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टेपाधिराज का अंतिम ठहाका!

हिंदी के शीर्ष व्यंग्यकार और हास्य के सालाना जलसे अखिल भारतीय टेपा सम्मेलन के संस्थापक डॉ. शिव शर्मा ने बीती साँझ इस संसार से विदा ले ली। मानो इसी के साथ व्यंग्य के एक पूरे युग और हँसी की एक पूरी धारा का ही संवरण हो गया।

अपनी जवानी के ज़माने में वे मध्यप्रदेश के राजगढ़ से आकर उज्जैन में आ बसे थे। फिर अंत तक उज्जैन ही उनका बसेरा रहा। मालवा का टेपापन उनके मिज़ाज से ऐसा ‘मैच’ हुआ कि तन-मन-जीवन मालवी हो गया। इस दौरान उज्जैन के माधव कालेज में अध्ययन और फिर वर्षों तक इसी कालेज में राजनीति के प्राध्यापक रहते हुए उन्होंने सृजन का जो इतिहास रचा, वह अब उनके जाने के बाद समाज की धरोहर हैं।

डॉ. शर्मा भगवान के घर से ही अपने साथ हेकड़ी, ज़िंदादिली, बिंदासी और ठहाकों का अक्षय ज़खीरा धरती पर लिए उतरे थे। इसलिए जब तक वे इस जहान में रहे, यारों के जमघटों से लेकर साहित्य के उबाऊ समारोहों में उनके ठहाके हर अनुशासन को सरेआम धता बताकर गूँजते रहे।

जीवन की आपाधापी के बीच उनका सृजन चार आयामों शिक्षा, पत्रकारिता, लेखन और आयोजन के जरिये अभिव्यक्त हुआ। ख़ास बात यह कि चारों ही मोर्चो पर उन्होंने अपने ख़ालिस ‘शिव शर्मा ब्रांड’ की वह छाप छोड़ी जिसकी फ़ोटो कॉपी न कोई उनके जीते जी कर सका, न आगे ही कोई कर सकेगा।

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तीस साल से अधिक अध्यापन और वर्षों तक आकाशवाणी के लिए संवादगिरी के बीच उनके लिखे सैकड़ों व्यंग्य, एकांकियाँ और उपन्यास प्रमाण है कि किस तरह डॉ. शिव शर्मा ने ‘अपने पे हँसकर जग को हँसाने’ का जोख़िम उठाया था। गोया कि जीवन की शुरुआत में ही उन्होंने जान लिया था कि उदासी को अपना सिंगार मानने वाली दुनिया में सूमड़ों को पल भर हँसाने के लिए भी पहले ख़ुद पर हँसने की आदत डालना पड़ेगी।

इसलिए उनकी हर रचना ज़माने की मनहूस मान्यताओं और बक़वास दायरों के फटे में आगे रहकर पाँव फँसाते हुए, हर वर्जना को तोड़ती हुई सृजन के गुलशन में हँसी के गुल खिलाती रही। अपने व्यंग्य लेखन में तत्सम, तदभव शब्दों के साथ देशज शब्दों के प्रति मोह और देसी पात्रों के प्रति आकर्षण के बीच ही उनके हाथ ‘टेपा’ लगा था जो उनकी कीर्ति का कालजयी आधार बन गया।

यह आसान नहीं था कि स्वयं को स्वयंभू टेपाराज घोषित करके वे पूरे संसार को टेपास्तान बनाने का सपना सार्वजनिक कर दें! लेकिन उन्होंने यह किया और पूरी दबंगता के साथ किया। वे भले पूरी दुनिया को मालवा के देसी मनक टेपे की तरह जीना न सीखा पाए हो मगर ख़ुद टेपा बन वह ज़िंदगी जी गए जिसकी मिसाल आने वाले दौर में अरसे तक ली और दी जाएगी।

उनके द्वारा स्थापित और साल 1970 से अब तक लगातार जारी टेपा सम्मेलन ने लोकप्रियता के वह कीर्तिमान कायम किए जो देश में दूसरे किसी हास्य अनुष्ठान को कभी नसीब न हो सकें। नकली टेपों ने असली टेपा सम्मेलन की तर्ज़ पर देश के कोने-कोने में उसकी फ्रेंचाइजी खोली लेकिन डॉ. शिव शर्मा का मौलिक स्वाद कोई लाख चाहकर भी कॉपी न कर सका।

इसलिए कि डॉ. शिव शर्मा बनने के लिए जिस स्पष्टता, प्रखरता, पकड़, पहुँच, दिलदारी, यारबाज़ी, मस्ती और फक्कड़पन की दरकार थी, वह हर किसी के बूते की बात थी भी नहीं। दूसरों को पल भर हँसाने के लिए ख़ुद का तमाशा बनाने का गुर्दा सब कब कहाँ जुटा पाते हैं? तभी तो जिनके पास यह गुर्दा था, वे अकेले डॉ. शिव शर्मा ‘टेपाधिराज’ बन सकें।

जीवन के 80 वसंत पारकर भी उनकी दिनचर्या में सुबह से रात तक हँसी के बारहमासी फूल खिलते रहे। अपने दोस्तों और टेपा कुल के कुटुम्बियों से अंतिम विदाई से कोई 40 घण्टे पहले तक उनके कहकहे बहुत कुछ अनकहा कह रहे थे। अंतिम समय में आहार नली के कैंसर के बावज़ूद उनके अन्दाज़, अल्फ़ाज़ और आवाज़ की अदा में रंच मात्र भी पेंच न आया था। मानो ज़िन्दगी की जिस पतंग को वे जीवन भर जिस तरह ऊंचाई पर ही उड़ाते आए थे, उसे किसी सूरत में अस्पताल की छत पर उतारने को राज़ी न थे।

अंततः हास्य-व्यंग्य के रंग रंगी वह पतंग सातवें आसमान की ओर उड़ाकर ही उन्होंने चैन की साँस ली।

मेरे लिए उनका जाना मेरे अपने परिवार के किसी बड़े के जाने जैसा है। पिछले पचास साल से मेरे पिता पर उनका अनुज तुल्य स्नेह बना रहा और बीते पच्चीस बरस से मुझ पर पुत्रवत कृपा भी। कल उनके निधन की ख़बर के बाद मानो हर कोने से उनकी आवाज़ कानों में गूँज रही है। लगता है कहीं किसी कोने से आवाज आएगी, ‘क्यों रे उग्रवादी! इतने दिन नज़र न आया… कहाँ था?’

क्या कहूँ ? बस यहीं कि जब जहाँ भी रहूँगा, अंकल! आपको बहुत ‘मिस’ करूँगा।

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