Friday, June 21, 2024
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टुकड़े टुकड़े पाकिस्तान / ६

‘पाकिस्तान’ की किस्मत का तारा – खैबर पख्तूनख्वा / १

(जाने माने इतिहास लेखक व राजनीतिक चिंतक प्रशांत पोळ ने भारत विभाजन के दौर की घटनाओँ पर जबर्दस्त शोध किया है और पाकिस्तान बनने और उसके बाद के घटनाक्रमों पर कई ऐतिहासिक साक्ष्य जुटाएं हैं , उनके इस अभिनव कार्य की छठी  कड़ी में प्रस्तुत है गाँधी और नेहरु द्वारा खैबर पख्तुनावा  जैसे प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर क्षेत्र को पाकिस्तान के पाले में डालने का षड़यंत्र और बादशाह अब्दुल गफ्फार खान से धोखाधड़ी की दास्तान  )

पाकिस्तान का, अफगानिस्तान से सटा हुआ राज्य, जिसे आज ‘खैबर पख्तूनख्वा’ कहा जाता हैं, पाकिस्तान की झोली में आया, नेहरु के कारण. यह राज्य, पाकिस्तान की किस्मत का तारा हैं, जिसके कारण अमरीका ने अफगानिस्तान के रुसी सैनिकों से लोहा लेने के लिए, पाकिस्तान पर पैसों की बारिश की थी.

तब इसका आधिकारिक नाम ‘खैबर पख्तूनख्वा’ नहीं था. यह North West Frontier Province (NWFP) के नाम से जाना जाता था. पश्तूनों, या पठानों का यह प्रदेश, तब भी मुस्लिम बहुल था. पश्तूनी या ‘हिंदको’ भाषा यहां चलती थी. हमारे चर्चित फ़िल्मी चेहरे, प्राण, राजकपुर, देवानंद आदि उन दिनों ‘हिंदको’ भाषा जानते थे, बोलते थे. इस राज्य का पेशावर यह बड़ा केंद्र था. व्यापार का, शिक्षा का और कुछ हद तक सांस्कृतिक गतिविधियों का भी.

*इस पूरे क्षेत्र के सर्वमान्य नेता थे, खान अब्दुल गफ्फार खान. एक भारीभरकम नाम और ठीक वैसा ही भारीभरकम उनका व्यक्तित्व.  पश्तूनी, या पठानी लोग उन्हें ‘बादशाह खान’ इस नाम से पुकारते थे. उनके समर्थकों को ‘खुदाई खिदमतगार’ कहा जाता था. भारत इन्हें ‘सीमांत गांधी’ के नाम से जानता था.* वे थे ही गांधीजी के अनन्य साधारण भक्त. पूर्णतः गांधीवादी जीवन जीनेवाले. और तो और, उन्होंने औसत छह / सात फीट ऊँचे, खूंखार माने जाने वाले पठानों को भी गांधीजी के शरण में लाने की जादू कर दिखाई थी. लगभग सारे पठानों को उनका नेतृत्व मान्य था.

इसीलिए, अंग्रेजों ने जब १९४५ / ४६ में राज्यों के चुनाव कराएं, तब नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ. यह एक आश्चर्य था. कारण १९४६ तक, लगभग देश के विभाजन का स्वरुप स्पष्ट हो चुका था. जिन राज्यों में मुसलमानों का बहुमत हैं, वहां पर मुस्लिम लीग और जहां हिन्दुओं का बहुमत हैं, वहां कांग्रेस के हाथों सत्ता आयी थी. ऐसे में मुस्लिम बहुल नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में कुल ५० सीटों में से ३० स्थानों पर कांग्रेस का जीतना यह एक आश्चर्य ही था. यह कर दिखाया था, बादशाह खान, अर्थात सीमांत गांधी ने और उनके खुदाई खिदमतगारों ने.

अब जबकि यह स्पष्ट हो गया कि भारत का विभाजन होने वाला है, तब पठानों के सामने सवाल खड़ा हुआ कि, वे किस तरफ जाएं? पठानों का और पाकिस्तान के पंजाबियों का आपस में बैर बहुत पुराना था. इस कारण इस प्रांत के सभी पठानों की इच्छा थी कि वे भारत में विलीन हों. प्रांतीय असेम्बली में बहुमत भी इसी पक्ष में था. केवल भौगोलिक निकटता का ही सवाल था, परन्तु तर्क यह दिया गया कि पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच भी तो हजारों मील की दूरी है. दूसरी बात यह भी थी कि यदि कश्मीर की रियासत भारत के साथ मिल जाती है, तो ये प्रश्न भी हल हो जाएगा, क्योंकि गिलगिट के दक्षिण वाला इलाका, नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर से सटा हुआ ही है.

*परन्तु इस सबके बीच नेहरू ने अडंगा लगा दिया. उनका कहना था कि ‘हमें वहां सार्वमत (रेफरेंडम) से फैसला करना चाहिए’.* कांग्रेस की कार्यकारिणी में भी यह मुद्दा गरमाया और सरदार पटेल ने इस कथित सार्वमत का जमकर विरोध किया. *सरदार पटेल का कहना था कि, ‘प्रान्तीय विधानसभाएं यह तय करेंगी कि उन्हें किस देश में शामिल होना है. देश के अन्य भागों में भी हमने यही किया है. इसीलिए जहां-जहां मुस्लिम लीग का बहुमत है, वे सभी प्रांत पाकिस्तान में शामिल होने जा रहे हैं. और जहां-जहां कांग्रेस का बहुमत हैं, वे राज्य भारत में मिल रहे हैं. इसी न्याय के आधार पर नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर राज्य को भारत में विलीन होना ही चाहिए, क्योंकि वहां कांग्रेस का बहुमत हैं’. परन्तु नेहरू अपनी बात पर अड़े रहे.* नेहरू ने कहा कि ‘मैं लोकतंत्रवादी हूं. इसलिए वहां के निवासियों को जो लगता है, उन्हें वैसा निर्णय लेने की छूट मिलनी चाहिए’.

*बादशाह खान को रेडियो और समाचार पत्रों के माध्यम से ही यह पता चला कि उनके प्रान्त में सर्वसम्मत  निर्णय किया गया है. जिस व्यक्ति ने इस बेहद कठिन माहौल और मुस्लिम बहुल इलाका होने के बावजूद, पूरा प्रदेश कांग्रेसी बना डाला था, उन्हें नेहरू ने ऐसे अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर चर्चा करने लायक भी नहीं समझा. इसीलिए यह समाचार मिलते ही खान अब्दुल गफ्फार खान ने दुखी स्वर में कहा कि, “कांग्रेस ने यह प्रांत थाली में सजाकर मुस्लिम लीग को दे दिया है…!”*

इस प्रांत में जनमत (सर्वमत – रेफेरेंडम) की प्रक्रिया २ जुलाई १९४७ से आरम्भ हुई. मतदान ६ जुलाई को प्रारंभ हुआ. जो लगभग दस दिनों तक चला. सार्वमत से पहले और सार्वमत जारी रहने के दौरान, मुस्लिम लीग ने बड़े पैमाने पर धार्मिक भावनाओं को भड़काया. यह देखकर कांग्रेस ने इस सार्वमत का बहिष्कार कर दिया. इधर जब बादशाह खान को पता चला की इस सार्वमत में पख्तूनिस्तान के अलग देश का पर्याय ही नहीं हैं, तो उन्होंने भी सार्वमत का बहिष्कार किया. उनके लिए भारत में जाना यही पहला विकल्प था. उस विकल्प के ना रहने पर वे स्वतंत्र पख्तूनिस्तान चाहते थे. लेकिन यह विकल्प तो अंग्रेज सरकार ने रखा ही नहीं. खुदाई-खिदमतगार पार्टी के बादशाह खान इस बात की चिंता कर रहे थे कि ‘नेहरू की गलतियों की हमें कितनी और कैसी सजा भुगतनी पड़ेगी’.

यह मतदान केवल और केवल एक धोखा भर था. जिन छह आदिवासी जमातों पर खान अब्दुल गफ्फार खान का गहरा प्रभाव था, उन्हें मतदान में भाग लेने से रोक दिया गया. पैंतीस लाख जनता में से केवल पांच लाख बहत्तर हजार लोगों को ही मतदान करने लायक समझा गया. सवत, दीर, अम्ब और चित्राल इन तहसीलों में मतदान हुआ ही नहीं.

जितने पात्र मतदाता थे, उनमें से केवल ५१% मतदान हुआ. पाकिस्तान में विलीन होने का समर्थन करने वालों के लिए हरे रंग के डिब्बे रखे गए थे, जबकि भारत में विलीन होने वालों को मतदान हेतु लाल डिब्बे थे. पाकिस्तान की मतपेटी में २,८९,२४४ वोट पड़े और कांग्रेस के बहिष्कार के बावजूद भारत में विलीनीकरण के पक्ष में २,८७४ वोट पड़े. अर्थात, पैंतीस लाख लोगों में से केवल तीन लाख के आसपास वोट पाकिस्तान के पक्ष में पड़े थे.

बादशाह खान के मन में इसी बात को लेकर नाराजी थी. ‘नेहरू और गांधीजी ने हम लोगों को लावारिस छोड़ दिया. और वह भी इन पाकिस्तानी भेड़ियों के सामने…’ ऐसी भावना लगातार उनके मन में घर कर रही थी.

_(अफगानिस्तान के विषय पर निरंतर लेखन करने वाली लेखिका प्रतिभा रानडे का एक लेख ‘अंतर्नाद’ के २०१८ के दीपावली अंक में है – ‘आक्रोश का अवकाश’. इस लेख में उन्होंने अस्सी के दशक में (जब वे अफगानिस्तान में थीं), बादशाह खान उनके घर पर आए थे, उस घटना का विवरण लिखा है. इस भेंट में खान साहब ने प्रतिभा रानडे से कहा था, “वास्तव में हमें तो हिन्दुस्तान में ही रहना था… गांधीजी ने वैसा वचन भी दिया, परन्तु बाद में उन्होंने हमारे साथ विश्वासघात कर दिया. गांधी-नेहरू ने स्वतंत्रता तो हासिल कर ली, परन्तु हम लोगों को कुत्तों के (पाकिस्तान) सामने फेंक दिया. यह दुःख मैं कभी नहीं भूल सकता. गांधी-नेहरू ने हमें धोखा दिया.”)_

इसीलिए पेशावर, कोहट, बानू, स्वात इलाकों से उनके कार्यकर्ता उनसे पूछ रहे थे कि ‘क्या हमें भारत में विस्थापित हो जाना चाहिए’? तब सीमान्त गांधी के पास इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था. वे क्या जवाब दें यह समझ नहीं पा रहे थे…!

इसीलिए, बटवारे के कुछ दिनों तक इस नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में विस्थापितों का बड़ा विचित्र दृश्य दिख रहा था. इस प्रान्त के मुसलमान, शरणार्थी बनकर खंडित भारत की ओर जा रहे थे. उनकी संख्या कम थी. किन्तु शुरूआती दिनों में विस्थापन का यह उलटा क्रम तेज था. इस प्रान्त में खंडित भारत से आनेवाले मुस्लिम विस्थापितों की संख्या नगण्य थी.

*पाकिस्तान को यह राज्य, मुस्लिम लीग का बहुमत ना होते हुए भी किस्मत से मिल गया. रणनीतिक और सामरिक रूप से यह प्रान्त अत्यंत महत्वपूर्ण हैं.* इसकी सीमाएं अफगानिस्तान, गिलगिट, पंजाब, कश्मीर आदि प्रान्तों से मिलती हैं. आज तक हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने आए हुए सारे आक्रांता इसी प्रान्त से चलकर आए थे. हिन्दुकुश पर्वत इस प्रान्त को और अफगानिस्तान को जोड़ता हैं. उसमें ‘खैबर के दर्रे’ के नाम से प्रसिध्द जो घाटी हैं, उसे लांघकर आक्रमणकर्ता भारत में आते थे.

*ऐसा प्रदेश पाकिस्तान को मिलना यह उसकी किस्मत ही थी.*

लेकिन पाकिस्तान ने इस प्रदेश को अपनाने के कुछ ख़ास प्रयास नहीं किये. बादशाह खान को पाकिस्तान की सरकार ने अनेकों बार जेल में बंद रखा. उनकी मृत्यु के समय भी वे नजरबन्द थे. ९८ वर्ष की आयु में, पाकिस्तान की सरकार ने सन १९८८ में उन्हें घुट-घुट कर मरने के लिए मजबूर किया..!

इस नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस का ‘खैबर पख्तूनख्वा’ कैसे हुआ और कब हुआ आगे पढ़िये…

*खैबर पख्तुनख्वा / २*  

पाकिस्तान बना था इस्लाम की प्रेरणा से. उस समय के अखंड भारतवर्ष के मुसलमान एक अलग देश चाहते थे. इसलिए पाकिस्तान के नाम में ही इस्लाम हैं. ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ पाकिस्तान’ अर्थात ‘इस्लामी जम्हूरिया पाकिस्तान’ यह इस राष्ट्र का पूरा नाम हैं.

*लेकिन प्रश्न यह हैं, क्या मात्र इस्लाम के नाम पर एक राष्ट्र खड़ा हो सकता हैं..? इरान और ईराक, दोनों मुस्लिम राष्ट्र हैं. लेकिन दोनों के बीच कई युध्द हो चुके हैं. ईराक ने कुवैत पर कई बार हमले किये हैं. सीरिया को ध्वस्त करने में मुस्लिम संगठनों का बड़ा हाथ हैं. पाकिस्तान की अफगानिस्तान से नहीं पटती…. ऐसे अनेक उदाहरण हैं. ये सभी इस्लामी राष्ट्र हैं, लेकिन आपस में झगड़ते हैं. अर्थात, मात्र मुस्लिम होना, यह किसी राष्ट्र को बांधे रखने का आधार नहीं हो सकता हैं.*

*पाकिस्तान बनाते समय, उसे बनाने वाले शायद इसी बात को भूल गए थे..!* इसीलिए आजादी के पच्चीस वर्ष पूरे होने के पहले ही, पाकिस्तान से, उसका बहुत बड़ा भूभाग, भाषा और स्थानिक संस्कृति को लेकर अलग हो गया था. पूर्व बंगाल की जनता और नेता, प्रमुखता से मुस्लिम ही थे. शेख मुजीबुर्र रहमान पांच वक्त नमाज पढने वाले मुस्लिम थे. लेकिन उनकी नहीं बनी. *१९७० – ७१ के दौरान, पश्चिम पाकिस्तान के शासकों ने लाखों की संख्या में पूर्वी बंगाल के हिन्दुओं को तो मारा ही. साथ ही, वहां के मुसलमानों को भी मारा…. एक ही धर्म के मानने वालों ने ऐसा किया. कारण, मुस्लिम धर्म यह राष्ट्र को खड़ा करने का साधन या आधार हो ही नहीं सकता, यह पाकिस्तानी समझ ही नहीं पाएं.* और बंगला देश, एक अलग राष्ट्र के रूप में खड़ा हुआ.

यही बात पाकिस्तान के अन्य प्रान्तों में हो रही हैं. नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस के साथ भी यही हुआ, और यही हो रहा हैं. नेहरु और अंग्रेजों के कारण, गांधीजी को और कांग्रेस को मानने वाला यह महत्वपूर्ण प्रदेश पाकिस्तान में चला गया. उस पाकिस्तान में, जिसकी भाषा प्रमुखता से पंजाबी और उर्दू थी. बंगाली भी प्रारंभ में चलती थी. लेकिन इस NWFP में रहनेवाले अधिकतर, या तो पश्तो बोलते थे, या हिंदको. न तो भाषा की समानता थी, ना रीति-रिवाजों की. इसलिए १९४७ में पाकिस्तान के बनने से ही, पठान, दिल से कभी भी पाकिस्तान के साथ नहीं रहे.

उनके सर्वमान्य नेता, बादशाह खान अर्थात खान अब्दुल गफ्फार खान को तो पाकिस्तान ने उनके मरते तक भरपूर अपमानित किया. बार बार उन्हें पकड़कर जेल में ठूंस दिया जाता था. ९८ वर्ष के आयु में जब उनका इंतकाल हुआ, तब भी वे पेशावर में नजरबन्द थे..!

ये सारा प्रदेश पहाड़ी हैं, जनजातियों से भरा हैं, अविकसित हैं, लेकिन गजब का सुन्दर हैं. ऐसा लगता हैं, प्रकृति ने अपनी सारी कृपा इस प्रदेश पर बरसाई हैं. पाकिस्तान में कुल २९ नेशनल पार्क हैं, जिन मे से १८ पार्क, इस प्रदेश में हैं. झेलम, सिन्धु, काबुल, कुर्रम, स्वात, पंजकोरा, कुनार, कुंहर… इन नदियों ने इस पूरे प्रदेश को हरा-भरा और प्राकृतिक सुन्दरता से भरपूर बना दिया हैं. हिन्दू कुश की पर्वत श्रेणियों ने इसे दुर्गमता के साथ सृष्टि का वैभव दिया हैं. इस प्रदेश में प्रमुखता से पश्तुनी लोग रहते हैं, जो पाकिस्तान में पंजाबियों के बाद, दूसरा सबसे ज्यादा संख्या वाला समूह हैं.

पेशावर यह NWFP, जो आज खैबर पख्तुनख्वा कहलाता हैं, की राजधानी हैं. दक्षिण आशिया का प्राचीनतम शहर. ईसा पूर्व ५३९ वर्षों का इतिहास, इस शहर में मिलता हैं. *किसी जमाने में यह हिन्दुओं की सांस्कृतिक विरासत का प्रतिक, ‘पुरुषपुर’ शहर था. वैभवशाली और संपन्न. बौध्दों के लिए भी यह एक पवित्र स्थल था. आज वही पेशावर शहर आतंकी हमलों से बदतर हो गया हैं. प्रदुषण की भरमार, तंग गलियां और आतंकी हमलों की आशंका… यह पेशावर का स्थायीभाव बन गया हैं.*

किसी जमाने में समृद्ध रहे इस गांधार प्रांत के अवशेष अब खंडहर होते जा रहे हैं. अराजकता और अस्थिरता यह इस प्रदेश का स्वभाव विशेष बनाता दिख रहा हैं. अफगानिस्तान से लगा होने के कारण, इस प्रदेश में तालीबानियों की भी दखलंदाजी हैं. आतंकवादियों के विभिन्न गुट, एक – दूसरे की जान लेने पर उतारू रहते हैं.

पहले अमेरिकी जासूसों ने, अफगानिस्तान के रुसी सैनिकों से लड़ने के लिए इसका उपयोग किया. फिर रुसी सैनिक चले जाने के बाद, तालिबानी सैनिकों ने पेशावर को अपना ठिकाना बनाया. पाकिस्तान ने भी इस पूरे क्षेत्र को ‘आतंकवाद का अड्डा’ बनाए रखा. इसी प्रदेश के आबोटाबाद में पाकिस्तानी सेना ने ‘ओसामा बिन लादेन’ को अनेक वर्षों तक छुपाएं रखा था.  यहां पाकिस्तानी प्रशासन बिलकुल लचर हैं. २०१४ में इसी शहर में तालिबानियों ने १३२ स्कूली बच्चों को मौत के घात उतारा था.

प्रारंभ से ही इस NWFP में पाकिस्तान के विरुध्द, विरोध का वातावरण रहा. लेकिन सीमावर्ती क्षेत्र, और वनवासी जनजाति समुदाय होने के कारण पाकिस्तान ने कभी इस क्षेत्र पर ध्यान दिया ही नहीं. इसलिए विरोध के स्वर ज्यादा बुलंद नहीं हो सके. लेकिन नब्बे के दशक के बाद, अमरीका ने, अफगानिस्तान के रूसियों से लड़ने के लिए इसी क्षेत्र को युध्दभूमि बनाया, और सारे समीकरण बदलते चले गए. अमरीका ने ९/११ होने के बाद तो इस प्रदेश को युध्दभूमि मान लिया था. पठानों पर अत्याचार होने लगे. और पाकिस्तान, अमरीकी सेना का समर्थन कर रहा था. सारे पठान, पाकिस्तान के विरोध में होते गए. विरोध का यह वातावरण ऐसा बढ़ता गया, की सन २००९ में इस NWFP प्रदेश के प्रमुख सड़कों पर चालीस फीट के बड़े से होर्डिंग्स लगे थे, पाकिस्तान के विरोध में. तब तक यह इलाका ‘आतंकवाद का गढ़’ बन चुका था.

सन २०१० में पाकिस्तानी प्रशासन ने इसे सुधारने के लिए कुछ करने का सोचा. उन्होंने इसका नाम बदल दिया. NWFP से यह ‘खैबर पख्तूनख्वा बन गया. सन २०१८ में इस प्रदेश में पाकिस्तान का अर्ध स्वायत्त प्रदेश, FATA (Federally Administered Tribal Areas) विलीन कर दिया. लेकिन अन्य कोई बदलाव नहीं हुआ. आतंकी गतिविधियाँ वैसेही चलती रही. *पुश्तैनी निवास करनेवाले पठानों को यह सब सहन नहीं हो रहा था. उन्होंने अलग ‘पश्तुनिस्तान’ की मुहीम छेड़ रखी हैं.*

*उमर दौड़ खटक* यह पश्तुनिस्तान समर्थक विद्रोही नेता हैं. ये पाकिस्तानी सेना में था. लेकिन अपने पश्तून प्रदेश में हो रहे पाकिस्तानी अत्याचार के विरोध में वो पाकिस्तानी सेना से भागा और अफगानिस्तान गया. वहां उसने ‘पश्तुनिस्तान लिबरेशन आर्मी’ बनाईं हैं, जिसका वह ‘मिशन कमांडर’ हैं. उमर का कहना हैं, ‘उसके जैसे अनेक युवा, पाकिस्तानी अत्याचार के विरोध में देश छोड़कर, उसकी ‘पश्तुनिस्तान लिबरेशन आर्मी’ में शामिल हो रहे हैं’.

आगे पढ़िए…..
खैबर पख्तुनवा 3

‘उमर दौड़ खटक’ ने पाकिस्तानी सेना पर आरोप लगाया हैं, की ‘वे (पाकिस्तानी सेना), वजीरिस्तान और स्वात इलाके की पश्तूनी महिलाओं को, ‘हवस का गुलाम’ बनाकर रखती हैं. उसका कहना हैं की सैकड़ों की संख्या में पश्तूनी महिलाओं को पाकिस्तानी सेना ने, उनका काम होने के बाद, लाहौर के वेश्यालयों में भेज दिया हैं.’

उमर दौड़ खटक अनेकों बार भारत आ चुका हैं. पूरे पश्तुनिस्तान में फैले विद्रोह का, पाकिस्तान के प्रति गुस्से का, वो प्रतिक हैं…!

*इस्लामाबाद के बैठे पाकिस्तानी शासकों के खिलाफ, खैबर पख्तूनवा के लड़ाकू पठानों ने हमेशा ही आवाज बुलंद की हैं. और इस्लामाबाद की सरकार ने उन्हे हमेशा ही दबाने की कोशिश की हैं.*

पाकिस्तानी सरकार के विरोध के आंदोलनों की इस शृंखला में २०१४ से एक जबरदस्त नाम सामने आ रहा हैं – *‘पख्तून तहफ्फुज मूवमेंट’ (PTM)*, अर्थात ‘पख्तून रक्षा आंदोलन’. डेरा इस्माइल खान की ‘गोमल यूनिवर्सिटी’ में पढ़ने वाले आठ लड़कों ने, लगभग आठ – नौ वर्ष पहले यह आंदोलन खड़ा किया. पहले इसका नाम ‘महसूद तहफ्फुज’ था. महसूद यह वज़ीरिस्तान की एक जनजाति का नाम हैं, जिसके अधिकतर छात्र, गोमल यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे.

लेकिन १३ जनवरी, २०१८ को इस आंदोलन के एक नेता, नकिबुल्लाह महसूद को पुलिस ने कराची में एक झूठे एनकाउंटर में मार गिराया. इससे छात्रों का गुस्सा भड़का और आंदोलन भी पूरे प्रदेश में फ़ैल गया. आंदोलन के इस फैलाव के बाद, इसके नाम में से महसूद शब्द हटाकर, ‘पख्तून’ कर दिया गया. आज यह आंदोलन खैबर पख्तूनवा के साथ, बलूचिस्तान प्रांत में भी फ़ैल रहा हैं. इसे पाकिस्तानी, ‘पी टी एम’ (Pashtun Tahafuz Movement) इस नाम से जानते हैं.

दिनांक २६ मई, २०१९ को, नॉर्थ वज़ीरिस्तान जिले के खारकमर मिलिट्री चेक पोस्ट पर, पी टी एम के, शासन विरोधी प्रदर्शन चल रहे थे. आंदोलन में लग रहे नारों से बौखलाकर पाकिस्तानी सेना ने इन प्रदर्शनकारियों पर अंधाधुंद गोलियां चलाई. इसमे पी टी एम के १३ कार्यकर्ता मारे गए और २५ गंभीर रूप से जख्मी हुए. इसकी जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई. पाकिस्तानी सेना के विरोध में प्रदर्शन तीव्र होने लगे. पाकिस्तानी सेना ने पी टी एम के धाकड़ सांसद, आली वझीर और मोहसीन डावर को गिरफ्तार किया. २१ सितंबर तक ये दोनों, सेना के जेल में रहे. लेकिन विरोध का आंदोलन रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था. आखिरकार पड़ोसी देश भारत, जब अपना गणतंत्र दिवस मना रहा था, अर्थात २६ जनवरी २०२० को, पाकिस्तानी पुलिस ने, पी टी एम के निर्विवाद नेता, ‘मंजूर पश्तिन’ को पेशावर से उठा लिया.

*‘मंजूर पश्तिन’ यह खैबर पख्तूनख्वा के लोगों की आवाज हैं. वे मानव अधिकार कार्यकर्ता हैं. उन्हे पाकिस्तान में तथा पाश्चात्य मीडिया मे, ‘नया फ्रंटीयर गांधी’ कहा जाता हैं.* मात्र २६ वर्ष की आयु का यह लड़का, पूरे पी टी एम का नेतृत्व करता होगा, ऐसा लगता नही. मंजूर पश्तिन, एक उजबेकि टोपी पहनता हैं, उसे माझरी हैट कहते हैं. पशतुनी युवाओं में यह टोपी इतनी ज्यादा लोकप्रिय हो गई हैं, की लोग उसे अब मंजूर के नाम से ‘पश्तिन टोपी (Pashtin Hat)  कहने लगे हैं. मंजूर पश्तिन को मानने वाले लाखों कार्यकर्ता खैबर पख्तूनवा में हैं. इसलिए २६ जनवरी की गिरफ्तारी के तुरंत बाद, पी टी एम के दो सांसद, अली वझीर और मोहसीन डावर ने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किए.

*पाकिस्तान में ३ से ४ करोड़ पश्तुन रहते हैं. आज उनका सर्वमान्य नेता, मंजूर पश्तिन हैं. पाकिस्तान की सरकार और पाकिस्तानी सेना, इस छब्बीस वर्षीय युवा नेता से इतनी ज्यादा डरी हुई हैं, की वह उसे जेल के बाहर देखना पसंद नही करती.* पाकिस्तान सरकार को लगता हैं की शायद मंजूर पश्तिन को गिरफ्तार कर के, वे पी टी एम का आंदोलन कुचल देंगे. लेकिन ऐसा संभव नही हैं. आज तक, पाकिस्तान की सेना और पुलिस से लड़ते हुए, पचास हजार से ज्यादा पश्तुन, मारे गए हैं. पाकिस्तान की सेना, पूरे बर्बरता के साथ, इस आंदोलन को कुचलना चाहती हैं.

अभी कुछ महीने पहले, इमरान खान को गिरफ्तार करने के बाद लोगों का गुस्सा पाकिस्तानी सेना पर फूट पड़ा था. इस घटना को छोड़ दे, तो पाकिस्तान में सेना के विरोध में बोलना बहुत बड़ा साहस माना जाता हैं. *लेकिन मंजूर पश्‍तीन खुल कर सेना के विरोध में बोलते हैं. अभी कुछ दिन पहले एक रैली में उन्होंने कहा था, “हमे बर्बाद करने वाली जगह हमे पहचानना होगी. और वह जगह हैं – जी एच क्यू (अर्थात पाकिस्तान का सेना मुख्यालय!)”*

इस समय ‘पश्तून तहफुज मूवमेंट’ (पीटीएम) के साथ मिलकर मंजूर पश्तून काम कर रहे हैं. कुछ महीने पहले, जब पी टी एम के नेता आली वजीर को दो साल कैद में रखने के बाद रिहा किया गया, तो उनके स्वागत में लाखों लोगों ने रैली की. इस रैली को मंजूर पश्तीन और मंसूर पश्तीन ने संबोधित किया.

*सारा वज़ीरिस्तान इस समय असंतोष की आग में उबल रहा हैं. पश्तुनों के मानव अधिकारों से प्रारंभ यह आंदोलन अब पुरजोर तरीके से, ‘स्वतंत्र पश्तूनिस्तान’ की मांग कर रहा हैं.* ऐसे समय में मंजूर पश्तिन को गिरफ्तार करना, सन १९७१ में बंगाल के ‘अवामी लीग’ के नेता, शेख मुजीबुर रहमान की गिरफ्तारी याद दिलाता हैं. इसलिए पाकिस्तान सरकार भी उन्हे गिरफ्तार करने में हिचक रही हैं. इसके कारण इस पूरे प्रदेश का वातावरण बिगड़ा हैं. किसी जमाने में बौद्ध धर्म का यह गढ़, आज आतंकवादियों के विभिन्न गुटों की युद्ध भूमि बना हुआ हैं.

‘पश्तून तहफ़ूज मूवमेंट’ (PTM) के सहसंस्थापक मोहसीन डावर, यह पाकिस्तान की नेशनल असेंबली (अपनी भाषा में ‘लोकसभा’) के सदस्य हैं. स्वतंत्र पश्तूनीस्तान के प्रबल समर्थक, मोहसीन डावर ने पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में एक संविधान संशोधन का बिल लाया था, जिसमे ‘खैबर पख्तूनवा’ नाम से ‘खैबर’ शब्द को हटाने की मांग थी. किन्तु अलग से पख्तूनवा या पश्तूनीस्तान की मांग में अफगानिस्तान यह भी एक मुद्दा हैं. अफगानिस्तान में लगभग ४५ प्रतिशत पश्तून हैं. इसलिए अफगानिस्तान भी अपना हक पश्तूनीस्तान पर जताता हैं. तालिबान, पेशावर और पख्तूनवा के क्षेत्र में अपनी घुसपैठ बढ़ा रहा हैं. इसी कारण से स्वतंत्र पश्तूनीस्तान का मुद्दा थोड़ा जटील बन गया हैं.

अभी ३० जुलाई, २०२३ को, खैबर पख्तुनख्वा के बाजौर जिले के खार गाव में ‘जमात उलेमा-ए-इस्लाम’ की रॅली मे एक आत्मघाती (सुसाइड) आतंकवादी ने बम से ५६ लोगों को उड़ा दिया. दो सौ से ज्यादा, गंभीर रूप से घायल हुए हैं.

*इसका अर्थ इतना ही हैं, की पाकिस्तानी सेना को, इस प्रदेश को अपने नियंत्रण में रखना, दिन-ब-दिन कठीन होता जा रहा हैं, और बहुत ज्यादा दिन तक यह प्रदेश पाकिस्तान के साथ जुड़कर रहेगा, ऐसा लगता नहीं हैं..!*

–   प्रशांत पोळ

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