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‘सॉफ्टवेयर’ इंजीनियर से ‘सेल्फ अवेयर’ साधिका का नया सफर

दीक्षार्थी कु.प्रगति कोटड़िया के संकल्प पर�डॉ.चन्द्रकुमार जैन की आत्मीय चर्चा�

राजनांदगांव। संस्कारधानी के संस्कार,सुलझे हुए विचार और आत्मकल्याण को व्यवहार में उतारने का अडिग संकल्प लेकर मुमुक्षु कु.प्रगति कोटडिया दो मार्च को श्री कैवल्यधाम तीर्थ,कुम्हारी में श्री जैन भागवती दीक्षा ग्रहण करेंगी। कम्प्यूटर साइंस में बी.ई.की उपाधि प्राप्त प्रगति का चिंतन अब जीवन और जगत के वास्तविक स्वरूप और आत्मा की धुन के स्थायी आनंद की खोज की तरफ रुख कर रहा है। वह 'सॉफ्टवेयर' इंजीनियर से आगे बढ़कर अब पल-पल 'सेल्फ अवेयर' रहकर जीने और स्वयं की पहचान करने की कठिन व चुनौतीपूर्ण डगर पर चलने के लिए तैयार है। प्रगति शहर के प्रतिष्ठित कोटडिया परिवार के श्री प्रभात कोटडिया व श्रीमती ममता कोटडिया की सुपुत्री हैं।

मात्र 25 वर्ष की युवावस्था में जीवन के इस अहम मोड़ पर महाभिनिष्क्रमण दीक्षा अंगीकार करने के लिए प्रस्तुत दीक्षार्थी कु.प्रगति के संकल्प पर प्रोफ़ेसर डॉ.चन्द्रकुमार जैन ने ख़ास चर्चा व मंथन किया। उसके अनुसार कु.प्रगति का स्पष्ट मंतव्य है कि साधना का मार्ग कठिन है, लेकिन सहज और सरल मार्ग पर तो सभी चलते हैं। मनुष्य जीवन की जिम्मेदारी उससे बड़ी है। मिट्टी से घड़ा बनने की यात्रा में मिट्टी के जीवन में न जाने कितनी वेदना के कितने पड़ाव आते हैं, जिन्हें शांत भाव से सहकर मिट्टी अंततः विशेष पात्रता अर्जित करती है। वह जल धारण करने के योग्य बन जाती है। जीवन नदी में बहने वाली मिटटी की तरह नहीं, दर्द सहकर एक घट में बदलकर किसी की बुझाने वाली मिट्टी बन जाए तो कोई बात बने।�

गौरतलब है कि कु.प्रगति ने यह पूछने पर कि सूर्य का ताप जब धरती को आग उगलने के लिए विवश कर देगा, दूसरे मौसम भी जब अपना विकराल रूप दिखाएंगे तब तुम अपने कोमल पांवों से चलकर और सब कुछ सहकर कैसे रह पाओगी, उत्तर मिला कि जिस प्रकार कुम्भकार के हाथों पूरी श्रद्धा के साथ खुद को सौंपकर और सारे कष्ट सहकर मिट्टी घड़े में परिवर्तित हो जाती है, उसी तरह मेरा अडिग विशवास है कि ' मैं भी अपने पूज्य गुरु भगवंतों के आशीष और पूजनीय गुरूवर्या के चरणों में स्वयं को पूर्णतःसमर्पित कर, अनुकूल-प्रतिकूल हर मौसम और हर माहौल में रहकर,सब कुछ सहकर अपनी साधना पूर्ण करने में अवश्य सफल होउंगी।' �स्मरणीय है कि परम विदुषी साध्वी, मरुधर ज्योति श्री मणिप्रभा श्रीजी म.सा.चरणों में कु.प्रगति अपना सर्वस्व समर्पित करने जा रहीं हैं।�

मुमुक्षु प्रगति ने इस सवाल पर कि आज विज्ञान के असीम विस्तार और सुख-साधनों की आश्चर्यकारी बढ़ोतरी के बावजूद सुख-वैभव के सपनो से दूर संन्यास और पांच महाव्रत की दुरूह राह अपनाने का सबब क्या है, प्रगति ने सहज भाव से उत्तर दिया कि वास्तविक और अनंत सुख तो हमारी आत्मा में बसा है। बाहर के सुख साधन तो दिखते हैं,लेकिन आत्मा के अनंत वैभव को खोजना पड़ता है। बाहरी सुख धन से मिल सकता है, किन्तु आत्मा का सुख तो केवल धुन से पाया जा सकता है। प्रगति ने कहा – 'मैं अब आत्मा की उसी खोज की राह पर अपनी धुन में चल पड़ी हूँ। अपना दीप खुद बनने और जीवन में ही जीवन में मर्म को पाने की यात्रा मुझे सहर्ष स्वीकार है। मैं जानती हूँ मार्ग आसान नहीं है, बाधाएं आयेंगीं, संयम को कसौटी पर भी रखना पडेगा, फिर भी मेरा मन कहता है कि प्रभु की कृपा और गुरूवर्या के आशीष से मैं अपने मन को हर हाल में नियंत्रित कर लूंगी। मुझे विश्वास है कि मेरी साधना को सबका आशीष मिलता रहेगा।'�

उल्लेखनीय है कि दीक्षा का मूल अर्थ सत्य की खोज है। लेकिन यह खोज जब बाहर से भीतर की तरफ प्रवेश करती है तब सम्पूर्ण जीवन रूपांतरण का नया अध्याय शुरू होता है। दीक्षार्थी अपने विशुद्ध चैतन्य की खोज में निकला हुआ एक अन्तर्यात्री होता है। इसी अंतरयात्रा पर निकलीं कु.प्रगति दृढ़ता पूर्वक कहतीं हैं कि परम सत्य को पाने के लिए साधु जीवन एक महान अवसर है। उनमें उत्सुकता व जिज्ञासा के साथ-साथ पूरी लगन से उस सत्य को पाने की अडिग निष्ठा स्पष्ट दिखती है। प्रगति को मंगल कामनाएं।

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