काम किसी से नहीं करवा सकते।

इस विवाह समारोह में शामिल हुई धानु की नगर पंचायत की अध्यक्ष सुश्री हेमलता सातवी का कहना है, ये मेरे ही समाज के वनवासी लोग हैं, और इनका घर बसाने का जो काम संजय जी पटेल ने किया है वो मैं कभी नहीं भूल सकती। इन लोगों के पास अपने दो समय की रोटी का इंतजाम करन् मुश्किल होता है, लेकिन संजय जी और उनकी टीम के लोग हर साल तीन चार बार ऐसे गरीब युवक-युवतियों को इकठ्ठा कर उनके सामूहिक विवाह का आयोजन करते हैं।

संजय पटेल इस विवाह समारोह का अर्थशास्त्र बताते हुए कहते हैं, हमने एक जोड़े के विवाह पर 5 हजार रुपये खर्च किए। मैं विगत 27 सालों से इस तरह के सामूहिक विवाह कार्यक्रम का आयोजन करवा रहा हूँ। 27 साल पहले मात्र 800 रुपये में एक जोड़े का विवाह हो जाता था। पिछले वर्ष ये विवाह साढ़े 4 हजार प्रति जोड़ के हिसाब से हो जाता था।

संजय जी बताते हैं, इस विवाह समारोह में शामिल होने वाली वधू को साड़ी, ब्लाउज़, शाल, चप्पाल, नथ, कान की बाली, हरी चूड़ियाँ, पायजेब, अंगूठी, कंघी, आईना, काजल सिंदूर आदि शगुन की चीजें विवाह के पहले दे दी जाती है, ताकि वो विवाह के दिन शृंगार करके आ सके। वर को कुरता, पायजामा, टोपी, कलगी, उपर्णा (दुपट्टा) जैसी शगुन की चीजें दे दी जाती है। विवाह के दिन वर-वधू दोनों को स्टील का हंडा, दो थाली, तलसी, दो कटोरी, तीन डिब्बों वाला टिफिन चादर, टॉवेल आदि सामान दिया जाता है। वधू की सास के लिए लुगड़ा भी दिया जाता है। इन सभी को इस मौके पर नकद 500 रुपये भी दिए जाते हैं। ये 500 रुपये इन जोड़ों से उनके रजिस्ट्रेशन के समय इसलिए लिए जाते हैं ताकि ये सभी जोड़े निश्चित तिथि पर समय पर विवाह समारोह में उपस्थित हो सकें।

श्री संजय पटेल के समर्पित कार्यकर्ता इन आदिवासी क्षेत्रों में गाँव गाँव में फैले हुए हैं और बगैर कुछ लिए ये इस पुनीत कार्य में अपना सहयोग देते हैं।

ये सामूहिक विवाह समारोह लगभग 1450 की आबादी वाले धनिवरी के जंबीपाड़ा गाँव में संपन्न हुआ था। 47 जोड़े इसी गाँव के ही थे। 103 जोड़े दूसरे गाँव के थे। इस मौके पर आसपास के गाँव के लोगों को मिलाकर 5 हजार लोगों ने खाना खाया।

कोरोना काल में इस समारोह के आयोजन में पालघर के युवा सक्रिय और जमीन से जुड़े विधायक श्रीनिवास वंगा की महत्वपूर्ण भूमिका थी। समारोह में शामिल अशोक चौधरी, विकास गोयल और धानु की नगर पंचायत की सभापति सुश्री हेमलता सातवी श्रीनिवास वंगा का समर्पण, सहजता-सरलता और विनम्रता देखकर दंग रह गए। जिस आत्मीयता और अनौपचारिकता के साथ वे सभी जोड़ों से मिलने से लेकर सभी अतिथियों के साथ घुल-मिल रहे थे वो इन सबके लिए एक चौंकाने वाला सुखद अनुभव था। श्रीनिवास जी ने मंत्र और श्लोकों का पाठ कर तो सबको चौंका ही दिया।

इस सामूहिक विवाह के आयोजन की तैयारियों का प्रबंधन भी अपने आप में बेजोड़ है। जिन जोड़ों को सामूहिक विवाह में आना होता है, उनको तीन महीने पहले ही इसकी सूचना दे दी जाती है ताकि वे अपने रिश्तेदारों को इसकी सूचना दे दे। क्योंकि उनके जो रिश्तेदार दूसरे गाँवों में मजदूरी के लिए चले जाते हैं वे समय पर वापस आ सके।

संजय जी बताते हैं पहले किसी वनवासी जोड़े का विवाह होने पर सरकार की ओर से मंगलसूत्र और बर्तन दिए जाते थे। लेकिन सरकारी अधिकारी भ्रष्टाचार की वजह से सोने की जगह पीतल का मंगलसूत्र दे देते थे। इसके बाद हमने ये कोशिश की कि वनवासियों को सरकार ये चीजें देने की बजाय नकद पैसे दे। हमारे प्रयासों से अब सरकार की ओर से हर जोड़े के खाते में दस हजार रुपये नकद जमा कर दिए जाते हैं। इसके पहले तो सरकारी बाबू फर्जी खाता खोलकर इनका पैसा हड़प जाते थे। अब हमने ऐसी प्रक्रिया अपनाई है कि सामूहिक विवाह में शामिल होने वाले हर जोड़े के सभी आवश्यक दस्तावेज तैयार करते हैं। इस काम में हमारे 100 से 150 कार्यकर्ताओं को तीन महीने का समय लगता है। लेकिन हमारे कार्यकर्ताओं के भी इस काम में लगभग 500 रुपये खर्च हो जाते हैं। लेकिन ये 500 रुपये खर्च करके हम हर जोड़े के खाते में दस हजार रुपये जमा करवाने में सफल हो जाते हैं और सरकारी बाबू किसी तरह की धोखाधड़ी नहीं कर सकते। विवाह संपन्न होते ही सभी जोड़ों को विवाह प्रमाण पत्र सौंप दिया जाता है।

विवाह के एक दिन पहले वर वधू के घर जश्न का माहौल रहता है और उनको हल्दी भी लगाई जाती है।

संजय जी बताते हैं, अब विवाह में खर्च ज्यादा इसलिए होने लगा है कि टेंट वालों ने अपनी एसोसिएशन बना ली है और हमको टेंट के भी ज्यादा पैसे चुकाने पड़ते हैं। अनाज, दाल, तेल सब महंगा हो गया है। लेकिन हम जिनसे सामान खरीदते हैं उनको पता होता है कि ये सामान परोपकार के कार्य के लिए लिया जा रहा है इसलिए कई बार दुकानदार भाव भी कम कर देते हैं और अपनी ओर से भी कुछ सामान दान दे देते हैं।

संजय जी बताते हैं कि वनवासी समाज में एक अजीब रिवाज है कि किसी भी जोड़े के विवाह को गाँव और उनका समाज तब तक मान्यता नहीं देता है जब तक विवाहित जोड़ा गाँव के लोगों को भोज ना दे दे।

संजय जी विगत 27 सालों से ये आयोजन कर हजारों वनवासी परिवारों का घर बसा चुके हैं। उनके एक इशारे पर लोग लाखों रुपये देने को तैयार हो जाते हैं। वे बताते हैं, इस विवाह समारोह में दान देने वाले लोगों के साथ उनके मित्र भी आते हैं और जब वे ये सब अपनी आँखों से देखते हैं तो फिर मेरे पास नकद राशि लेकर आते हैं कि आप इसे रख लीजिए हम कुछ करना चाहते हैं। लेकिन संजय जी पूरी विनम्रता से ये राशि लेने से इंकार कर देते हैं, क्योंकि हम सभी जोड़ों तको एक जैसी चीजें और राशि देते हैं। समारोह में आए लोग अपनी ओर से इन जोड़ों को नकद राशि भी देते हैं।

संजय जी गुजरात के वनवासी क्षेत्रों के जोड़ों के लिए भी सामूहिक विवाह आयोजित करवाते हैं। गुजरात के इन वनवासियों के लिए गुजरात के एनआरआई सहायता देते हैं और वे चाहते हैं कि वधू को सोने का मंगलसूत्र दिया जाता है। इन जोड़ों को 25 हजार का सामान दिया जाता है। जिसमें डबलबेड का पलंग, अलमारी जैसे सामान भी शामिल होते हैं।

इस समारोह में नई मुंबई की श्रीमती निहारिका, मंजूषा जी और देश के जाने माने वैज्ञानिक मुरलीधर राव भी शामिल हुए।

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