भारत के शेयर बाजार की कहानी केवल कंपनियों के शेयर खरीदने-बेचने की कहानी नहीं है। यह उस परिवर्तन की कहानी भी है जिसमें पुराने दलाल-आधारित बाजार से निकलकर भारत ने इलेक्ट्रॉनिक, पारदर्शी और देशव्यापी पूंजी बाजार का निर्माण किया। इस परिवर्तन में National Stock Exchange of India—NSE की स्थापना एक निर्णायक घटना थी। आज NSE भारत के सबसे महत्वपूर्ण वित्तीय बाजार संस्थानों में है और करोड़ों निवेशकों तथा हजारों कंपनियों को पूंजी बाजार से जोड़ता है। NSE स्वयं बताता है कि वह 1994 में इलेक्ट्रॉनिक/स्क्रीन-आधारित ट्रेडिंग शुरू करने वाला भारत का पहला एक्सचेंज था।
BSE से पहले NSE क्यों जरूरी हुआ?
भारत में आधुनिक शेयर बाजार की जड़ें 19वीं शताब्दी के मुंबई में मिलती हैं। BSE—जिसे पहले Bombay Stock Exchange कहा जाता था—की स्थापना 1875 में हुई थी और BSE स्वयं इसे एशिया का सबसे पुराना स्टॉक एक्सचेंज बताता है।
BSE का विकास उस दौर में हुआ था जब शेयर बाजार मुख्यतः दलालों और भौतिक ट्रेडिंग व्यवस्था के माध्यम से चलता था। कारोबार का बड़ा हिस्सा मुंबई जैसे वित्तीय केंद्र में केंद्रित था। निवेशक और ब्रोकर आमने-सामने अथवा टेलीफोन आदि माध्यमों से आदेश देते थे और बाजार की पूरी व्यवस्था आज की तरह देशव्यापी इलेक्ट्रॉनिक नेटवर्क पर आधारित नहीं थी।
1990 के दशक की शुरुआत तक भारतीय पूंजी बाजार को अधिक पारदर्शी, प्रतिस्पर्धी और आधुनिक बनाने की आवश्यकता महसूस होने लगी। 1991-92 के आर्थिक सुधारों और प्रतिभूति बाजार में सामने आई गंभीर कमियों ने इस आवश्यकता को और स्पष्ट किया। मुंबई विश्वविद्यालय की वित्तीय बाजार संबंधी अध्ययन सामग्री भी बताती है कि उस समय पुराने एक्सचेंजों में price rigging, insider trading, market manipulation और अपर्याप्त तकनीकी ढाँचे जैसी समस्याओं को लेकर सुधार की आवश्यकता महसूस की गई थी।
इसी पृष्ठभूमि में सरकार ने एम. जे. फेरवानी (M. J. Pherwani) की अध्यक्षता में अध्ययन समूह गठित किया। 1991 के इस अध्ययन समूह की सिफारिशों ने एक नए राष्ट्रीय स्टॉक एक्सचेंज की दिशा में रास्ता तैयार किया। संसद के 1992 के एक उत्तर में भी सरकार ने बताया था कि फेरवानी समिति के सुझाव के आधार पर एक National Stock Exchange स्थापित करने को सैद्धांतिक मंजूरी दी गई थी।
NSE की स्थापना कैसे हुई?
NSE को 1992 में incorporated किया गया। अप्रैल 1993 में उसे SEBI से स्टॉक एक्सचेंज के रूप में मान्यता मिली और 1994 में उसने अपना परिचालन शुरू किया। सबसे पहले Wholesale Debt Market शुरू किया गया और इसके बाद equity/cash market में कारोबार आरंभ हुआ।
NSE की स्थापना का मूल विचार केवल एक नया शेयर बाजार बनाना नहीं था। लक्ष्य था ऐसा राष्ट्रीय बाजार बनाना जिसमें देश के अलग-अलग हिस्सों के निवेशक समान तकनीकी व्यवस्था के माध्यम से कारोबार कर सकें।
इसका सबसे बड़ा परिवर्तन था—स्क्रीन आधारित इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग।
NSE के अपने इतिहास के अनुसार 1994 में शुरू हुई उसकी इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग व्यवस्था ने भारतीय शेयर बाजार को एक नए युग में प्रवेश कराया। पुराने बाजार की भौतिक ट्रेडिंग व्यवस्था के मुकाबले यहाँ निवेशक का आदेश इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम में जाता और निर्धारित नियमों के अनुसार order matching होता था।
NSE के निर्माण में किसका सबसे महत्वपूर्ण योगदान था?
यदि NSE की स्थापना की कहानी में एक व्यक्ति का नाम “शिल्पकार” के रूप में लिया जाता है, तो वह हैं—
डॉ. रघुनाथ हरि पाटील (R. H. Patil) NSE के founding Managing Director थे। NSE के अपने ऐतिहासिक दस्तावेज में उन्हें स्पष्ट रूप से “Founding-Managing Director” कहा गया है। NSE उनके नाम पर आज भी Dr. R. H. Patil Memorial Lecture आयोजित करता है और उन्हें भारतीय पूंजी बाजार के परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला व्यक्ति बताता है। डॉ. पाटील पहले IDBI में वरिष्ठ अधिकारी थे। उन्होंने NSE को केवल एक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म के रूप में नहीं देखा, बल्कि आधुनिक बाजार की पूरी infrastructure व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया।
उनके साथ रवि नारायण (Ravi Narain), चित्रा रामकृष्ण, आशीष कुमार चौहान और अन्य पेशेवरों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। NSE के पुराने दस्तावेजों के अनुसार रवि नारायण अप्रैल 1994 में संगठन से जुड़े और बाद में उसके Managing Director एवं CEO रहे।
NSE के एक आधिकारिक दस्तावेज में डॉ. पाटील और तत्कालीन IDBI/NSE नेतृत्व को नए एक्सचेंज की स्थापना में अग्रणी बताया गया है। उसी ऐतिहासिक सामग्री में NSE की शुरुआती तकनीकी व्यवस्था, satellite-based communication और screen-based trading की दिशा में किए गए प्रयासों का उल्लेख मिलता है।
इसलिए NSE की स्थापना को केवल किसी एक व्यक्ति का काम कहना उचित नहीं होगा। इसे समझने का सही तरीका है:
BSE और NSE में मूल अंतर क्या है?
दोनों शेयर बाजार हैं, दोनों में कंपनियों के शेयर और अन्य वित्तीय उत्पादों का कारोबार होता है, लेकिन उनके इतिहास और विकास की दिशा अलग रही है।
BSE आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण है और equity, debt, derivatives, mutual funds तथा अन्य उत्पादों में बाजार उपलब्ध कराता है। BSE स्वयं उसे भारत के पूंजी बाजार के विकास में प्रमुख भूमिका निभाने वाला और एशिया का सबसे पुराना एक्सचेंज बताता है।
इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि “BSE पुराना और NSE नया इसलिए एक अच्छा और दूसरा खराब”। दोनों भारतीय पूंजी बाजार के महत्वपूर्ण संस्थान हैं। अंतर मुख्यतः उनके इतिहास, तकनीकी विकास और बाजार संरचना के विकासक्रम में है।
NSE ने भारतीय शेयर बाजार को क्या बदला?
NSE का सबसे बड़ा योगदान केवल इलेक्ट्रॉनिक trading शुरू करना नहीं था। इसके साथ कई ऐसी व्यवस्थाएँ विकसित हुईं जिन्होंने भारतीय पूंजी बाजार की संरचना बदल दी।
1. देशव्यापी बाजार
पहले शेयर बाजार का अनुभव मुख्यतः कुछ बड़े शहरों तक सीमित था। इलेक्ट्रॉनिक नेटवर्क के कारण NSE ने छोटे शहरों और दूरदराज के निवेशकों को भी राष्ट्रीय बाजार से जोड़ना संभव बनाया।
2. पारदर्शी order matching
इलेक्ट्रॉनिक order matching ने खरीदने और बेचने के आदेशों को एक निर्धारित प्रणाली के माध्यम से मिलाने की व्यवस्था की। इससे पारंपरिक open-outcry व्यवस्था की तुलना में बाजार को अधिक standardized और technology-driven बनाया गया।
3. जोखिम प्रबंधन
NSE ने केवल trading system पर ध्यान नहीं दिया। 1995 में NSE Clearing की स्थापना हुई और 1996 में उसने clearing और settlement operations शुरू किए। NSE के अनुसार यह भारत में स्थापित होने वाली पहली clearing corporations में से एक थी।
4. Nifty 50
NSE का Nifty 50 आज भारतीय शेयर बाजार का प्रमुख benchmark index है। इसके माध्यम से भारत की बड़ी और प्रमुख कंपनियों के प्रदर्शन को एक index के रूप में देखा जाता है।
5. Derivatives market
NSE ने 12 जून 2000 को Nifty 50 index futures के साथ derivatives trading शुरू की। इसके बाद index options और individual stocks के futures/options भी आए। आज NSE के derivatives बाजार में कई प्रमुख indices और 200 से अधिक securities पर futures/options उपलब्ध हैं।
आज NSE का महत्व कितना बड़ा है?
आज NSE केवल शेयर खरीदने-बेचने की जगह नहीं है। यह एक Market Infrastructure Institution के रूप में काम करता है।
NSE के अनुसार वित्त वर्ष 2026 में वह cash equities में trades और equity derivatives में contracts की संख्या के आधार पर भारत का सबसे बड़ा multi-asset-class exchange था।
इसके प्रभाव का अंदाजा कुछ आँकड़ों से लगाया जा सकता है। NSE के अनुसार जनवरी 2025 में उसके unique investor base ने 11 करोड़ का आंकड़ा पार किया। 2024 में NSE के माध्यम से 268 IPOs ने लगभग ₹1.67 लाख करोड़ जुटाए। 23 जुलाई 2024 को NSE ने एक दिन में 2,000 करोड़ से अधिक orders process किए और 5 जून 2024 को लगभग 29 करोड़ trades का रिकॉर्ड दर्ज किया।
इसका अर्थ है कि NSE अब केवल बड़े संस्थागत निवेशकों का बाजार नहीं है। Retail investor, mutual fund, pension investor, FPI, domestic institution और कंपनियाँ—सभी इसके ecosystem का हिस्सा हैं।
NSE और आम निवेशक
आज किसी छोटे शहर में बैठा निवेशक भी अपने मोबाइल या कंप्यूटर से NSE पर सूचीबद्ध कंपनी का शेयर खरीद सकता है। उसे मुंबई के किसी trading floor पर जाने की आवश्यकता नहीं है।
यही NSE की सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धियों में से एक है:
मुंबई-केंद्रित शेयर बाजार → राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक बाजार → डिजिटल निवेश व्यवस्था।
NSE की स्थापना के समय जिस तकनीक को अत्याधुनिक माना जाता था, वह आज मोबाइल trading application, online brokerage और demat account के माध्यम से सामान्य निवेशक की दैनिक जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है।
NSE ने स्वयं अपनी 30वीं वर्षगाँठ के अवसर पर कहा कि उसके विकास में dematerialisation, centralized clearing, real-time risk management, Nifty index, derivatives, ETFs, SME market और mobile-based investing जैसे अनेक पड़ाव शामिल रहे हैं।
NSE केवल एक Stock Exchange नहीं, बल्कि बाजार-व्यवस्था का परिवर्तन है
भारत में BSE ने शेयर बाजार की ऐतिहासिक नींव रखी, जबकि NSE ने उस बाजार को नई तकनीक, राष्ट्रीय पहुंच और आधुनिक market infrastructure के साथ एक नए चरण में पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
NSE की कहानी में M. J. Pherwani Committee ने नीतिगत दिशा दी, सरकार और वित्तीय संस्थाओं ने संस्थागत आधार उपलब्ध कराया और डॉ. R. H. Patil तथा उनकी टीम ने उस विचार को व्यवहार में उतारने में केंद्रीय भूमिका निभाई। NSE 1992 में बना, 1993 में मान्यता मिली और 1994 में कारोबार शुरू हुआ।
और शायद NSE की सबसे बड़ी विरासत यह है कि उसने भारतीय शेयर बाजार को केवल “मुंबई में दलालों का बाजार” रहने से आगे बढ़ाकर एक राष्ट्रीय, इलेक्ट्रॉनिक और तकनीक-आधारित पूंजी बाजार बनाने में योगदान दिया।
आज जब करोड़ों भारतीय अपने मोबाइल से Nifty, Sensex, शेयर, ETF, IPO और derivatives देखते हैं, तो उसके पीछे 1990 के दशक में शुरू हुए उस तकनीकी और संस्थागत परिवर्तन की महत्वपूर्ण भूमिका है।

आशीष कुमार चौहान की NSE की स्थापना में भूमिका महत्वपूर्ण रही है। वे NSE की founding team के सदस्य थे और 1992 से 2000 तक NSE में रहे। इसलिए उन्हें NSE के “संस्थापक दल के प्रमुख तकनीकी/क्रियान्वयनकारी सदस्यों” में गिना जाता है। वे भारत सरकार के केंद्रीय शिक्षा अनुदान आयोग यूजीसी के सम्मानित सदस्य भी हैं।
श्री आशीष चौहान उस समय अपेक्षाकृत युवा तकनीकी पेशेवर थे। वे IIT Bombay और IIM Calcutta से शिक्षित हैं और 1991 में IDBI से जुड़े। NSE के निर्माण के समय उन्होंने विशेष रूप से इन क्षेत्रों में काम किया:
Screen-based electronic trading system के विकास में भूमिका
NSE के लिए commercial satellite communication network तैयार करने में योगदान
Indices के विकास में काम
बाद में derivatives market के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका
NSE में market operations, membership, clearing & settlement, surveillance, rules, IT आदि अनेक क्षेत्रों की जिम्मेदारी।
BSE के आधिकारिक दस्तावेज में भी उन्हें “one of the founders of India's NSE” कहा गया है और बताया गया है कि उन्होंने 1992–2000 के दौरान NSE में काम किया।
NSE का निर्माण IDBI, वित्तीय संस्थानों, विशेषज्ञों और पेशेवरों की सामूहिक परियोजना थी। NSE स्वयं बताता है कि उसका गठन 1992 में हुआ, 1993 में SEBI की मान्यता मिली और 1994 में कारोबार शुरू हुआ।
“NSE को तकनीकी रूप से आधुनिक, स्क्रीन-आधारित और इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय एक्सचेंज बनाने में आशीष चौहान का नाम निश्चित रूप से प्रमुखता से आता है। NSE के अपने रिकॉर्ड में उनके screen-based trading, satellite communication और derivatives development के योगदान का उल्लेख है।वे 2009 में BSE से जुड़े, 2012 में BSE के MD & CEO बने, और 2022 में वापस NSE के MD & CEO बने। वर्तमान में सितंबर 2026 तक वे NSE के MD & CEO हैं। इस अर्थ में उनका करियर असाधारण रूप से दिलचस्प है।





