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स्व. पं. चन्द्रभानु आर्योपदेशक के स्वयं लिखित संस्मरण

93वें जन्मोत्सव पर कोटि कोटि नमन

संस्मरण का संग्रहण एक चुनौतीपूर्ण कार्य है । खास बात इसमें ईमानदारी की है । जीवन में अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के अनुभव सभी को होते हैं । अभी आर्य स्वर्णकार मासिक के एक अंक में एक प्रसंग छपा था , जिसका भाव था कि बुरे संस्मरणों को रेत पर लिखो और अच्छे अनुभवों को पत्थर पर लिखो । रेत पर भी लिखने की क्या आवश्यकता है ? यह एक प्रश्न हो सकता है । बुरे अनुभव भी कुछ न कुछ प्रेरणा तो अवश्य देते ही हैं । मेरा कोई विचार इन अनुभवों को लिखने का नहीं था । लेकिन जब कभी प्रसंगवश बच्चों को कुछ घटनाएँ सुनाता था तो इनका आग्रह रहता था कि इनको लेखनीबद्ध किया जाए । अब तो ईश्वरीय प्रेरणा भी हुई कि मैं इस आग्रह को स्वीकार कर बैठा । अब इसमें क्या ग्राह्य है क्या नहीं , इसका निर्णय तो सुहृदों को करना है ।

मेरा जन्म आसौज शुक्ला दौज को ग्राम लोहारी जिला करनाल ( वर्त्तमान जिला पानीपत ) में पिता श्री हरज्ञान सिंह व माता श्रीमती मानकौर के घर हुआ था । मैं अपने दस भाई – बहनों में सबसे छोटा था और माता – पिता का लाड़ला था । मेरे माता पिता प्रत्यक्ष रूप से तो आर्यसमाज से नहीं जुड़े थे , लेकिन वे अत्यंत धार्मिक और सात्त्विक थे । मेरे बड़े भ्राता श्री सुखलाल आर्य प्रत्यक्ष रूप से आर्यसमाज से जुड़े थे और उनके द्वारा विभिन्न अवसरों पर घर में आर्य वातावरण बना रहता था । वे इलाके के एक प्रसिद्ध पहलवान थे । हमारे पिता उनसे सत्यार्थप्रकाश सुना करते थे ।

मेरे पिता दुकान करते थे । ( स्वर्णकार ) कुछ कृषि भी होती थी । सबसे बड़े भ्राता चन्दगीराम नेत्रहीन थे । सुखलाल युवक हुए तो वे पिता जी की मदद करने लगे । घर की आर्थिक स्थिति ठीक थी , पर कमाऊ पुत्र सुखलाल का लगभग २२-२३ वर्ष की अवस्था में ही निधन हो गया । मैं और मेरे बड़े भाई किशनचन्द छोटे थे । स्थिति खराब हो गई । मेरी माता की पहले से ही मुझे आर्यसमाज को अर्पित करने की भावना थी । चार जमात उर्दू की पढ़कर , और कालखा ग्राम में आर्य पाठशाला से कुछ संस्कृत का अध्ययन कर जब मैं तरुणावस्था में आया तो मैंने भी अपना दिशा निर्धारण कर लिया था । मुझे गाने का शौक था और उन दिनों हमारे इलाके में स्वामी भीष्म जी का बड़ा प्रभाव था । पहले हमारा परिवार सुताना में रहता था और वहाँ स्वामी भीष्म जी अकसर आते रहते थे । मैं स्वामी भीष्म जी के भजन और व्याख्यान सुनकर उन जैसा बनने की सोचता था ।

जब भजनोपदेशक बनने के लिए लगभग १८ वर्ष की अवस्था में उनके पास गया तो उन्होंने संभवतः जमानत के लिए या कोई परिचय न होने के कारण मुझे १०१ / – और पगड़ी देने को कहा । मेरे पास पैसे नहीं थे । मैं निराश होकर लौट आया । उस समय मेरे सहपाठी श्री हरिवंश ( हरिवंश वानप्रस्थी ) भी मेरे साथ थे । उन्होंने साहस दिया और निराश न होकर समय का इन्तजार करने को कहा ।
गुरुजनों के चरणों में

कुछ दिनों के पश्चात् हमारे गांव में स्वामी भीष्म जी और स्वामी रामेश्वरानन्द जी का आगमन हुआ । प्रचार के दौरान गांव के मौजिज लोगों ने स्वामी जी से कहा हमारा लड़का चन्द्रभान बहुत अच्छा गाता है । इसके भी दो भजन करवा दो । स्वामी जी की स्वीकृति के बाद मैंने भजन गाए । मेरे भजन बहुत अच्छे रहे । स्वामीजी ने गांव के लोगों से मेरे चालचलन के बारे में पूछा गांव के बुजुर्गों ने कहा कि बहुत ईमानदार और चरित्रवान लड़का है । स्वामीजी ने मुझे घरौंडा बुला लिया और मैं खाने के बरतन और बिस्तरा लेकर घरौंडा पहुंच गया । स्वामीजी के पास जाने के बाद मैंने अनुभव किया कि स्वामीजी बाहर से दिखने में जितने कठोर हैं अन्दर से उतने ही कोमल हैं । संस्कृत के कवि ने कहा है ।
वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि ।
लोकोत्तराणां चेतांसि को हि विज्ञातुमर्हति ।।

स्वामी जी का व्यक्तित्त्व कुछ ऐसा ही था । उनका अपने शिष्यों के प्रति स्नेह देखते ही बनता था । स्वामी जी की पहली शिक्षा थी कि ऊपर से ठोको , नीचे से रोको । ब्रह्मचर्य और आचरण के मामले में वे कोई दिलाई सहन नहीं करते थे । प्रचार के लिए जाते , कुछ शिष्यों को साथ ले जाते कुछ को छोड़ जाते । खाने की जो विशेष सामग्री रहती , यदि आने के बाद बची रहती तो डांटते कि तुम इसे भी नहीं खा सके ।

वे भजन गायन के साथ साथ सिद्धान्त का ज्ञान भी उपदेशकों के लिए आवश्यक समझते थे । पूज्य स्वामी रामेश्वरानन्द जी महाराज का मेरे प्रति विशेष स्नेह था । उनके आदेशानुसार मैं दो घंटे के लिए गुरुकुल में जाया करता था। वे मुझे विशेष रूचि लेकर न्याय , वेदान्त आदि दर्शन और उपनिषद् पढ़ाया करते थे । इस प्रकार इन दोनों गुरुजनों ने मुझपर विशेष कृपा की , जिस कारण मैं किसी योग्य बन सका ।
चरित्र के रक्षक

स्वामी भीष्म जी माता पिता के समान अपने शिष्यों का ध्यान रखते थे । स्वामी जी के साथ दिल्ली जाना होता था तो कई बार कई कई दिनों तक आर्यसमाज बाजार सीताराम में ठहरना होता था । एक बार स्वामी जी अपने ढोलक वादक के साथ मुझे एक धर्मशाला में छोड़कर स्वयं किसी कार्य से चले गए । ढोलक वादक बाजार में चला गया । किसी ने स्वामी जी को बाद में कहा कि आप के चेले तो बाजार में फिरते रहते हैं । स्वामीजी को मेरी चिन्ता हुई । स्वामी जी ने मुझसे पूछा कि रात को कहाँ गए थे , मैंने बता दिया कि मैं तो सो रहा था । मैं समझ नहीं पाया कि बात क्या है । बाद में उन्होंने ढोलकिए से जानकारी ली तो उसने बता दिया कि वह किसी काम से गया था , चन्द्रभानु को इसकी जानकारी नहीं है , वह तो अन्दर सो रहा था । इस पर स्वामी जी शांत हुए । कहने को तो छोटी सी बात है लेकिन इससे स्वामी जी के चरित्र की विशेषता का पता चलता है कि अपने शिष्यों का प्रत्येक अवस्था में ध्यान रखते थे, और उनके अनुशासन और चरित्र के मामले में कितने सतर्क थे ।
मुझे तो उपदेशक बनना है

दिल्ली में रहते हुए एक घटना हुई जिसमें मेरे संकल्प बल की भी परीक्षा हुई और वह मेरे जीवन की एक यादगार बन गई । मैं घर कभी कभार ही जाता था । दिल्ली की भोगल बस्ती में रहने वाली एक माता थी । वह मुझे प्रायः स्वामीजी के साथ देखती थी । वह विधवा और निःसन्तान थी । एक दिन वे स्वामी जी के पास आकर बड़ी भूमिका बांधकर बोलीं कि आपके पास यह चन्द्रभानु ब्रह्मचारी है , जिसका व्यवहार और आचरण बहुत अच्छा है , मैं निस्संतान हूँ । मैं इस ब्रह्मचारी को गोद लेना चाहती हूँ । यदि आप अनुमति दें तो मेरा भी सहारा हो जाएगा ।

मुझे इस बात का तब पता चला जब माता अंगिरा और स्वामीजी के मध्य इस बात पर बहस हो रही थी । माता अंगिरा देवी , आर्य समाज बाजार सीताराम की महिला कार्यकर्त्री थीं और स्वामी जी की बड़ी श्रद्धालु थी । स्वामी जी मुझे गोद देने से मना कर थे । माता जी कह रही थी कि गोद देने में क्या हर्ज है । गोद देने के बाद भी यह उपदेशक ही रहेगा । स्वामी जी पहले तो मना करते रहे , पर बाद में कह दिया कि चलो चन्द्रभानु से ही पूछ लो । माता अंगिरा ने मुझे बहुत समझाया – मरे , इसके पास १५ लाख की संपत्ति है । मान जा । लेकिन मैं ने साफ इन्कार कर दिया । मुझे तो उपदेशक बनना है । घर पहले ही छूट चुका था । यह लगभग १९५०-५१ की घटना है । स्वामी जी का इस घटना से मुझ पर विश्वास और भी बढ़ गया ।

स्वामी रामेश्वरानन्द
स्वामी रामेश्वरानन्द जी महाराज के स्नेह का मैंने उल्लेख किया था । स्वामी जी मुझे पढ़ाते तो थे ही , एक बार उन्होंने पूज्य धर्मवीर जी शास्त्री से कहा कि ईमानदार ब्रह्मचारी है , इसको एक एकड़ जमीन दे दो , प्रचार करता रहेगा । हालांकि मेरी भी रूचि नहीं थी पर उनके लड़कों ने यह बात सिरे नहीं चढ़ने दी । शास्त्री जी जब तक विराजमान रहे , उत्सवों में बड़े सम्मान के साथ गुरुकुल में बुलाते रहे । उनके स्वर्गवास के पश्चात् न तो उन्होंने मुझे बुलाया और न मैं गया । अब गुरुकुल पता नहीं किस हालत में है । स्वामी रामेश्वरानन्द जी का आर्यसमाज कम ही होता है । बहुत योगदान है , परन्तु उनकी चर्चा कम ही होती है।

स्वामीजी के त्याग के संबंध में एक घटना मुझे याद आती है । उनके एक भाई एक बार गुरुकुल में आए । उनकी पारिवारिक सम्पत्ति का बंटवारा हुआ था और उनके अनुसार उनको कुछ कम मिला था । वे चाहते थे कि स्वामीजी उनके साथ जाएँ और अपना हिस्सा ( स्वामी जी का ) उनको दिलवा दें । स्वामी जी ने कह दिया कि मेरा न तो कोई परिवार है और न कोई भाई । हम तो संन्यासी हैं और सारा संसार ही हमारा परिवार है । उसके आग्रह करने पर स्वामी जी ने कहा कि तुम चाहो तो यहाँ रहते रहो । गाय चरा दिया करो , हम तुम्हारा खर्च देते रहेंगे । उन्होंने गुरुकुल में रहना शुरु कर दिया । कुछ दिनों बाद स्वामीजी को पता चला कि वह काम नहीं करते और आराम करते रहते हैं । स्वामीजी ने उनको कहा कि यह गुरुकुल समाज का है , उन्हें वहाँ रहना होगा तो काम करना होगा । अन्ततः उन्होंने अपने भाई को वहाँ से भेज दिया ।

मैं कई बार अपने भजनोपदेश में एक चुटकुला सुनाया करता हूँ कि एक स्थान पर एक संन्यासी रो रहे थे । हमने पूछा कि महाराज क्या बात है ? उन्होंने कहा कि बच्चे याद आ रहे हैं । पूछा कि कब संन्यास लिया था ? उन्होंने कहा कि परसों ही लिया था । मैंने कहा कि क्यों लिया था , उन्होंने कहा कि घरवाली के साथ झगड़ा हो गया था । आज के समाज में इस प्रकार के उदाहरण अनेक मिल जाएंगे कि संन्यासियों को अपने परिवार और भाई भतीजों की चिन्ता खाए जाती है । वे कैसे लोग थे कि उन्हें सारा संसार ही अपना नजर आता था ।
स्वामी जी का पट्ठा

लगभग १९५० की बात है । मैं स्वामी जी की मण्डली में था । हम प्रचारार्थ पलवल के धतीर गांव में गए । उस समय लोगों को कुश्ती का बड़ा शौक था । हम बाहर खेत में मालिश कर व्यायाम कर रहे थे । गांव के कुछ नौजवान आकर बोले- स्वामी जी , हम आपके पट्ठे के साथ कुश्ती लड़ेंगे । स्वामीजी ने मना तो किया , पर उनके आग्रह को देखते हुए स्वीकृति दे दी । एक पतला सा लड़का आया । वह दांव पेंचों में माहिर था । उसने कुछ ही देर में मुझे नीचे गिरा लिया । ताकत मेरे में ज्यादा थी , फुर्तीला वह ज्यादा था । एक घण्टे तक मल्लयुद्ध चलता रहा । चित तो मैं नहीं हुआ , उठने उस ने नहीं दिया । एक घण्टे के बाद छुड़वा दिये । बाद में वे नौजवान व्यंग्य करने लगे- स्वामी जी का पट्ठा एक घण्टा रगड़ा । स्वामी जी ने उत्तर दिया हमारा लड़का तो एक घण्टे के बाद अपने आप उठ गया । अगर ये हमारे लड़के के नीचे आधा घंटा रह जाता तो इसे आप लोगों को उठाकर ले जाना पड़ता । इस पर वे चुप हो गए ।

हमारे गुरु स्वामी भीष्म जी सच्चे अर्थों में एक विरक्त साधु थे । गुरुजी महीने दो महीने में घरौंडा आते थे । कुछ दिन रुकना पड़ता । एक बार सर्दी का मौसम था । भीमसैन राणा ने स्वामी जी से कहा- गुरु जी सर्दी बहुत है , पैसा है नहीं , कोट दिला दो । स्वामी जी ने उसको ३०० रुपये दे दिये । मैंने कहा- स्वामी जी , अपना खर्च कैसे चलेगा ? स्वामी जी बोले- भाई , ईश्वर देगा हम निमित्त हैं । कर्म करते चलो । देने वाला रक्षक परमात्मा है । उन्हें संग्रह करने की चिन्ता नहीं थी । ‘ आपदर्थे श्रियं रक्षेत् ‘ की उन्हें कोई परवाह नहीं थी ।

प्रचार से चाहे कितने ही रुपये ले आते जाते समय खाली हाथ ही होते थे । घरौंडा में एक वृद्धा रहती थी , जिसको हम बुआ कहते थे , उनसे प्रायः दस रुपये किराये के लिये उधार लेकर जाते थे । गुरुजी कहा करते थे कि साधु को धन संग्रह नहीं करना चाहिए , राजा संतोषी नहीं होना चाहिए । साधु के पास धन होगा तो झगड़ा बढ़ता है।
प्रभु जी इतना दीजिये जितना आप समाय ।
मैं भी भूखा ना रहूँ अतिथि न भूखा जाय ।
नौगजा सैयद : अंधविश्वास मिटाया

एक बार स्वामीजी के साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसी गांव में प्रचारार्थ गए हुए थे । गांव में नौगजे सैयद का खौफ था । प्रचार में जब स्वामी जी ने भूत प्रेतों का खण्डन किया तो एक ने आदमी रोने लगा । वह एक मुस्लिम कुंजड़ा था । उसने एक आमों का बाग ले रखा था । वह बोला- महात्मा जी हमारे बाग में रात को नौ गजे सैयद आते हैं । पेड़ तोड़ जाते हैं , आम तोड़ कर ले जाते हैं । हम रात को वहाँ सो नहीं सकते । स्वामीजी ने कहा- हमें दिखाओ । अगली रात को स्वामीजी के साथ हम पांच व्यक्ति गए । जेली गंडासी ले ली । बाग के पास छुपकर बैठ गए । ठीक रात के १२ बजे चांद निकला । ३ नौ गजे सैयद आए । उनके पाजामें लम्बे लम्बे थे । कुरते मनुष्यों जैसे । स्वामीजी ने उन्हें ध्यान से देखकर कहा- इनके पाजामों और कुरतों में इतना फर्क क्यों है ? स्वामी जी ने हमें आदेश दिया- एकदम उन पर हमला बोल दिया । वे तीनों एक एक जेली में गिर गए । हाथ जोड़कर बोले- हम निकट के गांव के नट हैं । पैरों में लम्बे बांस बांधकर लट्ठे का थान पैरों में लपेट लेते हैं । हमारे पास पैसे नहीं थे । एक सप्ताह पूर्व इनसे २० सेर आम उधार लेने आए थे । इन्होंने मना कर दिया । हमने अगले दिन आकर इनको डराया कि हमारे दादा कहते थे कि इस बाग में पिपली में नौगजे सैयद रहते हैं । अगली रात हम भेष बदल कर आम तोड़कर ले गए । ये हमें देखकर डर कर भाग गए । हम अचारी आम आस – पास के गांवों में बेच देते हैं । आज के बाद नहीं आएँगे । हमें छोड़ दो । स्वामी जी बोले- गांव में चलो । हमें लोगों का भ्रम दूर करना है । इन कुंजड़ों के नुकसान की भरपाई कर देना । आप पंचायत में माफी मांग कर जा सकते हो । उनके हाथ बांध कर गांव में लाए। पंचायत ने उन पर जुर्माना लगाकर छोड़ दिया । स्वामीजी ने कहा- भूत नाम बीते हुए समय , काल , वक्त का है । भूत प्रेत के डर से बचना चाहते हो तो आप आर्य बनो , ताकि पाखण्ड से पीछा छूट सके ।

स्त्रोत – पंडित चन्द्रभानु आर्योपदेशक व्यक्तित्व एवं कृतित्व
लेखक एवं संपादक – रामफल खटकड़, सुभाष श्योराण, नरेश सिहाग, रविन्द्र कुमार आर्य, सहदेव समर्पित
नोट :- पंडित चन्द्रभानु आर्योपदेशक व्यक्तित्व एवं कृतित्व पुस्तक निशुल्क प्राप्त करने के लिए 9996338552 नम्बर पर व्टसैप करें।

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