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विज्ञान एवं आध्यात्म में संतुलन लाना होगा- डॉ. नरेन्द्र भंडारी

महू (इंदौर). ‘विज्ञान एवं आध्यात्म दोनों एक ही चीज हैं और इनमें संतुलन लाना होगा. यह बात राष्ट्रीय वेबीनार को संबोधित करते हुए अंतरिक्ष वैज्ञानिक डॉ. नरेन्द्र भंडारी ने कही. डॉ. भंडारी ने कहा कि ‘विज्ञान सभी प्रकार के ज्ञान को मानता है और मानव कल्याण को ज्ञान माना गया है.’ डॉ. भंडारी डॉ. बीआर अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय (ब्राउस), साइंस एंड स्प्रिक्चुअल चेयर, ब्राउस, साइंट एंड स्प्रिक्चुअल रिचर्स इंस्ट्यूट अहमदाबाद एवं सोसायटी फॉर सिस्टोमेटिक एजुकेशन फॉर एवरीबडी डेवलपमेंट के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित वेबीनार में मुख्य अतिथि की आसंदी से संबोधित कर रहे थे. डॉ. भंडारी ने विज्ञान और आध्यात्म के अंर्तंसंबंध की व्याख्या करते हुए कहा कि विज्ञान न्यूटन के सिद्धांत को प्रतिपादित करते हुए बताता है कि सेव नीचे की ओर गिरता है लेकिन सेव से बीज और उससे लगने वाला पेड़ आध्यात्म को परिभाषित करता है. हमारा जीवन ही ब्रह्मांड से आया है. धर्म और विज्ञान को भी पृथक रूप से समझने पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि धर्म वह है जो चेतना का विकास करता है. उन्होंने कहा कि धर्म इज नॉट रिलीजन.

वेबीनार में बीज वक्तव्य में स्प्रिक्चुल थिंकर एवं साइंस एंड स्प्रिक्चुअल चेयर के चेयरपर्सन डॉ. चांद भारद्वाज ने कहा कि दुनिया में सब लोग आपस में सीखते हैं और यह सीखने की परम्परा से एक-दूसरे से जुड़ते हैं. वनमानस से हम मानस बने. विज्ञान के आधार पर हमारी सोच बनी. उनका कहना था कि ज्ञान को विज्ञान के माध्यम से बच्चों को सिखाना जरूरी है. उनका कहना था कि सृष्टि बनती है और बिगड़ती है और वापस बनती है. शिक्षा पद्धति को विज्ञान से जोड़े जाने की आवश्यकता बतायी. इसरो के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. सुरेन्द्र सिंह पोखराना ने कहा कि हमने आर्थिक विकास दर तो माप लिया है, अब आवश्यकता है कि हम आध्यात्मिक विकास दर मापने का कोई पैमाना बनाये. उनका कहना था कि आर्थिक विकास से कई तरह की समस्या उत्पन्न होती है लेकिन आध्यात्मिक विकास से समाज में शुचिता का स्थान बनता है. उन्होंने ज्ञान और विज्ञान के बीच के संबंधों को अपनी पीपीटी प्रजेंटेशन के माध्यम से आध्यात्मिक विकास की ओर जोडऩे के बारे में बताया. डॉ. पोखराना का कहना था कि सभी समस्या का हल आध्यात्म में है.

राज्यसभा सचिवालय के पूर्व संयुक्त संचालक एवं लेखक श्री एसएन साहू ने विवेकानंद का उल्लेख करते हुए विज्ञान और आध्यात्म के बीच के संबंधों और आज के समय की जरूरतों पर अपनी बात रखी. श्री साहू ने कहा कि विज्ञान एवं आध्यात्म पॉॅजिटिव सोच उत्पन्न करते हैं. सूचना एवं जानकारी हमारे पास विपुल है लेकिन इन्हें आध्यात्मिक रूप से समझने की आवश्यकता है. डॉ. बीआर अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय (ब्राउस) के मीडिया एवं नेक सलाहकार डॉ. सुरेन्द्र पाठक ने कहा कि विज्ञान मनुष्य की भौतिक एवं शारीरिक आवश्यकताओं की पूूर्ति करता है जबकि ज्ञान का संंबंध अंतरजगत है. अपने संक्षिप्त उद्बोधन में डॉ. पाठक ने कहा कि जिसे हम अथर्वेद के रूप में जानते हैं वह विज्ञान है, सामवेद विवेक है और ऋग्वेद ज्ञान है. मनु संहिता का उल्लेख करते हुए डॉ. पाठक ने कहा कि जीने का आचरण की बात कही गई है. उन्होंने कहा कि ज्ञान की प्राप्ति से मानव आचरण में नियंत्रण, संतुलन संभव होता है. उन्होंने कहा कि विज्ञान में विवेक का अभाव है जबकि सामाजिक विज्ञान में विवेक की पूर्णता है. आज विवेक सम्मत विज्ञान और विज्ञान सम्मत विवेक/सामाजिकता की अवश्यकता है।

वेबीनार की अध्यक्ष एवं कुलपति प्रो. आशा शुक्ला ने अतिथि वक्ताओं का स्वगात परिचय दिया. आभार प्रदर्शन करते हुए प्रो. शुक्ला ने कहा कि साफगोई के साथ कहा कि विज्ञान को लेकर तो उनकी समझ थोड़ी कम है लेकिन उन्हें मानवता की समझ है, उन्होंने उम्मीद जाहिर की कि विषय विशेषज्ञों के संगत में वे अपने ज्ञान में वृद्धि करने का प्रयास करेंगी. उन्होंने कोरोना संक्रमण के दौरान उपजी परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि हमने प्रकृति के साथ ज्यादती की तो हमें यह संकट भोगना पड़ा. कार्यक्रम का संचालन डॉ. बिंदिया तांतेड ने किया. वेबीनार के सफल आयोजनमें डीन डीके वर्मा, रजिस्ट्रार अजय वर्मा एवं सम्पूर्ण ब्राउस परिवार का सक्रिय सहयोग रहा. अनेक विवि के प्रोफेसरों की भागीदारी देखी गई।

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