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श्री सुरेश प्रभु के साथ एक नहीं बस आधा दिन!

सुबह से शाम तक अखबारों से लेकर टीवी चैनल तक नेताओं, मंत्रियों के बेसिर-पैर के बयानों से ऐसे भरे रहते हैं कि ऐसा लगता है जैसे देश के बयानवीरों के बीच कोई वाद-विदा प्रतियोगिता चल रही है कि कौन कितना नीचे गिरे, और कौन कितना घटिया बयान दे। चैनल और अखबार भी सुबह से शाम तक इन्हीं बयानवीरों के मुँह खोलने के इंतजार में अपने कैमरे लेकर बैठे रहते हैं कि कब वे अपना श्रीमुख खोलें और कब वे अपने टीवी की ब्रेकिंग न्यूज़ बनाएँ।

टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज़ के रूप में धाराप्रवाह चलने वाले बयानवीरों के मूर्खतापूर्ण आख्यानों के बीच एक दिन अचानक केंद्रीय रेल मंत्री श्री सुरेश प्रभु के साथ तीन अलग-अलग कार्यक्रमों में जाने का संयोग मिला, तो ऐसा लगा इस देश में अगर कोई समझदारी, संजीदगी और राष्ट्रीय हित की बात करे तो इस देश के मीडिया में उसके लिए कोई जगह नहीं है।

पत्रकारिता में रहते हुए कई मंत्रियों, मुख्य मंत्रियों, नेताओं के साथ रहने, घूमने उनकी आम सभाएं, चुनाव सभाएँ कवर करने और लिखने का खूब मौका मिला, हर नेता मंत्री और मुख्यमंत्री की अपनी खासियतें होती थी जो उनके साथ रहने पर ही पता चलती थी, लेकिन श्री सुरेश प्रभु के साथ यही अनुभव रहा कि वे जिस मंच पर जाते हैं वहाँ उस राष्ट्रीय सोच को पहुँचाने की कोशिश करते हैं, जिस दिशा में सरकार और उनका मंत्रालय काम कर रहा है। वो राजनीतिक बातें नहीं करते, वो अपनी बात से लोगों को राष्ट्रीय हित के उन मुद्दों से जोड़ने की कोशिश करते हैं जिससे वे जाने-अनजाने कटे हुए हैं। उनके वक्तव्यों में न तो राजनीतिक आश्वासन होता है, न किसी की छिछालेदारी, उनका जोर इस बात पर होता है कि वो क्या करने जा रहे हैं और इसमें देश के उद्योगपतियों की और समाज की क्या भूमिका हो सकती है।

एक दिन अचानक केंद्रीय रेल मंत्री श्री सुरेश प्रभु का फोन आया कि वे मुंबई आ रहे हैं और मुझे उनके साथ रहना है। श्री सुरेश प्रभु को अपन इतना ही जानते थे कि अटलजी की सरकार में एक काबिल मंत्री होने के बावजूद उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ा था, लेकिन इसके बाद उन्होंने कभी भी और कहीं भी इस बात की चर्चा नहीं की कि उन्होंने मंत्री पद क्यों छोड़ा। 1996 से लेकर 1999 तक पर्यावरण, वन, रसायन एवँ उर्वरक, उर्जा, भारी उद्योग मंत्री जैसे महत्वपूर्ण विभागों में मंत्री रहने के दौरान उन्होंने अपने छोटे से कार्यकाल में जो उपलब्धियाँ हासिल की उससे प्रधान मंत्री श्री बाजपेयी इतने गदगद् थे कि उन्हें किसी भी हालत में मंत्री पद से हटाना नहीं चाहते थे। बाद में श्री बाजपेयी ने श्री प्रभु को नदियों को जोड़ने की योजना के लिए बनी टास्क फोर्स समिति का अध्यक्ष बनाकर और उन्हें मंत्री पद का स्तर देकर उनकी सेवाएँ ली।

image (1)श्री सुरेश प्रभु से अपना व्यक्तिगत परिचय जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र से जुड़ने की वजह से हुआ, वे जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र के मुंबई चैप्टर के अध्यक्ष हैं। उनको अध्यक्ष भी इसीलिए बनाया गया है कि उनके पूर्वज 500 साल पहले जम्मू कश्मीर के ही निवासी थे और उन्हें भी ठीक उसी तरह जम्मू कश्मीर छोड़कर आना पड़ा था जैसे 1999 में कश्मीरी पंडितों को जम्मू कश्मीर छोड़ना पड़ा था। जम्मू कश्मीर के लोगों के लिए कोंकण की आबो हवा जम्मू कश्मीर जैसी थी और सभी लोग वहाँ से पलायन करने के बाद कोंकण क्षेत्र में बस गए। महाराष्ट्र–गोआ के जितने भी सारस्वत ब्राह्मण हैं वे मूल रूप से जम्मू कश्मीर के ही निवासी हैं। इनमें राजदीप सरदेसाई, सचिन तेंदुलकर और केंद्रीय मंत्री श्री मनोहर पर्रिकर भी शामिल हैं। श्री प्रभु के लिये भी ये तथ्य चौंकाने वाला था कि उनकी जड़ें जम्मू कश्मीर में हैं।

इसके बाद भी श्री प्रभु उर्जा और जल संरक्षण से जुड़े कई अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से जुड़े रहे और कई अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अपनी धाक जमाई। अपने गृह क्षेत्र कोंकण में उनका एक एनजीओ मानव साधन विकास संस्था के नाम से चलता है जिसके माध्यम से वे हाशिये पर जी रहे लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए काम करते हैं। लेकिन अपने किसी भी काम का वे कोई राजनीतिक प्रपोगंडा नहीं करते। जो भी करते हैं परिणाममूलक होता है और अपना काम चुपचाप करते हैं।

श्री सुरेश प्रभु के साथ मुंबई में तीन कार्यक्रमों में जाना हुआ। एक कार्यक्रम इंडो अमेरिकन चैंबर ऑफ कॉमर्स का था, तो दूसरा इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट प्रमोशन काउँसिल (EEPC) का और तीसरा कार्यक्रम स्वामी विवेकानंद पर वर्ड ट्रेड सेंटर में था। तीनों ही कार्यक्रमों में श्री प्रभु ने रेल्वे से लेकर देश के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को अपने ढंग से विश्लेषित करते हुए प्रस्तुत किया और आने वाले वर्षों में रेल्वे की दशा और दिशा होगी
इस पर भी सार्थक चर्चा की।

इंडो अमेरिकन चैंबर ऑफ कामर्स में अपने 20 मिनट के सधे हुए भाषण में श्री प्रभु ने कहा कि आर्थिक विकास की दौड़ में अगर पर्यावरण पर ध्यान नहीं दिया गया तो ये घातक सिध्द हो सकता है। उन्होंने कहा कि आज अमरीका और भारत दोनों ही आर्थिक मंच पर एक प्रमुख ताकत के रूप में उभर रहे हैं, और भारत अपनी विकास यात्रा रेलों में बुनियादी विकास के साथ और तेजी से लिख सकता है। देश के जाने माने उद्योगपतियों के बीच श्री प्रभु ने आंकडों, तथ्यों और भारतीय रेल को आने वाले सालों में नई दिशा देने की अपनी सोच को जिस तरह से प्रस्तुत किया, उसे सुनना अपने आप में एक यादगार अनुभव था।

इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट प्रमोशन काउँसिल (EEPC) के कार्यक्रम में 150 से ज्यादा उद्योगपतियों को पुरस्कार और सम्मान प्रदान करते हुए श्री प्रभु ने कहा कि देश के इंजीनियिरंग उद्योग अगर रेल्वे के साथ काम करे तो इस उद्योग को एक नई दिशा मिल सकती है, क्योंकि रेल्वे को इंजीनियरिंग से जुड़ी छोटी से लेकर बड़ी हर चीज की बड़ी संख्या में ज़रुरत होती है।

image (2)चीन की चर्चा करते हुए श्री प्रभु ने कहा कि हम हर मंच पर चीन के आर्थिक और औद्योगिक विकास की बात करते हैं लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि चीन जितना निर्यात करता है उससे ज्यादा आयात भी करता है। उन्होंने कहा कि हम विश्व के बाजार में तभी सफल हो सकते हैं जब हम समय- समय पर अपने उद्योग में नई तकनीकी और प्रोद्योगिकी को भी शामिल करते रहे। नहीं तो हमारे सामने टेक्स्टाईल उद्योग एक उदाहरण है कि किस तरह सभी टेक्साटाईल कारखाने तकनीक पुरानी पड़ने पर एक के बाद एक बंद होते गए।

कारोबारियों की दुनिया के बाद श्री प्रभु वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में राष्ट्रीय युवा परिषद् द्वारा आयोजित मेक इन इंडिया पर आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुए। इस अवसर पर मेक इन इंडिया को स्वामी विवेकानंद के दर्शन से जोड़ते हुए श्री प्रभु ने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने अपने समय से आगे जाकर लोगों में राष्ट्र के प्रति एक सोच पैदा किया। उन्होंने कहा कि हमारे समाज में कई कमियाँ हैं और स्वामी विवेकानंद का सबसे बड़ा योगदान ये था कि उन्होंने इस सत्य को प्रतिपादित किया कि धर्म समाज के लिए कितना उपयोगी है। श्री प्रभु ने धाराप्रवाह हिन्दी में विवेकानंद के जीवन, दर्शन और उनके योगदान को आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में जिस अंदाज़ में प्रस्तुत किया उसे सुनकर ऐसा लगा मानो कोई राजनेता नहीं बल्कि ओशो जैसा तत्वदर्शी स्वामी विवेकानंद के व्यक्तित्व का विश्लेषण कर रहा है।

जब उन्होंने कार्यक्रम में कुछ विदेशी मेहमानों को देखा तो उनके लिए अंग्रेजी में अपना वक्तव्य देना शुरु किया और जैसे ही उन्होंने कहा, स्वामी विवेकानंद के विचार और सोच आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जो उनके जीवनकाल में थे, स्वामी विवेकानंद की सोच थी कि आराम का जीवन कोई जीवन नहीं है, जो समाज साधन संपन्न हो जाताहै वह प्रसन्न नहीं रह सकता। अभी तक अनमने से बैठे हुए विदेशी अतिथि उनके इस वक्तव्य से ऐसे प्रभावित हुए कि अपने मोबाईल और कैमरे पर उनका बयान रिकॉर्ड करने लगे। श्री प्रभु ने कहा, जीवन में प्रसन्न होने के लिए हमें अपने जीवन का उद्देश्य भी मालूम होना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारे समाज की विडंबना यह है कि हम इस बात से प्रसन्न नहीं है कि हमारे पास क्या है, हम इस बात से दुःखी हैं कि हमारे पड़ोसी के पास जो है वो हमारे पास नहीं है। उन्होंने कहा कि हमारा जीवन उस जहाज की तरह है जिस पर लंगर बँधा है, अगर जहाज का लंगर खोल दिया जाए तो वह विशाल समुद्र की यात्रा पर निकल सकता है। इसी तरह अगर हम अपनी सोच के बंधनों से मुक्त हो जाएं तो एक लंबी यात्रा पर निकल सकते हैं। उन्होंने कहा कि हमें दूसरे जैसा होने की कोशिश नहीं करना चाहिए क्योंकि सचिन तेंदुलकर तो एक ही हो सकता है।

उनके साथ आधे दिन का ये सफर इस मायनों में याद रहा कि पहली बार किसी मंत्री को आँकड़ों और तथ्यों के साथ बगैर लिखा भाषण देते देखा और सुना।

कोई मंत्री केंद्र का हो या राज्य सरकार का, मुंबई की सड़कों पर आए दिन जिस तरह से उनके काफिले निकलते हैं तो ऐसा लगता है जैसे किसी राजा की सवारी निकल रही है, लेकिन श्री प्रभु के साथ मात्र एक पुलिस की जिप्सी थी जो उनकी गाड़ी के आगे चल रही थी, न आगे कोई गाड़ी न पीछे कोई काफिला।

कोई केंद्रीय मंत्री शहर में आए तो उसके विबाग के अधिकारियों की पूरी फौज मंत्री की गाड़ी के पीछे चलती रहती है, लेकिन की गाड़ी के साथ रेल्वे के प्रोटोकॉल अधिकारी को छोड़कर कोई अधिकारी नहीं था। कार्यक्रमों में भी उन्होंने अपने स्वागत सत्कार की बजाय अपनी बात कहने और आयोजकों का व अपना समय बचाने की कोशिश ज्यादा की।

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