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अगले 40 साल बाद पाकिस्तान का अस्तित्व ही नहीं रहेगाः मुज़फ्फ़र हुसैन

मुज़फ्फ़र हुसैन जैसे पत्रकार को सुनना ऐसा ही है  जैसे इतिहास, राजनीति, धर्म की कई किताबों को एक साथ पढ़ लिया। पत्रकार, चिंतक, लेखक और इस्लामिक मामलों के साथ ही वैश्विक राजनीति के गहन जानकार मुज़फ्फर हुसैन को पढ़-पढ़ कर ही पत्रकारिता सीखी और समझी और पत्रकारिता का चस्का भी लगा, स्कूली दिनों से लेकर आज तक उनको पढ़ते हुए जो सीखा वो कई किताबें पढ़कर भी नहीं सीखा जा सकता है। अपनी धाराप्रवाह हिन्दी में जब वे किसी भी विषय पर बोलने खड़े होते हैं तो ऐसा लगता है मानो आप कोई व्याख्यान नहीं सुन रहे हैं बल्कि कोई फिल्म देख रहे हैं। विषय कितना भी गूढ़-गंभीर हो, अपने गहन विश्लेषण, तथ्यों और सहज भाषा के जरिए उस विषय में आपको वे ऐसा डुबो देते हैं कि कुछ ही देर में आप भी अपने आपको उस विषय का जानकार समझने लगते हैं। एक सफल वक्ता की विशेषता भी यही होती है कि वह अपनी बात पाठकों के दिलो-दिमाग में बिठा दे।
 
मुंबई के विश्व अध्ययन केंद्र द्वारा आयोजित लोकाधिकार से लोकसंहार तक – मध्य एशिया की कहानी विषय पर आयोजित संगोष्ठी में श्री मुज़फ्फ़र हुसैन ने जब इस विषय को लेकर भूगोल और धर्म के सैकड़ों साल के इतिहास की एक-एक करके जो परतें खोलना शुरु की तो मध्य एशिया का एक ऐसा चित्र सामने आया जो न टीवी की खबरों में दिखाई देता है न अखबारों की खबरों में और न तथाकथित बुध्दिजीवियों के विद्वतापूर्ण आलेखों में।
 
‘लोकाधिकार से लोकसंहार तक – मध्य एशिया की कहानी’ –विषय पर चर्चा की शुरुआत करते हुए श्री हुसैन ने कहा मध्य पूर्व ऐसा क्षेत्र है जो विगत सैकड़ों साल से गलत वजहों से चर्चा में रहा है, लेकिन जब से यहाँ पेट्रोल जैसे तेल की खोज हुई इसका महत्व बढ़ गया। उन्होने कहा कि विगत 3600 वर्षों से मध्य पूर्व चर्चा और विवाद में रहा है। इसका महत्व इसलिए भी है कि यहाँ की धरती से तीन बड़े धर्मों का जन्म हुआ।  विगत 3600 वर्ष पहले मध्य पूर्व में यहूदी धर्म उदय हुआ। 1600 वर्ष बाद यानी 2 हजार साल पहले यहाँ इसाई धर्म अस्तित्व में आया और इसके बाद यानी 1500 वर्ष पहले इस्लाम धर्म की नींव पड़ी। विगत 2 हजार साल के इतिहास में मध्य पूर्व में ज़बर्दस्त खून बहा और आज बी ये सिलसिला जारी है। श्री हुसैन ने कहा कि भारत में भी हिन्दू धर्म के बाद इससे जैन और बौध्द धर्म का उदय हुआ लेकिन भारत के इतिहास में कभी धर्म को लेकर खून खराबा इसलिए नहीं हुआ कि हमारे इन धर्मों में हिंसा नहीं थी और धर्म गैर राजनीतिक थे, हमारे संतों या ऋषि मुनियों ने सत्ता का मोह नहीं किया। जबकि मध्य-पूर्व में जो धर्म  अस्तित्व में आए वो राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिए आए थे, इसलिए उनकी जड़ में हिंसा थी। धर्म कैसा होगा इसके लिए वह जहाँ अस्तित्व में आता है उसकी हवा, पानी और धरती का भी अपना महत्व होता है। भरत की धरती गैर राजनीतिक रही जबकि मध्य पूर्व की धरती राजनीतिक महत्वाकाँक्षोओं की।
 
श्री हुसैन ने कहा कि आज दुनिया का हर देश मध्य-पूर्व के देशों पर अपना कब्जा करना चाहता है क्योंकि दुनिया का 93 प्रतिशत पेट्रोल इन देशों के कब्जे में है। अमरीका अपनी कूटनीतिक चालों से इन देशों के साथ राजनीति कर रहा है और अपना दबदबा इन देशों पर बना रखा है। दुनिया भर में 52 मुस्लिम देश है लेकिन अमरीका ऐसी कुटिल चालें चलता है कि यूएनओ में उसकी चलती है।
 
उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व में बारतीय सबसे ज्यादा हैं और वे मज़दूर के रूप में काम कर रहे हैं, इन्हें बहुत ही नारकीय स्थिति में काम करना पड़ता है।
 
उन्होंने मनुष्य के जन्म की विभिन्न धार्मिक मान्यताओं की चर्चा करते हुए कहा कि मध्य एशिया का मानना है कि मनुष्य का पहला जन्म वहाँ हुआ। जिसे वे आदम या अब्राहम का नाम देते हैं। जबकि हमारी मान्यता में मनु मनुष्यों के पूर्वज थे। कुछ इतिहासविदों का कहना है कि आदम का जन्म श्री लंका में हुआ था और उसकी कब्र आज भी उत्तर प्रदेश में अयोध्या के पास में है। मध्य एशिया वाले आदम को पहला पुरूष मानते हैं।
 
भारत पूरे एशिया महाद्वीप के दक्षिण में मौजूद है। उत्तर में चीन, जापान है और मध्य पूर्व में छोटे-बड़े कुल मिलाकर 22 इस्लामिक देश हैं। मुस्लिमों का माना है कि पहला पैगंबर आदम है और मजे की बात ये है कि पैगंबर की परंपरा में अभी तक 1.24 लाख पैगंबर हो चुके हैं। मोहम्मद पैगंबर की परंपरा के अंतिम पैगंबर थे। मोहम्मद का जन्म मक्का –मदीना में हुआ। जबकि आदम के बाद नूह और फिर अब्राहम और उनकी संतान इस्माईल और आईजिक हुए। मोहम्मद इस्माईल के पुत् थे। भारतीय और मध्य पूर्व की लिपि का विश्लेषण करते हुए श्री मुज़फ्फ़र हुसैन ने कहा कि हमारी भाषा बाँए से दाएँ लिखी जाती है और हमारे अक्षर ऊपर से नीचे जाते हैं जबकि मध्य पूर्व की अरबी भाषा चंद्रमा की तरह लिखी जाती है उनके हर अक्षर में चंद्रमा जैसा घुमाव होता है और वह ऊपर की ओर खत्म होती है। उनके लिए चंद्रमा इसलिए महत्वपूर्ण है कि सूरज की तपती रोशनी के बाद चंद्रा से ही उनको ठंडक मिलती है। उनका जीवन रेगिस्तान में ही शुरु होता है और वहीं खत्म होता है।
 
श्री हुसैन ने कहा जैसे भारत में गाय का महत्व है वही महत्व मध्य पूर्व में ऊँट का है। ऊंट को लेकर अरबी भाषा में 3 हजार शब्द हैं। ऊंट की आँखें ऐसी है कि जब वह भागता है तो उसकी आँखों में रेगिस्तान की रेत नहीं जाती और जब तूफान आने पर वह अपने सवार को लेकर भागता है तो अपनी गर्दन पीछे कर मालिक का रेगिस्तानी रेत से बचाव भी करता है। ऊंट को रेगिस्तान में आने वाले तूफान की जानकारी दो घंटे पहले हो जाती है और वह ऐसे में अपने मालिक को अपने पैरों में छुपा लेता है। ऊंट ही एकमात्र ऐसा जानवर है जिसका कोई भी अंग सीधा नहीं होता। जब तूफान गुज़र जाता है तो ऊंट मालिक को चाटकर अपने प्यार का इज़हार करता है और बदले में मालिक भी उसे चूमता है। ऊंट रेगिस्तानी तूफान में 30 कि.मी. प्रति घंटे की गति से बागता है और उसका सवार एक हरबी गीत गाता है।
 
मध्य पूर्व की चर्चा करते हुए श्री मुज़फ्फ़र हुसैन ने कहा कि ये सबी देश सउदी अरब और यमन के भाग हैं। अरबिस्तान में 1.24 लाख पैगंबर हुए हैं। जिसमें से ये लोग 9 को अति पवित्र मानते हैं। जिनमें एडम, नूह, अबराम, मूसा, ईसा और मोहम्मद प्रमुख हैं। उन्होंने कहा कि अबराम में राम शब्द कैसे आया इस पर भी शोध होना चाहिए।
 
उन्होंने कहा कि यहूदी मध्य एशिया का सबसे प्राचीन धर्म है और इस्लाम अंतिम धर्म है। अबराम यहूदी धर्म के संस्थापक थे। इसके बाद दूसरे पैगंबर ईसा मसीह हुऐ। ईसा के 600 साल बाद इस्लाम का जन्म हुआ। उन्होंने कहा कि भारत ने कभी भी युध्द करके अपने साम्राज्य का विस्तार नहीं किया। जबकि मध्य एशिया में धर्म की आड़ में सत्ता की लड़ाई लड़ी गई। इसाईयों ने यहूदियों को सताया और उनके अस्तित्व पर संकट पैदा हो गया। लेकिन ईश्वर ने यहूदियों को तीन चीजें दी है जो दूसरी किसी और जाति के पास नहीं। यहूदी बहुत खूबसूरत, बुध्दिमान और पैसे वाले होते हैं। अल्बर्ट आईंस्टिन से लेकर परमाणु बम बनाने वाले और तमाम महत्वपूर्ण खोज करने वाले वैज्ञानिक यहूदी थे। द्वितीय विश्व युध्द में यूरोप को तमाम शस्त्र और परमाणु बम यहूदियों ने ही नबाकर दिए थे और उन्होंने शर्त रखी थी कि युध्द समाप्ति के बाद उन्हें एक देश के रूप में मान्यता दी जाएगी। युध्द खत्म होते ही उन्हें इज़राईल नाम के देश में बसाया गया। मध्य पूर्व के 44 से 48 इस्लामिक देशों के बीच मात्र 7.5 लाख की आबादी वाला ये छोटा सा देश बसा हुआ है और आज पूरी दुनिया पर इसकी धाक है।
 
1924 से 1928 के बीच पेट्रोल निकलने के बाद मध्य पूर्व की राजनीति पूरी तरह बदल गई। इसके पहले इरान कृषि प्रधान देश था। बग़दाद एक बसा हुआ उन्नत शहर था, अरब के लोग रेगिस्तान में जहाँ तहाँ भटकते रहते थे और अपने कबीले बनाते थे।
 
पारसी धर्म का उदय ईरान में हुआ लेकिन ईरान के राजनेताओं ने पारसियों के साथ मार काट की तो  कुछ गिने चुने पारसी एक जहाज में सवार होकर भाग निकले, उन्हें ये पता नहीं था कि ये जहाज कहाँ जाएगा।  ईरान से भटकता हुआ ये जहाज गुजरात के नारगोल में (जो मुंबई से मात्र तीन घंटे की दूरी पर स्थित संजान स्टेशन के पास है) जा पहुँचा। जब सूरत के राजा (जिनके अधीन नारगोल  था)  को ये पता चला कि कोई अनजान देश का जहाज आया है तो उन्होंने उसकी जाँच करवाई। जहाज में सवार पारसियों ने राजा को इशारे से समझाया कि वे अपनी जान बचाकर भाग कर आए हैं। और उनके देश में रहना चाहते हैं। इस पर राजा ने शर्त रखी कि वे उनके राज्य में तभी रह सकते हैं जब वे लिखित अनुबंध करें कि ले अपने धर्म ग्रंथों का अनुवाद गुजराती में करवाएँगे, वे कभी राज्य के खिलाफ हथियार नहीं उठाएँगे और उनकी स्त्रियाँ  भारतीय महिलाओं की तरह साड़ी पहनेगी। उन्होंने कहा कि हमारे एक छोटे से शहर के राजा में कितनी दूरदर्शिता और बुध्दिमत्ता थी कि उसने परदेश से आए लोगों को भारतीय मूल्य और परंपराओं का सम्मान करने की शर्त के साथ अपने यहाँ शरण दी।
 
इज़राईल की चर्चा करते हुए श्री मुज़फ़्फर हुसैन ने कहा कि इज़डराईल और मध्य पूर्व के इस्लामी देशों का इतिहास साँप और नेवले की लड़ाई जैसा है। आज 43 लाख यहूदी चारों से इस्लामिक देशों से घिरे हैं। वेटिकन सिटी जैसे इसाईंयों का पवित्र शहर है वैसे ही इजड़राईल यहूदियों के लिए पवित्र है।
 
मध्य पूर्व की राजनीति की चर्चा करते हुए श्री हुसैन ने कहा कि प्राचीन समय में इराक और बगदाद थे फिर सीरिया बना। इराक के साथ सीरिया मिल गया। मध्य पूर्व का अन्य देश टर्की एक सभ्य देश रहा।
 
उन्होंने कहा कि सीरिया में अल बगदादी इस्लाम की हुकूमत कायम करना चाहता है और अगर चौथा महायुध्द हुआ तो वह सीरिया में ही होगा।
 
श्री हुसैन ने कहा कि सीरिया में मुस्लिमों के अलावा एक और जाति है यज़दी। अल बग़दादी के लोग चुन-चुन कर इन यज़दी लोगों को ख़त्म कर रहे हैं और उनकी महिलाओं पर बेइंतहा जुल्म किए जा रहे हैं। न्यू यॉर्क टाईम्स और वाशिंगटन पोस्ट के खोजी पत्रकारों ने भेस बदलकर सीरिया के अंदरुनी हिस्सों में जाकर, अपनी जान जोखिम में जाकर इन यज़दी लोगों पर हुए अत्याचारों की खौफनाक तस्वीर पेश की है उससे सुनकर क्रूर से क्रूर आदमी के भी रोंगटे खड़े हो जाएँ। अब सवाल ये है कि ये यजदी कौन हैं? श्री हुसैन ने कहा कि न्यू यॉर्क टाईम्स ने जो रिपोर्ट लिखी है उसके अनुसार ये यजदी सैकड़ों साल पहले कश्मीर से जाकर वहाँ हबसे थे जो व्यापार के लिए गए थे। यज़दी महिलाएं भारतीय महिलाओं की तरह ही साड़ी पहनती है और बालं में जूड़ा बाँधती है। इनके घरों के बाहर यज्ञ वेदी बनी हुई है जहाँ ये प्रतिदिन यज्ञ करते हैं। ये अपने आपको कश्यप गौत्र का बताते हैं। कश्यप ऋषि का संबंध भी कश्मीर से ही रहा और माना जाता है कि कश्मीर को कश्यप ऋषि ने ही बसाया था। श्री मुज़फ्फर हुसैन ने कहा कि हमें यज़दी समुदाय का इतिहास खोजना होगा और मानवीय आधार पर उन्हें मदद पहुँचाना होगी। जैसे 3.5 लाख इजड़ाईलियों के लिए एक नया देश बनाया गया ऐसा ही यज़दियों के लिए भी एक अलग व स्वतंत्र देश बनाया जाना चाहिए ताकि वे अपनी परंपराओं और मूल्यों के साथ सुरक्षित रूप से रह सकें। एक अनुमान के अनुसार यज़दियों की आबादी साढ़े सात लाख के लगभग है। उन्होंने कहा कि हम भारतीय नागरिकों को ये मामला संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार आयोग में उठाना चाहिए ताकि हम मानवीय आधार पर इन यज़दियों की मदद कर सकें। साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ से एक दल भेजा जाना चाहिए जो यज़दियों पर हो रहे अत्याचारों की खोजबीन कर दुनिया के सामने सच्चाई ला सके।
 
मध्य पूर्व की राजनीतिक स्थिति पर अपने उद्बोधन का समापन  उन्होंने कहा कि विश्व राजनीति में आने वाला कल भारत का है। इरान हमेंशा से भारत के साथ रहा है और आगे भी रहेगा। अफगानिस्तान का पठान आज भी भारत को चाहता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज पाकिस्तान में जो हालात बन रहे हैं, उससे ऐसा लगता है कि आने वाले 40 साल में पाकिस्ताना का नामों-निशान मिट जाएगा, मगर ये तभी संभव है जब आने वाले समय में देश को इन्दिरा गाँधी जैसा की नेता मिले। 

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