Friday, June 21, 2024
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आकांक्षाओं के फूल खिलाती डॉ.वीना अग्रवाल रचनाएं

महाभारत खुद लिख रही है।
कभी तुम हो संगी सहेली हो तुम,
कभी भीड़ में भी अकेली हो तुम।
मैं न समझी तुम्हें तुम न समझीं मुझे,
एक अनबूझ उलझी पहेली हो तुम।

राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अपने काव्य पाठ का लोहा मनवाने वाली कवियित्री डॉ. वीना अग्रवाल का उक्त छंद, 306 छन्दों की काव्य कृति ‘जिन्दगी तुम’ की बानगी है जिसमें उन्होंने अपनी सहेली जिन्दगी की विस्तृत पड़ताल की है और इस कृति ने उन्हें खूब शोहरत दिलवाई । लेखिका ने कुछ इस तरह से लिखा है कि उनके भीतर हमें एक नई जिन्दगी की तलाश और जीवन का दर्शन मिलता है। इस छंद विधा संग्रह की कुछ और बानगी देखिए….
बड़ा खूबसूरत सा एहसास हो
प्रकृति और पुरुष का महारास हो,
दिगन्तों में छोटा सा अवकाश हो
नभरसर में नक्षत्र लगती हो तुम ।

जो रिश्ते सहेजे संभाले गए
उन्हीं के जनाजे निकाले गए,
न सोचा कभी जो वही हो गया
बनी मूढ़ मुजरिम सी तकती हो तुम ।

कोई मित्र मुझको न तुम सा मिला
मेरी धृष्टताओं को जिसने सहा,
कभी तुमने चाही विजय कीर्ति भी
कभी तो उदरपूर्ति लगती हो तुम।

चाँद अम्बर में उगा हो
चाँदनी है पास मेरे,
घन घटाओं में घिरे हों
किन्तु पावस पास मेरे,
आज सुर और ताल मेरे
क्यों विलम्बित हो गए हैं।

तुम्हीं आलम्बन हमारा
भाव भी अनुभाव तुम हो
तुम्हीं ने श्रंगार गाया
सर्ग लज्जा का तुम्हीं हो
आपके रसराज के
मन प्राण मधुकर हो गए हैं।

हुई सत्य ईमान की दुर्दशा
कि ली हो विधाता ने जैसे परीक्षा,
जिया खूब हंस-हंस के छल औ कपट
मगर सत्य शाश्वत ये कहती हो तुम।

प्रसिद्ध साहित्य मनीषी बलवीर सिंह करुण कहते हैं हलो जिन्दगी! कहो कैसी हो ? कहां-कहां घूम आई, क्या-क्या देख समझ आई? तुम तो चिर युवती हो, सदानीरा नदी के समान, तृप्ति से भरपूर, ऐसी रुआँसी क्यों दिख रही हो?…. रचनाकार वीना जिन्दगी से इसी अन्दाज में बतियाती हैं कभी सखी के समान तो कभी एकदम अजनबी के समान लगती रही उन्हें जिन्दगी। कभी प्रिय सखी तो कभी अजनबी लगती रही उन्हें जिन्दगी 306 छन्दों में।

साहित्यकार स्व. डॉ. दयाकृष्ण जी विजय ने इस इस पुस्तक की भूमिका में लिखा ” इस कृति को हम प्रसाद के ‘आँसू’ तथा जगदीश गुप्त की ‘सांझ की परम्परा’ की अगली कड़ी के रूप में देख सकते हैं। इसे उन्होंने जिन्दगी का खण्ड काव्य भी बताया है। भाव पक्ष इस काव्य कृति में जहाँ हृदय को छूता है, वहाँ कला पक्ष भी कम लुभावना नहीं है। यह सही है कि संगीत की मधुर गायिका होने के नाते उन्होंने उर्दू शायरों की स्वतंत्रता को हिन्दी मंच पर उतार गीत की लयात्मकता को एक नया प्रवाह दे दिया है। ”

साहित्यकार जितेन्द्र निर्मोही कहते हैं, ” मैंने जितने भी काव्य संकलन अब तक देखे, उनमें ‘जिन्दगी तुम’ बेहतर लगा । इनके दोनों काव्य संकलन दर्शन की विविधता लिये हुए हैं। ” पद्मश्री से सम्मानित कवि आशिक चक्रधर ने पुस्तक के अभिमत में लिखा है ” जिन्दगी के जितने आयाम हमारे सामने रखे हैं, वह उनके अनुभवों के खजाने से निकले हैं। हर छन्द हमारे समाज के वैविध्य रूपों को सरलता और सहजता से उकेर देता है। अनेक साहित्यिक विद्वानों ने इनकी रचना को अविस्मरणीय सृजन बताया।”

रचनाकार के प्रथम काव्य संग्रह ‘फूल खिले नीम तले’ में काव्योचित गुणों का समावेश और माधुर्य है। इस कृति पर साहित्यकार स्व.डॉ. मनोहर प्रभाकर ने अपनी सम्मति में लिखा “वीणा के बिम्ब परम्परागत हैं, किन्तु उनका प्रस्तुतीकरण और निर्वाह नए बोध के साथ जुड़ा हुआ है। कवयित्री का अंतर वर्तमान के प्रति काफी सजग है। उसकी दृष्टि समकालीन परिवेश और घटनाक्रम के पैनेपन से गहरे उतरकर बेधती है और तब काव्य शिल्प का सहारा लेकर उसकी कथा कागज पर उतर आती है। किन्तु इस पीड़ा में भी उम्मीद और आकांक्षाओं के फूल खिल रहे हैं। कवयित्री का यही आशावाद उसके सृजन में एक आकर्षण एवं शक्ति उत्पन्न करता है।” इस काव्य संग्रह का विमोचन पूर्व प्रधानमंत्री माननीय चन्द्रशेखर जी के करकमलों द्वारा हुआ। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा था, ” वीणा जी ने जीवन की कटुता में आशा के फूलों का अनुभव किया है। ”

आप यद्यपि गद्य विधा में कविताएं और छंद लिखती है परंतु और पद्य विधा में लेख , संस्मरण और समीक्षाएं भी लिखती हैं।

रचनाकार की उक्त प्रकाशित दो काव्य कृतियों कर साथ – साथ ” नीराजन (काव्य संग्रह)”, “जिन्दगी तुम -( भाग 2 काव्य संग्रह ), प्रेम तुम (काव्य संग्रह) और हिन्दी प्रबन्ध काव्यों में युग चेतना (हाड़ौती अंचल के संदर्भ में) शीघ्र आने वाली आगामी कृतियां हैं। इन्होंने तीन कृतियां का संपादन भी किया है जिनमें श्रीमती शशि सक्सेना की ‘रिटर्न गिफ्ट’ कहानी संग्रह,डॉ. महेश बंसल का ” कितना शेष हूँ – कविता संग्रह” और श्रीमती शशि सक्सेना के ” तितलियों के पंख बालगीत संग्रह” शामिल हैं। इनके आलेख, कविताएं और समीक्षाएं देश के कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं और आकाशवाणी केन्द्र कोटा ,जयपुर और
उदयपुर से कविताओं का प्रसारण हुआ है।

इन्होंने विभिन्न विषयों ज़िन्दगी, देश, भाषा, समाज, राजनीति, शृंगार, नारी, हास्य-व्यंग्य, बालगीत आदि पर कविताएं लिखी हैं। इनकी ” सैनिक की पाती ” शीर्षक से लिखी कविता की बानगी देखिए…………
पाती आई है कारगिल से, हाँ मैं वापस आऊँगा
लहरा करके तिरंगा या फिर उसमें लिपट कर आऊँगा ।
मैं माली हूँ इस गुलशन का इस गुलशन के अमन चैन का
गोली खाकर भी मैं दुश्मन सौ-सौ मार गिराऊँगा ।
मैं खेलूंगा खून से होली, तुम रंगों से गुलालों से ।
मैं बर्फीली रात में जागू, तुम नींदों के सपनों में ।
लहू मिला करके माटी में,चन्दन तिलक लगाऊँगा।
सदा मने त्यौहार देश में, जन्में नौनिहाल देश में ।
अपना आज मिटा करके मैं, कल बन करके आऊँगा ।
जो छेड़ेगा इसमी सीमा, दूभर कर दूँ, उसका जीना ।
स्वर्ग मेरे कश्मीर की वादी, मीट कर भी महकाऊंगा।
उड़े तिरंगा लाल किले पर, सदके अमर जवान ज्योति पर ।
जल-थल अम्बर की सेना में, प्राण फूंक मैं आऊँगा ।

कन्या के प्रति समाज की सोच और भ्रूण के रूप में ही उसे खत्म करने के आधुनिक समाज पर व्यंग्य है इनकी यह रचना का यह अंश…
कन्या भ्रूण
मैं कौन हूँ?
क्या एक इन्सान हूँ ?
नहीं!
यदि मैं इन्सान होती
तो इन्सान भ्रूण में ही
मेरी हत्या नहीं कर देता ।
लेकिन, जो लोग भ्रूण में ही
मेरा अस्तित्व मिटा देते हैं,
दरअसल –
वो इन्सान ख़ौफजदा हैं
मेरे जैसे जन्तु के अवतरण से
जहां-जहां भी ये जन्तु जन्म ले लेता है
दुर्भाग्य का दानव सिर पर मंडराने लगता है।
मेरा पिता कहलाने वाला इन्सान,
स्वयं की पत्नी नामक जन्तु की
जिम्मेदारी से ही नहीं उबर पाया था कि,
पुनः कन्या जन्म का वज्रपात,
एक व्यर्थ मानी जाने वाली वस्तु के लिए,
लाखों के दहेज की गठरी की व्यवस्था
उस गठरी के नीचे दिन-दिन दबता
पिता नामक इन्सान।

पर्यावरण से प्रेरित सृजन ” पेड़ ” नामक रचना में देखने को मिलता है ………….
जो मैं होती वृक्ष घनेरा,
पंछी सुन्दर करें बसेरा ।
पेड़ झूमकर नर्तित होते,
गुजित पक्षी कलरव करते ।
जीवन का संगीत सिखाता,
उजला-उजला रोज सवेरा । जो मैं ……….
शाखें मेरी झुकी फलों से,
दोनों हाथों से मैं देती।
अहंकार मेरा मिट जाता,
सरल – तरल मेरा मन होता ।
बैठ कदम्ब बांसुरी बजाता,
मोर मुकुट धर जगत चितेरा । जो मैं….

सामाजिक व्यवस्था पर ” एक नया युग ” में वे लिखती हैं……………..
काफिये रदीफ जोड़ कर, एक नया युग चलो लिखें।
हाशिये लकीर जोड़ कर, एक पृष्ठ शान्ति का रचें ।
धुएँ को उजास चाहिये, निराशा को आस चाहिये ।
पी सको अगर समुद्र तुम, अन्तहीन प्यास चाहिये ।
जमीं कायनात जोड़ कर, एक नए क्षितिज तक चलें ।
वक्त का लबरेज जाम था, पी सके न एक घूंट हम ।
शाख समय की झुकी रही, घड़ी पल न तोड़ सके हम ।
एक-एक तृण बटोरकर, एक नया नीड़ हम रचें।
सत्य फटे हाल में खड़ा छद्म रेशमी लिबास में ।
झूठ के सिर सेहरा बंधा, स्वार्थ के सगे बरात में ।
अंक और शून्य जोड़कर, दूर तक अनन्त हम लिखें ।
यज्ञ ध्वंस कर दिया गया, मूल्य बिक रहे हैं हाट में ।
न्याय खड़ा शीश धुन रहा, कपट सो रहा है ठाठ से ।
संग हवाओं का गर मिले, इक नई परवाज़ पर चलें ।
पा एग श्रृगाल सुरक्षा, सिंह सब शहीद हो गए ।
गिद्ध भोज अनवरत चला,हंस चतुर्मास कर रहे ।
एक-एक बूंद जोड़कर, प्रेम का अमोल घट भरें ।
कुर्सियाँ इमोशनल हुईं,आदमी लुकाठ हो गया।
शक्ति समर्पण किए खड़ी,आदमी ये ध्वंस बन गया ।
साज सरगमों से जोड़कर, एक नया गीत फिर बजे ।
सत्ता में फील गुड हुआ, जनता बेहाल हो रही । सत्ता ने ईद मनाई, जनता कुर्बान हो रही ।
एक-एक स्वार्थ छोड़कर, आओ सभी फील गुड करें।।

ये अनेक साहित्यिक कार्यक्रमों की सूत्रधार भी रही। इनकी साहित्यिक सक्रियता के सफर में अनेक पड़ावों पर कई साहित्यिक आयोजन इन्होंने किए। भारतेन्दु समिति भवन’ में राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर के तत्वावधान में आयोजित “लेखिका सम्मेलन “,

” सूचना केन्द्र,कोटा में राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर’ के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम, सूचना केन्द्र कोटा में राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम”,”अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ पर 8 मार्च 2017 को ‘राजस्थान लेखिका सम्मेलन’, तथा “डीएवी स्कूल सभागार में ह्यूस्टन (यू.एस.ए.) के ‘रामचरित भुवन’ संस्था के अध्यक्ष श्री ओमप्रकाश के. गुप्ता के भारत (कोटा) आगमन पर आयोजित कार्यक्रमों में इनके संयोजन और सक्रिय भागीदारी से यादगार बन गए। ये कार्यक्रम आज तक भी साहित्यकारों की स्मृतियों में हैं।

संस्मरण विधा के तहत इनके पिछले 5 सालों में कई बार अमेरिका प्रवास पर इन्होंने अमेरिका एवं प्रवासी भारतीयों के संदर्भ में “हिन्दुस्तान से बाहर हिदी का स्थान” पर अपने संस्मरण भी लिखे हैं। इनके संस्मरण के कतिपय अंश, लिखती हैं “जब कहीं राष्ट्रभाषा हिन्दी की बात चलती है, अखबारों में कुछ छपता है तो मेरे मन में यही बात उठती है कि कब हम हमारे देश में ही हिन्दी को महत्व देंगे ? कब हमारी भाषा को और हमें इंग्लैंड या अमेरिका में हेय दृष्टि से नहीं देखा जाएगा।

हिन्दुस्तान में जो अंग्रेजी बोलने में दक्ष नहीं हैं, कब हीन भावना से बाहर आयेंगे ?” वे लिखती हैं ” दुनियाभर के देशों में आज हिन्दी को बढ़ावा मिल रहा है। देश की कुल जनसंख्या मे आज 65 प्रतिशत लोग हिन्दी भाषा को जानने व समझने वाले हैं, मात्र 5 प्रतिशत लोग ही अंग्रेजी भाषा को बोलते, जानते व समझते हैं। बाकी 30 प्रतिशत गैर हिन्दी तथा अंग्रेजी भाषी लोग तमिल, तेलगू और बंगला आदि भाषाओं को जानते हैं ।

मैंने अमेरिका प्रस्थान के पहले दिन से ही, लन्दन के हीथ्रो एयरपोर्ट से लेकर अमेरिका के बोस्टन शहर तक उनकी भाषाई सभ्यता पर गौर करना आरम्भ कर दिया था । ” मेरा तुलनात्मक अध्ययन चल रहा था , सोच रही थी क्या अंग्रेजी अधिक व्यवस्थित भाषा है ? किन्तु लग रहा था – अंग्रेजी हिन्दी से कम व्यवस्थित है । हिन्दी में जो बोला जाता है वही लिखा जाता है जब की अंग्रेजी में नहीं।” इन्होंने लिखा, ” हिन्दी भाषा के प्रति प्रेम और सम्मान है प्रवासी भारतीयों के दिल में। और जब हम स्वयं हमारे राष्ट्र और भाषा के गौरव एवं सम्मान से आश्वस्त होंगें, हिन्दी को अंग्रेजी से श्रेष्ठ समझेंगे तभी हम विदेशियों के मन में भी भारत, भारतीयों तथा हिन्दी के प्रति समानता, आदर तथा सम्मान का भाव पैदा कर सकेंगे । फिल्म इंग्लिश-विंग्लिश में अमिताभ बच्चन का वह डायलॉग याद आ रहा है – बेशक, बेझिझक और बिंदास हिन्दी बोलिये। और भी बहुत से अनुभव इन्होंने अपने इस संस्मरण में लिखे हैं।

परिचय :
जीवन में संवेदनशील पारखी सृजनकार के रूप में विगत अर्द्ध शताब्दी से अधिक समय से लेखन में रत रचनाकार डॉ.वीना अग्रवाल का जन्म 6 दिसम्बर 1949 ग्राम उत्तरप्रदेश में इलाहबाद के ग्राम जुनिया में पिता ओम प्रकाश गर्ग एवं माता चन्द्रकांता गर्ग के आंगन में हुआ। आपका विवाह कोटा के लीलाधर अग्रवाल (एडवोकेट) के साथ हुआ। साहित्य सृजन के क्षेत्र में आपको विभिन्न प्रतियोगिताओं और सृजन के लिए विविध संस्थाओं द्वारा समय-समय पर सम्मानित किया गया। आपको प्रमुख रूप से ‘साहित्य श्री’ सम्मान,”सलिला साहित्य रत्न”,”शब्द शिल्पी” सम्मान के साथ – साथ “अमृता प्रीतम नेशनल पोइट्री अवार्ड एवं पोइट्री क्वीन अवार्ड” से सम्मानित किया गया है।
चलते – चलते इनकी देशभक्ति पूर्ण रचना के कुछ अंश………
हिन्दी वतन की आत्मा है, हिन्द की पहचान है।
हिन्दी हमारा स्वर मुखर, हिन्दी हमारा गान है।।
माता है ये, ममता है ये, ये एकता समता यही,
गीता है ये, ये रामधुन, भागीरथी सरिता यही ।
ये तो हमारी वेदना, ये तो हमारा प्राण है,
हिन्दी हमारा स्वर मुखर हिन्दी हमारा गान है ।। सब रंग इसमें देश भाषाओं के शामिल हो गए,
ये है रंगोली, देश के घर द्वार इससे सज गए ।इसको नमन जन-जन करें, ये तो हमारी शान है।

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