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वामपंथियों और खालिस्तानियों के मिलन ने किसान आंदोलन के मुँह पर कालिख पोत दी

बुद्ध , महावीर और गांधी का देश है यह। शांति और अहिंसा का देश है यह। तय मानिए कि अगर बीते 26 जनवरी को किसान आंदोलन के लोग तय रूट पर अहिंसक ट्रैक्टर रैली निकाल कर अपना शक्ति प्रदर्शन किए होते तो आज देश ही नहीं , दुनिया में वह देवता बन कर उपस्थित हुए होते। अन्नदाता की इज़्ज़त अफजाई में लोग उमड़ पड़े होते। सोने में सुहागा हो गया होता। सरकार को अपनी मांग के समर्थन में वह बड़ी आसानी से झुका सकते थे। लचीला बना सकते थे। लेकिन वामपंथियों और खालिस्तानियों के मिलन ने किसान आंदोलन के मुंह पर कालिख पोत दिया। किसान आंदोलन की पवित्रता भंग कर दी। कृषि मंत्री तोमर ने ग्यारहवें दौर की वार्ता असफल होने पर साफ़ कहा था कि किसान आंदोलन की पवित्रता खत्म हो गई है। लेकिन तब किसी ने कृषि मंत्री की इस बात पर गंभीरता से विचार नहीं किया।

दुनिया में दो लोगों ने सामाजिक समता की बात की है। एक महात्मा बुद्ध ने दूसरे , कार्ल मार्क्स ने। मकसद दोनों का एक था। लेकिन रास्ते अलग-अलग थे। बुद्ध सत्य और अहिंसा के रास्ते सामाजिक समता लाना चाहते थे। जब कि कार्ल मार्क्स तानाशाही और हिंसा के रास्ते। नतीज़ा सामने है। बुद्ध आज भी दुनिया भर में प्रासंगिक हैं। कार्ल मार्क्स दुनिया भर में न सिर्फ़ अप्रासंगिक बल्कि खारिज हो चुके हैं। कार्ल मार्क्स के नाम पर ख़ास कार भारत में कुछ वैचारिक कट्टरता और नफ़रत में डूबे मुट्ठी भर लोग ही उपस्थित दीखते हैं। लेकिन माहौल बनाने , अफवाह फैलाने , नफरत का प्राचीर बनाने में इन की निपुणता अभी भी अपने पूरे ख़म में है। कश्मीर में आतंक फैलाने वालों के खिलाफ इन लोगों ने कभी कुछ नहीं कहा। कश्मीरी पंडितों की बात करना इन की राय में सांप्रदायिक होना , हिंदुत्ववादी हो जाना हो जाता है। इमरान खान को शांति दूत बताते नहीं अघाते। खालिस्तानी आंदोलन में जलते हुए पंजाब की तरफ से भी आंख मूंद लिया था इन लोगों ने। मुस्लिम कट्टरता और सांप्रदायिकता के खिलाफ भी इन के लब कभी नहीं खुलते। सर्वदा सिले रहते हैं।

उलटे देश में आग लगाने के लिए जय भीम , जय मीम का नैरेटिव रचने में यह लोग पूरी तरह सफल हुए। दलित और मुसलमानों को जोड़ कर नफ़रत के तीर चलाने , माहौल खराब करने का इन का खेल अभी गरम ही था कि इन्हें किसान आंदोलन का खौलता कड़ाहा मिल गया। खालिस्तानियों का धन और बल मिल गया। इन को लगा कि अब यह देश में मुकम्मल आग लगा देंगे। अगर 26 जनवरी को मोदी सरकार और दिल्ली पुलिस ने अहिंसक रवैया न अपनाया होता तो इन के दोनों हाथ में लड्डू होते। ग़लती से एक भी गोली पुलिस से चल गई होती तो दिल्ली जालियांवाला बाग़ बन गया होता। मोदी जनरल डायर। देश के सौभाग्य से ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। पर किसान आंदोलन हिंसा की भेंट चढ़ गया।

याद कीजिए चौरीचौरा काण्ड की। 4 फ़रवरी , 1922 को घटित गोरखपुर में एक चौरीचौरा काण्ड में कुछ लोगों ने बिट्रिश सरकार की एक पुलिस चौकी को आग लगा दी थी जिस से उस में छुपे हुए 22 पुलिस कर्मचारी ज़िंदा जल के मर गए थे। महात्मा गांधी इस हिंसा पर कुपित हो गए। पूरे देश में फैल चुके असहयोग आंदोलन को गांधी ने तुरंत वापस लेने का ऐलान कर दिया था। पटेल और नेहरू जैसे नेता गांधी से कहते रह गए कि बापू , पूरा देश असहयोग आंदोलन में आगे बढ़ चुका है आंदोलन वापस मत लीजिए। आंदोलन वापस लेना ठीक नहीं होगा। लेकिन महात्मा गांधी ने साफ़ कहा कि ईंट के बदले पत्थर का जवाब नहीं हो सकता। मुझे ऐसी आज़ादी नहीं चाहिए।

और देखिए कि पूरे देश ने गांधी की बात मान ली थी। असहयोग आंदोलन स्थगित पूरे देश में स्थगित हो गया था। गांधी हों , जे पी हों , अन्ना हजारे हों , किसी भी का आंदोलन कभी हिंसक नहीं हुआ। क्यों कि वह लोग हिंसा में यकीन नहीं करते थे। इसी लिए यह लोग सफल हुए। किसान आंदोलन के लोग भी अगर अपने आंदोलन को हिंसक नहीं बनाते तो आज कामयाब होते। हिंसा शुरू होते ही , आंदोलन वापसी की घोषणा कर दिए होते , साज़िश के सौदागर न बने होते तो बात ही कुछ और होती।

नरेंद्र मोदी सरकार अगर आज कामयाब दिखती है तो सिर्फ़ इस लिए कि सरकार और पुलिस दोनों ने बुद्ध , महावीर और गांधी की अहिंसा पर यकीन किया , कार्ल मार्क्स की तानाशाही और हिंसा पर नहीं। सोचिए कि अगर पुलिस की एक भी गोली कहीं चली होती तो दिल्ली को जालियांवाला बाग़ बनने से कोई रोक नहीं सकता था। जाने कितनी लाशें बिछ गई होतीं। आज नरेंद्र मोदी से पूरी दुनिया इस्तीफ़ा मांग रही होती। लेकिन आंदोलनकारी तो समूची दिल्ली में सारी हिंसा पुलिस और सरकार को भड़काने के लिए ही कर रहे थे। पर लालक़िला की प्राचीर पर जो भी कुछ घटा , तिरंगे और लालक़िला का जो अपमान किया गया किसान आंदोलन के नाम पर तिरंगे की जगह धार्मिक झंडा और किसान आंदोलन का झंडा फहराया गया , हंसिया-हथौड़ा का झंडा रेलिंग पर लगाया गया , वह अप्रत्याशित था। तिरंगे और लालक़िला का यह अपमान सिर्फ़ सरकार ने ही नहीं , समूचे देश ने अपने दिल पर ले लिया है।

ट्रैक्टर रैली ऊर्फ टेरर रैली के नाम पर जिस तरह हिंसा की आग में दिल्ली को जलाया गया , 400 से अधिक पुलिस कर्मियों को घायल किया गया। घोड़े , ट्रैक्टर और तलवार चलाई गई , देश ने उसे पसंद नहीं किया। क़ानून की नज़र में तो यह सब अप्रिय था ही , देशद्रोह की इबारत भी बन गया। वामपंथियों ने बीते बरस भी मुसलामानों के साथ मिल कर सी ए ए के नाम पर दिल्ली को दहलाया और जलाया था इस साल भी दिल्ली को जलाने और दहलाने के लिए किसान आंदोलन के पंजाब के किसानों के साथ खड़े हो गए। पूरी रणनीति के साथ।

इस आग को कांग्रेस ने भी हवा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अब भी दे रही है। खालिस्तानी लोगों और उन को मिले फंड को भी वामपंथियों ने खूब दूहा। सरकार के साथ किसी भी सूरत समझौता नहीं होने दिया। फिर इस रणनीति के दूध का उबाल इतना उफना कि ट्रैक्टर रैली के नाम पर दिल्ली को ही नहीं राष्ट्रीय धरोहर , देश की शान , तिरंगे की मान को भी स्वाहा कर दिया। किसान आंदोलन के अगुआ और हीरो लोग अब देशद्रोह के आरोपी ही नहीं , देश के खलनायक बन कर उपस्थित हैं। यह लोग आए तो थे नरेंद्र मोदी को खलनायक बना कर देश की सत्ता से बाहर करने के लिए। लेकिन कबीर कहते हैं न कि :

जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल।
तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥

फ़िलहाल यही हो गया है। बुद्ध , महावीर और गांधी इसी लिए प्रासंगिक हैं और महत्वपूर्ण भी। लेकिन फासिस्ट लोगों के सिर्फ़ विचार ही नहीं , आंख और अक्ल भी कुंद हैं।

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