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राममय जीवन और रामकथा के बिरले चितेरे थे फादर डॉ. कामिल बुल्के – डॉ. चन्द्रकुमार जैन

राजनाँदगाँव। दिग्विजय कालेज के हिंदी विभाग के प्राध्यापक डॉ. चन्द्रकुमार जैन ने कहा है कि डॉ. फादर कामिल बुल्के रामकथा के अनोखे शोध शिल्पकार थे। उनके जन्म दिन एक सितम्बर पर अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में अपने भाव व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि भारत का गौरवपूर्ण इतिहास जिन ग्रंथों में आज भी सुरक्षित है, उनमें रामायण और महाभारत का विशिष्ट स्थान है। विदेशों के रामकथा के लेखकों में फादर कामिल बुल्के अग्रणी हैं। डॉ. जैन ने कहा कि पुराने समय में भारत यात्रा पर आये विश्व के अनेक विद्वानों में फादर कामिल बुल्के ही ऐसे थे जो भारत आए तो यहीं के हो गए और हिन्दी के लिए वह काम कर गए, जो शायद तब कोई भारतीय भी नहीं कर सकता था।

डॉ. जैन ने बताया कि कोरोना कालखंड में उन्होंने धरोहर रूप में घर पर ही सुरक्षित स्वयं डॉ कामिल बुल्के के मूल शोध ग्रन्थ रामकथा का मनोयोग के साथ अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि फादर बुल्के बेल्जियम से आये और यह देश इतना प्रिय लगा कि भारत में ही बस गए। रोचक विमर्श में डॉ. जैन ने बताया कि डॉ. बुल्के ने स्वयं लिखा है – मैं जब 1935 में भारत आया तो अचंभित और दुखी हुआ। मैंने महसूस किया कि यहाँ पर बहुत से पढ़े-लिखे लोग भी अपनी सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति जागरूक नहीं हैं। यह भी देखा कि लोग अँगरेजी बोलकर गर्व का अनुभव करते हैं। तब मैंने निश्चय किया कि आम लोगों की इस भाषा में महारत हासिल करूँगा। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से संस्कृत में मास्टर्स डिग्री हासिल की। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सन् 1949 में रामकथा पर डी.फिल. किया। बाद में तुलसीदास के रामचरित मानस का गहन अध्ययन कर, सन् 1950 में उन्होंने राम कथा की उत्पत्ति और विकास पर पी.एचडी. की उपाधि प्राप्त की।

डॉ. जैन ने बताया जिस समय फादर बुल्के इलाहाबाद में शोध कर रहे थे, उस समय यह नियम था कि सभी विषयों में शोध प्रबंध केवल अँगरेजी में ही प्रस्तुत किए जा सकते थे । डॉ. बुल्के के लिए अँगरेजी में यह कार्य अधिक आसान होता पर यह उनके हिन्दी स्वाभिमान के खिलाफ था। उन्होंने आग्रह किया कि उन्हें हिन्दी में शोध प्रबंध प्रस्तुत करने की अनुमति दी जाए। इसके लिए शोध संबंधी नियमावली में परिवर्तन किया गया। याद रहे कि उनकी रामकथा की बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने रामकथा से सम्बन्ध रखने वाली किसी भी सामग्री को छोड़ा नहीं है। यह ग्रंथ वास्तव में रामकथा सम्बन्धी समस्त सामग्री का विश्वकोष कहा जा सकता है।

डॉ. चंद्रकुमार जैन ने आगे बताया कि हिंदी भाषा-साहित्य पर काम करते-करते हिंदी भाषा की शब्द-संपदा से डा. कामिल बुल्के कुछ इस तरह प्रभावित हुए कि उन्होंने एक शब्दकोश ही बना डाला। इस शब्दकोश का इतना स्वागत हुआ कि बाद में उन्होंने अथक परिश्रम कर एक संपूर्ण अंग्रेजी-हिंदी कोश बनाया जो आज भी हिंदी भाषा का प्रामाणिक शब्दकोश माना जाता है। एक सितम्बर 1909 से सत्रह अगस्त 1982 तक की डॉ. कामिल बुल्के की जिंदगी का सफर राममय जीवन का बिरला उदाहरण बन गया। डॉ. कामिल बुल्के हिंदी और हिंदी साहित्य का उन्होंने विश्व वैभव बढ़ाकर हिंदी और रामकथा प्रेमी जनमानस के वे आदर्श बन गए।

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