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देखते ही देखते ढाँचा धूल में मिल गया और हजारों टन मलबा भी गायब हो गया

6 दिसंबर की सुबह 6 बजे मैं सरूयू नदी पर पहुँच गया, पता चला कि वहाँ तो रात भर से कार सेवकों के नहाकर एक मुठ्ठी रेत लेकर सिलसिला जारी था।

अयोध्या में चारों ओर मंदिरों से लेकर चौराहों तक राम भजन और रामजी की आरती गूंज रही थी। एक भगवा समुद्र अयोध्या की गलियों में लहरा रहा था। सूर्योदय होते ही बाबरी ढाँचे के चारों ओर हजारों कार सेवक अपनी मुठ्ठी में सरयू की रेत लिए कार सेवा के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। बाबरी ढांचे के चारों ओर पाँच सौ मीटर तक बाँस बल्लियों की रेलिंग लगा दी गई थी। जय श्री राम, मंदिर वहीं बनाएँगे, एक धक्का और दो…जैसे जयकारे और नारे लगा लगाकर कार सेवक एक दूसरे का उत्साह बढ़ा रहे थे।

बाबरी मस्जिद से थोड़ी दूर बने एक पम्प हाउस नुमा मकान पर लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती, विनय कटियार साध्वी ऋतुंभरा जैसे दिग्गजों के भाषण कार सेवकों में प्राण फूँक रहे थे।

मैने पत्रकार होने के बावजूद कार सेवक का हुलिया बना रखा और गले में कारसेवकों वाला दुपट्टा डाल लिया था। इसका सबसे बड़ा फायदा मुझे ये मिला कि मैं कहीँ भी आ जा सकता था। पत्रकारों में मैं पत्रकार हो जाता और कार सेवकों में कार सेवक। देश और दुनिया से आए पत्रकारों को कवरेज के लिए बाबरी मस्जिद के सामने ही स्थित एक आश्रम में दूसरी मंजिल पर जगह दी गई थी।

9 बजते बजते सभी पत्रकार अपने कैमरे लेकर वहाँ पहुँच गए। पत्रकारों के लिए अलग से पास बना दिए गए थे। 9 बजे से 10 बजे तक सभी पत्रकार बाबरी मस्जिद की ओर मुँह किए बैठे मुठ्ठी भर रेत वाली कार सेवा देख रहे थे। नीचे न्यूज ट्रैक वीडियो न्यूज़ ( जो अब आज तक चैनल हो चुका है) बीबीसी के वीडियो बनाने वाले कैमरा मैन सभी दृश्य कैमरे में कैद कर रहे थे। तभी जिस आश्रम पर देश और दुनिया भर के पत्रकार खड़े थे वहाँ एक पत्रकार दौड़ा दौड़ा आया और चिल्लाकर कहा कि भागो नीचे कार सेवक पत्रकारों को मार रहे हैं और उन्होंने बीबीसी के पत्रकार मार्क टुली को भी मारा है। ये सुनकर पत्रकार कुछ सोचते समझते तभी कार सेवकों का हुजुम उस आश्रम पर चढ़ आया और पत्रकारों के कैमरे, पैन पैड छीनकर मारपीट कर उनको भगाने लगा। मैंने तत्काल अपना कारसेवक वाला दुपट्टा निकाला और कारसेवक बनकर कारसेवकों को समझाने लगा मगर कौन मानने वाला था। सभी दिग्गज पत्रकार जिनमें महिला पत्रकार भी थी, अपनी जान बचाकर वहाँ से भाग निकले। फिर सबने छुप-छुपकर अलग अलग जगहों में शरण ली और जैसे तैसे अपनी जान भी बचाई और ढाँचे के आसपास ही डटे रहे। मैं भागकर वहाँ पहुँचा जहाँ मुरली मनोहर जोशी, आडवाणीजी और उमा भारती सहित सभी नेताओँ के भाषण चल रहे थे। वहाँ मेरे मित्र अरविंद त्रिवेदी लंकेश की वजह से आसानी से एंट्री हो गई।

दस बजे के आसपास कुछ युवक बाँस और बल्लियों को तोड़कर बाबरी ढाँचे की तरफ दौड़ पड़े। उनको देखकर सैकड़ों कार सेवक किसी तूफान की तरह बाँस बल्लियों की रैलिंग को रौंदते हुए उन पर छलांग लगाते हुए निर्जीव खड़े बाबरी ढांचे की और ऐसे दौडे मानों ओलंपिक की उँची कूद की प्रतियोगिता हो रही है, ये सब-कुछ इतनी जल्दी और मशीन की गति से हुआ कि किसी को कुछ समझ में नहीं आया कि अब क्या होगा। इधर मंच से आडवाणी जी, मुरली मनोहर जोशी लोगों को समझाते रहे कि ढांचे को कोई नुक्सान ना पहुँचाएँ, सभी शांति से अपनी प्रतीकात्मक कार सेवा करें और लौट जाएँ। लेकिन तूफान तो अपनी गति पकड़ चुका था। हाथों में बंदूक लिए पुलिस और पैरामिलिट्री फोर्स के जवान सकपकाये से खड़े थे, क्योंकि उनको गोली चलाने का आदेश नहीं था। तभी एक युवक ढाँचे के ऊपर पहुँचा और उसने वहाँ अपनी जेब से भगवा ध्वज निकारा और एक डंडे में पिरोकर उसे फहरा दिया। बाबरी ढाँचे पर भगवा ध्वज फहराते ही पूरा माहौल आक्रामक हो गया। अब तक जो कार सेवक मुठ्ठी भर रेत लिए खडे थे उन्होंने रेत छोड़कर वहाँ बैरिकेड्स बाँस बल्ली खींचकर खोल लिए और ढाँचे की ओर दौड़ पड़े। जिसे जो मिला वो उसे लेकर ढाँचे पर टूट पड़ा। मंच से आडवाणीजी, मुरली मनोहर जोशी और सभी नेता कारसेवकों से अपील करते रहे कि कि वो ढाँचे से नीचे उतर जाएँ और वापस लौट आएँ। मगर चारों और जय श्री राम और एक धक्का और दो के नारे इतनी बुलंद आवाज़ में गूँज रहे थे कि नेताओँ के भाषण नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बनकर रह गए। 600 साल पुराना बाबरी ढांचा कारसेवकों के हुजुम के आगे नतमस्तक खड़ा था और उसके एक एक हिस्से को कारसेवकों ने छलनी करना शुरु कर दिया था। शाम 4 बजे तक पूरा ढाँचा धूल का गुबार बन गया। सारी सुरक्षा व्यवस्थाएँ, नीतियाँ. योजनाएँ, अपीलें, निवेदन सब ढाँचे के साथ ध्वस्त होकर धाराशायी हो गए।

अयोध्या का वो मंजर जो न किसी ने देखा, न किसी ने लिखा

मंच से कार सेवकों को वापस लौट आने का निर्देश देने वाले नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी खुद एक इतिहास बनकर एक नया इतिहास बनते देख लौट चुके थे। हजारों कार सेवक ढाँचे को गिराने और गिरते देखने की गवाही के ऐतिहासिक पल के साक्षी होने के गौरव के साथ अपने घरों की और लौट रहे थे……लेकिन इस ऐतिहासिक पटकथा में अभी एक और अध्याय लिखा जाना था, इस पटकथा में एक अध्याय जोड़ा उमा भारती ने।

जब धूल का गुबार शांत हुआ तो वहाँ बाबरी ढाँचे का सैकड़ों टन मलबा पड़ा था। मलबा देखते ही उमा भारती ने कार सेवकों से कहा, कोई भी कार सेवक यहाँ से खाली हाथ नहीं जाएगा। हर कार सेवक अपने साथ राम जन्म भूमि की ये पवित्र मि्ट्टी, बाबरी ढांचे के अवशेष, ईंट पत्तथर और गारा जो मिले वो स्मृति चिन्ह के रूप लेकर अपने शहर और गाँव में जाएगा और लोगों को बताएगा कि हम बाबरी ढाँचे को तोड़ने का प्रमाण लेकर आये हैं। कोई भी यहाँ से खाली हाथ नहीं जाएगा। जिसको जो मिले वो लेकर जाए। इतना सुनते ही कार सेवकों की जो भीड़ ढाँचे को तोड़कर निश्चिंतता से अपने कैंपों की ओर लौट रही थी, वो तूफानी गति से वापस पलटी। एक बार फिर कार सेवक ढाँचे के मलबे पर टूट पड़े। जिसको जो हाथ आया वो लेकर अपने झोलों में, जेबों में भरने लगा। किसी को ईंट मिली, किसी को फर्शी का टुकड़ा तो किसी को उसके मलबे का हिस्सा, पूरा दृश्य ऐसा था मानों किसी कीमती चीज की लूट मची है और हर कोई ज्यादा से ज्यादा लूट लेना चाहता है। उमा भारती की इस अपील का ये असर हुआ कि पत्थर के बड़े बड़े टुकड़े और बड़ी बड़ी मूर्तियाँ जो ढाँचे से निकली थी और कार सेवक उठा नहीं पा रहे थे वो अपने दुपट्टों में लपेट-लपेट कर अपने साथ खींचकर ले गए। शाम 6 बजते बजते ढाँचे का सारा मलबा खाली हो चुका था और ढाँचे की जगह एक टिबड्डा, जिस पर ढाँचा खड़ा था वो किसी खाली मैदान सा दिखाई दे रहा था।

साभार –
इन्दौर से प्रकाशित दैनिक प्रजातंत्र से

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