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मध्यप्रदेश के लिए 29 नवम्बर, 2005 महज तारीख नहीं एक इतिहास है

29 नवम्बर, साल 2005 को जब शिवराजसिंह चौहान मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तब किसी को इस बात का इल्म भी नहीं था कि मध्यप्रदेश एक इतिहास रचने जा रहा है। जिस मध्यप्रदेश ने एक दिन से दस वर्ष के कार्यकाल का मुख्यमंत्री देखा हो, उस प्रदेश को लगातार तीन बार और एक छोटे अंतराल के बाद फिर चौथी बार मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह चौहान नसीब हुआ हो। चार बार मुख्यमंत्री बन जाने का राजनीतिक इतिहास तो शिवराजसिंह चौहान ने लिख दिया है और लगता नहीं कि कोई अन्य इस रिकार्ड को ध्वस्त कर पाएगा।

हालांकि राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है लेकिन कोई चमत्कार ही शिवराजसिंह चौहान का रिकार्ड ध्वस्त कर नया रिकार्ड बनाये। अपने इस चौथे कार्यकाल के पहले के तीन कार्यकाल में शिवराजसिंह चौहान ने मुख्यमंत्री के रूप में अलहदा छवि बनायी है। उन्होंने इस बात को स्थापित कर दिया कि वे पांव-पांव वाले भइया थे तो आज भी जड़ से जुड़े राजनेता हैं। जमीन पर पैर रखकर चलते हैं और अवाम के दिल में राज करते हैं। उनके पास मुख्यमंत्री का ताज है लेकिन उनके पास गुरूर की जगह विनम्रता है। बच्चों के मामा हैं तो बहनों के भाई और बुर्जुर्गों के लिए शिवराजसिंह चौहान उस श्रवण कुमार की तरह हैं जो उनकी चिंता करते हैं। यह शायद पहली-पहली बार हो रहा होगा कि जब मध्यप्रदेश की योजनाओं का अनुसरण देश के अन्य राज्य कर रहे हैं। ये योजनाएं सरकार को लोकप्रिय तो बनाती हैं लेकिन उससे कहीं ज्यादा लोगों को लाभ दिलाती हैं। एक दर्जन से अधिक योजनाओं की समीक्षा करेंगे कि कैसे इन योजनाओं से आम आदमी की जिंदगी में बदलाव आया है।

शिवराजसिंह चौहान हमेशा से जोर-जुल्म के खिलाफ खड़े रहे हैं। मसला, उनके अपने परिवार का ही क्यों ना हो। अपने घर में मजदूरों को वाजिब मजदूरी दिलाने के लिए अपने ही परिवार के खिलाफ खड़े होकर उन्होंने इस बात का संदेश दे दिया था कि जब भी मौका मिलेगा, वे गरीब और मजलूम के साथ खड़े होंगे। मुख्यमंत्री बन जाने के बाद उनका यह रूख एक बार नहीं, बार-बार लोगों ने देखा है। सरल इतने कि एक बार विदिशा में चल रहे निर्माण कार्य देखने पहुंच गए। वहां काम कर रहे मजदूरों से उन्होंने पूछा कि उन्हें पहचानते हो तो उनके इंकार करने पर गुस्सा करने के बजाय हंसते हुए लौट गए यहां शिवराजसिंह को कोई नहीं पहचानता। ऐसे कई किस्से आपको सुनने मिल जाएंगे जिसमें उनकी सरलता, सदाशयता और मिलनसारिता दिखती है। वे सरल हैं लेकिन सजग भी। कोई उनकी निकटता दिखाकर स्वार्थसिद्ध कर ले, यह संभव नहीं क्योंकि तब शिवराजसिंह सरल नहीं कठोर होते हैं।

मां नर्मदा से उनका स्नेह जगजाहिर है। बचपन से लेकर जवानी तक मां नर्मदा के आंचल में खेलने और इठलाने का आनंद लेते रहे हैं। आज भी वे कभी-कभी मां नर्मदा की गोद में खेलने के लिए मचल जाते हैं। विशाल नर्मदा यात्रा इस बात की गवाह है। वाकपटुता में भी उनका कोई सानी नहीं है। टेलीविजन चैनल के एंकर उनसे मुखातिब होने से पहले कई तरह की तैयारी करके आते हैं क्योंकि जाने शिवराजसिंह उनसे ही क्या सवाल पूछ बैठें। संस्कृत के श्लोक सुनाते हुए वे उसमें डूब जाते हैं। वे अपने किस्म के जादूगर भी हैं। उन्हें पता है कि ये पब्लिक है, सब जानती है और उन्हें यह भी पता है कि ये पब्लिक उन्हें क्यों चाहती है। इसलिये वे चोला नहीं ओढ़ते हैं और कई बार तो वे जानबूझकर ऐसी बातें बोल जाते हैं जिस पर उनके विरोधी बहस करते रहते हैं। ऐसा करके विरोधी उन्हें और ऊंचाई देते हैं।

जड़ से जुड़ाव रखने वाले शिवराजसिंह चौहान मुख्यमंत्री के रूप में एक ऐसे मुख्यमंत्री की छवि का निर्माण किया है, जो जनता का नेता कहलाते हैं। एक ऐसे राजनेता की परिभाषा गढ़ी है जो विरोधियों को भी अपना बना लेते हैं। वे आडम्बरहीन हैं लेकिन जो दिखाते हैं, उससे लोगों को लुभा लेते हैं। लोक में रचे शिवराजसिंह चौहान कभी मंजीरा बजाते तो कभी ढोलक पर थाम देते दिख जाएंगे। अपने लोगों के साथ मगन होकर नृत्य करने लगते हैं तो सडक़ किनारे लगी गुमटी पर खड़े होकर चाय की चुस्की का स्वाद लेते हैं। शिवराजसिंह की यह अदा विरोधियों को अखर जाती है और लोग ताने मारने लगते हैं लेकिन एक आदमी उनकी इसी अदा पर फिदा रहता है। एक समय था जब मुख्यमंत्री को देख पाना दुर्लभ हुआ करता था और आज एक वक्त है जब मुख्यमंत्री से चाहे जब मिल लो, कोई बंदिश नहीं। पहली बार मुख्यमंत्री निवास के दरवाजे तब खुले जब शिवराजसिंह चौहान ने मुख्यमंत्री पंचायत का अभिनव आयोजन आरंभ किया। हर वर्ग के लिए अलग-अलग पंचायत में आने वाले लोगों के लिए सीएम हाऊस के दरवाजे खुल गए थे। जनपदीय लोगों के लिए शायद यह रूटीन हो सकता है लेकिन आदिवासी और ग्रामीण अंचलों से आने वाले लोगों के लिए एक सुखद स्मरणीय यात्रा हुआ करती थी। सीएम हाऊस शिवराजसिंह के आने के बाद अभिजात्य नहीं रह गया बल्कि आम आदमी का दखल शुरू हुआ। सवधर्म-समभाव की भावना के साथ हर धर्म का आयोजन सीएम हाऊस में होने लगा।

इन्हीं आयोजनों के बीच कहीं शिवराजसिंह दम्पत्ति के मन में तीर्थ दर्शन योजना का बीज अंकुरित हुआ। उनके मन में सहज रूप से आया कि साधनसम्पन्न लोग तो अपनी हैसियत से उम्र के आखिर पड़ाव में तीर्थदर्शन का लाभ प्राप्त कर लेते हैं लेकिन उन लोगों का क्या जिनके पास संसाधन नहीं। ऐसे में मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना का श्रीगणेश हुआ और प्रदेशभर के बुर्जुगों को तीर्थदर्शन का लाभ दिलाया गया। कहना ना होगा कि यह योजना अन्य राज्यों को भी बेहतर लगी और उन्होंने भी अक्षरश: अपना लिया। बेटियों को लेकर हमेशा से संवेदनशील रहने वाले मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को लगता था कि आर्थिक सुरक्षा के बिना बिटिया को सुख नहीं मिलेगा और लम्बे सोच-विचार के बाद लाडली लक्ष्मी योजना आरंभ की गई। आज प्रदेश में बड़ी संख्या में बिटिया लाडली लक्ष्मी योजना के माध्यम से आर्थिक रूप से सुरक्षित हैं। आर्थिक रूप से कमजोर बच्चियों की ब्याह का जिम्मा भी शिवराजसिंह ने उठा रखा है और एक पालक का दायित्व निभाते हुए उनकी शादी करवाते हैं। शिक्षा का मार्ग भी बिटिया के लिए शिवराजसिंह ने प्रशस्त किया। आदिवासी अंचलों के बच्चों के लिए परदेस में शिक्षा व्यवस्था की गई। आज उनमें से अनेक बच्चे कॉपोरेट सेक्टर में सफलतापूर्वक कार्य कर रहे हैं। किसानों को लेकर वे हमेशा से दर्द से भरे रहे हैं और यही कारण है कि जो बेहतर हो सकता है, उन्होंने मुख्यमंत्री के नाते किया। स्वयं किसान पुत्र होने के कारण उनके दर्द को दिल से समझते हैं। ओला-पाला हो या अन्य प्राकृतिक आपदा, वे खुद पहुंच कर हालात का जायजा लेते हैं और अधिकाधिक आर्थिक सहायता दिलाने का प्रयास करते हैं।

मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान आम आदमी के लिये जितने नरम दिल हैं, उतने ही प्रशासक के तौर पर बेहद सख्त। पहली बार उन्होंने लोक सेवा गारंटी अधिनियम पास कर शासकीय कार्यों में लेट-लतीफी करने वालों के लिए समय-सीमा बांध दी। इसके बाद भी भर्राशाही करने वालों के लिए आर्थिक दंड का प्रावधान किया। आहिस्ता-आहिस्ता लोक सेवा गारंटी अधिनियम में सेवाओं का विस्तार करते रहे। कोविड के दौरान निजी अस्पतालों की मनमानी रोकनेे के लिए आम आदमी से अनुरोध किया और इलाज की दरें तय कर आम आदमी को राहत दिलाने की कोशिश की। शिवराजसिंह चौहान की सख्ती देखना हो तो उन अपराधियों के खिलाफ उनके तेवर देखिये जिनके घरों को मलबों में बदल दिया। अपराध का दंड कानून तय करेगा लेकिन फौरीतौर पर समाज में अपराध करने वालों के मन में डर बैठे, यह कर दिखाया। अब अपराधियों के मन में भय है और इसका सकरात्मक परिणाम दिखने लगा है। यह कहना भी जल्दबाजी होगी कि उनके इस कदम से अपराध थम गया है लेकिन अपराध नियंत्रण में होने लगा है, यह कहना अनुचित नहीं होगा। त्वरित फैसलों में भी उनका कोई सानी नहीं है। बार-बार अटक रहे पुलिस कमिश्ररी को उन्होंने एक झटके में मंजूरी देकर लागू कर दिया।

सहज, सरल और मृदुभाषी शिवराजसिंह चौहान जितने सरल दिखते हैं, उतने सरल नहीं हैं और जितने कठिन दिखते हैं, उतने कठिन भी नहीं हैं। भोपाल के मॉडल स्कूल में पढ़े शिवराजसिंह के सहपाठी यह कहते नहीं चूकते कि शिवराज हमारे साथ पढ़े, तो कोई कहता है कि हम शिवराज के साथ पढ़े तो कोई सदाशयता से कहता है कि हम साथ-साथ पढ़े। वे सबके साथ घुलमिल जाते हैं। सबके साथ उनका अपनापन है लेकिन इस अपनेपन का कोई नायजायज लाभ ले, ऐसा वे करने नहीं देते हैं। उन्होंने दिखावा पसंद नहीं है। यदि ऐसा होता तो चार बार के मुख्यमंत्री की वेशभूषा बदल जाती लेकिन वे सादे पाजामा-कुर्ते में ही खुद को सहज महसूस करते हैं। कभी विदेश गए या कोई खास मौका हुआ तो बंद गले का सूट पहन लिया।

कोविड के दरम्यान उन्होंने स्वयं की परवाह किये बिना लोगों का साहस बंधाते घूमते रहे। व्यवस्थाओं का जायजा लेते रहे। इस दौरान वे लोगों को समझाइश देने के लिए उपवास पर बैठे तो विरोधियों को एक और मौका तंज कसने का मिल गया था लेकिन वे तब चुप बैठ गए कि उनके इस उपवास से लोगों ने बात मानी और कोविड के नियमों का पालन किया। समाज में जागृति कैसी आती है और उनसे संवाद कैसे किया जाए, यह शिवराजसिंह से सीखा जा सकता है। वे अपने आप में एक कुशल संचारक है जिसे हम पत्रकारिता की भाषा में कम्युनिकेटर बोलते हैं।

अपनी व्यस्तता के बीच परिवार के लिये समय निकाल लेते हैं। गणपति की स्थापना करना हो तो परिवार के साथ गणपति लेकर विधि-विधान से बिठाते हैं और धनतेरस की पूजा के लिए भारतीय रीति-रिवाज का पालन करते हुए नेग के लिए बाजार क्रय करने भी जाते हैं। परिवार के साथ पिकनिक मनाने जाते हैं तो मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को पीछे छोडक़र निकल आते हैं। फिर वह एक आम दम्पत्ति की तरह चाय बनाते हुए दिख जाएंगे। पत्नी के मनुहार पर भुट्टे का स्वाद भी चखेंगे। मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह की यह खासियत जड़ से जुड़ाव के कारण है। इसके पहले भी मध्यप्रदेश में अनेक मुख्यमंत्री हुए लेकिन जितने सहज और सरल शिवराजसिंह हैं, वैसा दूजा मिलना मुश्किल है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं सुपरिचित शोध पत्रिका समागम के संपादक हैं)

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