विजयादशमी पर भागवत-संदेश
भारत केवल एक भौगोलिक सीमा में बसा देश नहीं, बल्कि विविधताओं के बीच विकसित हुई एक ऐसी सांस्कृतिक चेतना है, जिसने हजारों वर्षों से अनेक विचारों, आस्थाओं, भाषाओं, परंपराओं और जीवन-पद्धतियों को अपने भीतर स्थान दिया है। हमारी असली शक्ति इस विविधता को मिटाने में नहीं, बल्कि उसका सम्मान करते हुए एक साझा राष्ट्रीय पहचान को सुदृढ़ करने में है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का विजयादशमी पर दिया जाने वाला वार्षिक उद्बोधन इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में विचारणीय एवं राष्ट्रीय एकता का महा-उद्घोष है। उनके संदेश में देश की एकता, सामाजिक सद्भाव, नागरिक अनुशासन और भारत के सामने उपस्थित चुनौतियों के प्रति सजग रहने का आह्वान है। 

यह संदेश किसी एक संगठन, विचारधारा अथवा राजनीतिक पक्ष तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे राष्ट्रीय जीवन के आत्ममंथन का अवसर बनाना चाहिए। आज भारत जिस वैश्विक परिवेश में आगे बढ़ रहा है, उसमें उसकी आर्थिक प्रगति, तकनीकी क्षमता, लोकतांत्रिक व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव का विस्तार अनेक संभावनाएं पैदा कर रहा है। लेकिन किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल उसकी आर्थिक उपलब्धियों, सैन्य सामर्थ्य अथवा वैश्विक प्रतिष्ठा से नहीं मापी जाती। उसकी सबसे बड़ी शक्ति होती है-उसके नागरिकों का परस्पर विश्वास, संस्थाओं के प्रति सम्मान और संकट के समय एकजुट होकर खड़े होने की क्षमता। यदि सामाजिक ताने-बाने में अविश्वास गहरा जाए, संवाद की जगह कटुता ले ले और राजनीतिक अथवा वैचारिक मतभेद शत्रुता में बदल जाएं, तो बाहरी चुनौतियों से अधिक गंभीर संकट भीतर पैदा होने लगता है।

भारत के पड़ोस में पाकिस्तान की ओर से लंबे समय से चली आ रही सुरक्षा चुनौतियां, आतंकवाद और क्षेत्रीय अस्थिरता की आशंकाएं हमारी सतर्कता की मांग करती हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अमेरिका सहित विभिन्न शक्तियों के साथ भारत के संबंधों में सहयोग और प्रतिस्पर्धा, दोनों के आयाम मौजूद हैं। इसलिए किसी भी देश की नीतियों का आकलन भावनाओं के बजाय तथ्यों, राष्ट्रीय हितों और कूटनीतिक विवेक के आधार पर किया जाना चाहिए। यह मान लेना उचित नहीं होगा कि प्रत्येक विदेशी शक्ति भारत को कमजोर करने के उद्देश्य से ही काम कर रही है, लेकिन यह समझना भी आवश्यक है कि वैश्विक राजनीति में हर देश अपने हितों को प्राथमिकता देता है। ऐसे समय में भारत की सबसे बड़ी सुरक्षा केवल सीमाओं पर तैनात सैनिकों के हाथों में नहीं, बल्कि देश के भीतर नागरिकों के बीच कायम विश्वास में भी निहित है। कोई भी बाहरी शक्ति तभी हमारी आंतरिक कमजोरियों का लाभ उठा सकती है, जब हम स्वयं अपने मतभेदों को इतना गहरा कर लें कि एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी नहीं, शत्रु समझने लगें। इसलिए राष्ट्रीय एकता केवल भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि रणनीतिक आवश्यकता भी है। देश की सीमाओं की रक्षा जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी है उन सीमाओं के भीतर रहने वाले लोगों के दिलों के बीच विश्वास की दीवारों को मजबूत करना।

बांग्लादेश और फ्रांस में अलग-अलग परिस्थितियों में हुए आंदोलनों तथा सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल का उल्लेख करते हुए हमें यह समझना चाहिए कि किसी भी देश में असंतोष को अनदेखा करना और असंतोष को हिंसा में बदलने देना-दोनों ही स्थितियां नुकसानदेह हो सकती हैं। जनता की वास्तविक समस्याओं को सुनना लोकतंत्र की जिम्मेदारी है, जबकि विरोध के नाम पर हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान और समाज में घृणा फैलाना किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। भारत जैसे विशाल और बहुलतावादी लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं। बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, शिक्षा, सामाजिक न्याय और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे विषयों पर नागरिकों को प्रश्न उठाने और शांतिपूर्ण विरोध करने का पूरा अधिकार है। सरकारों का दायित्व है कि वे इन आवाजों को गंभीरता से सुनें और समाधान की दिशा में काम करें। वहीं नागरिकों और राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है कि वे जनभावनाओं का उपयोग समाज को बांटने के बजाय सकारात्मक परिवर्तन के लिए करें। लोकतंत्र में असहमति देशविरोध नहीं होती और सत्ता से प्रश्न करना राष्ट्र के प्रति अविश्वास का प्रमाण नहीं है। राष्ट्रहित की वास्तविक कसौटी यह है कि हम अपनी असहमति के बावजूद संवैधानिक मर्यादाओं और सामाजिक सद्भाव को बनाए रखें।

आज राष्ट्रीय एकता के सामने एक नई चुनौती डिजिटल माध्यमों के अनियंत्रित और गैर-जिम्मेदाराना उपयोग से उत्पन्न हो रही है। सोशल मीडिया ने सामान्य नागरिक को अपनी बात कहने का मंच दिया है, लेकिन इसी माध्यम से झूठी खबरें, भ्रामक वीडियो, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार की गई नकली सामग्री और आधे-अधूरे तथ्यों को भी तेजी से फैलाया जा सकता है। ऐसी सामग्री लोगों के मन में भय, आक्रोश और अविश्वास पैदा करके सामाजिक संबंधों को नुकसान पहुंचा सकती है। सबसे चिंताजनक स्थिति तब बनती है, जब किसी धर्म, जाति, भाषा अथवा समुदाय के बारे में एकतरफा सामग्री फैलाकर पूरे समाज को संदेह की दृष्टि से देखने के लिए उकसाया जाता है। एक झूठा संदेश वर्षों से बने आपसी विश्वास को क्षणभर में चोट पहुंचा सकता है। इसलिए आज डिजिटल साक्षरता के साथ-साथ नैतिक विवेक की भी आवश्यकता है। किसी संदेश को आगे बढ़ाने से पहले उसकी सत्यता जांचना, उत्तेजक सामग्री से बचना और असत्य फैलाने वालों का विरोध करना भी राष्ट्रसेवा का आधुनिक स्वरूप है। तकनीक तभी वरदान बन सकती है, जब उसके साथ जिम्मेदारी और मानवीय संवेदना जुड़ी हो।

भारत की एकता का अर्थ यह नहीं कि सभी नागरिक एक जैसा सोचें, एक जैसी पूजा-पद्धति अपनाएं अथवा सभी राजनीतिक प्रश्नों पर एकमत हों। एकता का वास्तविक अर्थ है कि अलग-अलग विचारों के बावजूद हम एक-दूसरे के सम्मान, अधिकारों और अस्तित्व को स्वीकार करें। संविधान ने हमें समान नागरिकता, धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्याय की जो भावना दी है, वही हमारे राष्ट्रीय सहअस्तित्व की आधारशिला है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी छोटी-छोटी पहचानों को राष्ट्रीय पहचान के विरोध में खड़ा न करें। धर्म हमें नैतिकता सिखाए, राजनीति जनकल्याण का माध्यम बने, शिक्षा विवेक पैदा करे और सामाजिक संगठन सेवा तथा समरसता को बढ़ावा दें। कोई भी विचारधारा तभी राष्ट्र के लिए उपयोगी है, जब वह समाज को बेहतर बनाने, कमजोरों को सहारा देने और नागरिकों में जिम्मेदारी का भाव जगाने में योगदान करे।

राष्ट्रीय एकता की छतरी इतनी विशाल होनी चाहिए कि उसमें हर धर्म, हर भाषा, हर क्षेत्र, हर जाति और हर वैचारिक पृष्ठभूमि का भारतीय सम्मानपूर्वक खड़ा हो सके। यहां किसी की देशभक्ति का निर्णय केवल उसकी धार्मिक पहचान, राजनीतिक पसंद या वैचारिक असहमति से नहीं होना चाहिए। देश के प्रति प्रतिबद्धता का मूल्यांकन उसके आचरण, संवैधानिक मूल्यों के प्रति सम्मान और समाज के लिए किए गए योगदान से होना चाहिए। मोहन भागवत के उद्बोधन का एक महत्वपूर्ण पक्ष नागरिक जिम्मेदारी का विचार भी है। राष्ट्रनिर्माण केवल सरकारों, नेताओं, सेनाओं या सामाजिक संगठनों का काम नहीं है। प्रत्येक नागरिक अपनी भूमिका से देश की दिशा प्रभावित करता है। ईमानदारी से काम करना, कानून का पालन करना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, महिलाओं का सम्मान करना, जरूरतमंदों की सहायता करना और सामाजिक तनाव के समय संयम बरतना-ये सभी राष्ट्रसेवा के व्यावहारिक रूप हैं। साथ ही राष्ट्रीय एकता के नाम पर अन्याय, भेदभाव अथवा नागरिकों की वास्तविक समस्याओं की अनदेखी भी नहीं होनी चाहिए। एक मजबूत राष्ट्र वह है, जहां नागरिक निर्भय होकर अपनी बात कह सकें, संस्थाएं निष्पक्षता से काम करें और हर व्यक्ति को न्याय मिलने की उम्मीद हो।

आज भारत को ऐसी राष्ट्रीय चेतना की आवश्यकता है, जो हमें एक-दूसरे के विरुद्ध नहीं, बल्कि एक-दूसरे के साथ खड़ा होना सिखाए। मतभेद रहें, पर मनभेद न बढ़ें, विचार अलग हों, पर राष्ट्र के प्रति हमारी जिम्मेदारी साझा रहे। राजनीतिक प्रतिस्पर्धा हो, पर सामाजिक संबंधों में शत्रुता न आए। हमें यह संकल्प लेना होगा कि किसी भी बाहरी चुनौती अथवा आंतरिक तनाव के सामने भारत की एकता, संविधान की गरिमा और मानवता का सम्मान कमजोर नहीं पड़ने देंगे। भारत की सबसे बड़ी विजय तब होगी, जब अनेक विचारों के बीच एक साझा विश्वास जीवित रहेगा। हम अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन हमारा भविष्य एक है, हमारी धरती एक है और हमारा राष्ट्र भारत है। मोहन भागवत का यही विजयादशमी का व्यापक संदेश है और यही समय की सबसे बड़ी पुकार है।
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
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