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संविधान की प्रस्तावना में हिंदुत्व की मूल भावना की प्रासंगिकता

संविधान का मौलिक आशय शासक और शासित के परस्पर विश्वास के मूल्य को पूर्ण करना है ;शासक को अपने शासकीय कार्यों /विधाई कार्यों के लिए शासित के प्रति उत्तरदाई ,पारदर्शी होना ही संविधान है।संविधान के अंतर्गत शासक और शासित के बीच परस्पर संतुलन की व्यवस्था की गई है अर्थात नागरिकों के मौलिक अधिकारों, स्वतंत्र न्यायिक व्यवस्था का समावेश है ।प्रस्तावना संविधानवाद एवं संवैधानिक सरकार की स्थापना करता है।

राष्ट्र की अवधारणा धर्म-दर्शन ,सत्य की खोज, मूल्यों की स्थापना, सांस्कृतिक
उपादेयता, व्यक्तित्व के मानवीय गरिमा, मूल्य निरपेक्ष तथ्य एवं अवधारणा पर आधारित है।

प्रस्तावना के अंतर्गत उस आधारभूत दर्शन ,राजनीतिक, धार्मिक एवं नैतिक मूल्यों का समावेश है ।प्रस्तावना में संविधान सभा के व्यक्तित्व के महान आदर्श एवं महान सोच का मूल्य निहित है। संविधान की प्रस्तावना दीर्घकालिक सपनों का संप्रत्यय है।प्रस्तावना हमारी संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य की भविष्य योजना है।

प्रस्तावना संविधान का सबसे सम्मानित भाग है ,यह संविधान की आत्मा है ,यह संविधान का बीज भाग है ।इसको धारित करने वाले राजनीतिक बुद्धिजीवी एवं बौद्धिक चिंतक थे।

प्रस्तावना संविधान का अनन्य भाग है जिसके मौलिक मूल्यों एवं आध्यात्मिक मूल्यों से संविधानवाद के प्रत्यय का निर्माण किया जाता है ।प्रस्तावना के दो तथ्य है:
1. प्रस्तावना विधायिका के शक्ति का स्रोत नहीं है और नहीं उसकी शक्तियों पर अंकुश लगाने वाला कारक है ; 2.इसके भावनाओं एवं निहितार्थ को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।

हिंदुत्व एक विचारों का समूह है अर्थात अपनी पहचान के प्रति सजग होना और पहचान के प्रति चेतना का विकास करना ही हिंदुत्व है। हिंदुत्व से आशय प्रेमभाव, सहिष्णुता मानवता, दिन – हिन के प्रति सेवा भावना ,आचरण की शुद्धता, अहिंसक होना, चरित्र का निर्माण करना एवं नागरिक धर्म का पालन करना है।

भारत के विविधता को बनाए रखना ,संस्कृति के क्षरण होने से रोकना ही हिंदुत्व है ।हिंदुत्व भू – सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है ।डॉक्टर हेडगेवार जी ने हिंदुत्व को सभ्यता परिवेश में रखा और इस प्रत्यय को पूजा पद्धति और आस्था से ऊपर रखा।

सभ्यता के उन्नयन में भारत के प्रति आस्था रखने वाले सभी नागरिक/व्यक्ति हिंदुत्व है अर्थात भारत के विविधता में आस्था रखना ,मानवीय मूल्यों के प्रति विवेकी दृष्टिकोण ही हिंदुत्व है ।हिंदुत्व सामाजिक ,राजनीतिक और आध्यात्मिक लोकतंत्र है।

इस प्रत्यय पर अपने विचार रखते हुए पूजनीय संघचालक डॉ मोहन भागवत जी ने कहा है कि हिंदुत्व सुजलाम सुफलाम है ।भारत विविधता में एकता ,वसुधैव कुटुंबकम के चेतना दर्शन और व्यवहार के आधार पर राष्ट्र बना है ।सामान्य उद्देश्य, जाति एवं धर्म से ऊपर सोचने वाले से राष्ट्र बनता है ।भारतीय दर्शन में कितना पैसा कमाया है? इसकी महत्ता नहीं है, बल्कि समाज के लोक कल्याण के लिए कितना उपभोग किया है ?इसकी महत्ता है ।धर्म ,अर्थ काम और मोक्ष में संतुलन बनाना ही संस्कृति है ।सब को संतुलित करने वाला दर्शन ही हिंदुत्व है। संविधान की प्रस्तावना भी हिंदुत्व की मूल भावना है ।

डॉक्टर भागवत जी के कथन का विश्लेषण किया जाए तो यह सार प्रगट होता है कि प्रस्तावना संविधान की कुंजी है ,तो प्रस्तावना का बीज हिंदुत्व। हिंदुत्व प्रस्तावना का मूल दस्तावेज है ,प्रस्तावना संविधान की आत्मा है तो हिंदुत्व चेतना है ।प्रस्तावना संविधान का बीज मंत्र है तो बीज हिंदुत्व है।

(डॉक्टर सुधाकर मिश्रा,राजनीतिक विश्लेषक हैं।

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