Saturday, June 15, 2024
spot_img
Homeदुनिया मेरे आगेपुस्तक मेले की सैर में क्या खोजा, क्या पाया !

पुस्तक मेले की सैर में क्या खोजा, क्या पाया !

इस बार विश्व पुस्तक मेले में सबसे अधिक धार्मिक साहित्य बिका है, चाहे कोई प्रकाशक कुछ भी दावा कर ले. हिन्दी का बड़े से बड़ा प्रकाशक, उतनी भीड़ नहीं जुटा पाया, जितना बिना प्रचार के गीता प्रेस गोरखपुर की स्टॉल पर जुटी रही.

नई हिन्दी के नाम पर ‘हिंद युग्म’ ने सेलिब्रिटी लेखकों को बुलाकर युवाओं को लुभाने की अच्छी कोशिश की, पर यह बात सही है कि इस प्रकाशक के पास नॉन-सीरियस पाठकों की ही भीड़ रही, चाहे भौकाल कुछ भी हो. प्रबुद्ध लेखकों के कदम उधर एक बार भी नहीं पड़े.

हिन्दी के नाम पर अभिनेता मानव कौल को घंटों बैठाकर युवाओं के बीच कुछ प्रतियां तो बेची जा सकती हैं, पर हिन्दी के परिपक्व पाठकों के बीच वो विश्वसनीयता हासिल नहीं की जा सकती जो राजकमल,वाणी, पेंगुइन, प्रभात, यश, सेतु एवं कुछ अन्य प्रकाशकों के पास है. बुक फेयर में कुछ ऐसे लेखकों के पास कॉलेज के विद्यार्थियों की भीड़ रही, जिन्होंने सोशल मीडिया प्रचार के जरिए अच्छा खासा सेलिब्रिटी रुतबा पाया है, ये ही प्रयास इन लेखकों ने पु्स्तक मेले में किया- जिन्हें देख कई लोग यह कहते हुए हंसते हुए भी दिखे- फैशन शो है या किताब मेला?

हिन्द युग्म ने युवाओं को लुभाने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का अच्छा उपयोग किया और अपने बेस्ट सेलर लेखकों का जमवाड़ा स्टॉल पर लगवा दिया.

मौजूदा प्रकाशकों में अगर इंस्टाग्राम पर किसी का अच्छा खासा दखल है, तो वो हिन्द युग्म का ही है. वैसे भी हिन्द युग्म ने ठीक से एक हजार शब्द नहीं लिख पाने वालों को लेखक जो बना दिया और हिन्दी का उद्धार किया. राजकमल की स्टॉल में भीड़ के मामले में हिन्द युग्म को टक्कर दी लेकिन यहां की भीड़ हिन्द युग्म के स्टॉल की भीड़ से एकदम अलग थी. राजकमल के पास ऐसे पाठक थे, जिन्हें रील्स नहीं बनानी थी, किताबें खरीदनी थी, जबकि हिन्द युग्म के पास रील्स और लाइव करने वालों का जमवाड़ा अधिक था.

पु्स्तक मेले में कुछ लेखक गैंग के साथ भी दिखे. कुछ ऐसे थे जो गैंग विहीन थे और जो मिला उसके साथ तस्वीरें खिंचवा ली. ऐसे लोग सभी गैंग के होते हैं, इन्हें न विचारधारा से फर्क पड़ता है और न ही लेखकों की कुटाई-जुटाई से. बुजुर्ग लेखकों का अलग गैंग था, युवा लेखकों का अलग. एक पत्रकार लेखक जिन्होंने व्यंग्य लिखा है, उनकी शिद्दत का मैं मुरीद हो गया. जितने दिन गया, उन्हें स्टॉल पर अपनी किताब बेचते हुए देखा. कुछ कॉमन परिचित मिले तो बोले भाई ने फोन करके बुलाया है. लेखकों में ऐसी सौम्यता आ जाए तो 100-50 प्रतियां तो संपर्क वालों को भाव देने, विनती करने और बुलाने से ही निकल जाती है।

ये भी एक हुनर ही है. कुछ की ठसक ऐसी थी- पढ़नी है तो ले लो, हम ये नहीं कहेंगे हमारी किताब ले लो- ऐसे लोग बेचारे मारे जाते हैं. दिल से तो चाहते हैं उनके परिचित उनकी किताबें खरीदें पर लगाने के लिए मलाई साथ लेकर नहीं चल पाते. कुछ पत्रकार ऐसे थे जो लेखकों के पेड-प्रमोटर बनकर आये थे, उन्होंने जो कवर किया बस अपनी गैंग के लिए किया- चाहे पोर्टल पर लिखा या अख़बार में बड़ा सलेक्ट होकर लिखा।

मैं राजकमल के स्टॉल पर खड़ा था, हिन्दी का एक विद्वान बुजुर्ग लेखक बोल रहा था सुनने वाले चार थे और आवाज़ भी नहीं थी, लेखक अपनी पुस्तक के आखिरी में विमोचन से ऐसे ही तमतमाया हुआ था, दो शब्द बोलकर ही चले गया. फेसबुक पर वो लेखक और कवि बहुत प्रसिद्ध हैं. पुस्तक मेले का सबसे बड़ा स्कैम स्टॉल पर विमोचन का होता है. कोई व्यंग्यकार इस पर भी लिखे तो पाठकों को आनंद आये, बाकी छोले-भटूरे ज्यादा बिके का हव्वा खड़ा करके व्यंग्य तो हुआ, पर असली वाला नहीं हुआ. अब क्या ज्ञान के लिए पेट पर लात मार देगा पाठक?

छोले भटूरे अच्छे बने होंगे तभी खाए. मैंने तो अपने पहले संपादक महोदय जी के साथ बॉम्बे बड़ा-पाव खाया था पेट खराब हो गया, नहीं तो मैं भी बड़ा पाव के स्वाद पर कुछ लिख देता. उत्तराखंड का एक प्रकाशक मिला, मैंने पूछा कैसी प्रतिक्रिया है. चेहरे पर अहं वाला भाव लाकर बोला हम तो विज्ञापन के लिए आये थे. अरे भाई दुनिया यहां विज्ञापन के लिए ही आई है. विज्ञापन के सिवा और है क्या?

प्रकाशकों का घमंड उनको लेखकों की नज़र में और गिरा देता है. इसको कम करो यार भाई. लेखक 5 साल, 3 साल, 2 साल और कई सालों की मेहनत के बाद लिखता है, मिलता क्या है? घंटा. प्रसिद्धि से पेट भर जाता तो पुस्तक मेले में लेखक बेचारा टूटी चप्पल और फटे गमछे में न आता. एक बड़े पत्रकार जो मेन-स्ट्रीम विहीन हो गये हैं, प से जिनका नाम आता है, ऐसी स्थिति हो गई कि बुक फेयर में अकेले घूमते हुए मिले और एक बेचारे धार्मिक साहित्य बेचने वाले को बौद्धिकता का पाठ पढ़ा रहे थे, उनके जाने के बाद मैंने पूछा क्या कह रहे थे?

बोला पता नहीं कौन पागल है?

ऐसा आंखों देखा हाल किसी ने लिखा क्या? नहीं लिखेंगे गठजोड़ ध्वस्त हो जाएंगे. यहां तो बस पत्रकार अपने संस्थान की वेबसाइट पर अपने परिचित के प्रशंसा लिखने में जुटा हुआ है. कहने को बहुत कुछ है, मन नहीं कर रहा क्योंकि आंखों देखा हाल पढ़ेंगे तो कई, साझा करते वक्त ये देखेंगे मैं किस गैंग का हूं?

साभार-https://www.facebook.com/profile.php?id=100063939030533 से

image_print

एक निवेदन

ये साईट भारतीय जीवन मूल्यों और संस्कृति को समर्पित है। हिंदी के विद्वान लेखक अपने शोधपूर्ण लेखों से इसे समृध्द करते हैं। जिन विषयों पर देश का मैन लाईन मीडिया मौन रहता है, हम उन मुद्दों को देश के सामने लाते हैं। इस साईट के संचालन में हमारा कोई आर्थिक व कारोबारी आधार नहीं है। ये साईट भारतीयता की सोच रखने वाले स्नेही जनों के सहयोग से चल रही है। यदि आप अपनी ओर से कोई सहयोग देना चाहें तो आपका स्वागत है। आपका छोटा सा सहयोग भी हमें इस साईट को और समृध्द करने और भारतीय जीवन मूल्यों को प्रचारित-प्रसारित करने के लिए प्रेरित करेगा।

RELATED ARTICLES
- Advertisment -spot_img

लोकप्रिय

उपभोक्ता मंच

- Advertisment -

वार त्यौहार