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स्वामी विवेकानंद की प्रासंगिकता पर प्रो.जैन के प्रेरक विचारों ने युवाओं को किया अभिभूत

राजनांदगांव। दिग्विजय कालेज के प्रोफ़ेसर डॉ.चन्द्रकुमार जैन ने विश्व विद्यालय अनुदान आयोग द्वारा स्वामी विवेकानंद के योगदान और उनके विचारों की प्रासंगिकता पर एकाग्र राष्ट्रीय सेमिनार में आमंत्रित वक्ता के रूप में प्रभावशाली भागीदारी की। उन्होंने अपने अतिथि वक्तव्य में कहा कि वर्तमान समय में युवाओं के सम्मुख अनेक चुनौतियाँ हैं। हर व्यक्ति प्रयत्नशील है बेहतर भविष्य के लिए, सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए एवं अच्छे जीवन के लिए। ऐसे समय में युवाओं के आदर्श स्वामी विवेकानन्द के संदेश व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।

डॉ.जैन ने कहा कि तुम अपनी अंतरात्मा को छोड़ किसी और के सामने सिर मत झुकाओ कहने वाले स्वामी विवेकानंद आत्म गौरव की अनूठी मिसाल हैं। इस्पात नगरी भिलाई के कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हुए गरिमामय आयोजन में उपस्थित विद्वानों, प्राध्यापकों और शोधार्थियों के समक्ष डॉ.जैन ने कहा कि जब तक तुम यह अनुभव नहीं करते कि तुम स्वयं देवों के देव हो, तब तक तुम मुक्त नहीं हो सकते जैसे शक्तिशाली विचार देने वाले स्वामी विवेकानद विरल विश्व विभूति हैं। स्वामी जी आत्म विशवास की जीती जागती प्रतिमा थे। उनका जीवन और उनके सन्देश दोनों में उनकी दिव्यता और साहसिकता के दर्शन किये जा सकते हैं।

डॉ.जैन ने कहा कि विदेशों में भारतीय संस्कृति की सुगंध बिखरने वाले स्वामी विवेकानन्द एक ऐसे आध्यात्मिक गुरु, जिन्होंने धर्म को व्यवहारिक बनाया तथा भारतीय सभ्यता के निर्माण और संस्कृति के प्रसार के लिए हमेशा समर्पित रहे। ये सही अर्थ में युवाओं के प्रेरणा स्रोत और युवा भारत के स्वप्नदृष्टा थे। आज हम ज्ञान आधारित समाज की बात कर रहे हैं किन्तु डॉ.जैन ने बताया कि स्वामी जी ने यह कहते हुए कि ज्ञान सदैव वर्तमान है, हम केवल उसका अविष्कार करते हैं, ज्ञान की महिमा बहुत पहले समझा दी थी। आज सब तरफ उद्यमिता की बात जोर-शोर से की जा रही है पर याद रहे की स्वामी जी ने अपने समय में ही कह दिया था कि पवित्रता, दृढ़ता और उद्यम ये तीन गुण मैं एक साथ चाहता हूँ। जब तक जीना तब तक सीखना, अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है।

डॉ.जैन ने प्रेरक शब्दों में कहा कि कहा कि स्वामी विवेकानंद जी के उत्साही, ओजस्वी एवं अनंत ऊर्जा से भरपूर विचार और दर्शन जन-जन को प्रेरणा देते रहेंगे। स्वामी जी धीरज, साहस, पवित्रता और अनवरत कर्म से सफलता का राजमार्ग बता गए हैं।आयोजन के संयोजक डॉ.सुधीर शर्मा ने संगोष्ठी की पृष्ठमूमि और उसके उद्देश्य की सारगर्भित चर्चा करते हुए अतिथि वक्ताओं का परिचय दिया और उनकी सहभागिता व सबके सहयोग के लिए के लिए आभार व्यक्त किया।

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