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भारत का उद्देश्य रक्षा तकनीकीय संप्रभुता प्राप्त करना है

भारत तीसरी सबसे बढ़ी सशस्त्र सेना है। उसका वार्षिक बजट लगभग 40 बिलियन डॉलर है जिसका पूंजी अधिग्रहण के लिए सशस्त्र सेनाओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए बजट में बढ़ोत्तरी हो रही है। भारत रक्षा संबंधी सामग्री के सबसे बड़े आयातकों में से एक है। राष्ट्र इस स्थिति को बदलना चाहता है। यह सुनिश्चित करते हुए कि रक्षा सेवाओं को हमेशा अच्छी गुणवत्ता के उपकरण मिले। भारत रक्षा उपकरण प्रौद्योगिकी में पर्याप्त आत्म निर्भरता और स्वदेशीकरण प्राप्त करना चाहता है।

रक्षा खरीददारी प्रक्रिया डीपीपी में महत्वपूर्ण सुधार करने की योजना का खुलासा करते हुए रक्षामंत्री श्री मनोहर पर्रिकर ने डीईएफईएक्सपीओ 2016 के 9वें संस्करण के दौरान नई डीपीपी की मुख्य विशेषताओं के बारे में जानकारी दी। यह एक्सपो भूमि, नौसेना और आंतरिक गृह भूमि और सुरक्षा प्रणाली प्रदर्शनी पर हर दो साल बाद आयोजित की जाती है। इस बार इसका आयोजन गोवा में किया गया था। इसमें 47 देशों ने भाग लिया जो स्पष्ट रूप से भारत की अंतरराष्ट्रीय रूप से बढ़ती शोहरत और कद का सूचक है। यह आजतक आयोजित सबसे बड़ी प्रदर्शनी थी। इस साल की प्रदर्शनी में एक हजार से अधिक भारतीय और विदेशी कंपनियों ने भाग लिया। श्री मनोहर पर्रिकर ने कहा कि भारतीय डिजाइन विकसित एवं विनिर्मित (आईडीडीएम) श्रेणी को अब सबसे अधिक प्राथमिकता दी जाएगी। नई डीपीपी में सरल प्रक्रिया, समय सीमा में कमी, निर्णय लेने में तेज़ी और पारदर्शिता को शामिल किया गया है।

अनुसंधान और विकास के महत्व के बारे में पूछे गए प्रश्न का जवाब देते हुए श्री पर्रिकर ने कहा कि अनुसंधान और विकास मेरे दिल के बहुत नजदीक हैं। एक इंजीनियर होने के नाते मैं यह जानता हूँ कि हम ठीक रास्ते पर चल रहे हैं। प्रौद्योगिकी में हर वर्ष परिवर्तन हो रहा है और भारत एक ऐसा देश है जहां इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रशिक्षित लोगों की भरमार है जो अनेक रक्षा जरूरतों को वास्तविकता में बदल सकते हैं। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) के पर्यवेक्षण में हम आईआईटी, आईआईएससी और एनआईटी जैसे अनेक शैक्षिक संस्थानों के साथ कार्य कर रहे हैं जो इस उद्देश्य को नई ऊंचाई ले जा सकते हैं।

रक्षा मंत्री ने कहा कि यह डीपीपी ‘मेक इन इंडिया’ एजेंडा को वास्तविक गति प्रदान कर सकती है और यह देश की अपनी जरूरतों के साथ-साथ निर्यात के लिए रक्षा उद्योग नेटवर्क का निर्माण करने में प्रमुख सफलताएं अर्जित करने के भारत के लक्ष्य में भी मददगार होगी। ‘मेक इन इंडिया’ प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा शुभारंभ की गई एक पहल है जिसका उद्देश्य बहु-राष्ट्रीय कंपनियों के साथ-साथ राष्ट्रीय कंपनियों को भी भारत में अपने उत्पादनों का निर्माण करने के लिए प्रोत्साहित करना है। इस उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए भारत सरकार द्वारा किए गए उपायों के बारे में जानकारी देते हुए रक्षा मंत्रालय में रक्षा उत्पादन सचिव श्री अशोक गुप्ता ने एक साक्षात्कार में कहा था कि 2014-15 और 2015-16 के दौरान रक्षा अधिग्रहण परिषद ने 66 पूंजी खरीदारी मामलों को अपनी मंजूरी दी है जिनकी अनुमानित लागत 1.98 लाख करोड़ रूपये है। इनमें से 88 प्रतिशत मामलों को “बाई इंडियन एंड बाई एंड मेक इंडियन” श्रेणियों में मंजूरी दी गई है जिसका अर्थ है कि प्रस्ताव के लिए अनुरोध भारतीय खरीदार द्वारा जारी किया जाएगा और वे स्वयं या विदेशी मूल उपकरण निर्माता (ओईएम) के साथ सहयोग करके इन मदों की आपूर्ति करेंगे। इससे भारी घरेलू मांग को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने पिछले दो वर्षों के दौरान रक्षा निर्माण में निजी क्षेत्र के प्रवेश को बढ़ावा देने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी दी-

1. रक्षा क्षेत्र के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को संशोधित किया गया है। अब स्वचालित मार्ग के अधीन 49 प्रतिशत तक समग्र विदेशी निवेश की अनुमति दी गई है और 49 प्रतिशत से अधिक विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड की अनुमति से दी जा सकती है। इस प्रक्रिया को को सरल बनाने के लिए नीति में अनेक शर्तों को हटा दिया गया है।

2. प्रविष्टि बाधा को कम करने के लिए, आईडीआर अधिनियम के तहत औद्योगिक लाइसेंसों (आईएल) को जारी करने के उद्देश्‍य से रक्षा उत्‍पादों की सूची संशोधित किया गया है और अधिकांश कंपोनेंट, पार्ट्स, उप-प्रणाली का परीक्षण करने वाले उपकरणों, उत्‍पादन उपकरणों को सूची से हटा दिया गया है।

3. भारतीय निजी क्षेत्र को समान अवसर मुहैया कराया गया है। उत्‍पाद एवं सीमा शुल्‍क लेवी के लिहाज से सार्वजनिक क्षेत्र के पास अब कोई विशिष्‍ट दर्जा नहीं है।

4. भारतीय एवं विदेशी उद्योग के बीच एक समान अवसर सृजित करने के लिए विनिमय दर वि‍चलन (ईआरवी) सुरक्षा की पूंजी अधिग्रहणों के सभी वर्गों में निजी कंपनियों समेत सभी भारतीय कंपनियों को विदेशी विनिमय घटकों पर अनुमति दी गई है।

5. चूंकि घरेलू उद्योग पूरी तरह घरेलू मांग पर ही आश्रित नहीं रह सकता, इसलिए निर्यातों के लिए समस्‍त प्रक्रिया को युक्तिसंगत बनाया गया है। अब निर्यातों के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र ऑन लाइन जारी किए जाते हैं।

6. पहली बार एक विशिष्‍ट रक्षा निर्यात रणनीति का निर्माण किया गया है और इसे सार्वजनिक किया गया है। इस रणनीति में रक्षा वस्‍तुओं के निर्यात को प्रोत्‍साहित करने के लिए सरकार द्वारा उठाए जाने वाले विशिष्‍ट कदमों को रेखांकित किया गया है।

7. पूंजी अधिग्रहण का ‘मेक’ प्रावधान मेक इन इंडिया पहल को साकार करने के लिए एक अहम स्‍तंभ है। ये ‘मेक’ परियोजनाएं न केवल वेंडर विकास के लिहाज से पारिस्थितिकी प्रणाली के सृजन में सहायक होंगी, बल्कि उद्योग द्वारा विकास और/ प्रौद्योगिकी अधिग्रहण के लिए होड़ की शुरूआत भी करेंगी। स्‍वदेशी तरीके से विकसित ऐसी प्रणालियां रक्षा बाजार में भारत को एक वैश्विक शक्ति के रूप में स्‍थापित करने के लिए उपलब्‍ध होंगी।

8. ऑफसेट्स घरेलू उद्येाग के विकास में एक महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और इसे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का एक हिस्‍सा बनने में सहायक होते हैं। जहां तक भारत में व्‍यवसाय करने का सवाल है, ऑफसेट क्रियान्‍वयन विदेशी ओईएम के साथ एक बड़ा मुद्दा रहा है। हम लोगों ने दिशा निर्देशों में उल्‍लेखनीय रूप से संशोधन करने का कार्य शुरू किया है।

9. सचिव (रक्षा उत्‍पादन) श्री अशोक गुप्‍ता ने कहा कि किफायती मानव संसाधन की एक बड़ी संख्‍या के साथ-साथ इन कदमों को लागू किए जाने के साथ भारत में अभी निवेश किए जाने का सर्वश्रेष्‍ठ समय है। उन्‍होंने कहा कि भारत सरकार उद्योग के लिए नीति, प्रक्रियाओं एवं प्रवर्तक कदमों में बदलाव के लिए आवश्‍यक कदम उठाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इसलिए अब यह उद्योग पर निर्भर करता है कि वह रक्षा क्षेत्र में निवेश करने के द्वारा इस अवसर पर सर्वश्रेष्‍ठ उपयोग करे।

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