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शब्दों की फिजूलखर्ची से बिगड़ते माहौल से सावधान

इन दिनों जितना बोला जा रहा है, उतना शायद इतिहास में कभी नहीं बोला गया. कौन बोल रहा है, क्यों बोल रहा है, क्या बोल रहा है, समझ में नहीं आ रहा. बोला जाना एक शौक में, चीख में बदल चुका है.लोग माइक में चिल्ला रहे हैं कि बोला जाना ध्वनि प्रदूषण की श्रेणी में आ गया है. कोई खास वजह नहीं है, फिर भी बोला जा रहा है. कोई सुनने वाला नहीं है,फिर भी बोला जा रहा है.शब्दों की इतनी फ़िज़ूलख़र्ची कभी नहीं की गई, जितनी आज की जा रही है. चुनावी सभाओं में खिलाड़ी और अभिनेता बोल रहे हैं, साहित्यिक गोष्ठियों में नेता बोल रहे हैं, पुस्तक विमोचन के कार्यक्रम में उद्योगपति बोल रहे हैं। लोग अगर किसी को सुनते भी हैं तो सिर्फ सुनने के लिए नहीं बाद में बोलने के लिए सुनते हैं। बोलना एक अहम जिम्मेदारी है पर अफ़सोस कि अब वह बीमारी की शक्ल में ढल सा गया लगता है। 

वाणी की महिमा कौन नहीं जानता। मनुष्य के जीवन में सुख और दुख के जो प्रमुख कारण हैं, उनमें वाणी भी एक है। इसलिए वाणी की शक्ति को जानना और उसे जीवनोपयोगी बना लेना वास्तव में बड़ी बात है। 

संत कबीर कहते हैं- 
एक शब्द सुखरास है, एक शब्द दुखरास
एक शब्द बंधन करै, एक शब्द गलफांस।

संत कबीर ने एक पद में बताया है कि कब, किससे, क्या बोलना चाहिए-

बोलत बोलत बाढ़ विकारा, 
सो बोलिए जो पड़े विचारा।
मिलहिं संत वचन दुइ कहिए, 
मिलहिं असंत मौन होय रहिए।
पंडित सों बोलिए हितकारी, 
मूरख सों रहिए झखमारी।

क्या आप भी बोलने की कला सीखना चाहते हैं ? तो .बोल-चाल में शब्दों का सही चयन करें। आपको महत्वपूर्ण शब्दों को चुनना होगा और महत्वहीन शब्दों को छोड़ना होगा, क्योंकि शब्द ही आपके व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। बोलने की आदत डालिए, क्योंकि बोलने से आत्मविश्वास पैदा होता है, लेकिन बोलने से पहले अपने शब्दों को रचनात्मक विचारों की तराजू में तोलिए। यदि आप एक शब्द बोलने से पहले दो बार सोच लेंगे, तब आप हमेशा अच्छा बोलेंगे। जिन्हें बातचीत करना नहीं आता, वही लोग सबसे अधिक बोलते हैं। लेकिन जिन्हें बातचीत करनी आती है, वे कम बोलते हैं। 

कन्फ्यूसियस ने कहा है-‘शब्दों को नाप तौल कर बोलो, जिससे तुम्हारी सज्जनता टपके।‘ कबीर ने भी यही कहा है- 
बोली तो अनमोल है,जो कोई बोले जान। 
हिये तराजू तौल के, तब मुख बाहर आन।।

संयमित वाणी को विद्वानों ने अधिक महत्व दिया है। ऋषि नैषध कहते हैं-‘मितं च सार वचो हि वाग्मिता‘ अर्थात, थोड़ा और सारयुक्त बोलना ही पाण्डित्य है। जैन और बौद्ध धर्मों में वाक्संयम का महत्वपूर्ण स्थान है।

तुलसीदास जी की यह व्यंग्योक्ति बहुत बड़ी सीख देती है- 

पेट न फूलत बिनु कहे, कहत न लागत देर। 
सुमति विचारे बोलिए, समझि कुफेर सुफेर।।

भारतीय दार्शनिक जे. कृष्णमूर्ति ने कहा है-‘कम बोलो, तब बोलो जब यह विश्वास हो जाए कि जो बोलने जा रहे हो उससे सत्य, न्याय और नम्रता का व्यतिक्रम न होगा।‘ इसलिए बोलते समय सतर्क रहना चाहिए। 

कबीर के अनुसार-
शब्द संभारे बोलिए, शब्द के हाथ न पांव
एक शब्द औषध करे, एक शब्द करे घाव। 

फ्रांसीसी लेखक कार्लाइल ने कहा है कि मौन में शब्दों की अपेक्षा अधिक वाक्शक्ति है। गांधीजी ने भी मौन को सर्वोत्तम भाषण कहा है। सुकरात कहा करते थे-‘ईश्वर ने हमें दो कान दिए हैं और मुंह एक, इसलिए कि हम सुनें अधिक और बोलें कम।

अंत में देखिये कि संत कबीर ने बोलते समय मध्यम मार्ग अपनाने का सटीक सुझाव दिया है-
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।

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लेखक राष्ट्रीय ख्याति के वक्ता और 
शासकीय दिग्विजय पीजी ऑटोनॉमस 
कालेज, राजनांदगांव में प्रोफ़ेसर हैं। 
मो.9301054300 

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