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ओडिशा में अग्रसेन जयंती मनाने की रही है सुदीर्घ परम्परा

ओडिशा में अग्रसेन जयंती मनाने की सुदीर्घ और गौरवशाली परम्परा रही है। यहां पर व्यापार को बढावा देने के खयाल से 14वीं शताब्दी में राजा मानसिंह ने राजस्थान से कुछ कारोबारियों को ओडिशा लाया।वे अपने आगमन के आरंभ से (लगभग 550 वर्ष पूर्व से) ही ओडिशा में भी अपनी राजस्थानी संस्कृति,संस्कार और परम्परा आदि को जीवित रखे।साथ ही साथ अपने-अपने कारोबार केन्द्रों की ओडिया संस्कृति,परम्परा तथा लोकाचार को स्वेच्छापूर्वक अपनाकर उनमें पूर्ण सहयोग देते रहे। उन दिनों ओडिशा में उनके व्यापार का मुख्य केन्द्र जटनी, ब्रह्मपुर, कटक, संबलपुर, राउरकेला,बलंगीर,बरगढ और टिटलागढ रहा।

बाद में तो भुवनेश्वर समेत पूरे ओडिशा के सभी शहरों में उनका व्यापार तेजी से बढ गया।उनके व्यापार और कारोबार की प्रगति का मूल आधार उनकी ओडिशा के लोगों से आत्मीयता और पूर्ण सहयोग था जो आज भी समय-समय पर प्राकृतिक आपदाओं के वक्त स्पष्ट रुप से देखा जाता है।वे ओडिशा जनपद के स्थानीय लोगों की खुशी,सुख-शांति तथा समृद्धि में लग गये। प्रतिवर्ष ओडिशा में भी वे नवरात्रि के पहले दिन अग्रसेन जयंती हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं।महाराजा अग्रसेन अग्रवाल समाज के लोकनायक,जननायक और प्रियदर्शी राजा थे। वे अग्रवाल समाज के जन्मदाता और सुधारक थे।प्रवर्तक थे।समाजवाद के सच्चे प्रचारक थे। वे समाज सुधारक थे। उनका आविर्भाव द्वापर के अंतिम चरण में कलियुग के प्रथम चरण में 5185 वर्ष पूर्व में हुआ था।अग्रोदय राज्य के वे महाराजा थे।

वल्लभगढ के राजा के वे सबसे बडे राजकुमार थे।उनकी महारानी माधवी एक अत्यंत रुपवान और गुणवान वल्लभगढ राज की राजकुमारी थी।आज भी वल्लभगढ राज्य हरियाणा हिसार में है।महाराजा अग्रसेन आजीवन समता,समानता,दया,करुणा,शांति तथा न्याय में विश्वास करते थे और उनकी स्थापना में ही अपना जीवन व्यतीत किये।वे पूजा-पाठ में पशु-बलि के घोर विरोधी थे।हरियाणा प्रदेश सरकार ने महाराजा अग्रसेन के राज में अग्रोहा विकास ट्रस्ट बना दिया है जिसके माध्यम से वहां पर आज भी अनेक स्कूल, कालेज,अस्पताल,अतिथिशाला और देवालय आदि सफलतापूर्वक चल रहे हैं। महाराजा अग्रसेन के कुल 18 गोत्र हैं।कालांतर में महाराजा अग्रसेन ने निःस्वार्थ जनसेवा के लिए वे अपने सूर्यवंशी क्षत्रीय धर्म का परित्यागकर वैश्य धर्म अपना लिया।उनका विश्वास लोकतंत्र,आर्थिक समानता तथा सामाजिक न्याय में अटूट था।लगभग 108 वर्षों तक राज करने के बाद महाराजा अग्रसेन जी ने संन्यास ले लिया।

ओडिशा में व्यापार,कारोबार,उद्योग-धंधे तथा कल-कारखाने लगानेवाले समस्त वैश्य समाज अपने आपको यहां के सामाजिक,धार्मिक तथा जनसेवा के कार्य में भी लगाये हुए है।गौरतलब है कि राजस्थान से लाये गये व्यापारी आरंभ में गल्ले(राशन) का व्यापार करते थे।उसके उपरांत ये परिवहन (बैलगाडी,सबसे पहला परिवहन साधन के रुप में),उसके बाद कपडे का(कुल 8 महीने ओडिशा के गांव-गांव में जाकर कपडे बेचते थे और जैसे ही वर्षा आरंभ होती वे अपना सामान कटक मालगोदाम में रखकर तथा ओडिशा के अन्य सुरक्षित जगहों पर रखकर अपने पैतृक प्रदेश राजस्थान चले जाते थे।वर्षा के समाप्त होने के बाद वे पुनः ओडिशा लौट आते थे और अपने-अपने व्यापार में लग जाते थे।

लगभग 70 के दशक से वे स्थाई रुप से ओडिशा में रह रहे हैं जिनमें राजस्थान के साथ-साथ हरियाणा के भी कारोबारी हैं। ये ओडिशा के लोगों के साथ बडी ही आत्मीयता के साथ अपने-अपने कारोबार में लगे हुए हैं। सबसे बडी खुशी की बात यह है कि ओडिशा को अपनी कर्मस्थली मानकर पूरे ओडिशा में रह रहे लगभग 10लाख कारोबारी(वैश्य समाज) महाराजा अग्रसेन जी की समाजवादी अवधारणा को धन और मन से अक्षरशः साकार कर रहे हैं।वैश्विक महामारी कोरोना संक्रमण काल में भी(लगभग ढाई साल तक) ओडिशा के वैश्य समाज ने धन से और खुले मन से कोरोना मरीजों,कोरोना योद्धाओं तथा पारामेडिकल स्टाफों की भरपूर सहायता कर यह सिद्ध कर दिया कि ये सचमुच महाराजा अग्रसेन जी के वंशज हैं जो अपनी कर्मस्थली ओडिशा को अपना मानकर यहां के लोगों की सेवा करते हैं।

प्रतिवर्ष भगवान जगन्नाथ जी की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा तथा बाहुडा यात्रा(वापसी श्रीमंदिर यात्रा) के दौरान लाखों जगन्नाथ भक्तों को ओडिशा का वैश्य समाज निःशुल्क भोजन,नाश्ता,अस्थाई आवास सुविधा,प्राथिमक उपचार तथा विभिन्न प्रकार की जानकारियां आदि उपलब्ध कराता है।ओडिशा का वैश्य समाज समय-समय पर जनकल्यार्थ धार्मिक प्रवचन आदि आयोजित कराता है। इसप्रकार ओडिशा के वैश्य समाज की ओर अग्रसेन जयंती मनाने की परम्परा काफी गौरवशाली तथा सुदीर्घ रही है। सच कहा जाय तो ओडिशा के आतिथ्य-सत्कार का मूलमंत्र-अतिथिदेवोभव को ओडिशा का वैश्य समाज भी राज्य सरकार के साथ मिलकर साकार कर रहा है।

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