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आज मीरा बाई होती तो ये भजन गाती

खायो जी मैने दाल रतन धन खायो
वस्तु अमोलिक दी मेरे सतगुरु |
कृपा कर अपनायो ||

जन्म जन्म की पूंजी गँवाई
पड़ोसी ईर्ष्या से भर आयो
खायो जी मैने दाल रतन धन खायो

भाव रोज ऊँचे, हर कोई लूटे, दिन दिन बढ़त सवायो ||

दाल की राजनीति खेवटिया काला बजारिया
जो पायो वो बौरायो

मीरा के प्रभु गिरिधर नागर |
दाल खाई के खूब इठलायो ||
मूल भजन ये है
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो |

वस्तु अमोलिक दी मेरे सतगुरु |
कृपा कर अपनायो ||

जन्म जन्म की पूंजी पाई |
जग में सबी खुमायो ||

खर्च ना खूटे, चोर ना लूटे |
दिन दिन बढ़त सवायो ||

सत की नाव खेवटिया सतगुरु |
भवसागर तरवयो ||

मीरा के प्रभु गिरिधर नगर |
हर्ष हर्ष जस गायो ||

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