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पूरी साड़ी फटी हुई है, नयी किनारी दिल्ली में…

अक़ीला रेस्तराँ द्वारा साड़ी में प्रवेश निषेध उत्तर-उपनिवेशवाद है या यह उसी साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का ही विस्तार है जहां क्लबों और रेस्तराँओं में ‘डाग्स एंड इंडियन्स आर नाट अलाऊड’ के बोर्ड लगे रहते थे। कई क्रांतिकारियों ने उस समय अपने आक्रमण ऐसे अपमानों के चलते ही किये थे।अब तो कंप्यूटर युग में हर चीज़ स्मार्ट होने का फैशन है। सिटी भी स्मार्ट होनी हैं और सिटी के रेस्तराँ भी। जब घड़ी स्मार्ट हो सकती हैं, फ़ोन हो सकता है तो परिधान क्यों नहीं? कभी कोई हुसैन नंगे पैरों घुसा चला आता है, कभी ये कोई साड़ी पहन चले आये। कैजुअल विअर स्मार्ट हैं। साड़ी बौड़म। डंब।

ये तो शायर( विनय कुमार) है जो पहचानता है:
पूरी साड़ी फटी हुई है, नयी किनारी दिल्ली में।
तरल आग की लहर बेचती बर्फ हमारी दिल्ली में।
हश्र हवा में गुब्बारे सा होगा ग़र जेबें खाली
हलके हैं इंसान बहुत पर सिक्के भारी दिल्ली में।
दिल्ली के स्मार्ट होने की कुछ बाउंड्री लाइन्स तय की जा रही हैं।

और सौंदर्य-बोध के नये प्रतिमान भी गढ़े जा रहे हैं। गये वो जाँनिसार अख़्तर के दिन कि वो कहते थे :
वो माथे पे साड़ी के रंगीं किनारे
सहर से निकलती शफ़क़ के इशारे
अब तो ब्यूटी कंटेस्ट्स से साड़ी को बाहर हुए अरसा गुज़रा।

ये तो कवि (केदारनाथ अग्रवाल)हैं जिन्हें लगता है
धूप चमकती है चांदी की साड़ी पहने

जबकि रेस्तराँ के स्मार्ट वातानुकूलन में यह धूप भी नहीं चाहिए।

यह तो कवि (उदयन वाजपेयी) हैं जिन्हें साड़ी में अपनी पैरेंटेज का ख़्याल आ जाता है :
माँ झीने अँधेरे में डूबती, खाली कमरे में बैठी है।
उसकी साड़ी पर पिता की मौत धीरे-धीरे फैल रही है।
नाना वीरान हाथों से दीवार टटोलने के बाद खूँटी पर अपनी टोपी टाँग देते हैं।
नानी दबी आवाज़ से बुड़बुड़ाती है: ‘क्या बुड़ला फिर सो गया ?‘
माँ मेरी हठ के कारण सफ़ेद साड़ी बदलती है।
पिता सड़क के मुड़ते ही आकाश की ओर मुड़ जाते हैं।

स्मार्ट होने की चाह क्या इन्हीं पितर से मुक्त होने की चाह है?

यह तो लोकगीत हैं जो साड़ी को याद रखे हुए हैं:
इस साड़ी नै बांधण आली, पार्वती भोले की।
सिंग्लदीप की पदमनी सै, कोए रुक्के-रोले की।

स्मार्ट होने की चाह क्या इसी लोक से मुक्त होने की चाह है?

पाकिस्तानी सीरियलों में साड़ी चलती है पर स्मार्ट आधुनिकता को साड़ी सहन नहीं होती। अभी ‘मान्यवर’ वालों ने अपने विवादास्पद विज्ञापन की सफ़ाई में कहा कि वे एक इन्क्लूसिव समाज बनाना चाहते हैं। अब ये साड़ी वाली बहिष्कृति एरिस्टोक्रेसी का exclusionary होना नहीं बताती? अकेले अक़ीला की बात नहीं है। दुनिया भर में अनेक रेस्तराँ हैं जो काफ़ी रेसिस्ट क़िस्म का ड्रेस कोड अभी भी लागू किये हुए हैं। अटलांटा के उमी सुशी रेस्तराँ में पिछले साल ऐसा ही विवाद हुआ था। बाल्टीमोर में एक रेस्तराँ ने एक ब्लैक बच्चे को ड्रेस के आधार पर मना कर दिया था तो बवाल हुआ। आधुनिकता ही अभी तक परंपरा पर आक्रमण करती आई है और उसे पूर्वाग्रही बताती रही है। अभी परंपरा ने स्मार्टीकरण पर आक्रमण नहीं किया है। ये देखना चाहिए कि ये वस्त्र-विशुद्धिवादी क्या करेंगे जब कोई लहँगा, चोली, ओढ़नी पहन कर आ जाये और कोई परंपरा की ऐसी ही exotic dresses में। कब तक ये अपने अमेरिकनाइज्ड ड्रेस कोड्स लागू करेंगे? अभी किसी ने जगह जगह से फटी जीन्स पर कोई कमेंट कर दिया था तो सारे स्त्रीमुक्तिवादी उमड़ पड़े थे कि ये पहनूँ या वो आपसे मतलब!

अब वे कहाँ हैं?

(लेखक मध्य प्रदेश के सेवा निवृत्त आईएएस अधिकारी हैं और कई विषयों पर पुस्तकें लिख चुके हैं)

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