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हिन्दुस्तान की आजादी के बाद का सफर बताएगी वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल की ये नई पुस्तक

जब यह देश आजाद हुआ तो किस हाल में था। बंटवारे की छुरी कलेजे पर चली थी। अंग्रेजों ने जी भरकर लूटा था।

जब यह देश आजाद हुआ तो किस हाल में था। बंटवारे की छुरी कलेजे पर चली थी। अंग्रेजों ने जी भरकर लूटा था। न पेट भर अनाज था, न तन ढकने को कपड़े और न बच्चों के लिए दूध। पढ़ने के लिए स्कूल, कॉलेज, इंजीनियरिंग, मेडिकल कॉलेज नाम मात्र के थे। उद्योग धंधे नहीं थे। हर हाथ को काम नहीं था। सब कुछ छिन्न-भिन्न था। इस हाल में भारत ने अपने आप को समेटा और तिनका-तिनका कर अपना मजबूत लोकतांत्रिक घोंसला बनाया। अफसोस हमारी नई पीढ़ी संघर्ष के उस दौर से परिचित नहीं है।

मैनें इन नौजवानों के लिए एक छोटी सी पुस्तिका लिखी है- ‘हिन्दुस्तान का सफ़र’। दरअसल इससे पहले मैनें इसी विषय पर एक फिल्म बनाई थी। उसे जाने माने गांधीवादी और गांधी जी के साथ वर्षों काम कर चुके प्रेमनारायण नागर ने देखा। नागर जी 96 बरस के हैं और सदी के सुबूत की तरह हमारे सामने हैं। उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए भोपाल के गौरव फाउंडेशन ने यह पुस्तिका प्रकाशित की है।

गौरव फाउंडेशन के प्रेरणा पुरुष और माधव राव सप्रे स्मृति राष्ट्रीय संग्रहालय के संस्थापक पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर की देख रेख में यह पुस्तिका उपयोगी बन पड़ी है। इसका लोकार्पण उज्जैन विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के वाग्देवी भवन में हुआ। इसमें श्रीधरजी के अलावा स्वयं प्रेमनारायण नागर जी, विवि के कुलपति अखिलेश पांडे, पूर्व कुलपति डॉक्टर रामराजेश मिश्र, विभागाध्यक्ष डॉक्टर प्रोफेसर शैलेन्द्र शर्मा, जानी-मानी लेखिका डॉक्टर मंगला अनुजा, नेहरू युवा केंद्र के संभागीय निदेशक श्री अरविन्द श्रीधर समेत अनेक विद्वान, पत्रकार, लेखक और छात्र-छात्राएं मौजूद थे।

ज़ाहिर है इस कार्यक्रम में नागरजी को सुनने से बेहतर और कोई अनुभव नहीं हो सकता था। आज भी उन्हें अस्सी पचासी साल पुराने भारत की कहानी याद है। सन 1924 में जन्में श्री नागर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के निर्देश पर हजारों कार्यकर्ताओं के साथ गांवों को मजबूत बनाने के मिशन पर निकल पड़े थे। गांधीजी ने 8 अक्टूबर, 1946 को खादी ग्रामोद्योग से जुड़े अपने कार्यकर्ताओं को बुलाया और उनसे कहा, ‘असल तस्वीर देखनी है तो शहरों में नहीं गांवों में जाओ। ग्रामीण क्षेत्रों के काम-धंधों को बचाना ही पर्याप्त नहीं है। उनमें सुधार लाकर गांव के लोगों को रोजगार भी देना होगा। श्री नागर कहते हैं, ‘बापू के निर्देश पर मैं और मेरे साथी ग्वालियर तहसील में भांडेर से पंद्रह किलोमीटर दूर गांव उड़ीना पहुंचे। उन दिनों वहां जाने के लिए कोई सड़क नहीं थी और न कोई अन्य बुनियादी ढांचा। बरसात के दिनों में तो दो नदियों को तैरकर पार करना पड़ता था। मैं उस क्षेत्र में एक साल तक काम करता रहा।

उन्हीं दिनों पास के गांव भिटारी भरका में आपसी संघर्ष में एक दलित श्रमिक को मार डाला गया। पास के पड़ोखर थाने से पुलिस आई। भांडेर से तहसीलदार जांच के लिए उस श्रमिक के घर पहुंचा। उस परिवार की गरीबी को देखकर वह द्रवित हो गया। उसने अंतिम संस्कार और कुछ समय तक पेट भरने के लिए कुछ आर्थिक सहायता देनी चाही। झोपड़ी के द्वार पर श्रमिक का शव रखा था। देहरी पर उसकी बेटी बैठी आंसू बहा रही थी। गांव के चौकीदार ने उससे कहा कि अपनी मां को बाहर लेकर आ। साहब कुछ मदद देना चाहते हैं। रोती हुई बेटी ने कहा कि अम्मा बाहर नहीं आएगी। उससे बार-बार कहा गया, लेकिन हर बार उसने मना कर दिया। जब बहुत देर तक उसने मां को नहीं बुलाया तो चौकीदार ने कहा कि मैं अंदर जाकर मिल लेता हूं। तब उस बिलखती बेटी ने बेबसी से कहा, ‘अम्मा बाहर नई आ सकत। वा नंगी बैठी है। उसके पास एकई धोती (साड़ी) हती। वा दद्दा (पिता) पै डार दई तो कैसें बाहर आहै”।

(इसी पुस्तिका- हिन्दुस्तान का सफ़र का एक अंश )

साभार – https://www.samachar4media.com/ से

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