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इंसानी लालच का शिकार हुआ दुनिया का 84 फीसदी तटीय क्षेत्र

इंसानी प्रभाव का आलम यह है कि उसने संरक्षित क्षेत्रों को भी नहीं बक्शा है। अनुमान है कि करीब 43.3 फीसदी तटीय संरक्षित क्षेत्र इंसानी गतिविधियों से बुरी तरह प्रभावित है।

दुनिया भर में तटीय क्षेत्र का केवल 15.5 फीसदी हिस्सा ही पारिस्थितिक रूप से अनछुआ रह गया है। इसका मतलब है कि वो क्षेत्र अभी भी इंसानी लालच की भेंट नहीं चढ़ा है। हालांकि बाकी 84.5 फीसदी हिस्सा किसी न किसी रूप में इंसानी प्रभाव के आधीन है। ऐसे में यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वैश्विक स्तर पर तटीय क्षेत्रों के पुनर्वास और संरक्षण की कितनी ज्यादा जरुरत है।

समस्या कितनी गंभीर है इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि विश्व के 47.9 फीसदी तटीय क्षेत्र इंसानों के चलते अत्यधिक दबाव में हैं। वहीं दुनिया के करीब 84.1 फीसदी देशों में तटीय क्षेत्र का 50 फीसदी से ज्यादा हिस्सा इंसानी गतिविधियों के चलते बदतर स्थिति में है। इंसानी प्रभाव का आलम यह है कि उसने संरक्षित क्षेत्रों को भी नहीं बक्शा है। अनुमान है कि करीब 43.3 फीसदी तटीय संरक्षित क्षेत्र इंसानी गतिविधियों से बुरी तरह प्रभावित है।

यह जानकारी क्वींसलैंड विश्वविद्यालय के नेतृत्व में किए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में सामने आई है, जोकि जर्नल कंजर्वेशन बायोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। अपने इस शोध में शोधकर्ताओं ने उन स्थानों की पहचान की है जो मानव गतिविधियों के चलते अत्यधिक दबाव में हैं और जो अभी भी अपनी प्राकृतिक अवस्था में बरकरार हैं। शोधकर्ताओं ने इन स्थानों का एक वैश्विक डाटासेट भी तैयार किया है।

शोध के मुताबिक ऐसे ज्यादातर तटीय क्षेत्र जो अभी भी इंसानों के प्रभाव में नहीं हैं कनाडा, रुस और ग्रीनलैंड में हैं। इसके साथ ही चिली, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में भी कुछ तटीय क्षेत्र मानवीय गतिविधियों के चलते प्रभावित नहीं हुए हैं। यह वो कुछ बचे-खुचे क्षेत्र हैं जो अभी भी कृषि, शहरी विकास, खनन, मछली पकड़ने और सड़क निर्माण जैसे दबाव से बचे हुए हैं।

शोधकर्ताओं के मुताबिक वैश्विक संरक्षण और स्थिरता के लिए समुद्र और भूमि के बीच की यह जो कड़ी है उसका प्रबंधन आवश्यक है, क्योंकि यह तटीय क्षेत्र प्राकृतिक प्रक्रियाओं को बनाए रखते हैं, जो जैवविविधता के साथ-साथ अरबों लोगों को जीविका देती है।

देखा जाए तो वर्तमान में भूमि और समुद्रों पर ध्यान केंद्रित है, नतीजन यह तटीय क्षेत्र कहीं अंधेरों में गुम हो रहे हैं, जिसकी स्थिति आज भी लोगों के सामने पूरी तरह उजागर नहीं है। शोधकर्ताओं के अनुसार समुद्री घास, सवाना और प्रवाल भित्तियों वाले तटीय क्षेत्र अन्य तटीय इलाकों की तुलना में कहीं अधिक मानवीय दबाव का सामना करने को मजबूर हैं।

इस बारे में शोध और क्वींसलैंड विश्वविद्यालय से जुड़ी शोधकर्ता ब्रुक विलियम्स का कहना है कि तटीय क्षेत्र न केवल उच्च पैमाने पर जैवविविधता का आशियाना है। साथ ही यह लाखों इंसानों के लिए जीविका और भोजन देते हैं, और उनकी रक्षा आने वाली तूफानों से करते हैं।

उनके अनुसार जिस तेजी से इन तटीय क्षेत्रों का विनाश हो रहा है वो न केवल तटीय प्रजातियों और उनके आवासों बल्कि साथ ही इसके सहारे बसर करने वाले लाखों लोगों स्वास्थ्य, सुरक्षा और जीविका के लिए भी बड़ा खतरा है। शोध के नतीजे बताते हैं कि हमें इन्हें बचाने के लिए जल्द कार्रवाई करने की जरुरत है। यह न केवल इन क्षेत्रों में जैवविविधता को संरक्षित करेगा। साथ ही जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी मददगार होगा।

ऐसे में सभी देशों को शाश्वता के उद्देश्यों को हासिल करने के लिए अपनी सीमाओं के भीतर तटीय क्षेत्रों के संरक्षण और उनकी बहाली के लिए अधिक से अधिक प्रयास करने होंगे, जिससे मानव – प्रकृति के बीच की इस कड़ी को दोबारा दुरुस्त किया जा सके।

साभार- https://www.downtoearth.org.in/ से

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