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वामपंथ का वो ज़हर जो हमारी रगों में दौड़ रहा है

वामपंथ पर एक पुस्तक छपी है “विषैला वामपंथ”जिसके लेखक हैं डॉ राजीव मिश्रा। इस पुस्तक के कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं को सामने लाने का प्रयास अभाविप की राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य श्री अभय ने किया है।

इस पुस्तक में दिए गए तथ्यों से आप समझ सकते हैं कि किस तरह हमारी सरकारों ने वामपंथ के ृज़हर से हमारी शिक्षा नीति, हमारी राष्ट्रीय भावनाओँ, हमारे इतिहास, गौरवशाली अतीत, हमारी आयुर्वेदिक व पारंपरिक चिकित्सा, हमारे संस्कार और हमारे मंदिरों को नष्ट करने का षड़यंत्र कर हमारे अंदर ऐसी संस्कृति, विचारधारा और सोच के बीज बो दिए जिसने हमारी कई पीढ़ियों की सोच को ज़हरीला बना दिया। वामपंथ की तुलना हम कोरोना वायरस से कर सकते हैं जो सीधे फेफड़े पर मार करता है और अगर ईलाज हो भी जाए तो आपको शारीरिक रूप से ऐसा कमजोर कर देता है कि आपको वापस सामान्य होने के लिए योग, प्राणायम , ध्यान व अध्यात्म की शरण में जाना पड़ता है, लेकिन वामपंथ तो आपकी सोच पर ऐसा हमला करता है कि आपको ये समझने में ही कई साल लग जाते हैं कि आप इसके षड़यंत्र के शिकार हो चुके हैं। इस पुस्तक को पढ़ेंगे तो आपको अपने आसपास की राजनीति से लेकर दुनिया के देशों के राजनीतिक षड़यंत्रों की तथ्यात्मक जानकारी मिलेगी।

पिछले कुछ वर्षों में वामपंथ ने अपने स्वरूप में परिवर्तन किया है और समाज के बीच में वायरस की तरह कार्य कर रहा है। हमें लगता है कि वामपंथ अब केरल और जेएनयू में बचा है ।ऐसा नहीं है,यह एक भ्रम है।वामपंथ अब सीधे समाज के बीच में कार्य कर रहा है।यह नए-नए नैरेटिव समाज में लेकर आता है। जिससे समाज में संघर्ष उत्पन्न हो सके,यही इसका नया स्वरूप है।जो हमे आज देखने मे आते हैं। उन्होंने साहित्य,कविता,संगीत,फिल्म हर जगह अपने लोगों से भर दिया है और समाज की सोच बदलने का लगातार प्रयास कर रहे हैं।

वामपंथ ने 1950 के बाद पूरे यूरोप में कितना नुकसान पहुंचाया है इसकी कल्पना भी करना संभव नहीं है। इन्होंने नारीवाद,पितृसत्ता एवं फेमिनिज्म के नाम पर समाज को तोड़ने का कार्य किया है।आज इन्हीं सब रूपों में भारत में भी देखने को मिलता है। इन्होंने इतिहास को समाज में तोड़ मरोड़ कर पेश किया है। आज वामपंथ समाज को आकर्षित करने के लिए नए नए रूपों में कार्य कर रहा है। भारतीय संस्कृति का अकल्पनीय नुकसान भी वामपंथ ने किया है।

हमें आज सजग रहने की आवश्यकता है।उसके बदलते स्वरूप को पहचान कर समाज को जागरूक करने का प्रयास भी करने की आवश्यकता है ।जिस प्रकार पूरे यूरोप की संस्कृति को वामपंथ ने नष्ट किया ।वही एजेंडा भारत में वामपंथ लेकर आया है।हमें इसके इस नए स्वरूप को पहचानने की आवश्यकता है।

● वामपंथ:अंधेरे में शत्रु
लड़ाइयां सबसे ज्यादा रात में होती हैं।क्योंकि दुश्मन अंधेरे में छुपकर वार करता है।वही शत्रु ज्यादा खतरनाक है जो दिखाई नहीं देता।
वामपंथ भी वैसा ही है ,हमें लगता है वामपंथ बंगाल और केरल छोड़कर कहीं नहीं है शायद पूरी दुनिया से खत्म हो गया है ।किंतु सच तो यह है वामपंथ पहले से कई गुना ज्यादा मजबूत हुआ है,पर आज वह किसी कम्युनिस्ट या मार्कसिस्ट नाम से नहीं है, बल्कि उदारवाद और आधुनिकता के नाम पर घूम रहा है। एक सामाजिक आंदोलन की तरह,अलग से नहीं दिखाई देता। यही उसकी एक बड़ी ताकत है।
वामपंथ में अपने मसीहा कार्ल मार्क्स को त्याग दिया है और आज उससे भी कहीं ज्यादा खतरनाक और जहरीला होकर समाज के मूल्यों और मांनको को विकृत और भ्रष्ट कर रहा है ।
आज वामपंथ “पॉलीटिकल करेक्टनेस” के नाम से समाज को संचालित कर रहा है।
एक समय अमेरिका में वामपंथी होना अपराध था लोग वामपंथी होने के शक में जेल चले जाते थे। सॉल अलिंसकी जैसे कम्युनिस्ट को गुरु मानने वाले “बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति” बन जाते हैं इसे देखकर तो ऐसा लगता है कि वामपंथ पहले से कहीं और अधिक मजबूत हुआ है
वामपंथ को देखें वह अपने किलो को छोड़कर समाज में आ गएहै।शिक्षा,साहित्य,पत्रकारिता,कानून के मैदानों में मोर्चा ले लिया है।उन्हें पहचानना आज हमारे सामने बड़ी वैचारिक चुनौती है।

पहले डायग्नोसिस, फिर इलाज
वामपंथी पहले की तरह है झोला टांग का दाढ़ी बढ़ाकर इंकलाब जिंदाबाद का नारा नहीं लगाते ।अब उन्होंने कुछ परिवर्तन किए जैसे कि भ्रम फैलाना।
वामपंथी का एक और हथियार है,बात कितनी भी स्पष्ट हो वह विद्वता और कुतर्क का ऐसा गुब्बार खड़ा कर देंगे सच छुप जाए।
पुराने मार्क्सवादी वामपंथी डाकू थे और आज के वामपंथी चोर हैं वह झुंड में काम करते हैं।
आज के वामपंथी सिंड्रोम की तरह है,उसको हम वामपंथ सिंड्रोमिक कह सकते हैं।आपको देखने में आएगा वामपंथ,जनवादशोषण पूंजीपति के षड्यंत्र जैसे शब्द बोलता सुनाई पड़ता है।कुछ और बातें मिलेंगी नारी के अधिकार,अल्पसंख्यकों पर अत्याचार ऐसे सारे शब्द आज के समय में वामपंथी करते है।
समलैंगिकता का समर्थन करते मिलेंगे,मोदी और ट्रंप का विरोध मिलेगा,उनके भीतर हिंदू धर्म के प्रति गहरी घणा मिलेगी, राष्ट्रद्रोहियो और जिहादियों के लिए सहानुभूति मिलेगी।
अन्ना आंदोलन के समय अरविंद केजरीवाल सबको ईमानदार लगता था तो उसका एक कारण था कि हम उसे उसमें छिपे वामपंथी को नहीं पहचान पाए।
अगर आपको अन्याय अत्याचार पर खून के आंसू बहाते लोग देखें तो वह भी वामपंथ सिंड्रोम की पहचान हो सकती है।


वामपंथ का किला:अमेरिका
अमेरिका माने पूंजीवाद,रूस माने साम्यवाद,कम्युनिस्ट माने सीपीएम ।वामपंथी मात्र सीपीएम में नहीं,बड़ी संख्या में कांग्रेसी भी वामपंथी है और राष्ट्रवादी सोच के लोगों को भी वामपंथी विचारों ने इफेक्ट किया है।
वामपंथ सिर्फ रूस,चीन और पूर्वी यूरोप की समस्या नहीं थी यह पश्चिमी यूरोप और अमेरिका की भी समस्या थी
दुनिया में वामपंथी चिंतक अमेरिका और यूरोप से ही हुए हैं ।

जोसेफ मैक्कार्थी
वामपंथ के विरुद्ध अमेरिका में संघर्ष करने वाला महत्वपूर्ण नाम सीनेटर जोसेफ मैक्कार्थी का है
मैक्कार्थी ने 1950-56 के बीच में पहचाना कि कम्युनिस्ट अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट,व्हाइट हाउस,जुडिशरी,मीडिया,हॉलीवुड,यूनिवर्सिटी और यहां तक कि सीआईए और अमेरिकी सेना तक घुसपैठ कर गए हैं।
मैक्कार्थी के इस दावे के बाद आज हम भारत में असहिषुणता का हल्ला सुन रहे हैं उससे कई गुना हंगामा अमेरिका में हुआ। लेकिन मैक्कार्थी का निश्चय दृढ़ था
उसने परमाणु और रक्षा प्रतिष्ठान में काम कर रहे रूसी जासूसों को पकड़ा और विश्वविद्यालय में घुसे वामपंथियों की नाक में दम किया।
36 दिनों तक मैक्कार्थी पूरे देश की मीडिया और सैन्य संस्थानों का दृढ़ता से सामना किया ।
इन्हीं 3 वर्षों के भीतर मैककार्थी घुटने के दर्द की शिकायत लेकर अस्पताल में भर्ती हुआ,यहां कुछ दिन बाद उसकी रहस्यमय रूप से मृत्यु हो गई, जब वह भर्ती हुआ था उसका स्वास्थ्य ठीक था।
वामपंथियों के बारे में कहा जाता है कि वह लाश खुले में नहीं छोड़ते हैं,बल्कि जमीन के नीचे नमक के साथ गाड़ देते हैं,जिससे लाश बिल्कुल गल जाए और कुछ भी ना बचे।अमेरिकी वामपंथियों ने भी मैक्कार्थी के साथ भी ऐसा ही किया उसकी राजनीति खत्म की बल्कि उसकी राजनीतिक विरासत जमीन के अंदर दफना दी।
अमेरिका राजनीति में मैक्कार्थी नाम बुरा जाना जाता है मैक्कार्थी ने अपने समय में अमेरिकी तंत्र के अंदर छुपे कम्युनिस्टों की कमर तोड़ दी थी।
मैककार्थी के मरने के बाद अमेरिका में वामपंथी कहलाना खतरे की बात नहीं थी।


जॉन एफ केनेडी की महानता का सच
राष्ट्रपति John F Kennedy के बिना अमेरिकी वामपंथ की चर्चा नहीं की जा सकती।
1959-60में केनेडी के प्रचारक के लिए फ्रैंक सिनाट्रा जैसे पॉप स्टार ने प्रचार किया ।
केनेडी मीडिया और हॉलीवुड के लिबरल का दुलारा था, लेकिन अमेरिकी राजनीति का पप्पू बन गया।
केनेडी को थोड़ी भी राजनीति की समझ नहीं थी उसको तो वह उसके पिता से विरासत में मिली थी।
केनेडी का व्यक्तिगत जीवन भी बहुत रंगीन था।
केनेडी का कभी कोई “मी टू” नहीं आया,उसके जिंदा रहते मीडिया ने उसकी छवि बना कर रखी,मरने के बाद में लिबरल का मसीहा हो गया।
केनेडी के शासनकाल में कम्युनिश्म खूब फला फूला।केनेडी एक क्लोजेट कम्युनिस्ट था।
उसने क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो को हटाने के नाम पर विद्रोहियों की पूरी फौज को “वे ऑफ पिग्स” में एक मूर्खतापूर्ण मिशन में मरने के लिए भेज दिया, जिससे अमेरिका की बड़ी आलोचना हुई।
वह अमेरिका के अश्वेतो से बहुत सहानुभूति रखता था, उनके लिए अच्छी बातें करता था पर उसने भेदभाव हटाने का कोई प्रयास नहीं किया और कोई कानून भी नहीं लाया ।यह वामपंथियों की खास कार्य पद्धति है। एक तरफ से जमकर विरोध करते हैं भावनाएं भड़क आते हैं और यह भी चाहते हैं कि उसका समाधान ना हो।
अमेरिकी जासूसी और सामरिक तंत्र में कनेड़ी को खतरा समझ रास्ते से हटा दिया ।उसके बाद भी वह मीडिया और और लिबरल गैंग की आंखों का तारा है। कनेड़ी मरा नहीं।
केनेडी की गलत नीतियों से अमेरिका को बचाने के लिए सीआईए ने उसकी हत्या करवाई होगी ।


रिचर्ड निक्सन
निक्सन रिपब्लिकन होने के साथ ही कम्युनिस्टों का विरोधी था ।
निक्सन वर्षों तक लिबरल मीडिया के नंबर 1 शत्रु रहे और वह लगातार मीडिया से लड़ते रहे,मीडिया की सारी दुश्मनी के बावजूद दो बार राष्ट्रपति चुनावों में विजयी हुए और मीडिया की निक्सन से दुश्मनी पुरानी थी।
1950 में (हाउस अन-अमेरिकन एक्टिविटी कमेटी) अमेरिकी कम्युनिस्टों को सबसे ज्यादा नुकसान निक्सन ने पहुंचाया था। इस कमेटी का काम कम्युनिस्टों को ढूंढ कर उन पर कार्यवाही करने का था।
अमेरिकी गवर्नमेंट के ख़ुफ़िया दस्तावेज जो पंपकिन पेपर्स के नाम से अमेरिका में बहुत चर्चित है उसको चुराने वाले वामपंथी को पकड़ना और उसको सजा दिलाने का काम करना
निक्सन अपनी सदी के सबसे प्रभावशाली अमेरिकी राष्ट्रपति थे वामपंथी उपद्रवों के बावजूद 1972 में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के इतिहास में सबसे भारी बहुमत से दोबारा चुने गए।
अमेरिका में वॉटरगेट कांड बहुत चर्चित है जिसका नाम निक्सन के साथ जोड़ा गया यह सारी योजना वामपंथियों की थी और वॉटरगेट कांड अमेरिका में इतना उछला की निक्सन को इस्तीफा देना पड़ा ।
आज निक्सन को वाटर गेट कांड की वजह से जानते है।वामपंथी जंगली कुत्तों के जैसे है उनके बारे में कहा जाता है, उनका झुंड़ शेर का शिकार भी कर लेता है। वामपंथी भी झुंड में शिकार करते हैं वॉटरगेट कांड इसका प्रमाण है।

जिमक्रो की भारत यात्रा
वामपंथियों द्वारा अश्वेत अधिकारों का एक सिविल राइट मूवमेंट आंदोलन खड़ा किया गया,इस मूवमेंट में अश्वेत लोगों पर हो रहे अत्याचार को लेकर एक कानून बना जिसको जिमक्रो के नाम से जानते हैं ,जिमक्रो यह अश्वेतो के प्रति अनादर का शब्द था।
इस कानून के अनुसार श्वेत और अश्वेत अलग अलग रखे गए ,अलग बसों में चलते अलग अलग रेस्टोरेंट मैं खाते-पीते ,इससे वामपंथियों ने दोनों समाज को एक दूर ले जाने का काम करने के लिए किया।
इसके बाद अमेरिका में हजारों घटनाएं ऐसी हुई जिसमें श्वेत भीड़ ने किसी अश्वेत को पकड़कर पीटा उसके नाक-कान काट लिए, आंखें फोड़ दी, जिंदा जला दिया। ऐसी भयंकर यातनाएं देकर अश्वेतो को अमेरिका में मारा गया, ऐसी घटनाओं को लिंचिंग सक्सेस बताया गया।
उन्नीस सौ पचास साठ के दशक में सिविल राइट मूवमेंट के नेता बनकर डॉक्टर मार्टिन लूथर किंग उभरे ,बड़ी-बड़ी रैलियां की उन्हें विश्व में अमेरिकी गांधी की संज्ञा दी, उनकी 1964 में हत्या हुई।
उनके इस आंदोलन में कम्युनिस्टों ने पैठ बना ली और देखते-देखते आंदोलन हिंसक होते चले गए ।जैसा भारत में आज के समय में हम देख रहे हैं प्रदर्शन भारत के देखते हैं जैसे गुर्जर आंदोलन, जाट ,आंदोलन पटेल आंदोलन ऐसे बहुत सारे आंदोलन है जो शांति से शुरू होते अंत में हिंसक हो जाते हैं। यह स्क्रिप्ट ही ववामपंथियों की है।
जो अमेरिका में हुआ उसी का परिदृश्य आज हमें भारत में देखने को मिलता है दलित अधिकारों की मांग बिल्कुल अमेरिकी सिविल राइट्स आंदोलन की तर्ज पर खड़ा किए जाने का प्रयास है,भीड़ जुटाना, उन्माद पैदा ,करना जातीय हिंसा फैलाना पुलिस को आक्रमक कार्रवाई करने के लिए मजबूर करना ।ऐसा वामपंथियों का ग्लोबल स्ट्रैटेजिक भी है। यह तो भीम मीम की पार्टनरशिप भी पुरानी है जिसको हम अमेरिकी इतिहास में देख सकते हैं।

वामपंथ :पीड़ा का व्यवसाय
अन्याय के प्रतिकार का स्टैंड वामपंथियों का बहुत सशक्त हथियार है ,पहले समाज में अन्याय को खोजना फिर उसे अन्याय और पीड़ित के ग्रुप्स में बांटना संगठित और संस्थागत अन्याय का नेरिटिव खड़ा करना फिर पीड़ित व्यक्ति के लिए आवाज उठाने के नाम पर तथाकथित पीड़ित समाज का झंडा खड़ा करना और समाज में सतत संघर्ष का माहौल बनाए रखना यही वामपंथी रणनीति है।
उनके नरेटीव में पहले अमीर गरीब पर अत्याचार करता था और आज के समय में हिंदू मुसलमान पर अत्याचार करता है, स्वर्ण दलित पर और पुरूष स्त्री पर कहीं अन्याय आज नहीं हो रहा तो 300 साल पहले हुआ होगा। यह है वाम पंथी द्वारा नैरेटिव खड़ा किया जाता है।
अत्याचारी और पीड़ित का समीकरण खोजता और बनाता हुआ व्यक्ति वामपंथी है। अब उसे सीपीआई सीपीएम में खोजना बंद करना चाहिए।

अमीरों द्वारा गरीबी की मार्केटिंग
वामपंथ पूंजीवादी शब्द कहता बहुत सुनने में आता है लेकिन अगर हम वामपंथ का इतिहास देखते हैं तो वामपंथ और समाजवाद के जितने भी प्रमुख लोग हैं उन सब की पृष्ठभूमि बड़े पैसे वाले खान दानों की उपज है ।या किसी पैसे वाले के परजीवी रहे।
एंगेल्स बहुत ही पैसे वाला था, मार्क्स उसके पैसे पर जिंदगी भर ऐस करता था, लेनिन रूस के राजनायिक खानदान का बारिश था,माओ एक बड़े जमीदार परिवार का था, ऐसे ही अमेरिकी लेवलरल के पोस्टर बॉय केनेडी का परिवार अमेरिका के सबसे अमीर परिवारों में से था।
ऐसे ही एक वामपंथी फेलिक्स ने फ्रैंकफर्ट स्कूल की स्थापना की और आज पूरी दुनिया में इस स्कूल से वामपंथ का गंदा नाला बहता है।
वहीं दूसरी तरफ जितने दक्षिणपंथी नेता हुए पूंजीपतियों के कुख्यात एजेंट हुए।समाजवाद,समानता,मानवीय मूल्य यह सब भरे पेट के शगल हैं ।मेहनती आदमी से छीन कर निक्कम्मे आदमी को देने का वादा करके सत्ता पर कब्जा करने की मंशा का नाम समाजवाद है।

फ्रैंकफर्ट स्कूल : वामपंथ का विष वृक्ष

दुनिया में जितने भी विघटनकारी गतिविधियां हो रही हैं सबके तार इसी संस्था से जुड़े हैं कम्युनिज्म का जो भी असर फैला है वामपंथ के इस विषय ले वृक्ष की देन है।
कम्युनिज्म जब एक बार सत्ता में आ जाता है तो वह जनता का विश्वास खोने लगता है।जबरदस्ती अपनी ताकत के भरोसे बनाए रखना चाहता।
कम्युनिश्म ने देखा कि लोगों की आस्था राष्ट्र और और स्थापित संस्कृतिक मूल्यों के साथ है।अमीर औ गरीब , मालिक और मजदूर के बीच का स्थाई संघर्ष नहीं है। दोनों एक साथ ही राष्ट्रीय भावना और संस्कृति सूत्र में है जब यह समझा तो उसने अपने विचारधारा में परिवर्तन किया और उसने सबसे पहले राष्ट्रीय भावना को नष्ट करने के लिए काम किया।
उसके बाद उसने सभी संस्कृतिक मूल्यों को निशाना बनाया। समाज परिवर्तन हर बात जो जोड़ती है उसे कमजोर करना होगा।
ऐसा विचार क्या है आपको दिखता है यह महज संयोग नहीं है।
जर्मन में इन्हीं कुछ वामपंथी विचारको ने Institute of social research ki स्थापना की जो फ्रैंकफर्ट स्कूल के नाम से जाना गया
अमेरिकी विश्वविद्यालय में वामपंथियों की हमेशा गहरी पकड़ रही है, जैसे आज भारत में देशद्रोह के गढ़ JNU जैसे दिखते हैं।
1990 आते-आते इनकी जड़ें अमेरिका मीडिया,सिनेमा, शिक्षा पर इतनी गहरी हो चुकी थी सोवियत रूस का पतन वामपंथी इतिहास की एक मामूली घटना है ।
सांस्कृतिक मार्क्सवाद को समझने के लिए महत्वपूर्ण 11 पॉइंट है।
1 रेसिज्म के आरोपों की कल्पना।
लगातार बदलाव ओर भ्रम की स्थिति बनाए रखना।
बच्चों को सेक्स एवं समलैंगिकता का पाठ पढ़ाना
स्कूलों और शिक्षकों की ऑथोरिटी को खत्म करना
शरणार्थी, घुसपैठियों को बढ़ावा देकर सामाजिक संरचना और पहचान को खत्म करना।
नशे को बढ़ावा और समर्थन देना।
धर्म स्थलों को खाली कराना लोगों को धर्म से विमुख करना।
अन्यायपूर्ण और अविश्वसनीय न्याय व्यवस्था खड़ी करना।
सरकारी मदद पर लोगो आश्रित करना।
मीडिया पर नियंत्रण ।
परिवार की व्यवस्था को नष्ट करना ।
समाज में जहां कहीं भी कोई इन 11 में से किसी भी सूत्र को बढ़ावा दे रहा हो वह वामपंथी है।

वामपंथ की बाइबिल:रूल्स फ़ॉर रेडिकल्स
अमेरिका में “सॉल अलिंसकी” एक वामपंथी हुआ, वह कार्ल मार्क्स जैसा सिद्धांतवादी नहीं था उसे तकनीकी के लिए जाना जाता है, उसने वामपंथी रणनीति की एक पुस्तक लिखी जिसको वामपंथी बाइबल कहा जाता है-” रूल्स फॉर रेडिकल्स हर वामपंथी आंदोलन और रणनीति की रीड है ।
राष्ट्रपति बराक ओबामा और राष्ट्रपति पद की पिछली उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन एक समय अलिंसकी के शिष्य रह चुके हैं।
रूल्स फ़ॉर रेडिकल्स के 13 रूल है। 1:- शक्ति सिर्फ वह नहीं है, जो आपके पास है।शक्ति वह भी है जो आपका शत्रु समझता है कि आपके पास है।2:- कभी भी अपने एक्सपर्टाइज्ड के बाहर जाकर कुछ मत करो। 3:- जब भी संभव हो अपने शत्रु को उसकी सीमा से बाहर लाओ,हमेशा चिंता और सुरक्षा बनाए रखने के प्रयास करो।4:-विपक्ष को उसके अपने नियमों से चलने के लिए बाध्य करो।5:- उपहास सबसे बड़ा हथियार है।इसका कोई जवाब नहीं है,यह आपके विपक्षी को निहत्था कर देता है। व्यक्ति आलोचना का दबाव जवाब दे सकता है,उपहास का नहीं ।6:-अच्छी रणनीति वह है जिससे आप के लोग इंजॉय करें।ऐसे में वे बढ़कर सक्रिय होते हैं और स्वयं भी नई रणनीति सोचते हैं।7:- जब एक रणनीति लंबी खींची थी है तो लोग को बोरियत होती है, पुरानी खबर बनाने से बचें ।8 :-हमेशा दबाव बनाए रखें जैसे ही शत्रु एक प्रहार का जवाब तैयार करें, उस पर दूसरी ओर से हमला करें।9:-खतरा अक्सर जितना बड़ा होता है खतरे का डर उससे ज्यादा बड़ा होता है।10:-लगातार दबाव बनाए रखने की प्रक्रिया ही रणनीति का मुख्य बिंदु है, दबाव में शत्रु प्रक्रिया देता है। और इन्हीं प्रक्रियाओं से राजनीतिक अवसर निकलते हैं नंबर ।11:- एक नकारात्मक बात को हद से ज्यादा बढ़ावा दिया जाए तो उससे भी सकारात्मक बिंदु उठते हैं, उनका लाभ उठाया जा सकता है,अगर शत्रु आपके विरुद्ध हिंसक हो जाए इससे आपको सहानुभूति मिलेगी।12:- एक सफल आक्रमण का मूल्य है एक सकारात्मक विकल्प।शत्रु को इस बिंदु पर आप जिस समस्या की शिकायत कर रहे हैं उसके समाधान के बिना ना नहीं पकड़े जाएं।13:- अपने टारगेट को चुने फ्रीज कर दें, पर्सनलाइज करें और धूल में मिला दे ,अपने आक्रमण को व्यक्ति केंद्रित रखें, उसके समर्थन के सारे रास्ते बंद कर दें ,व्यक्ति पर हमला करें संस्था पर नहीं ,व्यक्ति पर हमला ज्यादा परिणाम देता है ।
रूल्स फ़ॉर रेडिकल्स पिछले 40 50 सालों में वामपंथियों की रणनीति की रीड है।

संघर्ष से सत्ता
यह शुरू हुआ अमीर और गरीब के संघर्ष से मजदूर और उद्योगों के कृषक को और जमीदारों के संघर्ष से। वह समाज में अनेक रूप से फैल गया है।
वामपंथियों ने सिर्फ उद्योग और व्यवसाय को बर्बाद नहीं किया बल्कि राष्ट्र,सभ्यता की मूल इकाई परिवार तक को नष्ट करने में अनवरत लगे हैं ।
वह सोचते हैं सत्ता सिर्फ संघर्ष से आती है ।राजनीतिक सत्ता के दो ही रास्ते हैं संघर्ष का निर्माण या फिर संघर्षों का नियंत्रण।
उदाहरण चाणक्य के काल में मौर्य समाज साम्राज्य की शक्ति यूनानीयों के साथ संघर्ष नहीं,बल्कि भारतीय राज्यों के आपसी संघर्ष को नियंत्रित करने से उत्पन्न हुई।
वामपंथी श्रम के लिए नहीं जाने बल्कि चालाकी ओर कुटिलता के लिए जाने जाते हैं ।
आज अमेरिका में वामपंथी होकरहेमर की थ्योरी ने धर्म,नैतिकता,समाज, माता-पिता ,प्रेमी भक्ति, सत्य, निष्ठा हर चीज की आलोचना करो, हर चीज में बुराई खोजो, हर पवित्र संस्था व्यक्ति पर विचार और भावना की निंदा करो।
दूसरे वामी “हर्बर्ट मार्क्यूस” जिसने परिवार और राष्ट्रवाद के स्थापित मूल्यों के विपरीत भ्रष्ट,नशे में डूबे हुए अमेरिकी समाज की स्थापना का अभियान चलाया। जिसने अमेरिका में अपराध नशा और समलैंगिकता की महामारी फैला दी।
उस समय मार्क्स, माओ, मार्क्यूस का नाम वामपंथ की त्रिमूर्ति के रूप में लिया जाता था।

चीन की त्रासदी 1

चीन की सफलता में कम्युनिज्म का कितना योगदान है? यह है पक्ष सामने आता है
चेयरमैन माओत्से तुंग चीन के महामानव गिने जाते थे।
उधर चीन के बड़े भाई की भूमिका में पड़ोसी कम्युनिस्ट रूस था,पर स्टालिन की मृत्यु के बाद माओ कि रूसी राष्ट्रपति खुचेव से नहीं बनी।
माओ को देश के औद्योगिक और आर्थिक विकास का कम्युनिस्ट विचार आया। उसने अपनी योजना अनुसार “द ग्रेट लीप फॉरवर्ड”को साथ लांच किया।
उसने हजारों लोगों को कम्यून के अंदर इकट्ठा किया लोगों को सामूहिक कृषि, सामूहिक औद्योगिक विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर में लगा दिया।
माओ के दिमाग में यह बात घुस गई देश की तरक्की और विकास का मानक उसका स्टील का उत्पादन है। उस समय लोगों ने अपने घर में स्टील की भट्टियां लगा दी ।जहां कुछ भी लोहे का सामान मिला दरवाजे, बर्तन, खेती के औजार,सबका स्टील बना दिया गया।
किसानों को भी स्टील के काम में लगा दिया ,उनकी खड़ी फसल सड़ गई नतीजा यह हुआ चीन में भयानक अकाल पड़ गया
माओ की पार्टी और सरकार के लोगों ने फसल का बहुत अच्छा आंकड़ा दिया,माओ ने रूस से लिया हुआ कर्ज समय से पहले लौटाने का फैसला किया।
यह कर्ज आनज के रूप में लौटाया जाता था
माओ का यह पागलपन ने 1958 -62 इन सालों में चीन ने मानव सभ्यता के इतिहास का सबसे भयानक अकाल में मरने वालों की संख्या कम से कम 3करोड़ है ।
इसके बाद उसने द ग्रेट लिप् फॉरवर्ड को समेटने के आदेश दिया।
द ग्रेट लिप् फॉरवर्ड की एक घटना बहुत प्रसिद्ध है माओ ने घोषणा की खेतों में आने वाली गौरैया किसानों की दुश्मन है,तो उसने गौरैया को मारने का आदेश दे दिया ।और गोरैया विलुप्त ही गयी।
नतीजा यह हुआ की टिड्डीयो की संख्या अधिक हो गई,ओर वह फसलो कोखा गई।चीन के अकाल में यह भी यह भी महत्वपूर्ण था।
वामपंथ गौरैया को दुश्मन घोषित करता है ओर टिड्डीयो को पलता है ।टिड्डीया ही वामपंथ की फ़ौज है।

चीन की त्रासदी 2
माओ की जो आलोचना करता था, चाहे वे उसका घनिष्ठ मित्र हो यह खास आदमी वह सब को कुचल देता था ।
ऐसे ही उसने अपने मित्र पेंग दे व्हाई को जो रक्षा मंत्री था उसे भी ग्रेट लिप् फारवर्ड की आलोचना के लिए प्रताड़ित किया ।
माओ को विरोध बिल्कुल भी पसंद नहीं था म्कम्युनिश्म पूरी तरह से वैचारिक सरेंडर मांगता है,बिल्कुल इस्लाम के सबमिशन की तरह ।
माओ ने लोगों सामने आने और कम्युनिस्ट पार्टी की आलोचना करने का आह्वान किया।जिसे लोगों ने चीन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता समझा और आलोचना की।
आलोचना करने वाले सारे लोगों को क्रांति विरोधी घोषित कर दिया और खोज खोज कर मार डाला
माओ ने ऐसे लोगों की पहचान की जो कम्युनिश्म के प्रति पूर्णता समर्पित नहीं थे ऐसे लोगों को ढूंढ कर और चीन के नेताओं की पूरी पीढ़ी, जिन्होंने स्वतंत्रता का युद्ध लड़ा था उनको अपमानित प्रताड़ित किया और जेल में डलवा दिया या मरवा दिया।

चीन की त्रासदी:-3
माओ ने रेड गार्ड्स का एक ग्रुप खड़ा किया ये रेड गार्ड्स पार्टी के अंदर या बाहर किसी को भी निशाना बना सकते थे।
रेड गार्ड्स ने 4 पुरानी परंपराएं- पुरानी संस्कृति,पुरानी आदतें ,पुराने विचारों के विरुद्ध लड़ाई छेड़ी ,जो कोई भी चीन में इन चार ओल्ड चीज से जुड़ा हुआ होता था इनके आंदोलन के दायरे में आता था।
यह रेड गार्ड 15 से 17 साल की स्टूडेंट थे,वर्षो चीन में सारे स्कूल बंद रहे रेड गार्ड्स के नाम पर बच्चे क्रांति करते रहे ।ये कहीं भी रेल से आ जा सकते थे, किसी रेस्टोरेंट में खाना खा सकते थे।
ये रेड गार्ड किसी के घर में तोड़फोड़ कर सकते थे,कोई भी सामान लूट सकते थे और किसी का भी बलात्कार करना,सब कुछ उचित था।
इनका लोगों की पीटना,आंख फोड़ना,नंगा करना ऐसा सब कुछ इनके लिए उचित था ।जो इनकी प्रताड़ना से बचते बचते थे वो आत्म हत्या कर लेते थे।
यह यह रेडगार्ड किसी भी स्कूल टीचर की पिटाई करते थे, इन रेड गार्ड ने चीन की हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता के प्रतीक नष्ट कर दिए। म्यूजियम लूट लिए गए।
इसमें रेड गार्ड्स ने पार्टी प्रेसिडेंट और जनरल सेक्रेटरी के पदों पर बैठे लोगों को भी नहीं छोड़ा।रेड गार्ड ने बहुत जगह कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यालयों पर भी कब्जा कर लिया, पूरा चीन गृह युद्ध की स्थिति में आ गया था।
रेड गार्ड्स के अंदर भी गट बन गए थे, तो माओ ने इनको रोकने का प्रयास किया, लेकिन अब बात हाथ से निकल चुकी थी।
अनेक जगह आर्मी लगाकर रेडगार्ड को कुचलने पड़ा।
कल्चरल रेवोल्यूशन के नाम पर 3 करोड लोग मारे गए ।चीन की समृद्धि और विकास आपको दिखाई देता है वह कम्युनिश्म की उपज नहीं है।
माओ का काल पागलपन,मानवीय त्रासदी ही वामपंथ की उपलब्धि है।

देंग सियाओ पिंग:चीन का पुनरूत्थान
देंग भी माओ के रेड गार्ड्स द्वारा प्रताड़ित किए गए थे, उनके पूरे परिवार को चीन के अलग-अलग स्थानों पर भेजा गया और उन्हें रेडगार्ड के स्ट्रगल सेशन सेशन से गुजरना पड़ा ।देंग एक समय माओ के सबसे करीबी रहे ।
अब माओ का अंतिम समय था अब उसे अपने उत्तराधिकारी की चिंता रहती जो उसके पास नहीं था। माओ ने अपना सारा जीवन शराब, विलासिता में निकाला और अब अपने बेडरूम तक ही सीमित रह गया था ।उसे चिंता थी कि इतिहास में उसे याद कैसे किया जाएगा ।
ऐसी हालत में सिर्फ एक व्यक्ति बचा था जो चीन सत्ता को संभालने की क्षमता रखता था, वह था देग पिंग जो धीरे धीरे सत्ता के गलियारों में वापस आए और उन्होंने सत्ता सौंपी एक बार देग फिर माओ की आंख में चढ़ गए और उन्हें फिर दोबारा निर्वासित किया।
कुछ समय बाद माओ की मृत्यु हो गई और उसने अपने विश्वासपात्र ह्ववा गुआफेंग को अपना उत्तराधिकारी चुना, जो चीन का प्रतिनिधि नहीं कर सकता था।
पार्टी के पुराने दिग्गज ने धीरे-धीरे देंग को पुनः स्थापित किया।
देंग ने पहला परिवर्तन शिक्षा के क्षेत्र में लाया
चीनी छात्र बड़ी संख्या में पश्चिमी देशों अमेरिका इंग्लैंड आदि देशों में पढ़ने गए ।
देंग ने कम्युन से मुक्त करके किसानों को अपनी खेती खुद करने का आह्वान किया।
लगातार देंग ने चीन की समृद्धि के लिए काम किया।
देंग सिद्धांत को सिर्फ उद्देश्य पूर्ति का साधन मानते थे कम्युनिज्म हो या कैपिटलिज्म जो भी समाज की समृद्धि दे,वह सही है ।
देंगे यह कहने के लिए जाने जाते थे विल्ली सफेद हो या काली क्या फर्क पकड़ता है अगर वह चूहे को पकड़ती है ।
देंग ने चीन में कई स्पेशल इकोनामिक जोंस बनाए जहां उद्योगों की स्थापना करने के लिए छूट दी गई।

वामपंथी :-हरे की लाल ढाल
पिछली पीढ़ी के वामपंथीयो के प्रिय कवि है “फ़ैज़ अहमद फ़ैज़” फैज की नजमो में एक लाइन है जिसे गुनगुनाते वामपंथी पूरी पीढ़ी बढ़ी हुई है।” “सब ताज उछाले जाएंगे ),सब तख्त गिराए जाएंगे”
फैज तो शायर था इतनी सी बात नहीं है ।उससे पहले ब्रिटिश फौज में लेफ्टिनेंट कर्नल था। विभाजन के समय पाकिस्तान गया और फ़ौज से निकलकर पाकिस्तान टाइम्स का एडिटर बना।वह पाकिस्तान में कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े नामों में से एक था ।
फैज की पत्नी ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य थी । उसका विवाह विवाह शेख अब्दुल्ला ने कराया था ।
1951 में लियाकत अली खान की सरकार के तख्तापलट के षड्यंत्र में फैज को गिरफ्तार किया ओर जेल भेजा गया।
इतने समर्पित कम्युनिस्ट की नज्म पढ़िये, सिर्फ ताज उछलने और तख्त गिराने की लाइनें पढ़ी होंगी आपने ।आगे पढ़िए अर्ज ए खुदा के काबे से सब बूत उठाए जाएंगे…’अहल ए सफा’ सफा यानी आसमानी किताब को मानने वाले मसनद पर बिठाए जाएंगे… और बस नाम रहेगा अल्लाह का….
कोई भी मुस्लिम कितना भी कट्टर कम्युनिस्ट क्यों ना हो वह इस्लाम को नहीं छेड़ता।उसके लिए अल्लाह का नाम ही सबसे बड़ी सत्ता है।
इस्लाम वामपंथ का स्ट्राइक आर्म है।वामपंथ के पास इतना संख्या बल कभी नहीं हुआ कि वह अपने बल पर सत्ता पर कब्जा कर सके। इसलिए वह गंदगी फैलाने और अव्यवस्था फैलाने के लिए इस्लाम की शक्ति का प्रयोग करने से परहेज नहीं करते।
वामपंथियों को पॉलिटिकल करैक्टनेस इस्लाम की ढाल है।

पॉलिटिकल करेक्टनेस
वामपंथी सिद्धांत पॉलिटिकली करेक्ट ।इन्होंने इसके पीछे नंगापन और यौन उच्च श्रंखला नारीवाद के पीछे छूप गया, इस्लामिक आतंकवाद सेक्युलरिज्म और सर्व धर्म सम्मान के पीछे छुप गया, कामचोरी ओर निकम्मापन समानता की मांग के पीछे छुप गया ।
स्कूलों में खूब aggressive तरीके से इनकी पॉलिटिकली करेक्ट सोच को घुसा दिया।
आप किसी के विरुद्ध किसी भी स्थापित मूल्य के विरुद्ध कुछ भी बोल सकते हैं वह इनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है।
ऐसा वामपंथ ने किया है वे लोकतांत्रिक मूल्यों का हवाला देते हैं ,अगले ही सास में लोकतांत्रिक तरीके से चुने हुए एक प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को अपशब्द कहकर अभिव्यक्ति वाली दीवार के पीछे छुप जाते हैं।
एक देशद्रोही चैनल मीडिया की स्वतंत्रता के पीछे छुप जाता है एक समाज विरोधी फिल्मकर कलात्मकता के पीछे और नक्सलीयो ओर जिहादियों की फ़ौज धर्मनिरपेक्षता के पीछे।ये वामपंथ के घिनोना चेहरा है ।

कोई वामपंथी बनता ही क्यों है ?
हीन भावना से ग्रस्त युवाओं के लिए वामपंथ लालच का एक प्लेटफार्म उपलब्ध कराता है ।वामपंथी होना किसी के सामाजिक आर्थिक वर्ग विभाजन पर इतना निर्भर नहीं करता जितना व्यक्तिगत मनोवैज्ञानिक प्रोफाइल पर ।
तीन तरह के लोग वामपंथी बनते है *पहले कम आई क्यू वाले ,जिन्हें वामपंथ समझा दिया जाता है।* दूसरे और हीन भावना से ग्रस्त लोग ,जिन्हें कुछ सिद्ध करना है।* तीसरे बदसूरत,दुनिया से निकाले गए शारिरिक रूप से विकृत ।
इटली में “अंतोनियो ग्राम्स्की”नामक व्यक्ति को मुसोलिनी ने जेल में डाल दिया गया।और वहां से निकलने के कुछ दिनों बाद वह मर गया।जेल में ही उसने “प्रिजन नोटबुक” के नाम से लेखन किया। उसके Hegemony सिद्धांत ने वामपंथी दर्शन और रणनीति को विशेष रूप से पूरी दुनिया को बदल डाला।

कफन के सौदागर
वामपंथी कैसे सोचता है?
वह समस्या को कैसे खड़ा करता है,जब मरीज बीमार पड़ता है तो वह इलाज खोजता है। ज्यादातर मरीज इलाज से ठीक हो जाते जाते हैं ।और कई इलाज न मिलने और साधन की कमी से मर जाते हैं।इस पर वामपंथी की क्या सोच होती है,वह कहता है क्या इलाज से लोग ठीक होगए, क्या लोग बीमार होन बंद हो गए? क्या यहाँ इलाज ठीक से ही होता है?क्या फायदा इस अस्पताल का?इसे बंद कर ।
अस्पताल के गेट पर खड़े होकर आक्रोश व्यक्त करेंगे तो लोगों को यही लगेगा अस्पताल ठीक नहीं है। इसमें इलाज ठीक नहीं किया जाता।कुछ लोग सहमत भी हो जाएंगे।
लेकिन अस्पताल बंद होने के बाद क्या एक भी मरीज ठीक होगा?या जिसको स्वास्थ्य लाभ मिल रहा है उसको मिलेगा ?क्या अस्पताल बंद होने के बाद तो रोगी नही मरेंगे? समस्या के प्रति वामपंथी का यही एप्रोच है ।

विक्टिम-आइडेंटिटी ओर कंफिलक्ट नैरेटिव

हमारी फिल्म इंडस्ट्री हमेशा वामपंथी रही है। 80 के दशक में सिनेमा में अर्धसत्य,मिर्च मसाला,दामूल जैसी फिल्म जिन्हें कोई नहीं देखता था उन्हें दूरदर्शन पर पब्लिक को दिखाने के लिए परोस दिया। वह तो खुलेआम वामपंथी कथानक की फिल्में थी।
सामान्य रोमांटिक फिल्मों में भी एक लड़के से एक लड़की को प्यार नहीं होता था ,एक गरीब रिक्शा चलाने वाला मेहनती,ईमानदार मिथुन चक्रवर्ती से एक अमीर बेईमान, निर्दई पूंजीपति की बेटी को प्यार होता था।
एक पुलिस वाला एक बेकसूर को नहीं पीटता था,एक ऊंची जाति के जमीदार के कहने पर ऊंची जाति का पुलिस वाला एक गरीब इमानदार नीचे जाति के बेकसूर को सताता था ।
वामपंथी वर्ग संघर्ष हमेशा खुद ले खोज लेता है।जहां वर्ग संघर्ष ना दिखे वहां वर्णन खोज लेता है।
एक गरीब मजदूर के अमीर पूंजीपति बनने के रास्ते हमेशा खुले हैं,कठिन हैं, पर संभव है ,दूध बेचने वाला धीरूभाई का अंबानी बनजाना..…
पर जिग्नेश मेवानी बनना हमेशा फायदे का काम है ।कितना भी पैसा कमा लें लेकिन आप हमेशा दलित और पीड़ित ही रहेंगे। आप एक जेनेरिक विक्टिम हैं ।
आप मुख्यमंत्री और राष्ट्रपति बनकर भी विक्टिम ही रहेंगे ।
यह विक्टिम आईडेंटिटी का विचार है और इस आईडेंटिटी से निकलने वाला वर्ग संघर्ष आज के उत्तर आधुनिक वामपंथ की पहचान है। यही दिव्यदृष्टि वामपंथ है ।

रिक्रूटमेंट टेक्निकल
वामपंथी प्रचार भी एक रिक्रूटमेंट जैसा है।
जहां लोगों को चमकदार तस्वीरें दिखाई जाती है।मजदूरों को कम्युनिज्म का स्वर्ग दिखाया जाता है,दलितों को सदियों से अत्याचारों की कहानियां और उनका बदला लेने के अवसर समझाए जाते हैं।स्त्रियों को समानता की तस्वीर दिखाई जाती है ।हर वर्ग में उनकी एक पीड़ित पहचान स्थापित की जा रही है। माइनॉरिटी को मेजारिटी से ,स्त्री को पुरुष से ,अवर्ण को स्वर्ण से लड़ने और जीतने के रास्ते सिखाए जा रहे हैं ।यह सब वामपंथी रिक्रूटमेंट टेक्निक है।
वामपंथ यह एक मनोरोग है इसे साइकोसिस कहते हैं। जिसमें रोगी की रियलिटी और उसकी दुनिया सब की दुनिया से अलग होती है ।वामपंथ एक तरह का sociopychosis है ।उसमें वर्ग संघर्ष है, क्रांति है, समानता है….तरह तरह की बकवास है जो आपको दिखाई नहीं देगा उनकी सोशल रियलिटी कुछ और है। जो वामपंथ समर्थक हैं।वह सभी वामपंथी नहीं हैं।उनमें अनेक लोग ऐसे हैं जो सिर्फ सिनेमा के दर्शक हैं, वे उनका नेरिटिक सब्सक्राइब करते हैं, क्योंकि आज तक नैरेटिव बिल्डिंग का धंधा उन्हीं के हाथ में रहा है। चाहे पाठ्यपुस्तक हो, इतिहास,लेखन कला,साहित्य, सिनेमा पर उनकी पकड़ ने दर्शकों को कब्जे में रखा है। उन्हें अपना नैरेटिव परोसते आए हैं।
वामपंथ का नैरेटिव बिल्डिंग का निर्माण सत्य और तथ्य का निर्माण नहीं हो,कथ्य का निर्माण हो ही सकता है ।हमारे आसपास ऐसे ही कितने नैरेटिव बन रहे हैं ।
दलित उत्पीड़न के,स्त्री दासता और हिंसा के,बलात्कार की संस्कृति के,बाल श्रम के, अल्पसंख्यक की लिंचिंग के ।
हम कहते हैं बोलने से क्या होता है? कल क्या होगा? यह है इस पर निर्भर करता है कि आज क्या कहा जा रहा है।
कुछ सालों पहले सेकुलर सेकुलर बोला जाता था और नतीजा देखिए यही सेकुलरिज्म आज तक योगी मोदी के गले में भी अटका है
हम सोचते हैं बोलने से क्या होता है? बोलने से कथ्य का निर्माण होता है।दुनिया के देशों का इतिहास बोलने से नॉरेटिव बिल्डिंग से बनता बिगड़ता रहा है ।
आर्य द्रविड़ बोल बोल कर वामपंथी ईसाईयों ने श्रीलंका में गृह युद्ध करा दिया। भारत में मूल निवासी आंदोलन चला रहे हैं। हम इनका नैरेटिव रोल नहीं समझते।
जब तक हम अपना कथ्य निर्माण नहीं करेंगे, तो सत्य सिर्फ परेशान ही नहीं पराजित भी हो जाएगा। सत्यमेव जयते को अभेद्य मत समझिए।
जब वामपंथियों को कोई नैरेटिव खड़ा करना होता है। तो हफ्तों पहले नेरिटिक तैयार किया जाता हैं।उसकी कड़ियां जोड़ी जाती है ।
जैसे पहले एक मुस्लिम बच्चे की हत्या की..फिर एक दलित के बलात्कार की कहानी.. फिर दोनों का दलित मुस्लिम गठजोड़ खड़ा किया और दोनों को bjp के साथ जोड़ दलितों को बीजेपी के खिलाफ भडकाया।
फिर बहुत मेहनत करके एक झूठ को खबर में ,और फिर एक खबर को इतिहास में बदलने का काम,इनकी मीडिया और प्रोडक्ट करते हैं।यही नैरेटिव वामपंथीयो का हैं।

कलह का कारोबार
वामपंथ का चरित्र वैश्विक है। वामपंथ में यह भी है की दो प्रोग्रेसिव मुद्दों को आपस में मत लड़ाईये…पर देश में लोगों को आपस में लड़ाईये एक इसलिए गरीब है,क्योंकि दूसरा कोई ज्यादा पैसे कमाता है।शरणार्थियों को देश में घुस आइए, उन्हें मुफ्त फ्लैट बाटिए डिसेबिलिटी के नाम पर पैसे फालतू कामों में लगाइये, बर्बाद कीजिए।
जिससे गरीबी बनी रहे और आप उन गरीबों को यह समझा सके कि गरीबी के लिए वे लोग जिम्मेदार हैं,जो लोग खुद गरीब नहीं हैं।
ऐसे ही असंतुष्ट लोगों की लोग ही आपकी फ़ौज बनेंगे ।आप को चुनकर पार्लियामेंट भेजेंगे, आपको सत्ता में बनाए रखेंगे। क्योंकि उन्हें सरकारी मदद की जरूरत ओर आदत है ।
जिस प्रकार अंग्रेजों ने चीन पर कब्जा किया था तो पूरे देश को अफीम की लत लगवा दी थी, आज उसी अफीम का नाम समाजवाद है।

वामपंथ का नशा, नशे का वामपंथ
कैनाबिस एक खतरनाक नशा होता है ।कनाडा में कैनाबिस को लीगल घोषित कर दिया।
ओर वामपंथ पूरी दुनिया में प्रचार कर रही है कि कैनाबिस को लीगल होना चाहिए।
इसके पीछे उनका तर्क देखिए कि जब सिगरेट और शराब लीगल है,तो कैनाबिस को लीगल होना चाहिए। इसके पीछे उनकी यही नियत है समाज में ज्यादा से ज्यादा लोग नशे की लत में आ जाए, जिससे ज्यादा नशेड़ी होंगे, उसनसे ज्यादा बेरोजगार,लाचार होंगे और उतने ज्यादा लोगों के यह प्रवक्ता बन सकेंगे।
ऐसे ही वामपंथी कहते है कैनाबिस को कानूनी स्वीकृति देने के बहुत अच्छे इफेक्ट होंगे ।जैसे आप इस पर टैक्स ले सकेंगे और आप इसे लीगली नियंत्रित कर सकते हैं। आप इसकी क्वालिटी कंट्रोल कर सकते हैं।
यही वामपंथियों प्रिय प्रयोग है।

वामपंथी साहित्य का फ्राड
एक नोबेल विजेता वामपंथी “सैमुअल बैकेट” हुआ। जिसने एक नाटक लिखा “वेटिंग फॉर गाडो” बैकेट को इसे लिखने पर नोबेल पुरस्कार मिला ।ऐसा क्या इस नाटक में था ?
नाटक में 2 लोग बैठकर गाडो की प्रतीक्षा करते और वह नहीं आता ।नाटक 2 घंटे चलता है ।और इस 2 घंटे में उनसे कुछ लोग आकर मिलते ।वह अर्थहीन बातें करते हैं और चले जाते हैं।आखिर में कुछ भी नहीं होता और गाडो नहीं आता।लोग तरह-तरह के अनुमान लगाते।आप यह नहीं समझ सकते गाडो कौन था? और यह दो लोग उसकी प्रतीक्षा क्यों कर रहे थे ?
जब बैकेट से पूछा गया तो उसने कहा कि अगर उसे पता होता तो वह इसे अपने नाटक में ही बता देता।और यह है एक नोबेल पुरस्कार विजेता नाटककार की सबसे प्रसिद्ध कृति। सोचे कितना बड़ा साहित्य फ्रॉड है
प्रख्यात वामपंथी विचारक “जॉर्ज लुकास” का कथन है” मैं निराशा की संस्कृति चाहता हूं”।एक ऐसा विश्व जिसे ईश्वर ने त्याग दिया हो। इसी प्रकार वेटिंग फॉर गार्डों सिर्फ एक अंतहीन प्रतीक्षा और निराशा की कहानी है।

निराशा वामपंथ का बहुत ही सशक्त हथियार है।
वामपंथ म्यूट वायरस की तरह आजकल काम कर रहा है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान देखने में भी आया ।देश में तोड़फोड़ ओर हिंसा फैली है जिसमें इन्हीं शक्तियों ने कार्य किया ।वामपंथियों ने देश को विभाजित करने पर सबसे ज्यादा इनवेस्टमेंट दलित- सवर्ण समाज में विभाजन पर किया।विभाजन वामपंथी कथानक की खुराक है।
वामपंथी आप से ही खेल खेलते हैं और यह वही खेल खेलते हैं जो ये जीते। कौन सी टीम जीत रही है ?कौन सा खेल हो रहा है? जिसे हाकी खेलनी है वह अपनी बाल लाता है ?मैदान सजाता है, टीम बनाता है ।इसी तरह से दंगे फसाद,संघर्ष,मनमुटाव यह वामपंथियों के खेल हैं उन्होंने इसका मैदान सजाया है,इसी के समान जुटाए है। उसी की प्रैक्टिस की है,उसी की टीम खड़ी की है। अब इतनी मेहनत के बाद खेल किससे खेले तो यह खेल देश की शांति और प्रगति से खेलने के मूड में है।

फेमिनिज्म:औरतों के हिस्से का कम्युनिज़्म
कम्युनिज्म जैसे औधोगिक सिस्टम में मजदूरों को संघर्षरत रखने के लिए बना है…वैसे ही फेमिनिज्म महिलाओं को परिवार नाम की संस्था से कांफ्लिक्ट में खड़ा करने के लिए बना है। वामपंथ की यह ताकत है अगर आप उसे एक रूप में नकार देते हैं,तो वह दूसरे रूप में घुस आता है।पर रूप बदलने से वामपंथ की नियत नहीं बदलती। वामपंथ को समझना है तो उसकी नियत को समझना पड़ेगा। उसे हर रूप में स्वीकार करना होगा।क्योंकि नियत कभी किसी की नहीं बदलती।

सामाजिक ऑटो-इम्युनिटी
वामपंथ एक इंड्यूस्ड ऑटो यूनिटी जैसी घातक बीमारी की तरह है। जिसमें समाज के एक अंग को समझा दिया जाता है,कि दूसरा अंग आपका नहीं है,शत्रु अंग है ।इसका सबसे विषैला रूप जो देखने को मिलता है, वह नारीवाद है ।
आप देख सकते हैं आपको वामपंथी बलात्कार के विरोध में कैंडल जलाते और उसे बहाने से पितृसत्ता को कोसते और पूरी हिंदू संस्कृति को घृणा से भरे वामिये मिल जाएंगे। वही वामपंथी जैसे ही किसी बलात्कारी अपराधी को सजा मिलती हो फांसी दी जाए ,तो यही सबसे पहले मानवाधिकार के नाम पर उस अपराधी को बचाने के लिए झंडा उठाए दिख जाएंगे।
ऐसी घटना है 1990 कोलकाता में15 साल की लड़की हेतल पारेख के साथ दर्दनाक रेप और मर्डर केस हुआ।उसमें एक वामपंथी धनंजय चटर्जी पर अपराध सिध्द हुआ और 2004 में उसे फांसी दी गई। तो यही वामी उस धनंजय चटर्जी की फांसी का विरोध करते हैं ।
इनके लिए हर अपराध,हर अत्याचार एक अवसर है। अपनी विषैली विचारधारा को फैलाने का एक पब्लिसिटी का अवसर है।
ये वही लोग हैं जो निर्भया के लिए कैंडल जलाते हैं और उसी का बलात्कार करने वाला अफरोज को छुड़वाने और बचाने के लिए तिकड़म और फर्जीवाड़ा करते हैं।
इसलिए जब बलात्कारी और हत्यारे धनंजय चटर्जी को फांसी दी गई तो इन्हीं कामरेड ने उसकी फांसी का विरोध किया। ऐसा वामपंथियों की नारीवाद है।

फेमिनिज़्म की कीमत
वामपंथी पित्रसत्ता को दोष देकर फॅमिनिश्म को बढ़ावा देने का काम करते हैं।जैसे स्वास्थ्य की चिंता का विषय है।स्त्रियों का स्वास्थ्य भी सबकी चिंता का विषय है। परिवार के पुरुष क्या चाहते हैं कि स्त्रियों को स्वास्थ्य सुविधाएं ना मिले? कोई एक पिता को अपनी बेटी को अस्वस्थ देखकर सुख मिलेगा?
वामपंथी की प्रतिक्रिया देखें -स्त्री के अधिकारों का हनन हो रहा है यह समाज पितृसत्तात्मक है।एक पिता अपनी बेटी के साथ अन्याय करता है।इसलिए अवश्य उनके साथ अन्याय पुरुषों ने किया है। और हिंदू रीति रिवाज जैसे कन्यादान विशेष रूप से पितृसत्ता को प्रेरित करते हैं,तो अवश्य हिंदू धर्म स्त्रियों के प्रति अन्याय करता हैं। हिंदू धर्म सामान्य स्वास्थ्य सेवाएं तक उपलब्ध नहीं कराता।
लीजिए हो गया इनका नैरेटिव तैयार जिसमें हमारे परिवार की स्त्रियां पीड़िता की भूमि में है।
1960 के दशक में स्त्री उत्पीड़न के नाम पर कम्युनिश्म ने अमेरिकी नारी मुक्ति आंदोलन के बहुत सारे आंदोलन चलाएं, इन्होंने सिर्फ पित्रसत्ता का विरोध किया और फेमिनिज्म को बढ़ावा दिया। आज इस फेमिनिज्म के कारण मानवता ने इसका मूल्य छुपाया है।
इसका शिकार टूटे हुए करोड़ों परिवार उन परिवारो के बच्चों का बचपन, ड्रग्स की आदत के शिकार अनाथ बच्चे, वह 15 साल की लड़की जो स्कूल जाने की उम्र में प्रेग्नेंट हो गई और बिना बाप के बच्चे को पालने के संघर्ष में तनाव के कारण आत्महत्या करती है।
इस दिशाहीन पीढ़ी की उपज अगली पीढ़ी मानवता और सभ्यता की मूलभूत इकाई परिवार के बिना बड़ी हो रही है।
यह है वामपंथियों के फेमिनिज्म ने समाज को दिया है। आज अमेरिकी समाज में फेमिनिज्म मुख्यधारा बन गया है ।जब फेमिनिज्म आया (1960) तब 90 हजार तलाक हुए। 1990 में 1.17मिलियन तलाक हुए।आज अमेरिकी समाज में 40%- 50% शादियों का अंत तलाक होता ।है ऐसे ही इंग्लैंड में तलाक 42% परसेंट है इनमें से 65% पिटीशन औरतों की तरफ से आते। हंगरी ओर चेक रिपब्लिक में 60%तलाक होते हैं और बेल्जियम में 70%।
वामियो के फेमिनिस्म के कारण समाज कैसे मूल्य चुकता है। अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट की “फादरलेस जनरेशन”रिपोर्ट में 43% अमेरिकी बच्चे बिना पिता के बड़े होते हैं,63%किशोर आत्महत्या बिना पिता के बच्चों में होती है, 90%बेघर बच्चे बिना पिता के होते हैं, 81%बलात्कारी बचपन में बिना पिता के बड़े होते हैं,ड्रग एडिक्शन की सामान्य दर से 68% ज्यादा बिना पिता के बच्चों में होती है, बिना पिता की बच्चियों में टीनएज में शादी करने की दर डेढ़ गुना है,टीनएज में प्रेग्नेंट होने की दर 7 गुनी है,अगर वह शादी करती हैं तो उनके तलाक की संभावना92% ज्यादा है।
इंग्लैंड में टूटे परिवारों की वजह से होने वाली हानि का वार्षिक अनुमानित मूल्य 100 बिलियन है, यहां की नेशनल हेल्थ सर्विस यानी पूरी तरह से मुफ्त स्वास्थ्य सेवा का कुल बजट 125 बिलियन है।यह वामपंथियों की पित्रसत्ता से मुक्ति की कीमत।
पित्रसत्ता लाखों वर्षों के साझा संस्कृतिक अनुभव से निकलकर बनी है। स्त्रियों और पुरुषों ने लाखों वर्षों में मिलकर यह समाज बनाया है,इसमें दोनों साझेदार रहे हैं दोनों को मिलकर ही पितृसत्तात्मक समाज बना है,जिसमें स्त्री और पुरुष का दोनों का सहयोग है।
यह वामपंथियों का एक खेल मात्र है यह कल्पना करते हैं कि उस दुष्ट पिता को हटा दीजिए और पूरी पूरी सामाजिक व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। और सामाजिक व्यवस्था को ध्वस्त करने का ही तो उनका लक्ष्य है।
अमेरिकी फेमिनिज्म की चर्चा एक महिला के बिना नहीं हो सकती जो अमेरिकी फेमिनिस्ट एक्टिविस्ट “कैट मिलेट” जो एक खूंखार किस्म की सिविल राइट्स एक्टिविस्ट और फेमिनिस्ट थी। उसकी किताब “सेक्सुअल पॉलिटिक्स” को feminismकी आसमानी किताब कहा जाता है।उसने अपनी किताबों में अपने परिवार के सदस्यों को क्रूर,असंवेदनशील और अन्यायी बताया है,जो उसकी पॉलिटिक्स से घृणा करते थे उसे लॉकअप में डालने देना चाहते थे।ऐसा उसने अपने परिवार के विषय में अपनी पुस्तक में लिखा।इसी से वामपंथ का फेमिनिज्म चलता है। सेक्सुअल पॉलिटिक्स में फेमिनिज्म को अश्लीलता, वेश्यावृत्ति और समलैंगिकता का प्रचार करके उसने फेमिनिस्म की क्रांति फैलाई।उसकी पुस्तक मीडिया में बहुत कवरेज दिया और वह नारी मुक्ति की कॉल मार्क्स गिनी गई ।उसकी पुस्तक पढ़ लड़कियां फेमिनिस्ट बन रही है।। उसकी पुस्तक को यूनिवर्सिटी में विमेंस स्टडी के नाम से पढ़ाया जाता है। इस प्रकार का जहर फेमिनिज्म के नाम पर विश्वविद्यालय में घोला जा रहा है।

पितृसत्ता
पिता सिर्फ परिवार का पालक ही नहीं होता समाज का निर्माता भी होता है,वह भविष्य की ईट अपने व्यक्तित्व की आंच में पकाता है और युग की नींव में रखता है। पित्रसत्ता को चुनौती यूं ही नहीं दी जा रही। वामियो को पिता के पुरुषार्थ से भय है,उन्हें भय है कि वह अपनी संतानों के भविष्य के लिए आखिरी सांस तक लड़ेगा। इसलिए उसकी सत्ता की वैधता को चुनौती दी जा रही है।

हिंदू समाज में विवाह की प्रकृति फेमिनिस्ट के लिए गंदगी फैलाने का खुला मैदान है।पितृसत्तात्मक समाज के विरुद्ध स्त्रियों की स्वतंत्रता,सबलता का झंडा आसानी से आज की लड़कियां पकड़ रही है और उनके जाल में फस रही ।हैं फेमिनिज्म इनका एक पॉलिटिकल टूल भर है,जो औरतों को अधिकार दिलाने के लिए नहीं लाया गया बल्कि समाज को बीचोबीच बांटने के लिए लाया गया है ।समाज के दो मूल स्तंभों स्त्री और पुरुष के बीच संघर्ष खड़ा करने के लिए लाया गया है।

वामपंथ का मूल मंत्र है संघर्ष.. आपके दाएं और बाएं हाथ में संघर्ष। जब संघर्ष होगा तभी इनकी दुकान चलेगी।

वामपंथियों को परिवार से समस्या है,इन्हें राष्ट्र की अवधारणा से समस्या है, इन्हें धर्म और अध्यात्म से समस्या है,इन्हें संस्कार से समस्या है,इन्हें अनुशासन और अनुशासित समाज से समस्या है,इन्हें हर समाधान से समस्या है ।तोवामपंथ की परिभाषा समझ ले… जिन्हें हमेशा हर समाधान से समस्या हो वे वामपंथी हैं।

● वामपंथ:म्यूटेट होता वायरस

जिस प्रकार फ्लू का वायरस म्यूटेशन से अपना रूप बदलता रहता है। उसी प्रकार वामपंत भी नित नए रूप बदलता रहता है।फ्लू और वामपंथ में भी बहुत सी समानताएं है।
दुनिया को रूसी क्रांति और माओवाद जैसी घटनाएं याद हैं जिसमें करोड़ों लोग मारे गए। वामपंथ के खूनी इतिहास में वे सर्दी जुकाम जैसे गिने जाते।
वामपंथ वैचारिक फ्लू है ।पर इसका सीजन सदाबहार होता है ।किसी को इसका आर्थिक पक्ष आकर्षित करता है,किसी को सामाजिक पक्ष, तो किसी को बौद्धिक पक्ष।
वामपंथी विचार हमारे आसपास बड़ी ही मासूम शक्लो में घूमता रहता है ।और हम अनजाने ही उनसे संक्रमित होकर छिकने लगते हैं। पिछले कुछ दशकों में फ़्लू के कई नए स्ट्रेन पनप रहे हैं ।
नारीवाद ऐसा ही एक खतरनाक स्ट्रेन है जो आता तो स्त्री के अधिकारों की मासूम सी शक्ल में है।लेकिन लाखों परिवारों को तबाह करके चला जाता है ।क्योंकि इसकी शक्ल इतनी मासूम है कि हम इसे सर्दी जुकाम से ज्यादा कुछ नहीं समझते।
विदेशों में यह “चाइल्ड-प्रोटेक्शन” की शक्ल में आया और परिवार में बच्चों पर माता पिता और शिक्षकों की ऑथोरिटी को खत्म कर गया।
बच्चों और किशोरों में इसने यौन शिक्षा के रूप में हमला किया और समाज की नैतिकता और मर्यादा को बर्बाद कर दिया ।उनके संस्कार को, सभ्यता को, आत्मसम्मान को भी यह नष्ट कर गया।

वामपंथ एक थाट-वायरस है।कंप्यूटर के संदर्भ में सोचे तो यह एक वायरस है ।जो लोगो की पुरो फॉर्मेटिंग बिगाड़ देता है। जैसे दिन-रात स्त्री विमर्श पर बोलने वाली 20 साल की लड़की महारानी पद्मिनी के बलिदान का मजाक उड़ा रही है और एक हत्यारे बलात्कारी का महिमामंडन कर रही है ।यह सब उसकी प्रोग्रामिंग के वायरस ही तो है….फॉर्मेटिंग बिगड़ गई है ।यही वामपंथ म्यूटेट वायरस है।

प्रस्तुति ः श्री अभय सदस्य अभाविप की राष्ट्रीय कार्यकारिणी

साभार –https://www.grenonews.com/ से

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